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इंक़लाब [नज़्म] - विश्वदीप "जीस्त"

मुझसे इस वास्ते ख़फ़ा हैं हमसुख़न मेरे
मैंने क्यों अपनी क़लम से न लहू बरसाया
मैंने क्यों नाजुक-ओ-नर्म-ओ-गुदाज गीत लिखे
क्यों नहीं एक भी शोला कहीं पे भड़काया

मैंने क्यों ये कहा कि अम्न भी हो सकता है
हमेशा ख़ून बहाना ही जरूरी तो नहीं
शमा जो पास है तो घर में उजाला कर लो
शमा से घर को जलाना ही जरूरी तो नहीं

मैंने क्यों बोल दिया जीस्त फ़क़त सोज नहीं
ये तो इक राग भी है, साज भी, आवाज भी है
दिल के जज़्बात पे तुम चाहे जितने तंज करो
अपने बहते हुए अश्कों पे हमें नाज भी है

मुझपे तोहमत लगाये जाते हैं ये कि मैंने
क्यों न तहरीर के नश्तर से इंक़लाब किया!
किसलिये मैंने नहीं ख़ार की परस्तिश की!
क्यों नहीं चाक-चाक मैंने हर गुलाब किया!

मेरे नदीम! मेरे हमनफ़स! जवाब तो दो-
सिर्फ परचम को उठाना ही इंक़लाब है क्या?
कोई जो बद है तो किर बद को बढ़के नेक करो
बद की हस्ती को मिटाना ही इंक़लाब है क्या?

दिल भी पत्थर है जहां, उस अजीब आलम में 
किसी के अश्क को पीना क्या इंक़लाब नहीं?
मरने-मिटने का ही दम भरना इंक़लाब है क्या?
किसी के वास्ते जीना क्या इंक़लाब नहीं?

हर तरफ़ फैले हुए नफ़रतों की दुनिया में 
किसी से प्यार निभाना क्या इंक़लाब नहीं?
बेग़रज सूद-ओ-जियां के रवायतों से परे
किसी को चाहते जाना क्या इंक़लाब नहीं?

अपने दिल के हर एक दर्द को छुपाये हुए
ख़ुशी के गीत सुनाना भी इंक़लाब ही है
सिर्फ नारा ही लगाना ही तो इंक़लाब नहीं
गिरे हुओं को उठाना भी इंक़लाब ही है

तुम जिसे जिसे इंक़लाब कहते हो मेरे प्यारों
मुझसे उसकी हिमायत न हो सकेगी कभी
मैं उजालों क परस्तार हूं, मेरे दिल से
घुप अंधेरों की इबादत न हो सकेगी कभी

ख़फ़ा न होना मुझसे तुम ऐ हमसुख़न मेरे
इस क़लम से जो मैं जंग-ओ-जदल का नाम न लूं
ये ख़ता मुझसे जो हो जाये दरगुजर करना
जिक्र बस जीस्त क करूं, क़जा का नाम न लूं


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