रचनाकार परिचय:-


लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित
dineshchandrapurohit2@gmail.com

अँधेरी-गळी, आसोप री पोळ रै साम्ही, वीर-मोहल्ला, जोधपुर.[राजस्थान]
मारवाड़ी हास्य-नाटक  [मर्द से औरत] खंड 8 लेखक और अनुवादक -: दिनेश चन्द्र पुरोहित


[१]

[मंच रोशन होता है, गाड़ी का मंज़र सामने आता है ! केबीन में रशीद भाई, सावंतजी, ठोक सिंहजी और दीनाजी भा’सा अपनी सीटों पर बैठे हैं ! हमेशा की तरह, चंदूसा ऊपर की बर्थ पर लेटे दिखायी दे रहे है ! अब एक चाय वाला चाय की टंकी को उठाये केबीन में दाख़िल होता है, उस चाय की टंकी को बेंच पर रखता हुआ ज़ोर से टेर लगता है !]

चाय वाला – [चाय की टेर लगाता हुआ] – चाय चाय मसालेदार चाये...! [सावंतजी पर निग़ाह डालकर, कहता है] सेठ साहब, चाय कितने कप डालूं ? हर चाय मिलेगी, पांच रुपये ! कहिये, सेठ ?

ठोक सिंहजी – [हास्य-विनोद की मीठी चिमटी काटते हुए, कहते हैं] – क्या सावंत सेठ, पिला दीजिये ना यार गरमा-गर्म चाय ! आज़ तो यहां अफ़सर विराज़मान है नहीं, ज़नाब...आज़ के अफ़सर, आप ही हैं !

रशीद भाई – कौनसे अफ़सर ? दयाल साहब, या काजू साहब ?

ठोक सिंहजी – अरे यार, सेवाभावी ! किस इंसान का नाम ले लिया, आपने ? आज़ तक कभी दयाल साहब ने चाय पिलायी है, क्या ? और आप में हिम्मत है, उनसे चाय मंगवाने की ? अरे यार इनकी जोधपुर बदली हो गयी, मगर जाते वक़्त ख़ुशी से एक कप चाय पिलाने का उनका दिल न हुआ ! जेब से पैसे निकालने इतने आसान नहीं, रशीद भाई !

रशीद भाई – हां ठोक सिंहजी, बिल्कुल सच्च कहा आपने ! ऐसे व्यक्तियों की जेब से पैसे निकलवाना, केवल स्वप्न में ही संभव है ! ये तो ऐसे इंसान है, जो कोई बहाना बनाकर अपुन लोगों से चाय मंगवाकर पी जाते हैं, मगर ख़ुद कभी नहीं फंसते ! दूसरे साहब है, काजू साहब..वे ज़्यादातर बस से ही सफ़र करते दिखाई देते हैं, वे अब यहां क्यों दिखाई देंगे ?

रशीद भाई – फिर, रहे कौन बाकी ? फुठर मलसा..? उनकी बदली ज़रूर हो गयी है, मगर वे अपने बकाया काम निपटाने के लिए आते हैं आज़कल, जो ज़्यादातर इस गाड़ी में ज़रूर दिखाई दे जाते हैं !

दीनजी – फुठर मलसा के बिना, क्या आपका मन नहीं लगता ? रशीद भाई, कहिये ज़नाब !

[अब इनकी बकवास सुनकर, चाय वाला अब परेशान हो चुका है ! उसका विचार है, ये कमबख्त चाय का आर्डर तो मारते नहीं, ऊपर से मुझे यहां बैठाकर मेरा धंधा ख़राब करते जा रहे हैं ! आख़िर, वह कहता है..]

चाय वाला – [परेशान होकर कहता है] – आप लोगों को चाय पीनी है, या नहीं ? क्यों मुझे यहां खड़ा करके, मेरा धंधा ख़राब करते जा रहे हैं...आप ?

[इतने में मछली विभाग के मुलाज़िम सत्य नारायणजी, युरीनल से बाहर निकलकर आते हैं ! वे अपने क़दम केबीन की ओर बढ़ाते हैं, उनको पता नहीं..उनके पीछे कौन तशरीफ़ ला रहे हैं ? जैसे ही वे आकर अपनी सीट पर बैठते हैं, तभी उनके पीछे आ रहा एक नाज़र आकर बैठ जाता है दीनजी भा’सा के पास ! उस बेचारे नाज़र के बैठते ही, ठोक सिंहजी उसे जहरीली नज़रों से उसे देखते हैं ! नामुंछ्या होते हुए भी वे मूंछो की ठौड़ मूंछो को ताव देने लगते हैं, अब वे ताव देते-देते उस नाज़र चम्पाकली को याद कर बैठते हैं ! जिसके गाल पर उन्होंने, राक्षस की तरह धब्बीड़ करता थप्पड़ रसीद किया था...]

सत्य नारायणजी – वाह ठोक सिंहजी यार, काहे के मर्द हो ? ख्वाज़ासरा साहब को देखकर, मूंछो पर ताव क्यों देते जा रहे हैं आप ?

सावंतजी – [हंसते हुए, कहते हैं] – अरे यार, ठोक सिंहजी ! वह तो बेचारा था, चम्पाकली...जो आपसे डरता था ! मगर ये ज़नाब ख्वाज़ासरा ठहरे, ज़नाब सत्य नारायणजी के मेहमान ! ये तो फिर आपके भी मेहमान हैं, फिर काहे इनको मूंछे तानकर डरा रहे हैं आप ?

