रचनाकार परिचय:-


लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित
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अँधेरी-गळी, आसोप री पोळ रै साम्ही, वीर-मोहल्ला, जोधपुर.[राजस्थान]
मारवाड़ी हास्य-नाटक  [गाड़ी के मुसाफ़िर- जासूसी कुत्ता] खंड 7 लेखक और अनुवादक -: दिनेश चन्द्र पुरोहित



[मंच रोशन होता है, माणक चौक का मंज़र सामने आता है ! लोगों के कोलाहल के आगे कुछ सुनायी नहीं दे रहा है ! अब अब्बू मियां की दुकान सामने दिखायी देती है ! दुकान के चबूतरे पर माइक लगा हुआ है, जिसे थामकर मुजाविर तीजे का एलान कर रहा है !]

मुज़ाविर – [माइक थामकर, कहता है] – ख़ुदा रहम करें, मुरीदों ! आज, तीज़े का उठावना है ! रसूल अलद सली अलद अलाया वसलम के दामाद साहब और उनके मासूम बच्चे की शहादत को हम सभी याद कर रहे हैं ! ख़ुदा इनकी रूह को जन्नत अता फ़रमावे !

[इतने में माइक में तकनीकी ख़राबी आ जाने से, माइक से खरड़ खरड़ आवाज़ आवाज़ निकलने लगती है ! अब मुजाविर की आवाज़, इस खरड़ खरड़ आवाज़ के आगे दब जाती है ! कुछ साफ़ सुनायी नहीं देता, इस कारण लोगों का ध्यान बंट जाता है ! दूसरी तरफ उतावली कर रहे मुरीदों के, गगन भेदी नारे ‘या अली, या हुसैन’ नभ में गूंज़ते जा रहे हैं ! सभी मुरीद इस तरह नारे लगाते हुए, फूलों की तरफ़ बढ़ते जा रहे हैं ! अब रशीद भाई भी इस भीड़ में, दाख़िल हो जाते हैं ! भीड़ में खड़े जबरू उस्ताद को देखकर, वे उनके निकट चले जाते हैं ! फिर उनका हाथ थामकर, उन्हें भीड़ से बाहर ले आते हैं ! बाहर लाकर, वे उन्हें कहते हैं...]

रशीद भाई – यार जबरु ! नीचे गिरने के बाद यार मज़ा आ गया होगा, तूझे ? अब बोल प्यारे, तूझे किस नाम से बतलाऊं ? जबरू या कबरू, या फिर काबरिया...
जबरुद्दीन – [शर्माते हुए कहते हैं] – किब्ला, आप ठहरे उस्ताद ! जो इलाज़ हकीम लुकमान के पास नहीं, वो इलाज़ आपके पास है ! उस्ताद, अब आप मुझे कुछ भी कहिये...मैं बुरा नहीं मानूँगा !

रशीद भाई – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – ऐसी क्या बात है, प्यारे ? कहीं यार तू, हुस्न की मोहब्बत का शिकार बन गया क्या ? यह सोच ले, उस्ताद से कोई बात छुपी हुई नहीं रह सकती ! उलू के पट्ठे, क्या यह बात तू जानता नहीं ?

जबरुद्दीन – [हंसते हुए, कहते हैं] – वाह यार, कमाल है...आख़िर, पट्ठा मैं आपका ही हूं ! अभी आपने कहा, मैं उल्लू का पट्ठा हूँ ? हुज़ूर कहिये, आप ही मेरे उस्ताद उल्लू हैं ! तब आप ही बताएं, के आप काठ के उल्लू है या...

रशीद भाई – [गुस्सा ज़ाहिर करते हुए, कहते हैं] – कहीं तेरा आटा वादी कर रहा है, उस्ताद को कह रहा है उल्लू ? कमबख्त..

जबरुद्दीन – अरे नहीं, उस्ताद ! मैंने ऐसे नहीं कहा, आप मोहब्बत के पुजारी हैं...यानि लव गुरु ! और मैं हूं, आपका शागिर्द ! अब यह आपका शागिर्द, हुस्ना की मोहब्बत से घायल हो गया है ! उसके दीदार करने के बाद, यह आपका शागिर्द कुछ काम का नहीं रहा !

[अब्बू मियां रंगरेज की दुकान के निकट ही एक ट्रोली रखी है, जिसमें सुंगधित फूल रखे हैं ! इधर इन फूलों के पास रखे लोभान से, मन को लुभाने वाली महक फैल रही है ! अब इस भीड़ में, मामूजान का थोबड़ा दिखाई देता है ! इस भीड़ में फंसे मामूजान, बराबर धक्के खाते जा रहे हैं ! मगर यह बीड़ी पीने की तलब उनको कहीं का नहीं छोड़ती, वे बराबर धूम्रपान करते जा रहे हैं ! धूम्रपान करते उनकी नज़र एक ख़ूबसूरत मोहतरमा पर गिरती है, जो बुर्के की जाली हटाकर अपना चन्द्रमुख सबको दिखला रही है ! साथ में वह, अपनी सहेलियों के साथ चुहुलबाजी करती जा रही है ! इसके दीदार पाकर अब मामूजान मुग्ध हो गए हैं, अब वे इन चुहुलबाजी कर रही ख़ूबसूरत मोहतरमाओं को एक टक देखते जा रहे हैं ! वे अब ऐसे मोहित हो गए हैं, उस मोहतरमा पर..उनका ध्यान हाथ में थामी हुई बीड़ी से हट जाता है ! तभी कोई उतावला मुरीद धक्का देता हुआ फूलों की ट्रोली की तरफ़ बढ़ता है, और उसके घुद्दे से मामू के हाथ में थामी हुई सुलगती बीड़ी हाथ से छूट जाती है ! जो उछलकर, फूलों की ट्रोली की तरफ़ बढ़ती

एक मोहतरमा के गाल पर आकर चेंठ जाती है ! फिर क्या ? वो मोहतरमा बिगड़ी सांडनी की तरह, गुस्से से उछल पड़ती है ! पास खड़े लौंडे को देखकर, उसे दोषी मान लेती है ! उस वक्त वो दुबला-पतला लौंडा किसी हसीन मोहतरमा को निहारता हुआ मुस्करा रहा था, बस वो मोहतरमा समझ बैठती है ‘हो न हो इस सींकिया पहलवान ने ही, बीड़ी मेरे गाल पर फेंककर कुचमाद की होगी ?’ बस, फिर क्या ? वह रण चंडी बनी मोहतरमा झट उस सींकिया पहलवान के गाल पर ज़ोर से जमा देती है, थाप ! वो झन्नाटेदार थाप उस लौंडे के गाल पर ऐसा लगता है, के ‘उस बेचारे सींकिये पहलवान को, दिन में ही दिखाई दे जाते हैं आसमान के तारे !’ और वो बेचारा अपने बदन पर, अपना नियंत्रण खो बैठता है ! फिर क्या ? धड़ाम से आकर गिरता है, पास खड़ी एक गजगामिनी मोहतरमा के ऊपर ! वह हथनी जैसी शरीर वाली मोहतरमा ठहरी, गुस्सेल ! वह आव देखती है न ताव, झट पहलवान दारा सिंह की तरह उस अदने से सींकिया पहलवान को उठाकर फेंक देती है...जो आकर गिरता है, एक दुबली-पतली मोहतरमा के ऊपर ! बेचारी वह मोहतरमा, उस सींकिया पहलवान के नीचे दब जाती है ! इस तरह उस बेचारी का निकल जाता है, कचमूर ! दर्द के मारे वो ज़ोर से चिल्लाती है, फिर दांत निपोरती हुई अपनी भाभी को आवाज़ देती हुई ज़ोर से उसे कहती है ‘ओ भाभीजान, इस मोटी ने मेरा कचमूर निकाला डाला ! ज़रा, इस कलमुंही की ठुकाई करना !’ पहले जिस मोहतरमा के गाल पर सुलगती बीड़ी गिरी थी, वो ही मोहतरमा इसकी भाभी निकली ! उसकी हथेली पर पहले से ही किसी को पीटने के लिए खुजली चल रही है, बस उसकी यह इच्छा रही के ‘मौक़ा हाथ लगने पर, वह किसी पर अपना हाथ साफ़ कर ले !’ बस, फिर क्या ? झन्नाटेदार थप्पड़ जमा देती है, उस गजगामिनी के गाल पर ! फिर बकती है, गालियां !]

पहली मोहतरमा – [थप्पड़ रसीद करके, कहती है] – मरी रांड की रांड, तू तो जंगारा की औलाद निकली ? आगे से ध्यान रखियो, मेरी ननद के हाथ लगायो तो चीर काडूंगी ! भंगार की खुरपी, मोटी भैंस !

गजगामिनी – [पहली मोहतरमा की चोटी खींचती हुई, कहती है] – तेरी ननद को छोड़ जंघामथानी [छिनाल] ! मैं तूझे चीर खाऊँगी, और तेरा यार रसूलिया कुछ कर नहीं पायेगा ?

