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दुनिया गोल है [लघुकथा] - महावीर उत्तरांचली

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बस खचाखच भरी हुई थी। कई डबल सीटों पर तीन-तीन सवारियाँ मुश्किल से बैठी हुई थीं। एक सज्जन बड़े आराम से पैर फैलाये बैठे थे।




 महावीर उत्तरांचली रचनाकार परिचय:-



१. पूरा नाम : महावीर उत्तरांचली
२. उपनाम : "उत्तरांचली"
३. २४ जुलाई १९७१
४. जन्मस्थान : दिल्ली
५. (1.) आग का दरिया (ग़ज़ल संग्रह, २००९) अमृत प्रकाशन से। (2.) तीन पीढ़ियां : तीन कथाकार (कथा संग्रह में प्रेमचंद, मोहन राकेश और महावीर उत्तरांचली की ४ — ४ कहानियां; संपादक : सुरंजन, २००७) मगध प्रकाशन से। (3.) आग यह बदलाव की (ग़ज़ल संग्रह, २०१३) उत्तरांचली साहित्य संस्थान से। (4.) मन में नाचे मोर है (जनक छंद, २०१३) उत्तरांचली साहित्य संस्थान से।

"भाई साहब आपकी बड़ी मेहरबानी होगी, अगर मेरी बीवी को बैठने के लिए सीट मिल जाये। वह बीमार है और इ हालत में नहीं कि ज़्यादा देर खड़ी रह सके। भीड़ की वजह से पहले ही हम दो-तीन बसें मिस कर चुके हैं। परेशान हालत में हमें घंटाभर स्टैंड में ही खड़े-खड़े हो गया।" अनुरोध करते हुई एक व्यक्ति ने कहा। वह तीन वर्षीय बच्चे को गोदी में थामे खड़ा था। उसकी बीवी सचमुच बीमार दीख रही थी। उस पर मरे थकान और पसीने से लथपथ थी। लगता था अब गिर पड़ेगी या न जाये कब गिर पड़ेगी? वैसे भी प्राइवेट बस वाले इनती रफ़ ड्राइविंग करते हैं कि बैठी हुई सवारियाँ भी परेशान हो उठती हैं। खड़ी सवारियाँ तो राम भरोसे ही रहती हैं।

"सॉरी मैं नहीं उठ सकता ..." बेरुखी से बैठे हुए सज्जन ने कहा, "आप किसी और से कहिये?"

"और सीटों पर तो पहले ही तीन-तीन लोग बैठे हुए हैं। आप भी थोडा-सा एडजेस्ट कर लीजिये।"

"नहीं, मैं क्यों करूँ?"

"प्लीज, भाईसाहब, मेरी बीवी सख्त बीमार है। उसको सीट दे दीजिए।" उस व्यक्ति ने लगभग रो देने वाले अंदाज़ में आग्रह किया, "आपके घर में भी तो माँ-बहन होगी!"

"अब कही न मन की बात। पहचाना कौन हूँ मैं?" कहकर वो व्यक्ति हंस पड़ा।

"नहीं तो ... कौन हैं आप?" उस व्यक्ति ने याद करने की कोशिश की।

"भाईसाहब, हफ्तेभर पहले मैंने भी आपसे यही कहा था, कि आपके घर में भी माँ-बहन होगी ..."

"ओह! तो आप वही हैं!"

"बिलकुल सौ फीसदी वही हूँ।" उस व्यक्ति ने अपनी टोपी उतारकर सर खुजाते हुए कहा। फिर टोपी पहनते हुए वो बोला, "इसलिए तो कहा गया है कि दुनिया गोल है!"

"प्लीज भाईसाहब, मुझे माफ़ कर दीजिये और उस वाक्यात को भूल जाइये।" उस व्यक्ति ने पश्चाताप भरे स्वर में कहा। "कैसे भूल जाऊं? उस रोज़ मेरी बूढी माँ खड़े-खड़े ही बस में सफ़र करती रही और आप सांड की तरह सीट पर पसरे हुए, मज़े से चने खाते हुए गा रहे थे। याद आया जनाब ... इसलिए मैं तो तुम्हें सीट हरगिज-हरगिज न दूंगा। चाहे तुम्हारी बीमार बीवी चक्कर खाके गिर ही क्यों न पड़े?" कहकर टोपी मास्टर ने इत्मीनान की साँस ली और जेब से चने निकलकर खाने लगा और गुनगुनाने लगा,

"चना ज़ोर गरम बाबू मैं लाया मज़ेदार। चना ज़ोर गरम ...."

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