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गोत्र [लघुकथा] - महावीर उत्तरांचली

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"द्वार खोल रधिया ..." रजनी ने तेजी से दरवाज़ा पिटते हुए कहा।




 महावीर उत्तरांचली रचनाकार परिचय:-



१. पूरा नाम : महावीर उत्तरांचली
२. उपनाम : "उत्तरांचली"
३. २४ जुलाई १९७१
४. जन्मस्थान : दिल्ली
५. (1.) आग का दरिया (ग़ज़ल संग्रह, २००९) अमृत प्रकाशन से। (2.) तीन पीढ़ियां : तीन कथाकार (कथा संग्रह में प्रेमचंद, मोहन राकेश और महावीर उत्तरांचली की ४ — ४ कहानियां; संपादक : सुरंजन, २००७) मगध प्रकाशन से। (3.) आग यह बदलाव की (ग़ज़ल संग्रह, २०१३) उत्तरांचली साहित्य संस्थान से। (4.) मन में नाचे मोर है (जनक छंद, २०१३) उत्तरांचली साहित्य संस्थान से।

तक़रीबन दो मिनट बाद दरवाज़ा खुला।

अपने अस्त-व्यस्त कपड़ों और बालों को ठीक करते हुए, रधिया का प्रेम दरवाज़े पर रजनी को खड़ा देख मुस्कुराया और अपनी रावनाकार मूछों को ताव देता हुआ वहां से चलता बना।

प्रेमी के चले जाने के करीब एक मिनट बाद रधिया आँखें तरेरते हुए बाहर निकली, "क्या है रे, रजनी की बच्ची सारा खेल ख़राब कर दिया?"

"कैसा खेल?" रजनी चोंकी, "और ये बता किसनवा के साथ अन्दर क्या कर रही थी?"

"भजन-कीर्तन ..." कहते हुए रधिया ने चोली का हुक ठीक किया।

"बेशर्मी की भी हद होती है, यही सब करना है तो शादी क्यों नहीं कर लेती किसनवा से!"

"देख किसनवा हमारे ही गोत्र का है। इसलिए उससे शादी नहीं हो सकती। पंचायत और गांव वाले हमें मिलकर मार डालेंगे जैसे हरिया और लाली को मारा था पिछले साल।"

"और ये सब, जो तुम कर रहे हो क्या ठीक है?"

"देख रजनी अपने गोत्र में शादी करना ग्रामीण समाज की नज़र में भले ही अपराध है, मगर अपने प्रेमी के साथ प्यार का आदान-प्रदान करना, न कभी ग़लत था न होगा।"

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