[रसूल मियां का नाम अपने नाम के साथ जोड़ा जाना, उस मोहतरमा को काहे पसंद ? बस, फिर क्या ? वह पहली मोहतरमा उस गजगामिनी के बाल खींचती हुई कहती है !]

पहली मोहतरमा – [बाल खींचती हुई, कहती है] - छोड़ मेरी चोटी, फिर आने दे मेरे खसम को...कमबख्त पोदीने की चटनी, तेरा क्या हाल करता है वो ? तेरी सात पुश्तें जाए दोज़ख़ में...

गजगामिनी – [बाल छुड़ाते-छुड़ाते, उस मोहतरमा की नाजुक कमर पकड़ती हुई कहती है] – छिनाल रांड तेरे तेरे खसम को लाकर करेगी क्या ? साला दोज़ख़ का कीड़ा, ख़ाली ऊब जाता है खम्बे की तरह..करता-वरता कुछ नहीं ? उसको तो मैं ऐसे ऊंचाकर [दोनो हाथों से उस मोहतरमा को उठा लेती है, और उसे पटक देती है..उसी सींकिया पहलवान के ऊपर ! फिर कहती है] ऐसे पटककर मारूंगी, उसके पिछवाड़े पर लात ! [मोहतरमा के पिछवाड़े पर, ज़ोर से लात मारती है]

[मगर यह पहली मोहतरमा ठहरी, फुर्तीली ! झट उठ जाती है, और फिर मोहम्मद अली मुक्केबाज की तरह उस गजगामिनी के पेट में मुक्कों की बरसात कर बैठती है ! फिर क्या ? उसे बचाने के लिए उसकी बहने आ जाती है, इस जंगे-मैदान में ! उधर पहली मोहतरमा की ननद भी बुला लेती है पास खड़ी अपनी सहेलियों को ! फिर यह मंज़र बदलकर, कुश्ती की रिंग बन जाती है ! वे एक दूसरे को मुक्कों से पीटती हुई, ये सभी मोहतरमाएं झांसी की रानी की तरह जंगजू बन चुकी है ! अब जो भी भला इंसान बीच-बचाव के लिए इस लड़ाई के बीच में कूदता है, वो इन मोहतरमाओं की पिटाई का शिकार बन जाता है ! अब इन लोगों की कुश्ती को, ये ढोलकिये कैसे नज़रंदाज़ कर पाते ? बस वे सभी ढोलकिये मातमी ताल पर, उनका जोश बढाने के लिए ढोल बजाते जाते हैं ! इधर भीड़ में खड़े तमाशबीन तालियां पीटते हुए, उन मोहतरमाओं का जोश बढ़ाते जा रहे हैं ! इस जंग में उस मोटी गजगामिनी और उस मुक्केबाज पहली मोहतरमा की लड़ाई, देखने योग्य बेमिसाल है ! इसे देख रहे सटोरिये मामूजान को, अब सट्टा लगाने की स्कीम हाथ लग जाती है ! अब वे सटोरियों की तरह ज़ोर-ज़ोर से लोगों को आवाज़ें लगाते हुए, उन्हें सट्टा लगाने के लिए तैयार करते जा रहे हैं ! उनकी बुलंद आवाज़, अब लोगों को सट्टा लगाने को प्रेरित करती जा रही है !]

मामूजान – [हाथ में नोट लिए, उन्हें हवा में घूमाते हुए कहते हैं] – दो के चार, दो के चार ! आ जाओ, साहेबान ! लगा दो, मोटी पे...लगा दो, दुबली पे ! अपनी क़िस्मत अजमा लो, प्यारों !

[फ़टाफ़ट सट्टे लगाने के लिए, मामू के चारों ओर भीड़ जमा हो जाती है ! मगर यह, क्या ? माइक में आयी खराबी, दूर हो जाती है ! अब मुजाविर की आवाज़ माइक पर गूंज़ती है ! वह माइक थामे, मुरीदों को एलान करता हुआ कह रहा है !]

मुजाविर – [माइक थामे हुए, कहता है] – क़ुर्बानी हो गयी, बीत गयी क़त्ल की रात ! [लड़ती हुई मोहतरमाओं को देखता हुआ, कहता है] अरी ओ मोहतरमाओं ! क्यों ख़ुद की क़ुर्बानी देने तुली हो ? आज तीज़े का उठावना है ! शान्ति बनायी रखो ! [बुलंद आवाज़ में लड़ती मोहतरमाओं को एक बार और कहता है] मोहतरमाओं, दूर हट जाओ ! बंद करो, यह झगड़ा-फ़साद ! यह कर्बला का जंगे-मैदान नहीं है..[ख़िदमतगारों से कहता है] ओ ख़िदमतगारों ! इन लड़ती मोहतरमाओं को बाहर निकालो ! शीघ्र अमन क़ायम कीजिये, फूलों की रस्म अता की जा रही है !

[फिर क्या ? हुक्म मिलते ही, सारे ख़िदमतगार भीड़ में घुसते हैं और सीधे चले आते हैं उन जंगजू मोहतरमाओं के पास ! फिर, सभी इन मोहतारामों को बेदख़ल करने की कोशिश करते हैं ! मगर, यह क्या ? यहां की स्थिति तो इन ख़िदमतगारों के विपरीत ठहरी ! ये मोहतरमाएं झगड़ालू ठहरी, ऊपर से इनके ऊपर छाये हुआ है मातमी उन्माद ! इदर इन ढोलकियों ने उन्मादी ताल पर ढोल पीटकर इनका जोश बढ़ा दिया है ! अब तो ये सारी मोहतरमाएं झांसी की रानी की तरह, रण चंडी बन चुकी है ! इनके सामने आया हुआ हर इंसान, इनको दुश्मन ही लगता है ! फिर क्या ? ख़िदमतगारों के निकट आते ही, वे एक साथ उन पर टूट पड़ती है ! ऐसा लगता है, मानो रण-क्षेत्र में घाव खाया हुआ हाथी सामने आने वाले हर इंसान को कुचलता हुआ आगे बढ़ जा रहा है ! एक साथ इनके टूट पड़ने से, बेचारे ख़िदमतगारों ने अपनी अंगुलियां ऊपर उठा ली है ! पिटाई होने से, वे बेचारे सभी दर्द के मारे किलियाते जा रहे हैं !]

ख़िदमतगार – [मार खाकर, चिल्लाते हुए कहते हैं] – ख़ुदा रहम, ख़ुदा रहम ! बचाओ मेरे मोला, इन शैतान की खालाओं से !

