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आन्दोलन [लघुकथा] - महावीर उत्तरांचली

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"भारत माता की।" वातावरण में गूंजता एक स्वर।




 महावीर उत्तरांचली रचनाकार परिचय:-



१. पूरा नाम : महावीर उत्तरांचली
२. उपनाम : "उत्तरांचली"
३. २४ जुलाई १९७१
४. जन्मस्थान : दिल्ली
५. (1.) आग का दरिया (ग़ज़ल संग्रह, २००९) अमृत प्रकाशन से। (2.) तीन पीढ़ियां : तीन कथाकार (कथा संग्रह में प्रेमचंद, मोहन राकेश और महावीर उत्तरांचली की ४ — ४ कहानियां; संपादक : सुरंजन, २००७) मगध प्रकाशन से। (3.) आग यह बदलाव की (ग़ज़ल संग्रह, २०१३) उत्तरांचली साहित्य संस्थान से। (4.) मन में नाचे मोर है (जनक छंद, २०१३) उत्तरांचली साहित्य संस्थान से।

"जय।" प्रतिक्रिया स्वरुप कई स्वर एक सुर में गूंजे।

"एक, दो, तीन, चार।" वह स्वर इस बार तीव्र आक्रोश के साथ।

"बंद करो ये भ्रष्टाचार।" उसी आक्रोश को बरकरार रखते हुए सामूहिक स्वर।

पूरे देश में आजकल उपरोक्त दृश्य मंज़रे-आम पर है। लोग गली-मुहल्लों में रैलियां निकाल-निकालकर अन्ना हजारे के 'जनलोकपाल बिल' के समर्थन में सड़कों पर उतर आये हैं। नारों के माध्यम से सरकार और विपक्ष के भ्रष्ट नेताओं तथा बड़े अफसरों तक को फटकार रहे हैं। देश के विभिन्न राज्यों से बैनर और सलोगन्स के साथ आन्दोलन समर्थक दिल्ली के रामलीला मैदान में पधार रहे हैं। जहाँ अन्ना हजारे पिछले बारह दिनों से अनशन पर बैठे हैं। उनके समर्थक बीच-बीच में उत्साहवर्धन करते हुए नारे लगा रहे हैं। 'अन्ना नहीं आंधी है। देश का दूसरा गांधी है।' 'अन्ना तुम संघर्ष करो। हम तुम्हारे साथ हैं।' चारों तरफ जन सैलाब। भारी भीड़ ही भीड़। लोग ही लोग। टोपियाँ ही टोपियाँ। जिन पर लिखा है -- मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना। इस हंगामे को कवरेज करते सभी चैनलों के मीडियाकर्मी। सभी चैनलों पर इसी तरह की मिली-जुली ख़बरें और बयानबाज़ी। गरमा-गरम बहसें। गांधी-नेहरू के ज़माने से लेकर जयप्रकाश आन्दोलन तक को वक्ताओं द्वारा याद किया गया।

रामलीला मैदान में उपस्थित "मैं" स्वयं हैरान था-- 'कैसे एक साधारण-सी कद-काठी वाले व्यक्ति ने समूचे राष्ट्र को ही आन्दोलित कर दिया है।' हृदय श्रद्धा से अन्ना हजारे के आगे नत-मस्तक हो गया। मुझे यह जानकार अत्यंत प्रसन्नता हुई कि अन्ना तेरहवें दिन अपना अनशन तोड़ेंगे। मैंने भी राहत की सांस ली --'चलो देर आये दुरुस्त आये' वाली बात।

कुछ देर मैदान में बिताने के बाद रामलीला मैदान से निकलकर मैं बाहर फुठपाथ पर आ गया। जहाँ सड़क किनारे अन्ना के नाम पर आन्दोलन से जुड़े बैनर, पोस्टर, टोपियाँ, झंडे, स्टीकर आदि बेचने वाले बैठे थे। जिन्हें मैं अक्सर चौराहों पर गाड़ियाँ साफ़ करते, कभी अखबार-किताबें या अन्य सामान बेचते और भीख मांगते भी देखता था।

"अम्मा क्या सचमुच अन्ना कल अपना अनशन ख़त्म कर देंगे।" बड़ी मायूसी से एक आठ-नौ बरस की लड़की ने अपनी माँ से पूछा।

"हाँ बेटी।" उसकी माँ भी उसी मायूसी से बोली।

"ये तो बहुत बुरा हुआ, अम्मा।" बच्ची के स्वर में असीम वेदना उभर आई।

"ऐसा क्यों कह रही हो गुडिया? कोई आदमी बारह दिनों से भूखा है और अपना अनशन ख़त्म करना चाह रहा है। यह तो ख़ुशी की बात होनी चाहिए।" मैंने टोकते हुए कहा, "इसका मातम क्यों मना रही हो?"

"ऐसी बात नहीं है बाबूजी, पिछले दस-बारह दिनों से आन्दोलन का सामान बेचकर हम पेटभर भोजन खा रहे थे। कल अनशन टूटने के साथ ही आन्दोलन भी ख़त्म हो जायेगा!" बच्ची की माँ ने अपना दृष्टिकोण रखा।

"तो!" मैंने आँखें तरेरते हुआ कहा।

"तो बाबूजी, हमें फिर से जिंदा रहने के लिए कड़ा संघर्ष करना होगा! बच्चों को भीख मांगनी पड़ेगी! लोगों की जूठन खाकर पेट भरना होगा। कूड़े-करकट के ढेर में अपनी रोज़ी-रोटी तलाश करनी होगी। पता नहीं दुबारा पेटभर भोजन अब कब नसीब होगा? बच्ची यही सोच-सोचकर परेशान है।" उस औरत ने बड़े ही करुणा भरे स्वर में कहा, "क्या ऐसे आन्दोलन सालभर नहीं हो सकते बाबूजी?" बड़ी ही कातर दृष्टि से उसने मुझसे प्रश्न किया। मैंने पहली बार खुद को असहज महसूस किया और एक सौ रूपये का नोट जेब से निकालकर उस नन्ही गुड़िया के हाथों में रख दिया . . . जो अपनी माँ के आँचल में छिपने का प्रयास कर रही थी। मैंने इधर-उधर देखा तो कई और बच्चों के हाथ मेरी तरफ बढ़ गए थे। मैंने उन्हें अपना खाली पर्स दिखाकर अपनी लाचारी प्रकट की।

लेकिन माँ-बेटी के दुखी, हतास-उदास चेहरों को देखकर मैं यह सोचने लगा -- "काश! कोई एक आन्दोलन ऐसा भी होता, जिससे इन ग़रीबों को हमेशा पेटभर भोजन मिल पाता!"

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2 टिप्पणियां

  1. जीवन की कटु वास्तविकता इस कहानी में प्रतिबिंबित होती है।
    लेकिन एक दूसरा पहलू भी है। अगर गरीबी मिट जाये तो राजनेता वोटों की फसल कैसे उगायेंगे? किसको संबोधित करके सुखमय भविष्य का दावा करेंगे? किसके हितों के लिए राजनीति करेंगे? इसलिए गरीबी जरूरी है !!

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