रशीद भाई – जैसा नाम है, इनका..वैसे ही ठोकने के गुण, परवरदीगार ने इनमें भर रखे हैं ! इनको कुछ मत कहो, सावंत सेठ ! आज़ की ख़ुश ख़बरी है, चाय वाले ने भी आपको कह डाला ‘सेठ साहब’ ! अगर आप जैसे सेठ साहब चाय का खर्चा नहीं करते हैं, तो सत्य नारायणजी तो तैयार बैठे हैं खर्चा करने के लिए ! आख़िर, इनके ये मेहमान कब-कब आते हैं इनसे मिलने ?

ठोक सिंहजी – फिर आप क्या करेंगे, हुज़ूर ?

रशीद भाई – मैं ठहरा बेचारा, सेवाभावी ! ज़्यादा से ज़्यादा इनको पानी लाकर पिला सकता हूं, और क्या ?

चाय वाला – [झुंझलाता हुआ, कहता है] – ऐसे क्या सेठ बने बैठे हो, तुम लोग ? एक चाय का ओर्डर तुम लोगों से मारा नहीं जाता, ऊपर से बने हैं सेठ ? अब तो मुझे किसी दूसरे डब्बे में जाकर, पैसे कमाने होंगे ! अरे राम राम, यहां तो तिलों में तेल नहीं !

सत्य नारायणजी – कहाँ जा रिया है, कढ़ी खायोड़ा ? यों काहे बदनाम करता है, हमें ? ला पिला, तेरी मसाले वाली कड़का-कड़क चाय ! [जेब से कड़का-कड़क पांच के तीन नोट निकालकर, चाय वाले को थमाते हैं]

सावंतजी – [उस ख्वाज़ासरा की तरफ, निग़ाह डालते हुए कहते हैं] – क्यों सत्य नारायणजी, अपने मेहमान को चाय पिला रहे हैं या नहीं ?

सत्य नारायणजी – यार सावंत सेठ, आप बैठे रहिये अपनी गद्दी पर ! मालिक, मुझे पूरी फ़िक्र है, मेरे मेहमान की !

[वह ख्वाज़ासरा सत्य नारायणजी को देखता है, फिर मुस्कराता है ! चाय वाला सबको चाय का कप थमाकर, चला जाता है दूसरे केबीन में ! उसके जाते ही चंदूसा बर्थ से नीचे उतरते हैं, और सत्य नारायणजी के पहलू में बैठते हुए कहते हैं..]

चंदूसा – [बैठते हुए, कहते हैं] – वाह सत्य नारायणजी, वाह ! अपने मेहमान के लिए तो चाय-वाय और अपने दोस्त के लिए [अंगूठा दिखाकर, कहते हैं] ठेगा ? [ख्वाज़ासरा की तरफ़ देखते हुए, कहते हैं] फिर आपके मेहमान, क्यों नहीं अपने लबों पर मुस्कान फैलायेंगे ? मैं तो ज़नाब, आपसे ज़रूर पिऊँगा चाय..चाहे तो आप, लूणी स्टेशन पर पिला दें या किसी भी स्टेशन पर...जैसी आपकी मर्ज़ी !

[सभी चाय की चुश्कियां लेते दिखाई देते हैं, मगर चंदूसा को चाय न मिलने के करण, वे खफ़ा हो गए हैं ! फिर क्या ? अपनी भड़ास निकालने के लिए, वे उस ख्वाज़ासरा को खारी-खारी नज़रों से देखते हैं ! अब समय काटने के लिए, दीनजी भासा उस ख्वाज़ासरा से कहते हैं !]

दीनजी भा’सा – [ख्वाज़ासरा से बात करते हुए, कहते हैं] – आप कभी इस गाड़ी में दिखाई क्यों नहीं देते..इसकी क्या वज़ह है ? लगता है, आप जोधपुर के नहीं हैं...कहीं दूसरी जगह से आयें हैं, आप ?

ख्वाज़ासरा – हुज़ूर, मैं गुजरात से आयी हूं, यहां उस्ताद कमला बाई से मुलाकात करने...

रशीद भाई – तब ही मैंने सोचा, आप कभी इस गुलाबे की टीम के साथ कभी दिखाई नहीं दिए ? क्या, आप मुमताज़ को जानते हैं ?

ख्वाज़ासरा – मुमताज भाई, कौनसे ? कहीं वह, एक मीनार मस्जिद वाले तो नहीं ? हुज़ूर, एक बार उनसे कमला बाई की हवेली पर मुलाकात हुई..उस वाकये को बीते, काफ़ी अरसा गुज़र गया है
!
सत्य नारायणजी – यार रशीद भाई, काहे मुमताज़ का जिक्र लेकर बैठ गए आप ? यह तो पूछिए, इनसे..किस तरह किन्नर बने, या फिर भगवान के घर से बनकर ही इस संसार में आये हैं ?

दीनजी – ज़रूर पूछो, यार रशीद भाई ! यह भी पूछिए इनसे इनकी सामाजिक स्थिति, इसकी जानकारी लेकर एक अच्छी खासी मार्मिक स्टोरी तैयार की जा सकती है !

[न तो अभी-तक चंदूसा को चाय मिली है, और अब यह बे-मतलब की झकाल ? बस, उनके बर्दाश्त करने की सीमा समाप्त हो जाती है ! फिर क्या ? ज़नाब झट बीच में उछल पड़ते हैं, और गुस्से से उबलते हुए कह देते हैं...]

