HeaderLarge

नवीनतम रचनाएं

6/recent/ticker-posts

बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ (भाग – 39 व 40)- [कहानियाँ]- राजीव रंजन प्रसाद

रचनाकाररचनाकार परिचय:-

राजीव रंजन प्रसाद

राजीव रंजन प्रसाद ने स्नात्कोत्तर (भूविज्ञान), एम.टेक (सुदूर संवेदन), पर्यावरण प्रबन्धन एवं सतत विकास में स्नात्कोत्तर डिप्लोमा की डिग्रियाँ हासिल की हैं। वर्तमान में वे एनएचडीसी की इन्दिरासागर परियोजना में प्रबन्धक (पर्यवरण) के पद पर कार्य कर रहे हैं व www.sahityashilpi.com के सम्पादक मंडली के सदस्य है।

राजीव, 1982 से लेखनरत हैं। इन्होंने कविता, कहानी, निबन्ध, रिपोर्ताज, यात्रावृतांत, समालोचना के अलावा नाटक लेखन भी किया है साथ ही अनेकों तकनीकी तथा साहित्यिक संग्रहों में रचना सहयोग प्रदान किया है। राजीव की रचनायें अनेकों पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं तथा आकाशवाणी जगदलपुर से प्रसारित हुई हैं। इन्होंने अव्यावसायिक लघु-पत्रिका "प्रतिध्वनि" का 1991 तक सम्पादन किया था। लेखक ने 1989-1992 तक ईप्टा से जुड कर बैलाडिला क्षेत्र में अनेकों नाटकों में अभिनय किया है। 1995 - 2001 के दौरान उनके निर्देशित चर्चित नाटकों में किसके हाँथ लगाम, खबरदार-एक दिन, और सुबह हो गयी, अश्वत्थामाओं के युग में आदि प्रमुख हैं।

राजीव की अब तक प्रकाशित पुस्तकें हैं - आमचो बस्तर (उपन्यास), ढोलकल (उपन्यास), बस्तर – 1857 (उपन्यास), बस्तर के जननायक (शोध आलेखों का संकलन), बस्तरनामा (शोध आलेखों का संकलन), मौन मगध में (यात्रा वृतांत), तू मछली को नहीं जानती (कविता संग्रह), प्रगतिशील कृषि के स्वर्णाक्षर (कृषि विषयक)। राजीव को महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा कृति “मौन मगध में” के लिये इन्दिरागाँधी राजभाषा पुरस्कार (वर्ष 2014) प्राप्त हुआ है। अन्य पुरस्कारों/सम्मानों में संगवारी सम्मान (2013), प्रवक्ता सम्मान (2014), साहित्य सेवी सम्मान (2015), द्वितीय मिनीमाता सम्मान (2016) प्रमुख हैं।

==========
जन-संघर्ष और स्कंदवर्मन
बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ (भाग – 39)

अर्थपति भट्टारक (460-475 ई.) राजसिंहासन पर बैठे तब महाकांतार से कोशल तक तथा कोरापुट से बरार तक के क्षेत्र पर नल-त्रिपताका लहराने का दौर था। अर्थपति विलासी शासक प्रतीत होते हैं, कदाचित व्यसनी। वाकाटक नरेश पृथ्वीषेण (460-480ई.) ने नलों की राजधानी नन्दिवर्धन पर तीन दिशा से हमला कर दिया। अर्थपति नल साम्राज्य की प्राचीन राजधानी पुष्करी की ओर भागे लेकिन वहाँ तक भी उनका पीछा किया गया। एक-एक प्रासाद और मकान तोड़ दिया गया। इसके बाद पृथ्वीषेण ने अर्थपति भट्टारक को उसके हाल पर छोड़ दिया और वह नव-विजित राजधानी नन्दिवर्धन लौट आया। अर्थपति के निधन के बाद उनके छोटे भाई स्कंदवर्मन (475-500 ई.) का अत्यधिक साधारण समारोह में राजतिलक किया गया। यह राजतिलक केवल परम्परा के निर्वाह के लिये ही था क्योंकि उनके पास न तो भूमि थी न ही कोई अधिकार।