[जान बचाने की भीख मांग रहे ख़िदमतगार अब हिफ़ाज़त से बाहर निकलने के वास्ते अपने हाथ-पांव फेंकने लगे ! मगर ये शैतान की खालाएं, कब उनको छोड़ने वाली ? इनसे बचकर निकलना इताना आसान नहीं, ये तो खुदा कसम ऐसी ख़बीस ठहरी जो भागने की कोशिश कर रहे ख़िदमतगारों की टांग में लंगड़ी का दाव डालकर उन बेचारों को गिरा दिया है ! कई मोहतरमाओं ने ख़िदमतगारों के गिरेबान पकड़कर उनको तिगनी का नाच नचा दिया है ! इनके द्वारा अजमाए जा रहे कुश्ती के दाव देखकर तमाशबीनों की आंखें खुली की खुली रह जाती है ! अब ऐसा दारुण मंज़र सामने आ रहा है, जहां बेचारे ख़िदमतगार चारों खाने चित्त पड़े हैं ! ऐसे लग रहे हैं, मानो किसी दयालु इंसान ने कबूतरों के लिए आँगन पर गेहूं बिखेर दिए हो ? अचानक, अल्लाह मियां उनकी करुण पुकार सुन लेते हैं, जो ढोलकिये इतनी देर से मातमी ताल पर ढोल बजा रहे थे...उनकी भुजाओं में, नाक़ाबिले बर्दाशत दर्द पैदा हो जाता है ! बड़े तेज़-तरार माने जाने वाले ढोलकिये, भारी ढोल लिए इतनी देर बजा नहीं सकते ! ये तो कमाल ठहरा इन मोहतरमाओं का, जो इतनी देर तक कुश्ती के दाव-पेच अजमा रही थी ? उन दाव-पेच को देखकर ये ढोलकिये, जोश से भर गए थे..खुदा रहम, इन लोगों ने किस तरह इतनी देर तक ढोल बजा डाले..वो अल्लाह मियां ही जाने ? अब थके हुए ढोलकियों ने वज़नी ढोल उतारकर नीचे रख दिया है, इस तरह उन्मादी ताल के बंद होने से इन मोहतरमाओं के दिल में बसा जंग का नशा काफूर हो जाता है ! चेतन होते ही, कोई मोहतरमा अपने रिदके से सर पर ढकती है, तो कोई अपने कंधे पर आये बुर्के को सर पर लाकर उसे अच्छी तरह से ओढ़ लेती है ! फिर आब-आब होती हुई, उस स्थान को छोड़ देती है ! इस तरह वे, अन्य स्थान पर जाकर खड़ी हो जाती है ! मगर, मामू के सट्टे लगाए आने की पुकार अभी भी सुनायी दे रही है ! वे ज़ोर-ज़ोर से बोलते जा रहे हैं ‘दो के चार, दो के चार ! आओ भाईजान आओ, आकर मोटी पर लगाओ..दुबली पर लगाओ !’ मगर, वे नूरा कुश्ती के नूरा पहलवान है कहाँ ? मामू की हो जाती है, बोलती बंद ! अब चारों ओर शान्ति छा जाती है, अमन कायम हो जाता है ! अब लोगों की निग़ाह, ज़मीन पर लोट लगा रहे ख़िदमतगारों पर गिरती है ! मानो इन बेचारों की क़िस्मत फूट गयी है, किसी बेचारे ख़िदमतगार की कमीज़ फट गयी है तो किसी का फट गया है पायजामा...और किसी बेचारे के पायजामे का, तीजारबंद निकलकर उनके हाथ में आ चुका है ! ये बेचारे किसी तरह कपडे से अपने बदन को ढाम्पते हुए अपने-आपको नग्न होने से बचा रहे हैं ! किसी तरह वहां हाज़िर लोग, इन खिदमतगारो को हाथ थामकर खड़ा करते हैं ! ख़ुदा न जाने, कहाँ से एक सांड घुस जाता है इस भीड़ में ? और मच जाती है, भगदड़ ! इस भगदड़ के कारण लोग इधर-उधर दौड़ते हैं, जिससे बेचारे ख़िदमतगार जो अभी खड़े ही हुए हैं उनको लगता है इस भीड़ का...एक ज़ोर का धक्का ! धड़ाम से बेचारे वापस गिरते हैं, ज़मीन पर ! सांड तो कारनामा करके, आगे निकल चुका है ! मगर पीछे अब मामूजान उन ख़िदमतगारों की यह हालत देखकर, ज़ोर से ठहाके लगाकर हंस पड़ते हैं ! तभी पहली मोहतरमा से थप्पड़ खाने वाला सींकिया पहलवान को दिखाई दे जाता है मामू का थोबड़ा ! उनको देखते ही उसे, पिछला बीता हुआ वाकया याद आ जाता है..किस तरह मामूजान ने बीड़ी फेंककर उस मोहतरमा के गाल जला डाले ? जिसका परिणाम, उस बेचारे सींकिया पहलवान को भुगतना पड़ा ! अब वो ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता हुआ, उन ख़िदमतगारों को कहने लगा..]

सींकिया पहलवान – [ख़िदमतगारों को, ज़ोर से कहता है] – अरे, ओ ख़िदमतगारों ! अब आप कहीं मत जाना ! पहले आप इस मामू को छठी का दूध याद दिला दीजिये, कमबख्त ने उस दुबली मोहतरमा पर सुलगती बीड़ी फेंककर दंगल करवाया है ! अब इस नामाकूल को कहीं जाने मत देना, इसे ठोक-ठोक कर इसकी अक्ल दुरस्त कीजिएगा !

[सुनते ही ख़िदमतगार उठते हैं, उठकर मामू का गिरेबान पकड़ने की निरर्थक कोशिश करते हैं ! मगर मामूजान ठहरे, उस्तादों के उस्ताद ! अब वे क्या हाथ आते ? वे तो झट अपना हाथ छुड़ाकर, रमजान मियां की दुकान के पास वाली पतली गली में दाख़िल हो जाते हैं ! मगर, अब मियां की बदकिस्मती ठहरी..क़िस्मत ने उनका साथ देना बंद कर दिया है ! ख़ुदा जाने आज उन्होंने क्यों लाल कमीज़ पहन रखा है ? जिसके कारण ये आने वाली आसमानी आफ़तें, उनका पीछा नहीं छोड़ रही है ! गली के नुक्कड़ पर चार-पांच गायों के झुण्ड के पास खड़ा एक सांड की निग़ाह मामूजान पर गिरती है ! उसकी निग़ाह में उनका लाल कमीज़ आते ही वह भड़क जाता है, फिर क्या ? वह निशर्मा अपने सींग झुकाए दौड़ता है, मामू की तरफ़..उनकी पिछली दुकान पर, भेटी मारने के लिए ! अब बेचारे मामूजान अपनी जान बचाने के ख़ातिर, बतूलिये की तरह दौड़ते नज़र आते हैं ! फिर क्या ? आगे-आगे मामूजान, और पीछे यह लाल सुर्ख आँखे किये..यह कमबख्त सांड ! इस मंज़र को देख रहे गली के बच्चों ने शोर मचा दिया है, चबूतरे पर बैठे छोटे बच्चे उस शोर से भयभीत हो जाते हैं ! एक बेचारा नन्हा बच्चा चबूतरे पर आकर खड़ा हुआ है पेशाब करने के लिए, जैसे ही मामू दौड़ते हुए उधर से गुज़रते हैं..बेचारा भयभीत बच्चा, मूत्र की धारा चला देता है ! जो सीधी आकर मामूजान के ऊपर गिरती है ! बेचारे मामूजान को क्या पता ? कौन, क्या कर रहा है ? वे तो बेचारे उस सांड के डर के मारे, जान बचाकर दौड़ते जा रहे हैं ! ऐसा लग रहा है, मानो मामू मैराथन दौड़ में हिस्सा ले रहे हैं ! इस मंज़र को देख रही मुंडेर पर खड़ी हसीन मोहतरमाएं व बच्चे, अब तालियां पीटकर उस सांड को और भड़ाकाने का काम करते जा रहे हैं ! जिससे वो भड़का हुआ सांड, अपनी रफ़्तार बढ़ा देता है ! क़िस्मत अच्छी मामू की, जो रास्ते उन्हें दिखाई दे जाता है एक पाख़ाना ! जिसकी छत ज्यादा ऊंची नहीं है, बस उसे देखते ही मामू बन्दर की तरह लगाते हैं एक ज़ोर की छलांग...और, जा पहुंचते हैं पाख़ाने की छत पर ! इस तरह मामूजान कर लेते हैं, किला फ़तेह ! उनके लिए अपनी जान बचाना ही, किले को फ़तेह करने के बराबर था ! मगर, अभी मुसीबत कहाँ पीछा छोड़ने वाली ? पीछे से चला आता है वो नाशपीटा सांड, मामूजान को पखाने के ऊपर चढ़े देखकर उसका पारा चढ़ जाता है ! फिर क्या ? वो झट सींग झुकाकर, लगातार पाख़ाने के दरवाज़े पर भेटी मारना शुरू करता है ! पाख़ाने के अन्दर बैठे अल्लानूर मियां के कानों में, दरवाज़ा भाचीड़ने की कर्कश आवाज़ सुनायी देती है ! बेचारे चड्डी खोलकर बैठे ही थे, और आ गयी यह मुसीबत ! घबराकर झट उठ जाते हैं, मियां ! और बेचारे डरे हुए मियां अपने धूज़ते हाथों से तीज़ारबंद संभालते हैं ! जो उनके हाथ, लग नहीं रहा ? हाथ आया, बार-बार छूट जाता है ! इधर बाहर मामूजान का सांड को भगाने के लिए, हुड़-हुड़ की आवाज़ निकालना..उनको बावला बना देती है ? आख़िर अल्लानूर मियां की हिम्मत लौट आती है, अब वे परेशान होकर ज़ोर से गरज़ते हुए कहते हैं...]

अल्लानूर – [पाख़ाने के अन्दर, तीज़ारबंद बांधते हुए तल्ख़ आवाज़ में कहते हैं] – दरवाज़ा क्यों भचीड़ रहा है, मर्दूद ? आ रहा हूं, बाहर..धीरज रख नामाकूल !

[आख़िर, तीज़ारबंद बांधकर मियां, बाहर तशरीफ़ रखते हैं ! पीछे मुड़कर, क्या देखते हैं ? भयभीत मामूजान, पाख़ाने की छत पर खड़े हैं और उनके हाथ-पांव डर के मारे धूज़ रहे हैं ! अब मियां अपने पीछे आ रही आफ़त को नज़रंदाज़ करते हुए, ज़नाब मामूजान से उलझ बैठते हैं ! और, झल्लाते हुए उनसे कहते हैं..]

अल्लानूर – इतनी उतावली क्यों कर रहा है, मामू ? धीरज नहीं है, तुझको ? अबे ऊपर क्या मूतना कर रहा है, नामाकूल ? आ नीचे, बेउसूल ! नहीं आया तो अभी भचीड़ने, आ रहा हूं ऊपर ! और तू...

[आगे क्या बोल पाते मियां, उसके पहले उनकी निग़ाह मामूजान के पायजामें के ऊपर गिरती है ! क्या देखते हैं, मियां ? आली ज़नाब मामूजान के पायजामे का तीज़ारबंद, बाहर निकला हुआ है ! उसे देखकर, अल्लानूर मियां की हंसी छूट जाती है ! अब वे ज़ोर से ठहाके लगाकर, हंसते हैं ! उनको इस तरह हंसते देखकर, मामू जलभुन जाते हैं ! उनकी क्रोधाग्नि भड़क उठती है, अब वे चिढ़ते हुए कहते हैं आल्लानूर मियां से..]

