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गर्व [लघुकथा]- श्रद्धा मिश्रा

रचनाकार परिचय:-

परिचय-
नाम-श्रद्धा मिश्रा
शिक्षा-जे०आर०एफ(हिंदी साहित्य)
वर्तमान-डिग्री कॉलेज में कार्यरत
पता-शान्तिपुरम,फाफामऊ, इलाहाबाद
संपर्क-mishrashraddha135@gmail.com

*गलतफहमी*

नंदनी आज खाने में क्या है?जोरो की भूख लगी है।नमन ने कुतुहलवश पूछा।
तुम्हारी ही पसंद की सारी चीजें हैं नमन, नंदनी ने कहा।
खाना खाते ही नमन ने कहा वाह! मजा आ गया। नंदनी मैंने पहले भी कहा अभी भी कहूँगा तुम्हारे हाथों में जादू है। जो भी बनाती हो लाजवाब,जो भी खाए बस खाता जाए।
नंदनी ने बीच मे टोकते हुए कहा नमन सोचती हूँ टिफ़िन का काम कर लूँ। हर साल कितने नए बच्चे आते हैं यहाँ पढ़ने जो खाना नही बना पाते उन्हें भी घर जैसा खाना मिलेगा और उस के लिए बाहर भी नही जाना पड़ेगा और मेरा हुनर भी बेकार नही होगा।

हर बार की तरह नमन हूं हूं करके हाथ धुलके बैडरूम में चला गया। परी को गोद मे उठाकर उसके साथ खेलने लगा।

नंदनी को पता था कि नमन इस बात में कोई इंट्रेस्ट नही लेंगें। फिर भी उसने अपनी बात बोल दी। ये नमन का आज का नही है जब भी नंदनी उससे घर के बाहर जाकर या घर मे ही रहकर कोई काम करने की बात करती उसका यही रवैया होता था।

खैर, इसी तरह दिन बीतते गए।

एक दिन अचानक नमन ने नंदनी से कहा नंदनी मैं सोचता हूं तुम्हे अपना हुनर घर में ही आजमाना नही चाहिए। नंदनी को एक बार को लगा कि उसने जो सुना वो नमन ने ही कहा है या कि उसके ही दिल की आवाज है।

1 मिनट तक उसने नमन को देखा फिर नमन ने कहा ऐसे क्यो देख रही हो मैं सच मे चाहता हूँ कि तुम अपने हुनर से अपनी पहचान बनाओ।

नंदनी ने पूछा 5 सालो से मैं ये पूछती रही कहती रही आज अचानक क्या हुआ कि आप की सोच बदल गयी।

नमन ने कहा नंदनी आज रश्मि ऑफिस में आई थी। उसके बारे में सुना तो अंदर तक हिल गया।

रश्मि कौन है? नंदनी ने पूछा।

हमारे ऑफिस में जो चपरासी है मंगल उसकी बीवी है।
उसके माता पिता ने उसे बहुत कम पढ़ाया लिखाया और छोटी उम्र में ही शादी कर दी। मंगल सिंह ने उसे पढ़ाया लिखाया। और उसे पुलिस की नौकरी मिल गयी है। दोनों खुश हैं। अगर वो इतनी छोटी सी नौकरी करके इतनी बड़ी सोच रखता है तो मैं क्यो नही कर सकता नंदनी। मैं क्यो तुम्हारे हुनर को दबाऊं। आखिर मैं बदलूंगा तभी तो कल अपनी बेटी के लिए बेहतर भविष्य की और बेहतरीन समाज पाऊँगा।

नंदनी की आंखों में गर्व था, पता नही किसके लिए मंगल सिंह के लिए या अपनी बेटी के आजाद भविष्य के लिए।

श्रद्धा मिश्रा





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2 टिप्पणियां

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन अग्नि-5 की सफलता पर बधाई : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

    जवाब देंहटाएं
  2. मैंने देखा है कि सहित्यशिल्पी में छपने वाले लेखों आदि में वर्तनी संबंधी त्रुटियां अक्सर रहती हैं, जैसे इस लघुकथा में "धुलके, मे, नही, क्यो, सालो" जैसे सरल और मौलिक स्तर के शब्दों के मामले में है।
    लेखक-लेखिकाएं थोड़ा-सा सावधानी बरतें तो अच्छा हो।

    जवाब देंहटाएं

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