चंदूसा – [गुस्से से उबलते हुए, कहते हैं] – यह कैसी बकवास, लेकर बैठ गए ज़नाब ? समझदार इंसानों के बीच ऐसी बातें करनी शोभा नहीं देती, दीनजी भा’सा ! अगर ऐसा ही स्टोरी का मेटर इकठ्ठा करना है, तो ले जाइये सत्य नारायणजी के मेहमान को...किसी दूसरे केबीन में, और लेते रहना मेटर ! ज़नाब, मुझे तो सोने दीजिये आराम से ! काहे ख़लल डालते हैं, आप ?

[सावंतजी मुस्कराते जा रहे हैं, मगर वे अपने मुंह से एक शब्द नहीं कहते ! और रशीद भाई ठहरे, सेवाभावी इंसान ! उनको तो सबसे मेल-मुलाक़ात रख़नी पड़ती है, इस कारण बेचारे यह सलाह देकर हो जाते हैं चुप !]

रशीद भाई – दीनजी, आप ऐसा कीजिये ! सत्य नारायणजी और इनके मेहमान को साथ लेकर, किसी दूसरे केबीन में चले जाइए ! आप नाराज मत होइए, तब-तक मैं झट पानी की खाली बोतलें इकट्ठी कर लूंगा..! और लूणी स्टेशन आने पर, उनमें शीतल जल भरकर शीघ्र ही जल-सेवा का कार्य संपन्न करके आपके पास चला आऊंगा !

[चाय पीकर, खाली की गयी कागज़ की ग्लासों को खिड़की से बाहर फेंक देते हैं ! अब सत्य नारायणजी जहरीली नज़रों से, सावंतजी और ठोक सिंहजी को देखते हैं ! उनके दिल मे, विचार आता है..]

सत्य नारायणजी – [होंठों में ही, कहते हैं] – हम्म...चाय पीने में ये डोकरे पड़ते हैं तेज़, मगर साथ निभाने में ये कुत्तिया के ताऊ मेरी जूत्तियां खींचकर ले जाने वाले हैं ! [प्रगट में कहते हैं] अरे चलिए, दीनजी ! यहां क्या बैठना, यार ? उठिए, उठिए ! [ख्वाज़ासरा से कहते हैं] अब आप भी उठिए, अब आपको उठने के लिए अलग से कहना होगा ? उठिए, और चलिए दूसरे केबीन में !

[सत्य नारायणजी दीनजी और उस ख्वाज़ासरा को साथ लेकर, चले जाते हैं, दूसरे केबीन में ! अब इन लोगों के चले जाने से, कई सीटें खाली हो गयी है ! अब चंदूसा, सावंतजी से कहते हैं..]

चंदूसा – सावंतजी ! मुझे तो यार, आ रही है नींद ! मैं तो जा रहा हूँ, बर्थ पर सोने ! कल तो यार, पूरी रात काली कर डाली जगकर..इस महिला संगीत के लिए ! ये कैसी शादियाँ, इस जोधपुर शहर में ? नाम तो रखा है, महिला संगीत ! मगर इसमें आते हैं, सभी मर्द औरत ! अब सोचिये यार, ख़ूबसूरत औरतों का नृत्य देखा जाय या आनंद से खाना खाया जाय ? काम एक ही किया जा सकता है, सावंतजी !

रशीद भाई – मुझे पूरा भरोसा है, आपने सुन्दर नवयोवनाओं का नृत्य देखा होगा ! अब चढ़ जाइए बर्थ पर, और सपने में नाचते रहना इन ख़ूबसूरत परियों के साथ !

चंदूसा – [बर्थ पर चढ़ते हुए, कहते हैं] – आप सबको याद दिला देता हूं, लूणी स्टेशन आने पर आप मुझे जगा देना ! तब मैं सत्य नारायणजी से चाय मंगवाकर,आराम से पी लूंगा !

[अब बर्थ पर चढ़कर, चंदूसा खूंटी तानकर सो जाते हैं ! थोड़ी देर बाद, उनके खर्राटों की आवाज़ गाड़ी की खरड़-खरड़ आवाज़ के साथ ताल-मेल बैठाने लगी ! अब इधर ठोक सिंहजी सोच रहे हैं, के यह किन्नर [ख्वाज़ासरा] कमला बाई की हवेली के अन्दर मुमताज़ से मुलाक़ात कर चुका है ! आख़िर, यह मुमताज़ है क्या बला ? इसकी जानकारी प्राप्त करने की उत्कंठा, उनके दिल में बढ़ने लगी ! आख़िर, उनसे चुप बैठा नहीं गया ! वे तपाक से, रशीद भाई से पूछ बैठते हैं !]

ठोक सिंहजी - रशीद भाई ! आपके पास किन्नरों की जानकारी काफ़ी रहती है, यार फिर...

सावंतजी – रोज़ाना तो सर के नीचे बैग रखकर सो जाया करते हैं, आप ! कहीं आज़ , पश्चिम दिशा में सूरज उग गया क्या ?

रशीद भाई – चिल्लाओ मत, सावंतजी ! अभी चंदूसा भले भड़क जायेंगे, मैं तो आप लोगों को अक़सर कहा करता हूं....मैं आदमी आदमी में, अंतर नहीं रखता...
सावंतजी – आगे और बक दीजिये, ‘अगर आपको पानी पिलाता हूं, तो पास बैठे किन्नर को भी पानी पिला देता हूं ! आख़िर मैं हूं, सेवाभावी !’ इतना तो हम सभी जान गए हैं, अब आप आगे कहिये !