मामूजान – [चिढ़ते हुए, कहते हैं] – क्यों दांत काडे हंस रहा है, माता के दीने ? तेरी तो...

अल्लानूर – [हंसते हुए, कहते है] – देख ले, देख ले ! तेरे पायजामे का तीज़ारबंद खुला पड़ा है, ही ही ही..! खींचकर डाल दूं रे ख़त, तेरे पायजामे के अन्दर ? बेहया, बेउसूल ! फिर नाचते रहना माणक चौक में, ऊंचे हाथ करके !

[खुला तीज़ारबंद को देखते ही, मामूजान के गाल शर्म के मारे लाल-लाल हो जाते हैं ! इसमें बेचारे मामू की क्या ग़लती ? बेचारे जब उस सांड के साथ लगा रहे थे मैराथन दौड़, तब शायद यह ढीला बांधा गया तीज़ारबंद खुल गया हो ? फिर क्या ? तीज़ारबंद को सलामत करके, मामूजान जहरीली नज़रों से मियां अल्लानूर की तरफ़ देखते हैं ! मगर यहां तो मियां अल्लानूर साहब के ख़ुद के पायजामे का, तीज़ारबंद पायजामे से बाहर निकला हुआ ? बेचारे, सांड के दरवाज़ा भचीड़ने से तीज़ारबंद पर बिना ध्यान दिए बाहर आ गए थे..इस कारण उन्होंने उतावली में तीज़ारबंद बंद किया था ! जो पायजामे के अन्दर डाला गया, या नहीं ? इस बारे में मियां कुछ नहीं जानते ! हो सकता है, वो तीज़ारबंद बाहर ही रह गया हो ? मामू की उस पर निग़ाह गिरते ही, वे अब तालियां पीटते हुए ज़ोर-ज़ोर से हंसते जा रहे हैं !]

मामूजान – [हंसते हुए, कहते हैं] – मेरे तीज़ारबंद को छोड़ो, मियां ! देख लो, अपने तीज़ारबंद को ! अरे लंगूर, डाल दे,,,डाल दे, अन्दर ! कमबख्त बेहया निकला रे, तू तो ? अबे ए..

[इसके आगे, मामूजान क्या बोल पाते ? उनको सामने से, तेज़ी से आता हुआ वो गुस्सेल सांड दिखाई दे जाता है...जहां ख़ुद मामू जान के होश फ़ाख्ता हो जाते हैं, तब वे मियां अल्लानूर को कैसे करते सावधान ? वो तो अचानक सांड सामने आता ही नज़र आता है, और बेचारे मामूजान की बंध जाती है घिग्घी ! वे अब, क्या हिम्मत रख पाते ? उनकी तो हालत हो गयी थी, पतली ! बेचारे अल्लानूर मियां जैसे ही तीज़ारबंद को सलामत करने के लिए नीचे झुकते हैं, तभी वो कमबख्त सांड दौड़ा चला आता है ! और उनके पिछवाड़े दोनों सींग लगाकर, एक ही झटके में बेचारे अल्लानूर मियां को उठाकर फेंक देता है पाख़ाने की छत पर ! अब जैसे ही अल्लानूर मियां छत पर आकर गिरते हैं, मामूजान उनको देखकर ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाकर हंसते हैं ! फिर वे परिहास करते हुए, उनसे कहते हैं...]

मामूजान – क्यों रे, चमान ? तू भी आ गया, यहां मूतने ? बेशर्म, बेहया !

[मामूजान के एहबाब ठहरे, रशीद भाई ! क्योंकि वे भी उनकी हर हरक़त पर अपनी नज़र गढ़ाए रखते हैं...वे अब इस वाकये के क्यों नहीं बनना चाहेंगे, चश्मदीद गवाह ? वे तो मामू के वहां से रूख्सत होते ही, जबरू उस्ताद को साथ लिए उनके पीछे-पीछे यहां चले आये हैं ! अब वे इन दोनों को छत पर चढ़े देखकर, ज़ोर से हंसते हैं ! फिर रशीद भाई, मामूजान से कहते हैं..]

रशीद भाई – [ठहाके लगाकर, कहते हैं – मामू प्यारे, आ गए साले रंग में भंग डालने..बांगी कहीं के ? कमबख्त, वहां बेचारे ख़िदमतगारों को ज़मीन पर धूल चटाकर आ गया यहां...अब साला चढ़ा है पाख़ाने के ऊपर ! नापाक ठौड़ पर क्या करता है रे, दोज़ख़ के कीड़े ?

मामूजान – [गुस्से में, जहरीली नज़रों से देखते हुए कहते हैं] – छक्के की तरह क्यों हंस रहे हो, लंगूरों ? तुम-दोनों की, सीटी-पिटी गुमकर दूंगा ! आख़िर, तुम-दोनों मुझे समझते क्या हो ?

अल्लानूर – [पाख़ाने से नीचे उतरते हुए, कहते हैं] – अभी तो मामू, तेरी सीटी-पिटी गुम है प्यारे ! अब क्यों देखता है इन दोनों को, आँखे फाड़कर जहरीली नज़रों से ? कमबख्त सांड को देखते ही डर गया साला, और लगा मूतने चमान कहीं के ! देख तेरे पायजामे को, मूत से ख़राब कर डाला तूने साले...फूटी झालर !

जबरूद्दीन – हां रे, देख लिया रे इसका पायजामा...वो तो गीला पड़ा है ! भयंकर बदबू आ रही है, इसके पायजामे से ! पायजामे के अन्दर ही, मूतता है साला ? छोटा बच्चा है, कमबख्त...मूतना आता नहीं इसको ?

[मामू को तो अपनी जान की पड़ी...पीछे आ रहे सांड के करण उसने अपना पूरा ध्यान दौड़ने में ही लगाया ! उसे, क्या पता ? रास्ते में एक चबूतरे के ऊपर खड़े नन्हे बच्चे ने डरकर, मूत की धार चला दी थी मामू के ऊपर ! इससे बेचारे मामूजान का कमीज़ और पायजामा ख़राब हो गया, अब बेचारे मामूजान उन मूत से सने कपड़ो को देखते ही आब-आब हो जाते हैं ! मगर मामू ठहरे, बड़े होशियार ! झट तीज़ारबंद को पायजामे के अन्दर डालकर, मुद्दा बदलने के लिए उन तीनों को धमकाते हुए कहते हैं..]

मामूजान – अरे ओ, मां के दीनों ! तुम लोग हो, खर्रास...सालों, कहां खुला है..तीज़ारबंद ? अब देखना, तुम ! तुम सबको डराकर ऊंचा न चढ़ा दिया, तो मेरा नाम....

रशीद भाई – [मामू का अधूरा जुमला पूरा करते हुए, कहते हैं] – कह दूंगा यार, तेरा नाम फरेब खां ! समझ गया ? [तेज़ आवाज़ में, कहते हैं] शर्त लगानी और उसे निभाना, मर्दों का काम है ! मगर तू तो ठहरा, जनखा ! अगर जनखा नहीं है, तो पहले वाली शर्त पूरी कर ! बेचारे जबरू से सौ चक्कर कटवा डाले, उस महावतों के ताजिये के चारों तरफ़ ! फिर आयी, बारी शर्त निभाते हुए सर पर जूत्ते खाने की ! तब कमबख्त भग गया, मर्दूद पतली गली से ?

[इतना सुनते ही, मामू की क्रोधाग्नि भड़क जाती है और कूदकर नीचे आते हैं ! फिर हाथ नचाते हुए, ताने देने को उतारू हो जाते हैं ! वे गुस्से से लाल-पीले होकर, कहते हैं...]

मामूजान – जनखा मैं नहीं, तू है गेलसफ़ा ! अब तो तुम सबको, मेरी कारश्तानी देखनी होगी ! तुम सब अपने-आपको, समझते क्या हो ? बड़े आये, मज़नू बनकर ? कुतिया के ताऊ सारे दिन बाज़ार में मज़नूगिरी करते फिरते हो..अब यह सारी दास्तान, जाकर कह दूंगा दूल्हे भाई को !

[पांव आगे बढ़ाते हैं, जाने के लिए, फिर रुककर...आगे, और कहते हैं]

मामूजान – [जाते-जाते, कहते हैं] – याद रखना, तुम दोनों का क्या हाल करता हूं ?

जबरुद्दीन – कह देना, मामू ! आराम से नमक-मिर्च लगाकर, ऐसे कहना..अपनी महबूबा को खिलाये दही-बड़े और तुझको खिलाई आलू की टिकिया और मिर्ची बड़ा ! कमबख्त तू तो इतना खाकर भी निकला, नमकहराम !

