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स्वप्न [कविता] - डॉ महेन्द्र भटनागर

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बदली छायी
 डा. महेंद्र भटनागर रचनाकार परिचय:-


डा. महेंद्रभटनागर
सर्जना-भवन, 110 बलवन्तनगर, गांधी रोड, ग्वालियर -- 474 002 [म. प्र.]

फ़ोन : 0751-4092908 / मो. 98 934 09793
E-Mail : drmahendra02@gmail.com
drmahendrabh@rediffmail.com

पागल सिरफिरे किसी भटनागर ने
माननीय प्रधान-मंत्री ---- की
हत्या कर दी,
भून दिया गोली से!!
ख़बर फैलते ही
लोगों ने घेर लिया मुझको -
‘भटनागर है,
मारो --- मारो --- साले को!
हत्यारा है --- हत्यारा है!’
मैंने उन्हें बहुत समझाया
चीख-चीख कर समझाया -
भाई, मैं वैसा ‘भटनागर’ नहीं!
अरे, यह तो पफ़कत नाम है मेरा,
उपनाम (सरनेम) नहीं।
मैं ‘महेंद्रभटनागर हूँ,
या ‘महेंद्र’ हूँ
भटनागर-वटनागर नहीं,
भई, कदापि नहीं!
ज़रा, सोचो-समझो।
लेकिन भीड़ सोचती कब है?
तर्क सचाई सुनती कब है?
सब टूट पड़े मुझ पर
और राख कर दिया मेरा घर!!
इतिहास गवाही दे –
किन-किन ने / कब-कब / कहाँ-कहाँ
झेली यह विभीषिका,
यह जुल्म सहा?
कब-कब / कहाँ-कहाँ
दरिन्दगी की ऐसी रौ में
मानव समाज हो पथ-भ्रष्ट बहा?
वंश हमारा / धर्म हमारा
जोड़ा जाता है क्यों
नामों से, उपनामों से?
कोई सहज बता दे-
ईसाई हूँ या मुस्लिम या फिर हिन्दू हूँ।
(कार्यस्थ एक, शूद्र कहीं का!)
कहा करे कि
‘नाम है मेरा - महेंद्रभटनागर,
जिसमें न छिपा है वंश, न धर्म!’
(न और कोई मर्म!)
अतः कहना सही नहीं -
‘क्या धरा है नाम में!’
अथवा ‘जात न पूछो साधु की।’
हे कबीर! क्या कोई मानेगा बात तुम्हारी?
आिख़र, कब मानेगा बात तुम्हारी?
‘शिक्षित’ समाज में,
‘सभ्य सुसंस्कृत’ समाज में
आदमी - सुरक्षित है कितना?
आदमी - अरक्षित है कितना?
हे सर्वज्ञ इलाही,
दे, सत्य गवाही!


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