ठोक सिंहजी – आगे क्या कहेंगे ? यही कहेंगे, के ‘ये किन्नर लोग तो, मेरे समधी हैं ! अब, याद कीजिये ! तभी इस गुलाबे ने मेरे ऊपर दस रुपये की घोल करके, दयाल साहब को वो कड़का-कड़क नोट थमा दिया था !’

रशीद भाई – [लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए, कहते हैं] – यही बात मैं आपसे कह रहा था, कि ‘ये सभी किन्नर भाई, मेरा सम्मान क्यों करते हैं ? किस कारण वे मुझे, समधीसा कहकर पुकारते हैं ? सुन लीजिये, एकबार ! इसका कारण है, मुमताज़ ! लीजिये, इस मुमताज़ की गाथा सुन लीजिये ! किस तरह इस मामू ने इस मुमताज़ का निकाह, गुलाब खां साहब के साथ करावा डाला ?

[रशीद भाई कथा बयान करते नज़र आते हैं, जैसे जैसे वे इस कहानी को आगे बढाते हैं..त्यों-त्यों वाकये चित्र बनकर, इन लोगों की आँखों के आगे छा जाते हैं ! गाड़ी तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ती जा रही है, इसकी खरड़-खरड़ आवाज़ के आगे रशीद भाई की आवाज़ दब जाती है ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है !]

[२]

[मंच पर रोशनी फ़ैल जाती है, हवेली का मंज़र सामने आता है ! चौक के अन्दर, कुर्सी पर मजीद मियां बैठे हैं, और उनकी बैसाखी कुर्सी के सहारे पास ही रखी है ! अभी मजीद मियां हाथ में अख़बार लिए, उसे पढ़ते जा रहे हैं ! उनके पास, और भी कुर्सियें रखी है ! इन कुर्सियों के सामने ही जीना है, जिसकी सीढ़ियां ऊपर की ओर चढ़ती दिखाई दे रही है ! चौक के पास ही बरामदा है, जहां मनसद पर साज़ के सामान तबला और हारमोनियम की पेटी रखी है ! पास ही गद्दे पर चांदी की थाली रखी है, जिसमें मीठे पान की गिलोरियां तैयार करके रखी गयी हैं ! इसके पास ही, तैयार किया हुआ चांदी का हुक्का भी रखा है ! इस तरह अमीर लोगों की शान-शौकत की, पूरी व्यवस्था नज़र आ रही है ! हमेशा की तरह आज़ भी मजीद मियां की आपाजान फातमा बी मुंडेर पर अपने बाल संवार रही है ! और वह अपनी तांक-झाँक करने की आदत से बाज नहीं आती, और कई बार नीचे चौक में निग़ाह घूमाकर देख लेती है..कि, इस हवेली में कौन आ रहा है और कौन जा रहा है ? या नीचे बैठे महानुभव, किस मुद्दे पर गुफ़्तगू करते जा रहे हैं ? वह हर हल-चल पर, अपनी नज़र गढ़ाए रखती है ! अब अख़बार से नज़र हटाकर, मजीद मियां बड़बड़ाते हुए कह रहे हैं...]

मजीद मियां – [बड़बड़ाते हुए, कह रहे हैं] – लोगों को, वक़्त का पाबन्द होना चाहिए ! मगर, यह क्या ? बच्चों को देखो या देखो इन बड़े-बुजुर्गों को, किसी को वक़्त का ख्याल नहीं ?

[दरवाज़े के पास खड़े मामूजान, उनकी बात सुनते जा रहे हैं ! वे अब उनके सामने आकर, उनसे कहते हैं...]

मामूजान – आज़ किसकी शामत आयी, दूल्हे भाई ? आली ज़नाब, अब आप मेरे किस मुअज्ज़म पर अंगार बरसाएंगे ?

मजीद मिया – [तड़ककर, कहते हैं] – आपकी आंखें है, या आलू ? यहां रखे ये साज़ के सामान, आपको दिखाई नहीं दे रहे हैं ? आज़ ये साज़ के सामान यहां क्यों रखे गए हैं, जानते नहीं ? आज़ कौन तशरीफ़ ला रहे हैं, यहां ?

मामूजान – [मासूमियत से, कहते हैं] – अरे हुज़ूर, मुझे क्या पता ? मैं ठहरा, सीधा-सादा इंसान ! आप लोग हैं, रईस ख़ानदान के..कहीं किसी नाचने गाने वाली को तो यहां नहीं बुला लिया हो, आपने ? अब आप ही बता दीजियेगा, जान लूंगा आपकी मेहरबानी से !

मजीद मियां – साहबज़ादे, ऐसे भूला न करो ! कल ही आपके सामने बात हुई, वे...वे मेरे लख्तेज़िगर मेरे अज़ीज़ दोस्त गुलाब खां साहब को यहां आने की दावत दी है ! क्या, आप उन्हें नहीं जानते ? प्यारे मियां ! इस तरह कैसे भूलते जा रहे हैं, आप ?