रशीद भाई – [ज़ोर से कहते हैं] - यह भी कह देना, मामू ! सिनेमा का पास तुझको न देकर, हसीना को दे दिया..फिल्म चौदवी का चाँद देखने के लिए !
मामूजान – [जाते-जाते, पीछे मुड़कर कहते हैं] – देख लेना, देख लेना नामाकूलों ! तुम्हारी सारी करतूतें बता दूंगा, दूल्हे भाई को ! फिर कहना मत, के तुम लोगों को सावधान किया नहीं !

[सभी जाते हुए, दिखाई देते हैं ! धीरे-धीरे उनकी पदचाप, सुनायी देनी बंद हो जाती है ! मंच पर, अंधेरा फ़ैल जाता है !

[२]

[मंच पर, रोशनी फैलती है ! जबरू उस्ताद के मकान का मंज़र, सामने दिखाई देता है ! इनके मकान से सटकर मजीद मियां की आपाजान फातमा बी और रशीद भाई के मकान हैं ! इन सबकी मुंडेरों पर आ-जा सकते है ! इस वक़्त फ़ातमा बी अपनी मुंडेर पर खड़ी, अपने लम्बे बाल संवार रही है ! बाल संवारती हुई वह बार-बार नीचे झांकती हुई, जबरू उस्ताद के चौक में देख लेती है ! वह बराबर चौकस होकर ध्यान रखती है, मकान में कौन आ रहे हैं और कौन जा रहे हैं ? ऐसी निक्कमी औरतों की यह तांक-झाँक करने की आदत, आसानी से छूटती नहीं है ! अब रशीद भाई और जबरू उस्ताद, घर में दाख़िल होते दिखाई देते हैं ! घर में घुसते ही उनकी नज़र गलियारे की दीवार पर लगी दीवार घड़ी पर गिरती है ! वह घड़ी अभी, सुबह दस बजने का वक़्त दिखला रही है ! दोनों अपने जूत्ते खोलकर वहीँ रख देते हैं, फिर वे चौक में आते हैं ! चौक में आने के बाद, जबरू उस्ताद अपनी अम्मीजान को आवाज़ देते हैं !]

जबरुद्दीन – [आवाज़ देते हुए, कहते हैं] – ओ अम्मीजान ! ज़ोरों की भूख लगी है ! जल्द दस्तरख्वान सज़ा दीजिये ! जल्दी कीजिये अम्मी, मुझे वापस लौटना है !

मरियम बी - [ऊपर झरोखे से नीचे चौक में झांकती हुई, कहती है] – आज़कल छोरा तू फिटोल बन गया है, पूरे दिन न जाने कहाँ-कहाँ घूमता-फिरता है ? आख़िर, तू करता क्या है ? मैं तेरी अम्मी, ठहरी भोली ! बेचारी लोगों को कहती रहती है, छोरे की तबीयत नासाज़ है [रिदके से, सर को ढकती है] मुझे तो छोरे तूने, सबके सामने खर्रास बना डाला ? लोग, क्या कहते होंगे ?

जबरुद्दीन – कुछ नहीं कहते होंगे, अम्मी ! आप फ़िक्र न किया करें !

मरियम बी – चिंता की ही बात है, बेटा ! लोग कह रहे होंगे, के ‘यह छोरा पूरे जोधपुर में घूमता-फिरता है और इसकी गतगेली अम्मी कैसे कहती है, बेचारा जबरू मुहर्रम के मेले में कुचला गया..?’ हाय अल्लाह, इस छोरे ने मुझको खर्रास बना डाला !

जबरुद्दीन – [अम्मी को धीमे बोलने का, कहते हैं] – अरे अम्मीजान ! क्यों ज़ोर-ज़ोर से बोल रही हैं, आप ? रशीद भाई तशरीफ़ लाये हैं, अब कम से कम उनके सामने मेरी बची-खुची इज़्ज़त को सलामत रहने दीजिये !

रशीद भाई – [आगे बढ़कर, कहते हैं] – सलाम, चच्ची जान ! खैरियत है ?

मरियम बी – अभी तो खैरियत है, बेटा ! अगर इस घर के यही हाल बने रहे तो वो दिन दूर नहीं, तब तेरी यह चच्चीजान बीमार हो जायेगी ! इस औलाद के कारण..[दुपट्टे के पल्लू से आँखों से ढलक रहे आंसूओं को पोंछती हुई, आगे कहती है] खाना तैयार है, दोनों ऊपर आ जाओ और खाना खा लो !

[दोनों जैसे ही ऊपर जाने के लिए अपने क़दम बढ़ाते हैं, तभी दरवाज़े के पास मजीद मियां और मामूजान की आवाज़ सुनायी देती है, उनकी आवाज़ सुनकर उन दोनों के पांव थम जाते हैं ! अब बैसाखी का सहारा लिए, मजीद मियां चौक की तरफ़ क़दम बढ़ाते हैं ! उनके पीछे-पीछे मामूजान, अपने कंधे पर केमरे वाला बैग लटकाए आ रहे हैं !]

मजीद मियां – [चौक में आते हुए, गुस्से से कहते हैं] – ओ साहबज़ादों, खाना बाद में खाना ! बरखुदार, आज तुम दोनों की खैर नहीं ! खर्रास...फ़हमाहिश के बाद भी तुम सुधरे नहीं नालायकों !

रशीद भाई – [भोला मुंह बनाकर, कहते हैं] – किब्ला, क्या हम दोनों से कोई ग़लती हो गयी...क्या ? हुज़ूर...

मजीद मियां – [चिढ़े हुए, कहते हैं] – ग़लती के बच्चे ! गारत कर डाली, मेरी दुनिया ! अब तुम दोनों को क्या कहूं, नामाकूलों ! आज़कल तुम नामाकूलों की शक्लें आलमेख्वाब में दिखाई देती है !

जबरुद्दीन – सरे ओ अदब, आख़िर दिखाई देगी क्यों नहीं हमारी भोली-भोली सूरत ? क्योंकि हम दोनों हैं, आपके प्यारे-प्यारे दामाद ! कहिये, ठीक है या नहीं ?

रशीद भाई – [हंसते हुए, कहते हैं] – और इसके साथ हैं हम, आपके प्यारे-प्यारे भतीजे ! ठीक है ना, चच्चाजान ?

मजीद मियां – [गुस्से से कहते हैं] – बंद करो, यह चापलूसी ! तुम दोनों ने सोच लिया कैसे, मैं तुम्हारी मौक़ापरस्ती से ख़ुश हो जाऊंगा ? बरखुदार, अब आगे से ऐसी गलत बात सोचना मत ! मैं जानता हूँ, तुम दोनों आज़कल करते क्या हो ?

जबरुद्दीन – [मासूमियत से कहते हैं] – हम दोनों भोले-भाले पंछी हैं ! [रशीद भाई से सहमति लेने के लिए, कहते हैं] क्यों रशीद भाईजान, क्या मैं झूठ तो नहीं बोल रहा हूं ना..?

रशीद भाई – [जबरू उस्ताद को जवाब देते हुए, कहते हैं] - हां जबरू, तू सच्च कह रहा है ! हम दोनों उड़ने वाले [हाथो को हिलाते हुए, पक्षी के उड़ने का अभिनय करते हैं] पक्षी हैं !

मजीद मियां – [गुस्से के साथ, कहते हैं] – पर काट दूंगा, तुम पक्षियों के !

जबरुद्दीन – खुदादाद आप जैसे आसीर मिले, ज़नाब काट लीजिये हमारे पंख...हम उफ़ नहीं करेंगे !

मजीद मियां – [झल्लाते हुए, कहते हैं] – ख़ुदाया, कैसे दामाद मिले मुझे ? हाय अल्लाह, ये दोनों फ़ातिर दिमाग़ के ठहरे !

[मुंडेर पर खड़ी फातमा बी, कब से इन लोगों की बकवास सुनती जा रही है ? वह चाहे शांत दिखाई दे रही है, मगर झरोखे में बैठी मरियम बी इस बकवास को सुनकर परेशान हो जाती है ! आख़िर उनसे, बोले बिना रहा नहीं जाता ! झट झरोखे से मुंह बाहर निकालकर, मजीद मियां से कहती है !]

मरियम बी – वाह, दूल्हे भाई वाह ! ऐसा किया क्या, इन बच्चों ने ? जिस कारण आप इतने बेनियाम होकर गुस्से से उबलते जा रहे हो ?

मजीद मियां – बस, बस ! आप बीच में न आइये, भाभिआन...! खुदानख़्वास्त: कहीं वाहियात लफ्ज़ निकल न जाए, इस मुंह से ?

मरियम बी – मफ़हूम क्या है, आपका ? सुबह-सुबह आ गए आप, मुर्गे की तरह बांग देने ? जानते हैं, आप ? इस वक़्त खम्स वक्ती नमाज़ी, नमाज़ अता किया करते हैं ! और, आप करते जा रहे हैं...

