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कलयुगी बेटा [लघुकथा]- शबनम शर्मा

रचनाकाररचनाकार परिचय:-

शबनम शर्मा
अनमोल कुंज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र. – 173021 मोब. - 09816838909, 09638569237


मैं किसी काम से बैंक में बैठी थी। कार्य कुछ ज्यादा होने की वजह से मैं मैनेजर के चैम्बर में चली गई। अकेली थी काम ज्यादा। कुछ फार्म भरकर मैंने मैनेजर साहब को थमाए। उन्होंने मुझे बैठने व कुछ देर और इन्तज़ार करने को कहा। मैं बैठ कर इधर-उधर आए लोगों को निहारने लगी कि बैंक के मेन गेट से लम्बा, ऊँचा, सुन्दर सा युवक, आधुनिक वेशभूषा में प्रवेश हुआ और मैनेजर साहब का कमरा खेल अन्दर आ गया। पीछे हाथ बाँधे, एक लिफ़ाफा हाथ में थामे उसने कहा, ‘‘सर, मुझे बहुत जरूरी सूचना चाहिये?’’ मैनेजर ने उसे बैठाया व पूछा, ‘‘हाँ, बताओ मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ।’’ उसने लिफ़ाफा आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘सर, इसमें मेरे पिताजी के बैंक के कुछ कागज़ हैं, मुझे पता करना है कि यह पैसा किसको मिल सकता है और मुझे यह पैसा लेने के लिये क्या-क्या कार्यवाही करनी होगी, जल्दी बताइए।’’ लिफ़ाफा खोलते ही मैनेजर सकते में आ गया। उसने कहा, ‘‘अभी इसी सप्ताह तो वो अपनी पैंशन लेकर गये हैं, मेरे साथ चाय पी है, क्या हुआ उन्हें? कब हुआ?’’ लड़का बोला, ‘‘परसों सुबह वो हमें छोड़कर चले गये।’’ मैनेजर ने कहा, ‘‘भले मानस डैथ सर्टीफिकेट लेने तक तो इन्तज़ार करते। इतनी भी क्या जल्दी है। आज तीसरा ही दिन है।’’ उसने जवाब दिया, ‘‘सर, वो तो आराम से मर गये। हमें अब समाज की भी लाज रखनी है। खर्च करूँगा उतने हिसाब से ही जो छोड़ कर गये हैं मेरे लिये।’’ मैनेजर ने कम्प्युटर खोला तो देखा, उसकी आँखों में आँखें डालकर बोला, ‘‘बेटा तेरे नाम कुछ नहीं है, उनके सारे खाते तुम्हारी माँ के नाम है। उसकी मर्जी है तुम्हें दे या न दे।’’ लड़का बिजली सा उठा, कागज समेटे व गुस्से में बोला, ‘‘मरता भी ढंग का काम न कर गया, अब करे ये बुढ़िया जो चाहे, मैं तो चला कल अपनी नौकरी पर।’’ मैं पैसे के लिए पागल इस कलयुगी औलाद को ताकती रह गई।






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1 टिप्पणियां

  1. शबनम शर्मा जी, आज कल के इस दुनिया में पैसे से बड़ा कोई नहीं.

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