मामूजान - [व्यंग भरी मुस्कान अपने लबों पर छोड़ देते हैं, फिर कहते हैं] – माशाल्लाह ! उनको, कौन नहीं जानता ? ये आली ज़नाब महाराजा हनवंत सिंहजी के रंग-महल में क्या साज़ बजाया करते थे, अब इससे आगे आपसे क्या कहूं ? उस वक़्त नर्तकी को बुलाने की कोई ज़रूरत नहीं होती, ज़नाब ख़ुद ही साज़ छोड़कर तन्मय होकर नाच लिया करते ! अरे हुज़ूर, क्या मीठे सुर उनके गले से निकला करते...

मजीद मियां – [ख़ुश होकर, कहते हैं] – अरे साहबज़ादे, ऐसे मीठे सुर निकला करते नहीं, अभी भी उनके गले से मीठे सुर निकलते हैं...ज़नाब अभी ज़िंदा हैं, इस ख़िलक़त में ! सुन लीजिये आप कान की ठेठी निकालकर, अल्लाज़िल्ला बाई भी अपने गले से ऐसे मीठे सुर निकाल नहीं सकती ! इन्होंने अभी-तक गायकी बंद की नहीं है, साहबज़ादे ! गाते-गाते वे ऐसी तरंग में बह जाते हैं, जनाब ख़ुद उठकर गीत गाते हुए नाच लिया करते...

मामूजान – [हंसी को दबाते हुए, धीरे-धीरे कहते हैं] – एक जनखे की तरह...!

मजीद मियां – [तल्ख़ आवाज़ में] – क्या कहा, साहबज़ादे ? सुना नहीं, ज़रा ज़ोर से कहना ! [सामान्य होकर, कहते हैं] वल्लाह ! क्या पांव थिरकते हैं, उनके..? सदका उतारू उनका, कहीं मेरी नज़र न लग जाए ?

[मजीद मियां की बात सुनकर, मामूजान उनके निकट आकर खड़े हो जाते हैं ! और फिर, वे ज़ोर से हंस पड़ते हैं ! इनके इस व्यवहार से मजीद मियां हो जाते हैं, नाराज़ ! वे गुस्से से, कह बैठते हैं..]

मजीद मियां – [गुस्से से कहते हैं] – छक्के की तरह, काहे हंसते जा रहे हो, साहबज़ादे ? हंसने के पहले, उनकी बराबरी तो कर लीजिएगा ! आप जानते क्या हैं, उनको ? उनके थिरकते पांवों की झंकार सुनकर, ख़ुद हनवंत सिंहजी उठकर उन पर सोने की मोहरे वारते थे ! अब कहिये, साहबज़ादे...क्या आप उनकी बराबरी कर पाओगे, इस नृत्य-कला में ?

मामूजान – मैं नाच नहीं सकता जनाब, बड़े-बड़े मुसाहिबों को नचा सकता हूं दूल्हे भाई ! [नौसीखिए की तरह, हाथ-पांव फेंकते हुए कहते हैं] मैं एक पांव इधर फेंकता हूं या फिर कभी हाथ, अनजाने में किसी को लग जाए तो ख़ुदा मुझे माफ़ करें !

[मामूजान तो अभिनय करते–करते सचमुच अपना एक पांव ऐसे फेंकते हैं, और फेंकते वक़्त ध्यान नहीं रख पाते उनका यह वार किसको चोट पहुंचा रहा है ? वास्तव में, आख़िर होता भी वही ! पास बैठे उनके मुअज्ज़म बेचारे मजीद मियां का पांव, चोटिल हो जाता है..उनके पांव के वार से !]

मजीद मियां – [उनका पांव थामते हुए, कहते हैं] – हाय अल्लाह ! ख़ुदा रहम, मार डाला इस नौसिखिये लंगूर ने ! ए ख़ुदा, अभी मत उठाना मुझे...अभी तो मेरे अरमान, अधूरे हैं !

मामूजान – [अपना पांव छुड़ाते हैं, फिर कहते हैं] – अरे दूल्हे भाई, यह क्या कर रहे हैं आप ? आप ठहरे, मेरे मुअज्ज़म ! मेरा पांव पड़ना, आपको शोभा नहीं देता ! [उनका हाथ थामकर, अपने सर पर रखते हुए कहते हैं] आपका यह हाथ, मेरे सर पर रखने के लिए है...मुझे आशीष देने के लिए ! आली ज़नाब, ख़ुदा आपके अधूरे अरमानों को पूरा करे, कहिये क्या अरमान बाकी है ? कहीं, मेरी शादी देखने का...

मजीद मियां – [तनिक गुस्से से, कहते हैं] – कमबख्त, आपकी शादी नहीं...आपकी शादी के लिए, मैं अपनी मौत के बाद भी ख़बीस बनकर आ जाऊंगा..आपकी बरात में, शरकत करने ! कान पकड़कर, आपका निकाह किसी लूली या पांगली छोरी के साथ करवा दूंगा ! अभी तो मुझे मेरे लख्तेज़िगर मेरे दोस्त गुलाब खां की शादी देखनी बाकी है ! ख़ुदा इस अधूरे अरमान, को पूरा कर दे...तो, मैं हज़ चला जाऊं !

मामूजान – [अचरच करते हुए, कह उठते हैं] – ख़ुदा रहम, यह क्या ? जवान तो बैठे हैं, और कब्र में पांव लटकाए बैठे बूढ़े...शादी करेंगे ? यह, कैसी नाइंसाफ़ी..?

