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काटो धान [कविता] - डॉ महेन्द्र भटनागर

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 डा. महेंद्र भटनागर रचनाकार परिचय:-


डा. महेंद्रभटनागर
सर्जना-भवन, 110 बलवन्तनगर, गांधी रोड, ग्वालियर -- 474 002 [म. प्र.]

फ़ोन : 0751-4092908 / मो. 98 934 09793
E-Mail : drmahendra02@gmail.com
drmahendrabh@rediffmail.com




काटो धान, काटो धान, काटो धान।
सारे खेत
देखो दूर तक कितने भरे,
कितने भरे / पूरे भरे।
घिर लहलहाते हैं
न फूले रे समाते हैं!
हवा में मिल
कुसुम-से खिल।
उठो, आओ,
चलो, इन जीर्ण कुटियों से
बुलाता है तुम्हें, साथी खुला मैदान।
काटो धान, काटो धान, काटो धान।
जब हिम-नदी का चू पड़ा था जल
अनेकों धार में चंचल,
हिमालय से बहायी जो गयी थी धूल
उसमें आज खिलते रे श्रमिक!
तेरे पसीने से सिँचे
प्रति पेड़ की हर डाल में
सित, लाल, पीले, फूल।
जीन के लिए देती तुम्हें
ओ! आज भू माता सहज वरदान।
काटो धान, काटो धान, काटो धान।
आकाश में जब घिर गए थे
मॉनसूनी घन सघन काले,
हृदय सूखे हुए
तब आश-रस से भर गए थे
झूम मतवाले।
किसी
सुन्दर, सलोनी, स्वस्थ, कोमल, मधु
किशोरी के नयन
कुछ मूक भाषा में
नयी आभा सजाए
जगमगाए श्वेत-कजरारे।
हुए साकार
भावों से भरे
अभिनव सरल जीवन लिए,
नूतन जगत के गान।
काटो धान, काटो धान, काटो धान।
जो सृष्टि के निर्माण हित बोए
तुम्हारी साधना ने बीज थे
वे पल्लवित।
सपने पलक की छाँह में पा चाह
शीतल ज्योत्स्ना की गोद में खेले।
(अरी इन डालियों को बाँह में ले ले!)
उठो!
कन्या-कुमारी से अखिल कैलाश केे वासी
सुनो, गूँजी नयी झंकार।
हर्षित हो, उठो
परिवार सारे गाँव के
देखो कि चित्रित हो रहे अरमान।
काटो धान, काटो धान, काटो धान।
टूटे दाँत / सूखे केश
मुख पर झुर्रियों की वह सहज मुसकान,
प्रमुदित मुग्ध
फैला विश्व में सौरभ
महकता नभ,
सजग हो आज
मेर देश का अभिमान।
काटो धान, काटो धान, काटो धान।





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3 टिप्पणियाँ

  1. मेहनत जब रंग लाती है तो मन में जो सुख उपजता वह अवर्णनीय होता है
    बहुत सुन्दर लहराती रचना

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह ! क्या बात है सुन्दर ,कोमल भावनाओं से सजी रचना आभार। "एकलव्य"

    जवाब देंहटाएं
  3. इस बसंत के रुतु में सारे खेत खलियान खिल उठते हैं, तभी उसे देखकर हमारी मेहनत का फ़ल मिल गया ऐसा लगता हैं,
    बहुत मनभावक रचना

    जवाब देंहटाएं

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