मजीद मियां – [बात काटकर, कहते हैं] – बकवास ? कह दीजिये, बोल दीजिये आप [आवाज़ बदलते हुए कहते हैं] मैं इस वक़्त कर रहा हूं चुहुलबाजी, इन जवान लौंडों से ! इन छोरों को मुंह लगाकर, अब भूंडापे का ठीकरा अपने सर पर फोड़ रहा हूं ! [ज़ोर से कहते हैं] आप यही कहना चाहती हैं, भाभीजान ?

मरियम बी – [चौंकते हुए, कहते हैं] – अरे, अरे ! मैंने कब कहा, ऐसे ? मैं तो जानना चाहती थी, के इन नादान बच्चों का जुर्म क्या है ?

मजीद मियां – [आश्चर्य करते हुए, कहते हैं] – नादान...और ये कुचमादिये के ठीकरे ? वाहियात हरक़ते करते फिरते रहते हैं, ये दोनों साहबज़ादे ! क्या कहते हैं, इसे..? हां याद आया, आशिकगिरी...मोहब्बत ! मज़नू बने फिरते हैं, सरे बाज़ार !

मरियम बी – इसमें कौनसी बात, वाहियात हो गयी दूल्हे भाई ? मोहब्बत तो, ख़ुदा का दूसरा नाम है ! हर किसी को आती नहीं है, मोहब्बत करनी !

मजीद मियां – [चिढ़ते हुए, कहते हैं] – तब इनको छूट दे दी जाय..सरे आम कर लीजिये, आशिकी ? यह क्या कह रही हैं, आप ?

मरियम बी – दूल्हे भाई, आप ऐसे सोचिये के ‘ये दोनों आपके भतीजे भी हैं, और प्यारे-प्यारे दामाद भी है !’ अगर आप इनको प्रेम से समझायेंगे, तो इनको आपकी बात समझ में आ जायेगी !

मजीद मियां – [बेरुख़ी से, कहते हैं] – आप ही समझा दीजिये ना, अपने नेक दख्तर को ! अब इस उम्र में, इनको सलीका सिखाने के लिए...क्या, मैं बैठूंगा उनके पास ?
[अब मामूजान इनकी बातें सुनते-सुनते, परेशान हो जाते हैं ! के, दूल्हे भाई सही मुद्दे से भटकते क्यों जा रहे हैं ? आख़िर, उनके नज़दीक जाकर वे उनके कान में फुसफुसाते हुए कहते हैं]
मामूजान – [कान में फुसफुसाते हुए, कहते है] – यह क्या कर रहे हो, दूल्हे भाई ? मुद्दे से भटकते जा रहे हैं, आप ? साफ़-साफ़ जो बात कहनी है वही बात क्यों नहीं करते हैं, दूल्हे भाई ? आपको अब डरने की कोई ज़रूरत नहीं, अपुन के पास पूरे सबूत है !

[इतनी बकवास सुनने के बाद, फातमा बी का सर घूमने लगत है ! बाद में वह उस मामू को, मज़ीद मियां के कान में फुसफुसाते और देख लेती है..तब उनका माथा ठनक जाता है ! के, यह उल्लू का पट्ठा आज फिर उनके भोले भाई मजीद मियां को भड़काकर यहां ले आया..? अब उनसे बोले बिना, रहा नहीं जाता...तब वे वहीँ से, ज़ोर से बोल देती हैं !]

फातमा बी – [ज़ोर से कर्कश आवाज़ में कहती हैं] – क्यों भड़का रहा है, मामू के बच्चे ? कुचमादिये के ठीकरे, काणे ! तुझसे, सीधा बैठा नहीं जाता ? लोगों को आपस में लड़ाए बिना, क्या तेरा दिल नहीं लगता ?

मामूजान – यह बात नहीं है, मेरे पास पूरे-पूरे सबूत है ! सुनते ही आपकी आंखें खुली की खुली रह जायेगी ! आप जानती क्या हैं ? मैं निक्कमा आदमी नहीं हूं, जो यहां बेफालतू की बकवास करने आया हूं ?

फातमा बी – [ज़ोर-ज़ोर से बोलती हुई, कहती है] – ऐसा क्या लाया रे, सबूत ? मुझे तो बता, आख़िर है तू झगड़े की जड़ ! खोजबलिये अभी आती हूं, नीचे चौक में ! [अपनी छत पर खिचीया पापड़ सूखा रही हमीदा बी को आवाज़ देती हुई कहती है] भाभीजान, ओ भाभीजान ! नीचे चौक में चलिए, आज तो रोज़ के झगड़े की जड़ को काटना ही होगा..किसी तरह !

मरियम बी – [झरोखे से ऊंचा मुंह किये, उन्हें कहती है] – आपाजान, मैं भी नीचे चौक में आ रही हूं ! ज़रा धीरे-धीरे चलते आना, क्या कहूं आपा आपको ? आज़कल घुटने के दर्द के कारण, मुझसे तेज़ चला नहीं जाता ! शायद, उम्र का असर होता जा रहा है !

[सभी मोहतरमाएं सीढ़ियां उतरकर, चौक में आती है ! फिर चौक में रखी हुई चौकियों पर बैठ जाती है ! मजीद मियां कुर्सी के सहारे बैसाखी रखकर, कुर्सी पर बैठ जाते हैं ! इधर फातमा बी ठहरी, मजीद मियां की बड़ी बहन ! इस कारण वह अपने बड़े ओहदे के कारण, वह मजीद मियां के पहलू में रखी कुर्सी पर बैठ जाती हैं ! मामूजान आराम से, मजीद मियां के पास रखे स्टूल पर बैठ जाते हैं ! अब रशीद भाई की अम्मीजान हमीदा बी, मजीद मियां से कहती है]

हमीदा बी – [मजीद मियां से, कहती है] – छोटे नवाब, आप इस तरह क्यों इन बच्चों को ज़लील करते जा रहे हैं ? क्या ये दोनों, आपके कुछ भी नहीं लगते ? यह हमारी तहजीब नहीं, अपने ही बच्चों को बेइज्ज़त करने के मक़सद से ज़ोर से बोलते हुए इनकी खामियां अपने पड़ोसियों को सुनाते रहें ! घर की बात, घर में ही रहनी चाहिए !

मजीद मियां – [अपना सर धुनते हुए, कहते हैं] – तौबा, तौबा ! हाय अल्लाह, भाभीजान मैंने आपको ऐसा नहीं समझा...आपने आख़िर, मुझको ग़ैर समझ लिया ? हाय हाय, मोहमल बेमानी और हिमाक़त की तस्वीर बनाकर रख दी ! खुदा रहम, अब मेरा यहां क्या काम ? अब मैं कौनसा रहा आपका हमदर्द ? अब मैं, एक मिनट यहां रुक नहीं सकता ! [रूख्सत होने के लिए, बैसाखी उठाते हैं]

मामूजान – [मजीद मियां को रोकते हुए, कहते हैं] – दूल्हे भाई, आप कहाँ जा रहे हैं ? [उनसे बैसाखी लेकर, वापस कुर्सी के सहारे रख देते हैं] अपने पास पूरे सबूत हैं, इन दोनों भाणजों की सगाई हुस्ना और हसीना से क्या करवा डाली, क्या इनको राज का पट्टा मिल गया..इश्क फरमाने का ?

मजीद मियां – [कुर्सी पर आराम से बैठते हुए, कहते हैं] – अब, ठीक है ! अब निकालिए अपने बैग से, वे फोटो...जो आपने, इन दोनों को सरे आम इश्क फरमाते देखकर खींची थी !

[मामूजान बैग से लिफ़ाफ़ा निकालते हैं, और फोटूओं को बिना देखे थमा देते हैं मजीद मियां को ! लिफ़ाफ़ा थमाकर, वे उनसे कहते हैं]

मामूजान – देख लीजिये, दूल्हे भाई ! आपको क्या मालुम, मैंने कितनी मुश्किल से इन फोटूओं को खींचा है...इन मज़नू भाणजों की, इश्क फ़रमाते हुए ! अब हुज़ूर, आपको इनकी अक्ल ठिकाने लगानी होगी ! नालायक सरे-आम इश्क फ़रमाते हैं, आज़कल ! इन दोनों को रोमांस करने की सज़ा, ज़रूर मिलनी चाहिए !

[मजीद मियां लिफ़ाफ़ा खोलकर देखना चाहते हैं, फोटूएं...मगर तभी तपाक से बाझ की तरह झपट्टा मारकर, हमीदा बी उस लिफ़ाफ़े को छीन लेती है ! जैसे ही वह उन फोटूओं को देखती है..वह गुस्से से उबल पड़ती है ! और गुस्से से, मामू को डांटती हुई कहती है !]

