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तेरा मिलना अजाब हो जैसे [ग़ज़ल] - गुमनाम पिथौरागढ़ी

Ishq-Faiz

रचनाकार परिचय:-



नवीन विश्वकर्मा (गुमनाम पिथौरागढ़ी)
ज़िन्दगी इक सराब हो जैसे
कोई जलता आफताब हो जैसे

कोई खुलकर मिले नहीं अब तो
शख्स हर इक नकाब हो जैसे

ज़ख्म मिलते हैं किश्तों मे गोया
गम का बाकी हिसाब हो जैसे

रोज किरदार बदले है वो तो
मानो कोई किताब हो जैसे


तिनका तिनका शज़र खयालों का
तेरा मिलना अजाब हो जैसे

कहते हैं सब महकता हूँ मै
याद तेरी गुलाब हो जैसे


तू भी गुमनाम है यकीं काबिल काबिल
दिखता लेकिन खराब हो जैसे

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