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30 दान [लघुकथा]- आलोक कुमार सातपुते

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 आलोक कुमार सातपुते रचनाकार परिचय:-


आलोक कुमार सातपुते
832 हाउसिंग बोर्ड कालोनी सड्डू रायपुर छग
मोबाइल नं 09827406575




‘ये देखो, एक घुमक्कड़ बाबा ने मुझे मोती-मूँगा और पुख़राज रत्न दिया और मैंने उसे सिर्फ़ सौ रूपये टिका दिया...मानते हो कि नहीं, कि हम भी उस्ताद हैं।’
‘‘अरे यार ये तो कोई अन्धा भी बता देगा कि ये रत्न नक़ली हैं। इस मोती की तो पाॅलिष भी निकल रही है। ये रत्न तो दस रूपये में भी महँगे हैं।’’
‘छोड़ो ना यार, वो बाबा बड़ा ही सिद्ध पुरूष था। उसने मुझे भरपूर दुआएँ दीं। आज जहाँ माँ-बाप तक अपने बच्चों को पानी पी-पीकर कोसते हों, वहाँ उसने मुझे दुआएँ दी...समझो मैंने उसे उसकी दुआओं के बदले में पैसे दे दिये।’
‘‘अरे भइया ऐसे में तो हर आदमी दुआओं का कारोबार शुरू कर देगा।’’
‘अरे यार आप तो हमेषा निगे़टिव सोचते हो। अरे भाई दान-घरम भी तो कोई चीज है। समझो हमने सौ रूपये दान कर दिये।’


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1 टिप्पणियाँ

  1. अंग्रेजी सभ्यता में पले लोगों का यह हाल है, जो दुआ को भी कारोबार समझ लेते हैं ! घर में विराज़मान मां-बाप से सच्ची दुआए मिल सकती है, मगर बाहर रोते फिरेंगे दुआ के बाज़ार में ! कहानी कड़वे सत्य का उजागर कर रही है ! -दिनेश चन्द्र पुरोहित dineshchandrapurohit2@gmail.com

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