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अरे उठो वीरो क्यों चुप हो [कविता]- श्रीप्रकाश शुक्ल

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फर्क नहीं कुछ दिखता हमको कायरता और शराफत में
मतलब क्या चुप हो बैठें हम नादानी और हिमाकत में
क्षमा उसी को शोभा देती जो सच में ज़हर उगल सकता है
बदला निपात का हो विघात, तो माहौल बदल सकता है


 श्रीप्रकाश शुक्ल रचनाकार परिचय:-



श्रीप्रकाश शुक्ल
जन्म १७ अक्टूबर १९४०
अध्ययन : स्नातकोत्तर भौतिक विज्ञानं विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन १९६१,प्रथम स्थान,स्वर्ण पदक
M Tech ( Electical Engg) IIT BOMBAY
कार्य : प्रवक्ता भौतिक विज्ञानं २ बर्ष
भारतीय वायु सेना इंजीनियरिंग ब्रांच २६ बर्ष
आसामयिक अवकास Wing Commander के पद से
Gas Authrority of India ltd 8 years उप महाप्रवंधक
Dectra Sendirian Berhad ( मलेसिया) समूह महाप्रवन्धक
कार्य जिसपर गर्व है : १९६५ के पाक युध्ध में वायु सेना का प्रथम प्रक्षेपण अश्त्र ( SAM II missile )शत्रु के सीमा में घुस आये वायुयान पर छोड़ने का गौरव I
काव्य रूचि : बचपन से ही स्वान्तः सुखाय कविता लिखने में रूचि
परिवार : पत्नी, तीन पुत्रिया और एक पुत्र सभी USA और England में
निवास : दिल्ली और अमेरिका लन्दन में

अरे उठो वीरो क्यों चुप हो किसकी तुम्हें प्रतीक्षा अब है
अठारह सह्स्र जब चीख उठें, शूरों की सार्थकता तब है
घर घर में घुस ढूढ़ निकालो जिसने ऐसा अंजाम दिया
सारे जग को आज बता दो, किसने माँ का दूध पिया

नहीं तनिक भी आवश्यक हम जग के आगे रोना रोयें
प्रत्युत्तर ऐसा सटीक हो सदियों तक हम चैन से सोयें
यदि देश पडोसी कोई भी दे रहा समर्थन इस जघन्य को
तो ऐसा पाठ पढ़ाओ उसको फिर न छेड़े किसी अन्य को

याद करो चाडक्य नीति जो कुश की धृष्टता मिटाने को
देती सलाह संकल्पित हो मौलिक आलंबन निबटाने को
आज ज़रूरी है हम इनकी अति विस्तारित जड़ें मिटायें
ऐसे दुः साहस पूर्ण कृत्य जिस से अपना सर न उठायें

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