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मेहनत किसान की [कविता] - रवि श्रीवास्तव

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आखिर हम कैसे भूल गये, मेहनत किसान की,
दिन हो या रात उसने, परिश्रम तमाम की।


 रवि श्रीवास्तव रचनाकार परिचय:-



लेखक, कवि, व्यंगकार, कहानीकार, फिलहाल एक टीवी न्यूज ऐजेंसी से जुड़े हुए है।

जाड़े की मौसम वो, ठंड से लड़े,
तब जाके भरते, देश में फसल के घड़े।

गर्मी की तेज धूप से, पैर उसका जले,
मेहनत से उनकी देश में, भुखमरी टले।

बरसात के मौसम में, न है भीगने का डर,
कंधों पर रखकर फावड़ा, चल दिये खेत पर।

जिनकी कृपा से आज भी,चलता है सारा देश,
सरकार उनके बीच में, पैदा होता मतभेद।

मेहनत किसान की, कैसे भूल वो रहे,
कर्ज़, ग़रीबी, भुखमरी से, तंग हो किसान मरे।

दूसरों का पेट भर, अपनी जान तो दी,
आखिर हम कैसे भूल गये , मेहनत किसान की।

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