रचनाकार परिचय:-


डॉ. सूर्यकांत मिश्रा
जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
मो. नंबर 94255-59291
email- sk201642@gmail.com



18 मार्च हिंदू नववर्ष पर विशेष...
सृष्टि की रचना का पर्व है गुड़ी पड़वा
० भारतीय पंचाग भी इसी दिन बना


 
भारत वर्ष में जिस तरह विभिन्न धर्मों को मानने वाले निवास करते है, उसी तरह अपने अपने धर्म के अनुसार नये वर्ष का उत्सव मनाते आ रहे है। हिंदू धर्म को मानने वाले अपना नववर्ष चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाते है। यह वह महत्वपूर्ण दिन है जब हम मां जगत जननी के नवरात्रों का प्रारंभ भी करते है। इसे गुड़ी पडवा के रूप में जाना जाता है। इसी दिन को वर्ष प्रतिपदा अथवा उगादी भी कहा जाता है। गुड़ी पडवा में गुडी का अर्थ विजय पताका बताया गया है। शालि वाहन संवत से लेकर विक्रम संवत तक का शुभारंभ भी गुड़ी पडवा से ही होता है। इतना ही नहीं इसी दिन ब्रम्हा जी ने सृष्टि की रचना की थी, ऐसा उल्लेख भी मिलता है। इस वर्ष 18 मार्च के दिन वह पवित्र दिन हम सभी के लिये खुशियां लेकर आ रहा है। हम संवत 2074 को अलविदा कहेंगे और स्वागत करेंगे संवत 2075 का। इसी तरह शालिवान शक: 1939 हमसे दूर चला जायेगा, और हम 1940 का आगाज करते दिखेंगे। इतिहास के पन्नों से यह जानकारी भी प्रकाश में आ रही है कि महान गणितज्ञ भास्काराचार्य ने इसी दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते हुये भारतीय पंचांग की रचना की थी।
चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को शुरू हुआ सृष्टि का निर्माण

भारतीय संस्कृति के अनुसार वर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से ही होता है। इसे सृष्टि के आरंभ का दिन माना जाता है। यह वैज्ञानिक तथा शास्त्रशुद्ध गणना है। इसकी काल गणना बड़ी ्रप्राचीन है। सृष्टि के आरंभ से अब तक एक अरब 95 करोड़, 58 लाख, 85 हजार, 118 वर्ष व्यतीत हो चुके है। यह गणना ज्योतिष विज्ञान के अनुसार निर्मित है। आधुनिक वैज्ञानिक भी सृष्टि की उत्पत्ति का समय 1 अरब वर्ष से अधिक बताते है। हमारे देश में कई प्रकार की काल गणना की जाती है। युगाब्द (कलयुग का आरंभ) श्री कृष्ण संवत, शक् संवत आदि। चंद्रमा की स्थिति देखकर एक भोला भोला ग्रामीण बड़ी आसानी से जान लेता है आज पूर्णिमा है या एकम, द्वितीया आदि। इस प्रकार काल गणना हिंदू धर्मावलंबियों के रोम रोम एवं भारत वर्ष के कण कण में गहराई तक उतरी हुई है। प्रतिपदा हमारे लिये क्यों महत्वपूर्ण है, इसके सामाजिक और एतिहासिक संदर्भ के साथ धार्मिक संदर्भ भी कुछ इस तरह है।

1. मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम का राज्याभिषेक।
2. मां दुर्गा की उपासना का पर्व नवरात्रि का प्रथम दिन।
3. युगाब्ध (युधिष्ठिर संवत) का शुभारंभ।
4. शालिवाहन शक् संवत (भारत वर्ष का राष्ट्रीय पंचांग)।
5. महर्षि दयानंद द्वारा आर्य समाज की स्थापना।
6. संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार का जन्मदिन।
मर्यादा पुरूषोत्तम का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ

तुलसीकृत रामचरित मानस और महर्षि वाल्मिकी रचित रामायण से जानकारी मिलती है कि भगवान श्री राम जिन्हें मर्यादा पुरूषोत्तम कहा गया है, उनका राज्याभिषेक भी गुड़ी पड़वा अथवा चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि को ही हुआ। अपने उच्च चरित्र और वचन की मर्यादा रखने के कारण ही उन्हें मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में हम भारत वर्ष के आदर्श चरित्र की प्रतिमूर्ति मानकर श्रद्धा के साथ पूजते आ रहे है। राम नाम के महत्व को समझना हो तो हमें दो अक्षरों की महिमा कुछ इस तरह समझनी होगी। र धन अ धन म बराबर राम। मधुर, मनोहर, विलक्षण, चमत्कारी जिनकी महिमा तीन लोक से न्यारी है। राम चरित मानस के बाल कांड में वंदना प्रसंग में तुलसीदास जी ने बड़े अच्छे शब्दों में लिखा है-

