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बदले सोच हमारे [लोक-शैली ’रसिया’ पर आधारित तेवरी] - रमेशराज

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रमेशराजरचनाकार परिचय:-


रमेशराज,
15/109, ईसानगर,
अलीगढ़-२०२००१

+|| हमको प्यारे हैं ||
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त्यागी वे चौपालें, मन की व्यथा जहाँ बतिया लें
अब तो चिलम-‘बार के हुक्का’ हमको प्यारे हैं।

नूर टपकता हरदम, उन बातों से दूर हुए हम
लुच्चे लपका लम्पट फुक्का हमको प्यारे हैं।

हर विनम्रता तोड़ी, हमने रीति अहिंसक छोड़ी
गोली चाकू घूँसा मुक्का हमको प्यारे हैं।

कोकक्रिया के अंधे, हमने काम किये अति गन्दे
गली-गली के छिनरे-लुक्का हमको प्यारे हैं।

धर्म-जाति के नारे, यारो अब आदर्श हमारे
सियासी धन-दौलत के भुक्का हमको प्यारे हैं।



+|| पीछे-पीछे है ||
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बदले सोच हमारे, हम हैं कामक्रिया के मारे 
अबला जिधर चले इक छिनरा पीछे-पीछे है।

दालें भरें उछालें, कैसे घर का बजट सम्हालें
मूँग-मसूड़-उड़द के मटरा पीछे-पीछे है।

देखा दाना बिखरा, चुगने बैठ गयी मन हरषा
चिडि़या जान न पायी पिंजरा पीछे-पीछे है।

मननी ईद किसी की, कल चमकेगी धार छुरी की
कसाई आगे-आगे बकरा पीछे-पीछे है।

साधु नोचता तन को, कलंकित करे नारि-जीवन को
अंकित करता ‘रेप’ कैमरा पीछे-पीछे है।

आज जागते-सोते, हम अन्जाने डर में होते
लगता जैसे कोई खतरा पीछे-पीछे है।
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