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रौशन [गज़ल] - प्रखर मालवीय

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प्रखर मालवीयरचनाकार परिचय:-


प्रखर मालवीय
जन्म स्थान- आज़मगढ़ (उत्तरप्रदेश)
शिक्षा- प्रारंभिक शिक्षा आजमगढ़ से हुई। बरेली कॉलेज बरेली से B.COM और शिब्ली नेशनल कॉलेज, आजमगढ़ से M.COM की डिग्री हासिल की। वर्तमान में CA की ट्रेनिंग नॉएडा से कर रहे हैं।
प्रकाशन- अमर उजाला, हिंदुस्तान, हिमतरू, गृहलक्ष्मी, कादम्बनी इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।
'दस्तक' और 'ग़ज़ल के फलक पर' नाम से दो साझा ग़ज़ल संकलन भी प्रकाशित हो चुके हैं।
संपर्क- चौबे बरोही, रसूलपुर नन्दलाल, आजमगढ़ (उत्तरप्रदेश)
वर्तमान निवास- दिल्ली






सवाल दिल के इसी बात पर रखे रौशन
कभी तो होंगे जवाबों के सिलसिले रौशन


कभी जो लौट के आयेंगे वो मिरी जानिब
चराग़ मुंतज़िर आँखों के पायेंगे रौशन


सभी की शक्ल चमकदार ही नज़र आये
रखो न शह्र में इतने भी आइने रौशन


कहो सुनो भी किसी रात अपनी-मेरी बात
करो कभी तो हमारे ये रतजगे रौशन


वगरना दिन के उजाले में खो भी सकते हो
रखो चराग़ हर इक वक़्त ज़ह्न के रौशन


रदीफ़ छुप रही है जा के एक कोने में
ग़ज़ल में बांधे हैं हमने भी क़ाफ़िये रौशन


न कर सकेगा अँधेरा कोई तुझे अँधा
‘क़लम सम्हाल अँधेरे को जो लिखे रौशन ‘







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