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इस लोक में [कविता] - गिरिजा अरोड़ा

रचनाकाररचनाकार परिचय:-

गिरिजा अरोड़ा
परिचयः मेरी जन्म तिथि 24.9.71 है। मेरा लालन पालन देहरादून में संपन्न हुआ एवं प्रारंभिक शिक्षा, स्नातक, स्नाकोत्तर शिक्षा भी देहरादून में ही प्राप्त हुई। मुझे आई.आई,टी रूड़की से एम.फिल(मैथ्स) करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। हिन्दी प्रेम ने स्वतः मेरा रूझान कविता की तरफ कर दिया एवं मैं कई कवि सम्मेलन में मंच तक पहुँच कर स्वयं को सौभाग्यशाली समझती हूँ। हिंदी की कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में मेरी कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं।
संप्रतिः देहादून में रहकर कार्यरत
इस लोक में देवकन्याएं नहीं आती
आती हैं तो
कभी हंसती, कभी रूठती,
नकचड़ी सी फरमाईशें
जो इसे
देवलोक हैं बनाती

इस लोक में देवता नहीं दिखते
दिखते हैं तो
गठीले, रौबिले फरमान
कभी पूरे, कभी अधूरे
अरमान
जो यहां
कितने देवालय हैं बनाते

इस लोक में कल्पवृक्ष नहीं उगते
उगते हैं तो
रसदार और फलदार
अनुभव
जो जीवन को
सुधा रस से हैं भरते

चांद सितारे बसते अंबर
सूरज का भी घर नील गगन
छोटे छोटे जूगनू भी लेकिन
धरती को कर देते जगमग







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