हमीदा बी – [गुस्से से, डांटती हुई मामू को कहती है] – बदतमीज़ ! दुनिया ज़हान के एब भरे पड़े हैं, तूझमें ! कनकव्वा तो उड़ाना आता नहीं, और चला उल्लू की दुम भाणजों की फोटूएं खींचने ? अरे बावली पूंछ, तूने किसकी फोटूएं खींची है, तेरे भाणजों की खींची है या हमारी ? कमबख्त, तेरी यह इकलौती आंख है या बटन ?
[मजीद मियां झट उनसे फ़ोटो लेकर देखते हैं, देखते ही वे ठहाके लगाकर ज़ोर से हंसते हैं ! फिर किसी तरह अपनी हँसी दबाकर, कहते हैं]

मजीद मियां – [फोटो दखते हुए, कहते हैं] - वाह भाभीजान, वाह ! बगीचे के अन्दर, मुंह उधाड़े कैसे बैठी हैं आप सब ? अरे ख़ुदा, यह क्या ? यहां बैठे, आप लोग क्या खा रही हैं ? अरे वाह, लज़ीज़ दही-बड़े ! [फोटो को देखते-देखे, चौंक जाते हैं] अरे यह कौन, सबीना ? वाह, पूरा महिला-मंडल यहां मौजूद है..? अरे याद आया, आप लोग वहां हाज़ी साहब की पाक तक़रीर सुनने गयी थी..फिर, आप पब्लिक पार्क में क्या कर रही हैं ?

मामूजान – [हंसते हुए, कहते हैं] – मैं बताता हूं, दूल्हे भाई ! इन लोगों ने सबसे पहले स्टेडियम सिनमा हाल में देखी है, फिल्म ‘चौदवी का चाँद’ ! फिर, पब्लिक पार्क में किये सैर-सपाटे ! इसके बाद जनाना बाग़ में बैठकर, खाए देशी घी के परमठे आम के अचार के साथ ! [मरियम बी से कहते हुए] क्यों आपाजान, मैं सच्च कह रहा हूं ना ? [मजीद मियां से, कहते हुए] दूल्हे भाई, मैं तो छाती ठोककर कहूंगा के...

मजीद मियां – कह दीजिये ना, आपको रोका किसने है ?

मामूजान – तब सुनिए, ज़नाब ! इनमें ख़ुद में लखन है नहीं, ये कैसे भाणजे को सिखाएगी शुऊरू ? ये तो ख़ुद..

[मामूजान का जुमला पूरा हुआ नहीं, और दोनों मोहतरमाओं को मामू पर आता है बहुत गुस्सा ! गुस्सा आता भी क्यों नहीं, आख़िर सत्य होता है कड़वा ! सत्य बात कहने पर, इन दोनों मोहतरमाओं को लगी है, मिर्चे ! फिर क्या ? एक मोहतरमा उठाती है पास रखा झाड़ू, और दूसरी मोहतरमा अपने पांव से जूत्ती उतारकर हाथ में ले लेती है ! और फिर वे दोनों बेचारे मामूजान को पीटने के लिए, उनके पीछे लग जाती है ! ख़ुदा रहम, यह कैसा मंज़र है ? बेचारे मामूजान उनके वार से बचने के लिए मजीद मियां के पीछे आकर खड़े हो जाते हैं या फिर कभी फ़ातमा बी के पीछे आकर छुप जाते हैं ! मरियम बी और हमीदा बी ठहरी, एक नंबर की जंगजू ! कभी एक मोहतरमा झाड़ू से पीटती है, तो कभी दूसरी दे देती है अपनी जूत्ती का प्रसाद ! मगर आश्चर्य की बात यह है, इनके किये वार को झेलता कौन है ? मामूजान तो अपना बचाव कर लेते हैं, इन दोनों मुअज्ज़म के पीछे छुपकर ! और इनके शिकार बन जाते हैं, बेचारे मजीद मियां और फ़ातमा बी ! अब कभी मजीद मियां के सर पर होती है, झाड़ू की बरसात ! कभी यह झाड़ू, मजीद मियां की कमर या कभी कंधों पर बरस पड़ता है ! इसी तरह फातमा बी पर भी झाड़ू और जूत्ती बरस जाती है ! इस तरह मामूजान सफ़ा-साफ़ बच जाते हैं, इन दोनों के पीछे छुपकर ! अब इन दोनों मुअज्ज़मों को ये दोनों मोहतरमाएं कहाँ वक़्त दे रही है कि, वे किसी तरह कुर्सी से उठकर अपना बचाव कर ले ?]

पिटाई करती हुई दोनों मोहतरमाएं, एक साथ कहती है – [पीटती हुई, कहती जा रही है] – आ इधर, मामू का बच्चा ! आया खोजबलिया बेचारा, तसलीमात अर्ज़ करने ? साले जासूसी कुत्ते, सूंघना तो आता नहीं, और चला हम दोनों की जासूसी करने ?

[इधर बेचारे मजीद मियां बैसाखी पकड़ने के लिए जैसे ही हाथ आगे बढ़ाते हैं, उसी वक़्त मामूजान आकर उनके पीछे आकर खड़े हो जाते हैं, और मार पड़ती है मामू की जगह मजीद मियां की कमर के ऊपर ! इधर मामूजान आकर उनका कंधे को झंझोड़ डालते हैं, अपने बचाव के लिए ! तब बेचारे मजीद मियां ना तो इधर जा पाते है और न उधर जा पाते हैं ! उसी वक़्त फातमा बी उठकर, मरियम बी की चौकी पर रखी फोटूएं उठा लेती है ! उन फोटूओं को देखते ही, वे झट आकर मजीद मियां का गिरेबान पकड़ लेती है ! और भौंए चढ़ाती हुई मजीद मियां से कहती है]

फ़ातमा बी – [मजीद मियां का गिरेबान पकड़ती हुई, कहती है] – अब तुम कहाँ भग रहे हो, छोटे नवाब ? मर्दूद, इस बुढ़ापे में आशिकी ? वाह मिया, बासी कढ़ी में उफान ? इस ख़ूबसूरत मोहतरमा के ऊपर, किस तरह पड़े हो तुम ? बताओ, यह कौन है कलमुंही ? ले देख, इस फोटो को ! [मजीद मियां को फोटो थमाते हुए, कहते हैं] अब बता, मुझको..यह मोहब्बत सिलसिला, कब से चल रहा है ?

[मजीद मियां उस फोटो को हाथ में लेकर, अच्छी तरह से देखते हैं ! फिर अचानक ही, उनकी आश्चर्य से आंखें फ़ैल जाते है और वे ज़ोर से कह उठते हैं..]
मजीद मियां – [ज़ोर से चिल्लाते हुए, कहते हैं] - हाय अल्लाह, यह क्या हो गया ?

फातमा बी – [उनका गिरेबान छोड़ती हुई, कहती है] – अब क्यों चिल्ला रहा है, छोटे नवाब ? वल्लाह ! ना वाफ़िके ग़म, अब दिल नाशाद नहीं है..! जब तू ख़ुद बिगड़ा हुआ आशिक ठहरा, अब बता...इन प्यारे बच्चो ने, तेरा क्या बिगाड़ा है ? अब बात आईने की तरह साफ़ है, तरुन्नम में आफ़रानी को क्या छिपाना ? अब तेरा मुंह, बंद कैसे है ?

मजीद मियां – [फोटो को देखते हुए, कहते हैं] - आपाजान, क्या करूं ? एक पांव ख़राब है, खोड़ा हूं ! क्या पता कहाँ से चिलका आकर, मेरे चेहरे पर आकर गिरा..? और मैं आगे देख नहीं पाया, और न संभाल पाया बैसाखी को ! और बदन का संतुलन, रख नहीं पाया..अल्लाह जाने, किसने मुझको कहाँ ला पटका ? [कुछ सोचते हैं, फिर अचानक बोल उठते हैं] कहीं इस मामू प्यारे ने फोटो उतारते वक़्त, मुझ पर फ्लश लाईट डाल दी हो ?

मामूजान – [घबराते हुए, कहते हैं] – यह क्या कह रहे हैं, दूल्हे भाई ?

मजीद मियां – सच्च कह रहा हूं, अब तो मियां आपकी तबीयत दुरस्त करनी होगी ! बहुत पर निकल आये हैं, साहबज़ादे के ? [बैसाखी को संभालते हुए, कहते हैं] अब ठहर जाओ, प्यारे मियां ! [गुस्सा ज़ाहिर करते हुए, कहते हैं] नामाकूल, मेरी सारी इज़्ज़त धूल में मिला डाली कमबख्त ?

मामूजान – [घबराकर, ज़ोर से कहते हैं] – मर गाया, मेरी अम्मी ! अब ये दूल्हे भाई भी, रूठ गए ! अब मुझे इनसे बचाने वाला, कोई मुख़्तसर यहां है नहीं ! [आवाज़ देते हैं] अरे ओ, रशीद मियां ! कहाँ मर गया, भाणजे ? अरे, ओ जबरू उस्ताद ! तू तो आ यार, आकर बचा इस तेरे मामूजान को !

मजीद मियां – [चिल्लाते हुए, ज़ोर से कहते हैं] – ठहर जा, जासूसी कुत्ते ! ठहर जा, ठहर ठहर !

