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इक गँवार लोकतंत्र के लिए [कविता]- सुशील कुमार शैली

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इक शांतिपूर्ण हत्याकाण्ड के बाद
शहर की अँधी गलियों में
ढूँढता हूँ इक शब्द
जिसे उस जगह पर रख
कर सकूँ मातम
कि अब इस व्यवस्था के कहीं किसी भी कोने में
नहीं है कोई शब्द
सिवाय 'लोकतंत्र' के
जो हर बार भोजन करते समय
जबड़े के ठीक नीचे कंकर सा आ जाता है
और मेरे बाबा छोड़ देते हैं भोजन
बेबसी, लाचारी के कारण,
क्यों कि कंधे पर लाशों को लिए
स्तुति करने की आज्ञा
न घुटने देेते हैं न ही जुबान,
 सुशील कुमार शैली रचनाकार परिचय:-

नाम: सुशील कुमार शैली 
जन्म तिथि-02-02-1986 
शिक्षा- एम्.ए. (हिंदी साहित्य), एम्.फिल्, नेट| 
रचनात्मक कार्य - तल्खियाँ (पंजाबी कविता संग्रह), सारांश समय का, कविता अनवरत-1 (सांझा संकलन)| कुम्भ, कलाकार, पंजाब सौरभ, शब्द सरोकार, परिकथा पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित 
सम्प्रति-सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, एस.डी.कॅालेज, बरनाला 
पता- एफ.सी.आई.कॅालोनी, नया बस स्टैंड, करियाना भवन, नाभा, जिला-पटियाला(पंजाब)147201 मो.-9914418289 
ई.मेल-shellynabha01@gmail.com

शहर को आती इक सड़क पर 
गाँव के जाते कदमों के निशान
को देख, बरसों वहाँ बैठे रहते थे
प्राणायाम की मुद्रा में
कि कहीं वो जब वापस आएगा, अपने
साथियों के खाली झोलों के साथ
तो उसे पास के किसी डेरे से उठाकर
समाध की चादर
कछोरा और कुछ लोक गीत दे देंगे
पीपल के किसी पेड़ के नीचे
इक गवार लोकतंत्र की पुन: स्थापति के लिए,

कि जहाँ बहसें दस्तावेजों के किसी प्रथमाक्षर
या
तथ्यों के जिवाणुओं के किसी सार से शुरू नहीं होती
'करमे' किसान के खुले ठहाके सी खुलती वह
'मरुये' के फटे हुए पाँव से होती
गाँव के सबसे बुजुर्ग 'जगजीवन' की झुर्रियों और
पोपले मुँह पर पहुँचती है
जहाँ आदमी को ठीक सामने से समुचा देखा जाता है
इन्कारी नहीं होते उसके सामने के हाथ
हाथों की किसी अटूट कड़ी के लिए
कि न ही वे
दीवार को जवाबदेह हैं किसी हँसते हुए आदमी के
ठहाकों के लिए
क्यों कि वहाँ आदमी का मरना कोई हादसा नहीं
न ही शब्दों को रखा जाता है
आँख में पुतली की जगह
वहाँ फलों के पेड़ पर फल
फूलों के पेड़ पर फूल
ही लगते हैं
वहाँ घास को घास नहीं दुब
जानवर को जानवर नहीं दरवेस कहते हैं
जानवर चिड़ियाघर में इंसानों के दिल में रहते हैं
हवाएँ दूर से नहीं
पास से होकर बहती हैं
पानी में आदमी को उसका चेहरा साफ़ दिखता है|

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