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कहां गया वो गांव [कविता]- विजयानंद ' विजय '

रचनाकार परिचय:-

विजयानंद ' विजय '
पता-
आनंद निकेत
बाजार समिति रोड
पो- गजाधरगंज
बक्सर (बिहार )-802103
जन्मतिथि - 1-1 -1966
संप्रति - सरकारी सेवा(अध्यापन)
निवास- आरा(भोजपुर),बिहार
मो.- 9934267166


सावन के झूले में झूले
बारिश की बूंदों में भींगे।
बचपन के सब खेल निराले
यादों के वे पवन हिंडोले।
उमड़-घुमड़ बादल से बरसे
घूमे सारा गांव, रे मनवां।
कहां गया -- वो गांव !
ताल-तलैया गली- चौबारे
सब कितने लगते थे प्यारे।
हरे चने, गेहूं की बाली
हरे - भरे खेत खलिहान।
रात चांदनी मक्के झूमें
ढूंढ़े वही मचान, रे मनवां।
कहां गया-- वो गांव !
स्मृतियों में मेले की फिरकी
घुंघरू बांध ,नाचे कठपुतली।
डमरू-मदारी, नाच बंदरिया
सजी-धजी जापानी गुड़िया।
बाबा के कांधे पर चढ़के
घूमे सारा गांव ,रे मनवां।
कहां गया-- वो गांव !
होली की रंगीन ठिठोली
लो निकली मस्तों की टोली।
रंग-गुलाल में घुलता यौवन
अतुल स्नेह से खिलता उपवन।
दीवाली फुलझड़ियों वाली
जगमग है हर ठांव, रे मनवां।
कहां गया -- वो गांव !
काका की सरपंच-कचहरी
कुछ अनसुनी-अनछुई फरियादें।
मुखियाजी मूंछों में कहते
न्याय जगत की कथा पुरानी।
शांति -सुलह की खुशहाली में
डूबा गांव-गिरांव, रे मनवां ।
कहां गया -- वो गांव !




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