मजीद मियां – आप ठहरे जवान लौंडे, पैसा होगा आपके पास तो...आते रहेंगे, आपके शादी के पैग़ाम ! मगर क्या कहूं, मेरे दोस्त के पास इतनी दौलत है, उसकी सात पीढ़ी बैठे-बैठे खा सकती है ! इस आने वाली पीढ़ी के लिए ज़रूरत है, शादी की ! जब शादी होगी..तब आगे की पीढ़ी का निर्माण होगा ! इसके नाचने-गाने के पेशे के कारण, कोई मोमीन इसका निकाह अपनी बेटी के साथ करता नहीं ! बरखुदार इसका निकाह तो अब मेरे लिए, ख़्वाब बन गया है !

मामूजान – ऐसे मत कहिये, दूल्हे भाई ? यह लोकोक्ति, सुनी नहीं क्या ? ‘हिम्मते मर्द, बादशाह की लड़की फ़क़ीर से विवाह !’ अरे हुज़ूर अब तो हिन्दुस्तान ने बहुत तरक्की कर ली है, बस दूल्हे भाई..आदमी के पास पैसे होने चाहिए ! तो बूढ़े का निकाह, ख़ूबसूरत जवान लौंडिया के साथ हो सकता है ! पढ़ लीजिये, आज़ का अख़बार ! ऐसे कई अमीर बूढ़ों की शादियों के इश्तिहार, इसमें छपते आ रहे हैं...इश्तिहार के कारण, उनकी शादी आसानी से हो जाती है !

[मजीद मियां अख़बार के सभी कोलम टटोलते हैं, फिर पढ़ते-पढ़ते अचानक चौंक जाते हैं !]

मजीद मियां – [चौंकते हुए, कहते हैं] – हाय अल्लाह, इस कमबख्त सम्पादक ने यह क्या छाप डाला ?

मामूजान – हुज़ूर, यह क्या..अब इस बेचारे सम्पादक की शामत आ गयी क्या ? ऐसा क्या लिख दिया हुज़ूर, जिससे ज़नाबे आली खफ़ा हो गए ?

मजीद मियां – [अख़बार थमाते हुए, कहते हैं] – लीजिये, यह अख़बार ! इस कोलम को देख लीजिएगा, इसने क्या छापा है ? [हुक्म देते हुए, कहते हैं] पढ़िए, पढ़िए, ज़ोर से पढ़िए ! यह, कैसी तक़रीर ? क्या कह रहा है, यह गेलसफ़ा ? साफ़-साफ़, ख़ुदा के क़ानून के ख़िलाफ़ ? यह भैंस का बच्चा, अपने-आपको क्या समझता है ? [सर थामते हुए, कहते हैं] अरे...अरेಽಽ..

मामूजान – क्या हो गया, दूल्हे भाई..बोलते-बोलते कैसे रुक गए ज़नाब ? कहीं कोई उड़ती हुई मक्खी, आपके मुंह में घुस गयी क्या ?

मजीद मियां – [आंखें तरेरते हुए, कहते हैं] – मक्खी...? कमबख्त, तुम्हारे मुंह में घुस जाए हाथी ! ज़बान पर लगाम दो, मियां ! अरे, मैंने किसको अख़बार दे दिया ? जिसके लिए पढ़ना तो कोसों दूर, यहां तो मियां तुम्हारे लिए लिखे मूसा पढ़े ख़ुदा वाली बात है ! क्या पढ़ोगे, तुम ?

[मामूजान तो झट अख़बार उठाकर, उसमें छपी फिल्म तारिकाओं की अधनंगी फोटूएं देखने लगे ! उनको निहारते-निहारते, लुत्फ़ उठाने लगे ! फिर, आली ज़नाब मजीद मियां से कहने लगे..]

मामूजान – इस बेचारे सम्पादक को आप भैंस का बच्चा न कहा करें, दूल्हे भाई ! इस सम्पादक को आप कहिये, दानिश..या फिर कहिये जन्नत का फ़रिश्ता ! देखिये कितनी ख़ूबसूरत हूरों की फोटूएं छापी है, इस अख़बार में ! वाह दूल्हे भाई, वाह ! क्या बिकनी पहने इस बिंदु के बढ़िया पोज़ लिए हैं, अरे वाह..क्या नाचती हुई हेलन के ख़ूबसूरत पोज़ लिए हैं, दूल्हे भाई ? मैं तो यही कहूंगा ज़नाब, कि यह सम्पादक कैसी कुत्ती चीज़ है !

[दरवाज़े के पीछे छिपे रशीद भाई ने जैसे ही अपनी फेवरेट हेलन के बारे में सुना, त्यों ही वे तपाक से छुपे स्थान से बाहर निकल आते हैं ! फिर मामूजान से अख़बार छीन लेते हैं, उसके बाद उनसे कहते हैं..]

रशीद भाई – [अख़बार छीनकर, कहते हैं] – मामू प्यारे, सदका उतारू तेरा ! ज़रा दीदार तो करने दे, मुझे...मेरी फेवरेट हेलन के !

मजीद मियां – [झल्लाते हुए, कहते हैं] - बड़ा आया, मर्दूद..हेलन के दीदार करने, मज़नू कहीं के ? हेलन को छोड़ो, बरखुदार ! अगर तुम कहते हो तो ख़ूबसूरत बेलन के दीदार करवा दूं, तुम्हारे सर पर चलाकर ?

मामूजान – वाह ज़नाब, वाह ! ऐसा लगता है, ज़माना बदल गया है ! आज़कल इस हवेली में, शमशीर के स्थान पर बेलन चलने लगे हैं !

