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जाड़ा आया व अब तो पढ़नें जाना है [कविता]- डॉ.प्रमोद सोनवानी " पुष्प "

रचनाकार परिचय:-

डॉ.प्रमोद सोनवानी " पुष्प "
संपादक- "वनाँचल सृजन"
"श्री फूलेंद्र साहित्य निकेतन"
तमनार/पड़ीगाँव-रायगढ़(छ.ग.)
भारत , पिन-496107
ई-मेल:-Pramodpushp10@gmail. com
" जाड़ा आया "
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सूरज भैया जल्दी आकर ,
जाड़ा दूर भगाना तुम ।
सर-सर,सर-सर हवा चल रही,
गरमी हमें दिलाना तुम ।।1।।

जाड़ा के इन दिनों में ,
दूर कहीं मत जाना तुम ।
पास हमारे रहकर भैया ,
जाड़ा दूर भगाना तुम ।।2।।

जाड़ा हमें कपाता थर-थर ,
उसे तनिक समझाना तुम ।
ठिठुरन में कांपे न कोई ,
जाड़ा दूर भगाना तुम ।।3।।

" अब तो पढ़नें जाना है "
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ध्यान लगाकर पढ़ना है ,
हमको आगे बढ़ना है ।
गाँव-गाँव में जा-जाकर ,
ज्ञान का दीप जलाना है ।।1।।

जहाँ कहीं भी मिले अंधेरा ,
उसको दूर भगाना है।
कोई अनपढ़ न रह पाये ,
ध्यान हमें यह रखना है ।।2।।

समझे कुछ तुम पिंटू भैया ,
अब तो पढ़नें जाना है ।
ध्यान लगाकर पढ़ना है ,
हमको आगे बढ़ना है ।।3।।




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