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बसंत [कविता]- वर्षा ठाकुर

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 वर्षा ठाकुर रचनाकार परिचय:-







नाम : वर्षा ठाकुर
शिक्षा: बी ई (इलेक्ट्रिकल)
पेशा: पी एस यू कंपनी में अधिकारी
मेरा ब्लौग: http://varsha-proudtobeindian.blogspot.in



तुम बसंत हो
तुम तब आते हो
जब लू के थपेड़ों से
तपकर सिकी
रिमझिम लड़ियों से
सीली पड़ी
तूफाँ के तेवर से
थर थर हिली
थककर गिरी
औंधी पड़ी
एक जीवन की लौ
अपने होने की वजह
तलाशने लगती है।
तुम आते हो
हाथ थाम,
उसे उठाते हो
कुछ उसकी सुनते हो
कुछ अपनी बताते हो।
सीलनों को हवा देकर
जख्मों को दवा देकर
ऋतु के अगले चक्र के
काबिल बनाते हो,
फिर मिलने का
वास्ता देकर
चले जाते हो
कुछ सुस्ताने के लिए
फिर लौट आने के लिये
जीवन को, जीने की
वजहें बताने के लिये।



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6 टिप्पणियाँ

  1. वर्षा जी, आपकी बसंत ये कविता बहोत अच्छी लगी.
    keep it up .....................

    जवाब देंहटाएं
  2. बसंत का आना जिंदगी में बहार का आना है

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  3. रमेश कुमार20 अप्रैल 2016 को 10:08 am

    बसंत की अच्छी चित्रण ...

    जवाब देंहटाएं

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