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जगदलपुर गोलीकाण्ड के विरोध में लाला जगदलपुरी की रचना



[वर्ष 1966 में जगदलपुर राजमहल में हुए गोली काण्ड के विरोध में क्या साहित्यकार मुखर नहीं थे इस प्रश्न ने मुझे उस दौर की रचनायें टटोलने पर बाध्य किया। यह सु:खद है कि दुष्यंत कुमार जैसे हिन्दी के ख्यातिनाम शायर ने अपनी एक ओजस्वी रचना महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव की हत्या के विरोध में लिखी थी। इस कड़ी में लाला जगदलपुरी की रचना अधिक महत्व की इस लिये है चूंकि तत्कालीन दमन और प्रशासन की दाँत के बीच मुखर विरोध करना असधारण बात थी यही कारण है कि लाला जगदलपुरी की प्रस्तुत रचना का साहित्यिक ही नहीं अपितु इतिहास के दृष्टिगत भी महत्व है। यह रचना सिद्ध करती है कि लाला जगदलपुरी एक साहसिक रचनाकार थे। - राजीव रंजन प्रसाद]

प्रशासक बन गये ऐसे कसाई,
अहिंसा तिलमिलाई छटपटाई॥  

दु:खी मनुष्य के वे पहरुए थे,
प्रताड़ित स्वत्व के वे पहरुए थे,
अनाहूत सत्य के वे पहरूए थे,
अकल्पित तथ्य के वे पहरुए थे।

हृदय की दृष्टि के आदर्श थे वे,
प्रकृति की सृष्टि के आदर्श थे वे,
मनोरम झाड़ियों के फूल थे वे,
सुरम्य पहाड़ियों के फूल थे वे,
दुरावों के दृगों के शूल थे वे,
हृदय के नृपति के अनुकूल थे वे।

श्रमिक कर्तव्यनिष्ठ सुजान थे वे,
सरलता के प्रतीक, महान थे वे,
कपट के छद्म के अंजान थे वे,
कथित असभ्य, अति गुणवान थे वे,
कुटीरों के गरीब किसान थे वे,
स्वयं उपमेय थे, उपमान थे वे।

कभी ऊबे नहीं तनहाईयों से,
कभी हारे नहीं कठिनाईयों से
उन्हें शोषण दबाता जा रहा था,
उन्हें शासन दबाता जा रहा था,
सहन अन्याय को वे कर न पाये,
वहन अन्याय को वे कर न पाये।

विरोधी बन गये दुर्भावना के,
विपक्षी बन गये दुष्कर्मणा के,
महल में गोलियों की रात आयी,
वहाँ पर रक्त की बरसात आयी,  
जहाँ पर गूंजती किलकारियाँ थी,
जहाँ पर पय पिलाती नारियाँ थी,
जहाँ पर गर्भिणी सुकुमारियाँ थी,
वहाँ पर दमन की तैयारियाँ थी।
 किया खुल कर परिश्रम क्रूरता ने,
दिखाई शक्ति अनुपम शूरता ने,
अनय का गर्व सचमुच भयंकर था,
मरण का पर्व सचमुच भयंकर था,
प्रशासक बन गये ऐसे कसाई,
अहिंसा तिलमिलाई छटपटाई।

विगत शासक प्रवीर उदार दानी,
बहादुर, कष्ट दर्शी, स्वाभिमानी,
कि जो थे नयनतारे आदिमों के,
कि जो थे प्राणप्यारे आदिमों के,
रुधिर उनका बहाया गोलियों से,
उन्हें छलनी बनाया गोलियों से।
 
फ़कत अन्याय पर था रोष उनका,
नहीं था और कोई दोष उनका,
समर्पण की दिशा में बह गये जो,
गंवा कर प्राण मन में रह गये जो,
उन्हें विश्वास अपने पीर पर था,
भरोसा लोचनों के नीर पर था।

अनय का सामना जो कर चुके हैं,
सुरभि अपनी लुटा कर झर चुके हैं,
उन्हें बागी कहा, लांछन लगाया,
उन्हें दागी कहा, लांछन लगाया,
बहुत विश्वास था परमात्मा पर,
करारी चोट पहुँची आत्मा पर
उन्हें खो कर बहुत व्याकुल चमन है।
उन्हें श्रद्धा सहित मेरा नमन है।।

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