रशीद भाई – [बीच में लपकते हुए, कहते है] - वज़ा फरमाया है, मामूजान ! बेलन चलाने वाले आपके दूल्हे भाई, मर्द से औरत बन गए हैं !

मजीद मियां – [गुस्से से काफ़ूर होकर, बैसाखी उठाते हुए कहते हैं ! ठहरो साहबज़ादों ! अभी दिखलाता हूं तुम्हें..[कुछ सोचते हुए, दिखाई देते हैं, फिर कहते हैं] अच्छा हुआ, अभी तुमने जुमला क्या कहा था ? बस, मैं वही बयान कर रहा था...शुक्रिया, तुमने याद दिला दिया !

मामूजान – कौनसा मतला, कौनसा जुमला ? कुछ समझ में नहीं आया, दूल्हे भाई !

मजीद मियां – मतला यह है, साहबज़ादों ! सम्पादक लिख रहा है कि, दूसरे मुल्कों में यह बात आम हो गयी...

मामूजान – [चौंकते हुए, कहते हैं] – कौनसी बात आम हो गयी, दूल्हे भाई ?

मजीद मियां – वहां मर्दों का ऑपरेशन करके उन्हें औरत बना देते हैं, और औरतों को मर्द ! अब आप दोनों इस फोटो को देखिये, इस आदमी को ! डिलेवरी के ऑपरेशन से, बच्चे को ऑपरेट किया जा रहा है...यह आदमी, पहले औरत रहा है ! औरत रहते वक़्त, ऑपरेशन करके डॉक्टरों ने इसे मर्द बना डाला...तब इन डॉक्टरों ने इसकी बच्चेदानी को अन्दर ही रहने दिया, बाहर नहीं निकाला !

रशीद भाई – [अख़बार का एक कोलम दिखलाते हुए, कहते हैं] – इधर देखिए, यहां इस सम्पादक ने क्या लिखा है ? पहले सेक्स चेंज के ऑपरेशन करने के दौरान, इसके गर्भाशय को बाहर निकालकर फेंका नहीं गया ! इसके बदन में ही, बचाकर रख लिया गया ! इस करण ही, यह दूसरा ऑपरेशन सफल रहा !
मामूजान – भाणजा पहले तू यह बतला कि, यह पहला ऑपरेशन कब हुआ रे ?

रशीद भाई – तू तो मामू अनपढ़ रहा तो कोई बात नहीं, मगर इसके साथ तूने अपना दिमाग़ काम में लेना बंद क्यों किया ? अब सुन, पहले यह क्या था ? पहले यह औरत था, जिसको ऑपरेशन के जरिये बना डाला मर्द ! जिस ऑपरेशन की बात मैं कह रहा हूं, यह वही सेक्स चेंज का ऑपरेशन था..अब तेरे भेजे में, यह बात चढ़ी या नहीं ?

मजीद मियां – बस यही बात मैं कह रहा था कि, यह सम्पादक लिख रहा है ‘अब इस हिन्दुस्तान मे भी, लिंग-परिवर्तन के ऑपरेशन होने लगे हैं ! अपने मुल्क ने, काफ़ी तरक्की कर ली है !’

[अब रशीद भाई को के दिमाग़ में शरारत [कुबद] सूझती है, कि किसी तरह आज़ चच्चाजान मजीद मियां को छेड़ा जाय ? फिर क्या ? उनके पहलू में रखी कुर्सी पर बैठ जाते हैं, फिर अपने दोनों हाथ अपने सर पर रखते हुए बड़े-बूढ़ों की तरह नसीहत देते हुए कह देते हैं..]

रशीद मियां – [दोनों हाथ सर पर रखते हुए, कहते हैं] – अमां...चच्चाजान, काहे बेफिज़ूल की बकवास बढ़ाते जा रहे हैं आप ? कहीं अल्लाह मियां ने सुन लिया, तो मां कसम आपको दोज़ख़ भी नसीब नहीं होगा !

मजीद मियां – [तुनककर, कहते हैं] – क्या बोले, साहबज़ादे ? क्या, मैं दोज़ख़ का कीड़ा हूं ? तुम जैसे आज़कल के लौंडों को एक मर्तबा नमाज़ अता करने में आती है, मौत ! अब सुन लो, कान खोलकर..खम्स [पांच] मर्तबा नमाज़ अता करता हूं, मैं ! तुम लोग मुझे, नमाज़ी मोमीन कह सकते हो ! और यहां, तुम..कमबख्त तुम मेरे लिए जन्नती दरवाज़े के स्थान पर, दोज़ख़ का दरवाज़ा खुलवा रहे हो ? तुम्हारे अब्बाजान मेरे बड़े भाई ठहरे, इस कारण तुम्हारी बदसलूकी बर्दाश्त करता उनका लिहाज़ रख रहा हूं, न तो छोटे मियां ये मेरी रेशमी जूत्तियां आपके सर पर सवार हो जाती..

मामूजान – आपकी रेशमी जूत्तियां आपको ही मुबारक, किब्ला सोचिये आप इस भाणजे के ससुर भी हैं ! आली ज़नाब, आपको इसको खिलानी चाहिए मिठाई..मगर आप तो खिला रहे हैं, जूत्तियों का प्रसाद ? ये जूत्तियां आपकी है, हुज़ूर ! अब चाहे तो आप इन्हें पहनियें या खाइए, यह ज़नाब आपकी इच्छा !

