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शहर [कविता]- नीतू सिंह ‘रेणुका’

रचनाकाररचनाकार परिचय:-


नाम: नीतू सिंह ‘रेणुका’
जन्मतिथि: 30 जून 1984
प्रकाशित रचनाएं: ‘मेरा गगन’ नामक काव्य संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2013), ‘समुद्र की रेत’ कथा संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2016)
ई-मेल: n30061984@gmail.com
दौड़ता भागता शहर
मैं कहती ज़रा ठहर
मगर सुनता ही नहीं
यह दौड़ता भागता शहर

पैरों में जैसे इसके पहिए जड़े हों
जो बहुत विशाल बहुत बड़े हों
समय से भी आगे भागते हुए
जैसे हम भविष्य में खड़े हों

दौड़ता भागता शहर
मैं कहती ज़रा ठहर

चीखता चिल्लाता शहर
मेरी सुन नहीं पाता शहर
कानों को बंद किए हुए
यह चीखता चिल्लाता शहर

आवाजों और चीख-पुकार में डूबा हुआ
शांति और चुप्पी से ऊबा हुआ
दबी आवाज़ों से कर के रुसवाई
शोरगुल का जाकर महबूबा हुआ

चीखता चिल्लाता शहर
मेरी सुन नहीं पाता शहर
चमचमाता शहर
मुझे रात में जगाकर
रातों को भुलाता शहर

दिन-सा चमचमाता शहर
हर दिन हर पहर
रोश्नी में नहाया शहर
कोई गली अंधेरी न रहे
चकाचौंध हो हर डगर

चमचमाता शहर
मुझे रात में जगाता शहर

दौड़ता भागता शहर
जो कभी जाता ठहर
तो मैं उससे पूछती
क्या होगा सबसे आगे जाकर
अपने सब पीछे न छूट जाएंगें
कैसे सुनेगा उनको, क्योंकि
वो जो कभी रोएंगे, चिल्लाएंगें
तो तेरे अपने ही शोर के आगे
वो दबेंगे और कुचल जाएंगें
तेरी इस चकाचौंध से
आंखें तेरी चौंधियां जाएंगी
भला अपनों को कैसे देख पाएंगीं

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