नहि कलि करम न भगति विवेकू। राम नाम अवलंबन एकू।

तात्पर्य यह कि कलयुग में न तो कर्म का भरोसा है, न भक्ति का और न ही ज्ञान का, बल्कि केवल राम नाम ही एकमात्र सहारा है। इसी तरह पदम पुराण में कहा गया है-

समेति नाम याच्छोत्रे विश्वम्भा दागतं यदि। करोति पापसंदाहं तूलं बहिकणो यथा।

अर्थात जिनके कानों में राम नाम अकास्म भी पड़ जाता है, उसके पापों को वह वैसे ही जला देता है, जैसे अग्नि की चिंगारी रूई को।

शुभ कार्यों के लिए उत्तम तिथि

किसी भी काम की निर्विध्न संपन्नता के लिये प्रत्येक व्यक्ति उसका शुभारंभ अच्छे मुर्हूत में करना चाहता है। इस दृष्टिकोण से गुड़ी पडवा अथवा प्रतिपदा तिथि अभिजीत मुर्हूत के रूप में जानी जाती है। यह बात सामान्य रूप से देखने में आती है कि दैनिक दिनचर्या की शुरूआत करनी हो, अथवा यात्रा पर जाना हो, विवाह का अवसर हो, गृह निर्माण अथवा गृह प्रवेश की बात हो, सभी के लिये एक संस्कारित और धर्मज्ञ व्यक्ति शुभ घड़ी, शुभ मुर्हूत अथवा चौघडिय़ा देखकर ही कार्य की शुरूआत करना चाहता है। इस मान से भी गुड़ी पड़वा बिना किसी हिचक के और बिना विचारविमर्श के कार्य की श्ुारूआत हेतु सबसे उत्तम मुर्हूत मानी जाती है। वैज्ञानिक रूप से भी यह बात सामने आ चुकी है कि दिन के चौबीस घंटों में कुछ गिनी चुनी घडिय़ा ही ऐसी होती है, जिनमें किये गये काम सफल होने की संभावना बढ़ जाती है। ब्रम्ह वर्चस्व पंचांग में कहा गया है कि अक्षय तृतीया, अक्षय नवमी, बसंत पंचमी, गंगा दशहरा, विजय दशमी, महाशिवरात्रि, श्रीराम नवमीं तथा सभी पूर्णिमा आदि पुण्य पर्वों पर मुर्हूत की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

कलश है मंगल प्रतीक

कलश को प्रत्येक देवी-देवताओं की पूजा में मंगल प्रतीक माना जाता है। चैत्र और क्वांर मास में होने वाली नवरात्रि पर्व पर तेा कलश स्थापना ही मुख्य माना जाता है। नौ दिन तक मां की आराधना करने वाले श्रद्धालु कलश स्थापित कर व्रत धारण करते है। पौराणिक ग्रंथों में कलश को ब्रम्हा, विष्णु और महेश के साथ मातृगण का निवास बताया गया है। त्रृगवेद में कलश के विषय में कहा गया है-

आपूर्णों अस्य कलश: स्वाहा सेक्तेव कोशं सिसिचे पिबध्यै।
समुप्रिया आववृत्रन मदाय प्रदक्षिणिदभि सोमास इन्द्रम।।


अर्थात पवित्र जल से भरा हुआ कलश भगवान इंद्र को समर्पित है। लंका विजय के उपरांत भगवान श्री राम के अयोध्या लौटने पर उनके राज्याभिषेक के उपलक्ष्य में जल भरे कलशों की पंक्तियां सजायी गयी थी। इसी प्रकार अथर्ववेद में भी कहा गया है कि सूर्य देव द्वारा दिये गये अमृत वरदान से मानव का शरीर कलश शत शत वर्षों से जीवन रसधारा में प्रवाहित होता आ रहा है। इस तरह से भारतीय संस्कृति में कलश अथवा घड़ा अत्यंत मांगलिक चिह्न के रूप में प्रतिष्ठित है। किसी भी प्रकार की पूजा अनुष्ठान, राज्याभिषेक, गृह प्रवेश, यात्रा का शुभारंभ, उत्सव, विवाह आदि शुभ प्रसंगों में सर्वप्रथम कलश को लाल कपड़े, स्वस्तिक, आम के पत्तों, नारियल, सिक्का, कुमकुम, अक्षत, फुल आदि से अलंकृत कर ब्रम्हा, विष्णु और महेश के रूप में उसकी पूजा की जाती है। देवी पुराण में उल्लेख मिलता है कि भगवती देवी की पूजा की शुरूआत से पूर्व सबसे पहले कलश की स्थापना की जानी चाहिये।



प्रस्तुतकर्ता
डा. सूर्यकांत मिश्रा
न्यू खंडेलवाल कालोनी
प्रिंसेस प्लेटिनम, हाऊस नंबर-5
वार्ड क्रमांक-19, राजनांदगांव (छ.ग.)
मो. नं.-9425559291


sk201642@gmail.com



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