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ऐसा क्यों होता है [कविता]- मनोरंजन कुमार तिवारी

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केवल शब्द ही,

 मनोरंजन कुमार तिवारी रचनाकार परिचय:-



नाम:- मनोरंजन कुमार तिवारी जन्म तिथि:- 06/01/1980 जन्म स्थान:- भदवर, जिला- बक्सर, बिहार पिता का नाम:- श्री कामेश्वर नाथ तिवारी गाँव:- भद्वर, जिला- बक्सर, बिहार वर्तमान पत्ता:- C/o- कर्ण सिंह, गाँव- घिटोरनी, नजदीक "तालाब",नई दिल्ही-30 मोबाइल न.- 9899018149 Email ID- manoranjan.tk@gmail.com

अजर है,
अमर है,
सार्थक है,
बाकी सब नाश्वर है पार्थ!
तुम जो भी कर्म करते हो,
शब्द संरचना हेतु ही करते हो,
शब्दों के बिना,
हर कर्म निरर्थक है पार्थ!
सोचो क्या मिला किसी शाहंशाह को?
उतना ही ना,
जीतना एक फ़कीर को भी नशीब हो जाता है,
सब शब्दों का व्यापार है पार्थ!
ये भय, भूख और भगवान,
भक्ति, आसक्ति और निर्वाण,
सब शब्दों की बाज़ीगरी है पार्थ!
शब्दों ने ही किसी को फुल कहा,
किसी को कहा कांटा,
कई दिलों को जोड़ा,
कई दिलों को बांटा,
शब्दों ने ही प्रेम सिखाया,
और नफरत भी,
जब शब्द नहीं थे,
तब तो सिर्फ देह हुआ करती थी,
शब्दों ने ही इश्क को ईश्वर सा बनाया,
सब शब्दों की महिमा है पार्थ!
शब्दों ने धरती बांटी,
नदियाँ बांटी,
सागर बांटा,
शब्दों ने इंशानों को इंशानों से बांटा,
शब्दों ने ही दीवारें खड़ी की किस्म-किस्म के,
पहले हया, हिया और हसरतें पैदा की,
फिर उन्हे ढकने को परदें बनवाये,
शब्द बहुत ताकतवर है पार्थ!
शब्दो को सिखना, गुनना और बुनना,
एक कला है पार्थ!
ये कला ही जीवन का ध्येय है,
बाकी सब मोह-माया है पार्थ!
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 मनोरंजन कुमार तिवारी रचनाकार परिचय:-



नाम:- मनोरंजन कुमार तिवारी जन्म तिथि:- 06/01/1980 जन्म स्थान:- भदवर, जिला- बक्सर, बिहार पिता का नाम:- श्री कामेश्वर नाथ तिवारी गाँव:- भद्वर, जिला- बक्सर, बिहार वर्तमान पत्ता:- C/o- कर्ण सिंह, गाँव- घिटोरनी, नजदीक "तालाब",नई दिल्ही-30 मोबाइल न.- 9899018149 Email ID- manoranjan.tk@gmail.com


ऐसा क्यों होता है की,
मेरे जीवन के घोर निराशा,
और नाउम्मीदी के पलों में भी,
रौशन हो जाती नामालूम उम्मीद की किरणें,
जब तुम्हे सोचता हूँ,
बरबस ही मेरे होठों पर खिल जाती है,
एक मुस्कुराहट,
जो ना जाने कब से रूठी होती है,
जब याद आती है मेरे जीवन की,
कुछ ऐसी बातें जो मैं सिर्फ तुम्हे बताना चाहता था,
मेरे कदमों मे अचानक से तेजी आ जाती,
जैसे मेरे उपर से कई मन का बोझ हटा दिया गया हो,
जब पूछ लेती हो कभी भूले से ही हाल-चाल मेरा,
ना जाने कहाँ से आ जाती है मुझमें,
इतनी जोश, इतना उत्साह,
की सब कुछ इतना असान सा लगने लगता है,
की लगने लगता है की कुछ भी मुश्किल नहीं है पाना जीवन में,
अगर पूछ लेती हो एक बार मेरे काम के बारें में,
ऐसा क्यों होता है की,
मेरे ख्यालों में बार-बार ये आता है की,
पा सकते थे सब कुछ,
अगर तुम्हारा साथ मिल जाता,
और ये सोच कर दिल बैठ सा जाता है,
की अब क्या होगा कुछ पाकर,
अगर तुम साथ ही ना हो,
क्या तुम्हे नहीं लगता की शायद कुछ बाकी है,
हम दोनों के बीच,
जिसे ठीक किया जा सकता है।

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