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मंगलसूत्र [कविता]- शबनम शर्मा

रचनाकाररचनाकार परिचय:-

शबनम शर्मा
अनमोल कुंज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र. – 173021 मोब. - 09816838909, 09638569237


तमाम रसमों-रिवाज़ निभा,
एक बड़ा जमघट बना
शोर-षराबे के माहौल में
सबकी मौजूदग़ी में
पहना दिया उसने मेरे गले में
चंद काले मोतियों का मंगलसूत्र,
जो सदैव याद दिलाता
मायके का विछोह व
सारी उम्र की उम्रकैद एक
अजनबी संग।
चाहते मिटाना मेरा सम्पूर्ण
अस्तित्व,
ढल जाऊँ, बन जाऊँ मैं
उनके घर की उस पुरानी
दहलीज़ सी,
जिसमें आई पुष्तों से कई
बहुएँ, गई कई दादियाँ।
मैं शायद बन भी गई
उस दहलीज़ का पायदान,
जिस पर सिर्फ पाँव ही पोंछे
छोटे से बड़े तक ने,
मेरा मंगलसूत्र घिस गया,
हलकी पड़ गई उसकी टिकड़ी,
मोती भी बदरंग हो गए,
पर कभी षिकायत न की,
क्योंकि ये कभी बदला नहीं जाता।
सिर्फ एक सोच,
मज़बूर करती मुझे
काष कि उस दिन पहनाया होता
किसी ने बाहों का मंगलसूत्र
जो मुझे हर वक्त देता इक सकून
इस घर को अपना कहने के लिये।






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3 टिप्पणियां

  1. शोर-षराबे, पुष्तों, षिकायत, काष में ष के स्थान पर श होना चाहिए। वर्तनी की ऐसी अशुद्धियां कुछ पाठकों को खल सकती हैं।

    जवाब देंहटाएं
  2. नमस्ते, आपकी यह रचना "पाँच लिंकों का आनंद" ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में आगामी गुरूवार 21 -09 -2017 को प्रकाशनार्थ 797 वें अंक में सम्मिलित की गयी है। चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर। सधन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  3. सुन्दर रचना। टंकण अशुद्धियों पर योगेंद्र जी का कहना सही है।

    जवाब देंहटाएं

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