आज मशहूर उर्दू शायर वसीम बरेलवी साहब के जन्मदिन के मौके पर साहित्यशिल्पी परिवार की तरफ़ से उन्हें हार्दिक शुभकामनायें! इस मौके पर आइये पढते हैं आपकी दो बेहद लोकप्रिय गजलें:
1)
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे 
घर सजाने का तस्सवुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे 
क़हक़हा आँख का बर्ताव बदल देता है
हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आयें कैसे 
कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा
एक क़तरे को समुन्दर नज़र आयें कैसे

2)
आपको देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया

आते-आते मेरा नाम-सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया

वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मैं था कि सच बोलता रह गया

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया

2 comments:

  1. लाज़वाब शायर वसीम बरेलवी साहब के जन्मदिन के मौके पर बेहतरीन गजल के लिए मुबारिकबाद

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