स्कंदवर्मन ने अपने विश्वासपात्र साथियों के साथ खुले वातावरण में बैठक की तथा अपने दिवास्वप्न से मित्रो को अवगत कराया। वे महाकांतार से वाकाटकों को खदेड़ कर नल-राज पताका पुन: प्रशस्त करना चाहते थे। स्कंदवर्मन एक कुशल योजनाकार थे; अद्भुत संगठन क्षमता थी उनमें। राजधानी से दूर महाकांतार की सीमाओं में रह रही प्रजा को सैन्य-प्रशिक्षण दिया जाने लगा। वाकाटक राजाओं को कमजोर करने का कार्य उनकी जन-विरोधी नीतियों ने भी स्वत: कर दिया था। वाकाटकों से असंतुष्ट धनाड्यों ने चुप-चाप स्कंदवर्मन तक आर्थिक मदद भी पहुँचायी। पहले छापामार शैली में छुट-पुट आक्रमण किये गये। छोटी छोटी जीत, शस्त्रों और सामंतों के पास संग्रहित करों की लूट से प्रारंभ हुआ अभियान अब स्वरूप लेने लगा। वाकाटकों के आधीन अनेकों सामंतो ने अवसर को भांपते हुए अपनी प्रतिबद्धता बदल ली। इधर राजा पृथ्वीषेण की मृत्यु के पश्चात वाकाटक और भी कमजोर हुए थे; ज्येष्ठ पुत्र देवसेन ने महाकांतार की सत्ता संभाल ली थी। स्कंदवर्मन ने नन्दिवर्धन किले पर विजय हासिल कर देवसेन को उसी शैली में निर्वासित कर दिया गया जैसा हश्र कभी अर्थपति भट्टारक का हुआ था।

- राजीव रंजन प्रसाद

===========


अंग्रेजों वाला विकास
बस्तर: अनकही-अनजानी कहानियाँ (भाग – 40)



रायबहादुर पंडा बैजनाथ (1903 – 1910 ई.) बस्तर राज्य में अधीक्षक की हैसियत से नियुक्त हुए थे। वे अंग्रेजों द्वारा प्रसारित विकास की परिभाषा से अक्षरक्ष: सहमत थे और अपनी सोच के प्रतिपादन को ले कर कट्टर भी। यह उनका अतिउत्साह था कि जगदलपुर से चांदा जाने वाली सड़क सन 1904 में पूरी कर ली गयी। सन 1907 ई. तक अतिदुर्गम मार्ग कोंडागाँव-नारायणपुर-अंतागढ़, तक सड़क बना ली गयी थी जिसे बाद में डोंडीलोहारा होते हुए राजनांदगाँव तक बढ़ा दिया गया। पण्डा बैजनाथ के कार्यकाल में धमतरी से जगदलपुर तक टेलीग्राफ लाईन बिछाने का काम जोरों से चल रहा था। बाहर-बाहर बदलाव महसूस हो रहा था; भीतर-भीतर राज्य में गहरी शांति थी। व्यवस्था और जनता के बीच कुछ टूट गया। व्यवस्था, आवरण और चेहरा बदलने में लगी रही और आवाम चौंधियाई आँखों से देख रहा था कि इस सबमें उसका अस्तित्व कहाँ है? सड़क पर उसे डामर की तरह पिघलाया जा रहा है जबकि उसके पसीने की कोई कीमत नहीं? बिना दाम में उत्तम काम पराधीन देश में भी केवल बस्तर राज्य में संभव था। पंडा बैजनाथ का प्रशासन निरंकुशता का द्योतक था जबकि उनके कार्य प्रगतिशील प्रतीत होते थे। उदाहरण के लिये शिक्षा के प्रसार के लिये उन्होंने उर्जा झोंक दी किंतु इसके लिये आदिवासियों को विश्वास में लेने के स्थान पर शिक्षकों को निरंकुश बना दिया। पुलिस को बच्चों को जबरदस्ती विद्यालय में पहुँचाने के निर्देश दिये गये। बालक के विद्यालय न जाने की स्थिति में उसके पालक को सजा दी जा रही थी। इधर उनके द्वारा अंग्रेजों की निर्मित वन नीति के सख्ती से प्रतिपादन के बाद आदिवासियों के पास ऐसी कोई वस्तु शेष नहीं रही थी जिसे बेच कर वे व्यापारियों से नमक, कपड़ा, तेल या इसी तरह की दूसरी आवश्यक वस्तुओं को प्राप्त करें। यह सबकुछ सुलग कर वर्ष 1910 के महान भूमकाल का कारण बना। भूमकाल के दौरान विद्रोही लगातार पंडा बैजनाथ की तलाश कर रहे थे लेकिन वे किसी तरह राज्य मे बाहर निकल पाने में सफल हो गये।






- राजीव रंजन प्रसाद


==========






टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां

आइये कारवां बनायें...

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...