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देवी-पूजा [लघुकथा]- सुरेखा शर्मा

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आँख खुलते ही हर रोज की तरह आज भी रसोईघर से मम्मी की आवाज के साथ -साथ बरतनों की उठा-पटक की आवाज सुनाई दी, पर हैरानी की बात आज कामवाली बाई की आवाज नहीं आ रही थी। जाकर देखा तो माँ नौकरानी की बेटी को डाँट रही थी जो रोते-सुबकते रात के झूठे पड़े बरतनों को रगड़-रगड़ कर माँजते हुए अपनी मैली-कुचैली आस्तीन से आँसुओं को भी पौंछ रही थी ताकि कोई देख न ले।

 सुरेखा शर्मा रचनाकार परिचय:-

सुरेखा शर्मा(पूर्व हिन्दी/संस्कृत विभाग)
एम.ए.बी.एड.(हिन्दी साहित्य)
६३९/१०-ए सेक्टर गुडगाँव-१२२००१.
email. surekhasharma56@gmail.com
चलभाष-09810715876

उसकी मासूमियत देखते हुए मैनें मम्मी से कहा,"मम्मी! क्यों डाँट रही हो उसे?"
माँ तेज स्वर में बोली, "जानती हो, आज से नवरात्र पूजा शुरू हो रही है, मैंने कल ही इसकी माँ को जल्दी आने को कह दिया था और उस महारानी ने इसे भेज दिया। ये कहती है कि माँ को बुखार है। सारा काम पड़ा है, मुझे मन्दिर की सफाई भी करनी है, माँ का सिंगार करने देवी मन्दिर भी जाना है?"
"माँ! देखो ना, वो कितनी छोटी-सी है, फिर भी कितना काम कर रही है?"
"तुम नहीं जानती बेबी, ये लोग छोटे तो होते ही हैं साथ ही कामचोर भी होते हैं। जिस दिन भी घर में काम ज्यादा हो तो इनके बहाने शुरू हो जाते हैं।" 'ए लड़की, जल्दी-जल्दी हाथ चला। क्या मेंहदी लगी है? तुम इस पर निगरानी रखना, मैं मन्दिर जा रही हूँ देवी-पूजा करने।'
'मम्मी.....! घर में आई देवी का तो आप अपमान कर रही हैं और मन्दिर में पत्थर की मूर्ति की पूजा करने जा रही हैं?' इतना सुनते ही मम्मी ने मेरे गाल पर जोर से तमाचा जड़ दिया, जिसकी आवाज़ सारे घर में गूँजती रही।

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