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लाला जगदलपुरी की एक बाल कविता - करती हवा बहुत शैतानी

[दिनांक 17.12.15, लाला जगदलपुरी जी की जयंति से आरंभ सात दिनों की विशेष श्रंखला में आज पढें उनकी एक बाल कविता।]

करती हवा बहुत शैतानी
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करती हवा बहुत शैतानी!
दूर-दूर तक दौड़ लगाती,
इस पर उस पर धूल उड़ाती।
यहाँ-वहाँ के कचरे लाकर,
बिखरा जाती घर-आँगन भर।
बार-बार करती मनमानी,
करती हवा बहुत शैतानी!

चाहे जिसके बाल हिलाती,
कपड़े तितर-बितर कर जाती।
भड़का देती तेज-आग को,
बुझा-बुझा देती चिराग को।
अनदेखी, जानी-पहचानी,
करती हवा बहुत शैतानी!

पर जब-जब वह डाल हिलाती,
और टपाटप फल टपकाती।
हमें सहेली-सी लगती है,
एक पहेली-सी लगती है।
सिर-आँखों पर यह नादानी,
करती हवा बहुत शैतानी!

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