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पीली चूड़ियाँ [कविता]- नीतू सिंह ‘रेणुका’

रचनाकाररचनाकार परिचय:-


नाम: नीतू सिंह ‘रेणुका’
जन्मतिथि: 30 जून 1984
प्रकाशित रचनाएं: ‘मेरा गगन’ नामक काव्य संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2013), ‘समुद्र की रेत’ कथा संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2016)
ई-मेल: n30061984@gmail.com
मेरे हाथ की ये पीली चूड़ियाँ
नींद में भी मुझे जगाती हैं
कभी खट्टी कभी मिट्ठी नींद सुलाती हैं
मेरे हाथ की ये पीली चूड़ियाँ

कभी मेरी कलाई के सहारे
खनक-खनक कर पुकारे
कभी ठहर कुछ देर
मेरी कलाई पर ही आराम करती हैं
कभी खूब शोर मचाती हुई
चढ़ती-उतरती साँसों में उत्तेजना भरती हैं।
मेरे प्रीतम की भी हैं प्रिया
मेरे हाथ की ये पीली चूड़ियाँ
नींद में भी मुझे जगाती हैं
कभी खट्टी कभी मिट्ठी नींद सुलाती हैं
मेरे हाथ की ये पीली चूड़ियाँ

जहाँ जाती वहाँ आती चूड़ियाँ
मैं दूल्हा तो मेरी बाराती चूड़ियाँ
कभी तो ये चूड़ियाँ आपस में ही
मिलकर कानाफूसी करती हैं
कभी पड़ोसन के हाथों में सजी
गुलाबी चूड़ियों से जलती हैं
बात-बात में इसने नाटक किया
मेरे हाथ की ये पीली चूड़ियाँ
नींद में भी मुझे जगाती हैं
कभी खट्टी कभी मिट्ठी नींद सुलाती हैं
मेरे हाथ की ये पीली चूड़ियाँ

कभी हाथापाई भी करती हैं
सहमी तो खनकने से भी डरती हैं
कभी गुस्से से हाथ पटक दूँ
तो दु:ख से टूट बिखर जाती हैं
कभी तो पूरी बाँह पर
मेरी खुशी संग नाचती नज़र आती हैं
दु:ख-सु:ख के आँसुओं से गीली चूड़ियाँ
मेरे हाथ की ये पीली चूडियाँ
नींद में भी मुझे जगाती हैं
कभी खट्टी कभी मिट्ठी नींद सुलाती हैं
मेरे हाथ की ये पीली चूड़ियाँ

नई चूड़ियों को देखकर
खुद ही हाथ से जाती उतर
ये पीली चूडियाँ
चुपचाप श्रृंगारदान में चली जाती हैं
"काँच की मैं और माटी की तू"
अंत में बस इतना बतलाती हैं।
क्यों मुझसे ये मिली चूड़ियाँ
मेरे हाथ की ये पीली चूड़ियाँ

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