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विचित्र [कविता] - डॉ महेन्द्र भटनागर

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 डा. महेंद्र भटनागर रचनाकार परिचय:-


डा. महेंद्रभटनागर
सर्जना-भवन, 110 बलवन्तनगर, गांधी रोड, ग्वालियर -- 474 002 [म. प्र.]

फ़ोन : 0751-4092908 / मो. 98 934 09793
E-Mail : drmahendra02@gmail.com
drmahendrabh@rediffmail.com



यह कितना अजीब है।
आज़ादी के तीन-तीन दशक
बीत जाने के बाद भी,
पाँच-पाँच पंचवर्षीय योजनाओं के
रीत जाने के बाद भी
मेरे देश का आम आदमी ग़रीब है,
बेहद ग़रीब है।
यह कितना अजीब है!
सर्वत्र धन का, पद का, पशु का
साम्राज्य है,
यह कैसा स्वराज्य है?
धन, पद, पशु
भारत-भाग्य-विधाता हैं,
चारों दिशाओं में
उन्हीं का जय-जयकार,
उन्हीं का अहंकार
व्याप्त है, परिव्याप्त है,
और सब-कुछ समाप्त है।
शासन अंधा है, बहरा है,
जन-जन का संकट गहरा है।
(खोटा नसीब है।)
लगता है - परिवर्तन दूर नहीं,
क़रीब है।
कितु आज यह सब
कितना अजीब है!


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1 टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 27 फरवरी 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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