[फिर यह क्या ? यह, कैसा मंज़र ? मामू प्यारे के मुख़्तसर मजीद मियां भी, इन दोनों मोहतरमाओं की तरह खफ़ा हो गए ? अब इनको बचाने वाला, यहां कौन ? रशीद भाई और जबरू उस्ताद तो ठहरे, बड़े होशियार ! मामले को बिगड़ते देख, किसी को मालुम नहीं....वे कब, छू-मंतर हो गए ! अब बाकी रही, मरियम बी और हमीदा बी..जो पहले से ही अपने शस्त्र उठा चुकी है, इस मामू प्यारे को पीटने ! अब बाकी रहे मजीद मियां, वे झट बैसाखी लेकर उनको पीटने को उतारू हो जाते हैं ! इधर फातमा बी ठहरी इन प्यारे-प्यारे भतीजों की भुआ, अब उनको मौक़ा मिल गया..रोज़-रोज़ के झगड़े की जड़ को निकालकर, दूर फेंकने का ! वो भी मामूजान की पिटाई करने के लिए, इनकी टीम में एंट्री ले लेती है !

मज़ीद मियां – [कुर्सी से उठकर, ज़ोर से गरज़ते हुए कहते हैं] – ठहर जा, जासूसी कुत्ते ! ठहर, ठहर !

[अब मामूजान डरकर, भगते हैं वहां से ! मगर ये इनके मुअज्ज़म, कब उनको छोड़ने वाले ? बैसाखी लिए मजीद मियां लपकते हैं, उनके पीछे ! और उनके पीछे-पीछे मरियम बी झाड़ू लिए और उनके पीछे हमीदा बी हाथ में जूत्ती लिए हुई..रण चंडी की तरह, मामू प्यारे को पीटने के लिए तेज़ी से लपकती है ! और सबसे पीछे फातमा बी, मामूजान को गाली पुराण सुनाती हुई उनका पीछा कर रही है ! इन सबसे आगे मैराथन दौड़ के एथलिट की तरह दौड़ रहे मामू जान को, इतनी कहाँ फुरसत..जो पीछे देखकर, इस मैराथन दौड़ का जाइजा ले ? के कौन उनके पीछे दौड़ रहा है, उनको पीटने ? बेचारे मामू तो बेहताशा दौड़ते ही जा रहे हैं, दौड़ते-दौड़ते अब वही पतली गली आ जाती है, जहां उनकी मुठभेड़ उस गुस्सेल सांड से हुई थी ! ख़ुदा कसम आज भी वही सांड, उसी गली के नुक्कड़ पर खड़ा है...और बदकिस्मती से, मामूजान ने आज भी वही लाल कमीज़ पहन रखा है ! जो उस सांड को भड़काने का, पर्याप्त साधन है ! उस लाल कमीज़ पर निग़ाह गिरते ही, वो सांड भड़क जाता है ! फिर क्या ? उसकी आंखें हो जाती है, लाल सुर्ख ! और वो रिड़कता हुआ, मामूजान के पीछे लग जाता है ! गली के इन शैतान बच्चों को, अब कौन रोके ? यह बच्चों की चिल्लर पार्टी तालियां पीटती हुई, उस सांड को भड़काती जा रही है ! इस मचे कोलाहल के कारण गली के कुत्ते अलग से भड़क जाते हैं, वे भी भौंकते हुए बतूलिये की तरह उनके पीछे दौड़ते हैं ! पीछे से इन कुत्तो के भौंकने से, वह सांड सहम जाता है ! अब वह अपने की रफ़्तार पहले से, और अधिक बढ़ा देता है ! उसको और नज़दीक आते देखकर, मामू को अपनी जान बचानी आवश्यक हो जाती है ! मामू की क़िस्मत अच्छी, रास्ते में वही पाख़ाना उनको दिखाई दे जाता है ! फिर क्या ? मामूजान एक ही छलांग लगाकर पहुंच जाते हैं, पाख़ाने की छत पर ! अब वहां, भौंकते हुए कुत्ते अलग से आ पहुंचते हैं ! वे सभी पाख़ाने के नीचे खड़े होकर, पाख़ाने की छत पर खड़े मामूजान को भौंकना शुरू करते हैं ! कुत्तों को इस तरह भौंकते देखकर, मामू उनको ज़ोर से कहते हैं...]

मामूजान – अरे, ओ मेरे बिरादर ! मै ठहरा, आपका बिरादर जासूसी कुत्ता ! मुझे क्यों भौंकते जा रहे हो, मेरे बाप ? अगर भौंकना ही है तो उनको भौंकिये, जो तुम्हारे इस बिरादर को पीटने आ रहे हैं पीछे..या फिर भौंकिये उस सांड को, जो तुम्हारे इस बिरादर का पीछा करता हुआ यहीं आ रहा है ! आख़िर, मुझे क्यों भौंक रहे हो ? मैं तो प्यारों, तुम्हारा यार हूं !

[अचानक मामूजान को हंसी के ठहाके सुनायी देते हैं, वे सामने क्या देखते हैं ? गली के नुक्कड़ पर छुपे रशीद भाई और जबरू उस्ताद ठहाके लगाते हुए इधर ही आ रहे हैं ! जैसे ही मामू दूसरी तरफ़ देखते हैं, वहां नज़र आते हैं साक्षात यमराज के रूप ‘मजीद मिया’ और साथ में उनके यम दूत सरीखी मरियम बी, हमीदा बी और फातमा बी ! ये तीनों मोहतरमाएं खाली हाथ नहीं है, मामू पर वार करने के शस्त्र लिए अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मामू को घूरती जा रही है ! रास्ते में मजीद मियां को मियां अल्लानूर भी मिल गये थे, उनको भी ये साथ ले आये ! इस वक़्त मजीद मियां ने अपना एक हाथ मियां अल्लानूर के कंधे पर रखा है, और दूसरे हाथ से बैसाखी उचकाते-उचकाते उनके नज़दीक आते जा रहे हैं ! इस तरह इन मुअज्ज़मों के आ जाने से रशीद भाई और जबरू उस्ताद के ठहाकों पर लग जाता है, जाम ! मजीद मियां उन दोनों के नज़दीक आकर, उनसे कहते हैं !]

मजीद मियां – [नज़दीक आकर, कहते हैं] – अरे, ओ साहबज़ादों ! तुम दोनों, यहां क्यों खड़े हो ? [मामूजान की तरफ़ अंगुली से इशारा करते हुए, कहते हैं] – भाग जाओ, कमबख्तों ! न तो यह जासूसी कुत्ता, काट खायेगा !

[जासूसी कुत्ते का नाम सुनते ही, रशीद भाई और जबरू उस्ताद ऐसे डरकर भगते हैं...मानो किसी बिल्ली के पीछे, कोई कुत्ता दौड़ रहा हो..! उनको भगते देखकर, गली के कुत्ते उनके पीछे भौंकते हुए उनका पीछा करते हैं ! उनका इस तरह पीछा करना, मामूजान को अच्छा लगता है ! क्योंकि अब, मामू को वसूक हो गया है के ‘उनकी बिरादरी वाले कुत्ते अपने बिरादर जासूसी कुत्ते मामू के लिए, उनके दुश्मन को भगाने का एक काम तो कर रहे हैं !’ अब कुत्तों ने भौंकना बंद कर दिया है, मंच पर अंधेरा छा जाता है !]





लेखक का परिचय
लेखक का नाम दिनेश चन्द्र पुरोहित
जन्म की तारीख ११ अक्टूम्बर १९५४
जन्म स्थान पाली मारवाड़ +
Educational qualification of writer -: B.Sc, L.L.B, Diploma course in Criminology, & P.G. Diploma course in Journalism.
राजस्थांनी भाषा में लिखी किताबें – [१] कठै जावै रै, कडी खायोड़ा [२] गाडी रा मुसाफ़िर [ये दोनों किताबें, रेल गाडी से “जोधपुर-मारवाड़ जंक्शन” के बीच रोज़ आना-जाना करने वाले एम्.एस.टी. होल्डर्स की हास्य-गतिविधियों पर लिखी गयी है!] [३] याद तुम्हारी हो.. [मानवीय सम्वेदना पर लिखी गयी कहानियां].
हिंदी भाषा में लिखी किताब – डोलर हिंडौ [व्यंगात्मक नयी शैली “संसमरण स्टाइल” लिखे गए वाकये! राजस्थान में प्रारंभिक शिक्षा विभाग का उदय, और उत्पन्न हुई हास्य-व्यंग की हलचलों का वर्णन]
उर्दु भाषा में लिखी किताबें – [१] हास्य-नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” – मज़दूर बस्ती में आयी हुई लड़कियों की सैकेंडरी स्कूल में, संस्था प्रधान के परिवर्तनों से उत्पन्न हुई हास्य-गतिविधियां इस पुस्तक में दर्शायी गयी है! [२] कहानियां “बिल्ली के गले में घंटी.
शौक – व्यंग-चित्र बनाना!
निवास – अंधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर [राजस्थान].
ई मेल - dineshchandrapurohit2@gmail.com


 










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