मजीद मियां – [नाराज़गी से, कलाम पेश करते हैं] – ‘तआर्रुफ़ रोग बन जाए उसको भूलना बेहतर, तआल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा !’ समझ गए, साहबज़ादे ? ऐसा रिश्ता और ऐसे तआल्लुक किस काम के, जिसके कारण अपनी इज़्ज़त धूल में मिलती हो ?

रशीद भाई – चच्चाजान ! ऐसी कौनसी ग़लत बात आपको कह दी, मैंने ? जिससे आप, इतना नाराज़ हो रहे हैं ? मैं बेचारा भोला जीव, क्या जानता ? आप अपने दिल में क्या सोचते हैं, मुझे क्या पता ?

मजीद मियां – [गुस्से में, कहते हैं] – अभी बताता हूं, साहबज़ादे ! जब आप खायेंगे, सात मर्तबा मेरी रेशमी जूत्ती की मार..अपनी भूसे से भरी खोपड़ी के ऊपर !

[ज़ोर से, कहते हैं] बेअक्ल के लौंडे ! अब यह दामाद का रिश्ता गया घास चरने, पहले तुम मेरे भतीजे हो...इस कारण तेरी अक्ल ठिकाने लगाने के लिए, अब मुझे पीटना पड़ेगा तूझे इस जूत्ती से !

[इतना कहकर, मजीद मियां अपने पांव की जूत्ती निकालते हैं ! मगर वे उसे, जैसे ही वे रशीद भाई पर फेंकने के लिए तैयार होते हैं...तभी मुंडेर से उड़ता हुआ आया दुपट्टा, उनके चेहरे को ऐसे ढक देता है..मानो पाकीज़ा फिल्म की नायिका मीना कुमारी, उस दुपट्टे को ओढ़कर मुज़रे में बैठी हो ? फिर क्या ? उनको सामने कुछ दिखाई देता नहीं देता, और उनका निशाना चूक जाता है ! अब वह जूत्ती रशीद भाई के ऊपर गिरने की जगह, दरवाज़े की तरफ़ बढ़ जाती है..सामने से आ रहे आगंतुक गुलाब खां साब की टाट को चमका देती है ! उनको ऐसे स्वागत की आशा ही नहीं थी, बेचारे स्तब्ध होकर खड़े रह जाते हैं ! जैसे ही सर पर लगी चोट का दर्द नाक़ाबिले बर्दाश्त हो जाता है, मियां चीत्कारते हुए अन्दर दाख़िल होते हैं ! यह उनकी चीत्कार भी ऐसी लगती है, मानो कोई गायक शास्त्रीय राग में अलाप ले रहा हो ?]
गुलाब खां – [चीत्कारते हुए, कहते हैं] – आ हाಽಽ इ इಽಽ..मार डाला रेಽಽ..इन्ही लोगोंಽಽ ने मार दी रेಽಽ..!

[इस ओढ़े हुए दुपट्टे के कारण, कहीं मजीद मियां नीचे गिर न जाए ? मामूजान फ़िक्र करते हुए उनके समीप आते हैं, और आकर उस दुपट्टे को उनके चेहरे से धीरे-धीरे ऐसे दूर लेते हैं...मानो फिल्म ‘चौदवी का चाँद’ में, गुरुदत्त धीरे-धीरे वहीदा रहमान का घूंघट हटा रहे हो ? और साथ में, वे गाते जा रहे हो ‘चौदवी का चाँद हो...!’ इसके बाद मामूजान हंसते हुए, मजीद मियां से कहते हैं..]

मामूजान – [हंसते हुए, कहते हैं] – हाथ आँगन को, आरसी की क्या ज़रूरत ? दुल्हे मिंया, सुभानअल्लाह ! किब्ला, आख़िर आपने उस सम्पादक की तक़रीर को क़बूल कर डाली ! हुजूरेआला मर्द से औरत बनने की मिसाल क़ायम करके, आपने इस ख़िलक़त को जतला दिया कि...

मजीद मियां – [गुस्से से कांपते हुए, कहते हैं] – बरखुदार, आपकी खोपड़ी ठिकाने है या नहीं ? काहे अनाप-शनाप बके जा रहे हो ? मैं ..और भले औरत ? औरत बनो, तुम ! औरत बनती रहे, तुम्हारी सात पुश्तें ! बेगम के भाई न होते, तो..तो....[हकलाते हैं]

मामूजान – ना, ना ! पगड़ी को सलामत रहने दीजिये, दूल्हे भाई ! मेहरबानी करके देखिये, दरवाज़े की तरफ़ ! कोई मुसाहिब तशरीफ़ लाये हैं, ज़नाब ! [दरवाज़े क तरफ़, अंगुली से इशारा करते हुए कहते हैं] मुझे ऐसा लगता है, आपके अज़ीज़ दोस्त गुलाब खां साहब तशरीफ़ लाये हैं ! देखिये ज़नाब, किस तरह आलाप लेते हुए आपकी शान में कशीदे पढ़ते जा रहे हैं ?

[गुलाब खां साहब एक हाथ उनके सर पर है, और उनके दूसरे हाथ में मजीद मियां की जूत्ती थामी हुई है ! वे रोते-रोते अपने दर्द का बयान, आलाप लेते हुए कर रहे हैं ! अब इनकी रोनी राग के अलाप को, शास्त्री संगीत की गायकी कहें तो गलत नहीं ! अब गुलाब खां साहब रोते हुए, अलाप के साथ बयान कर रहे हैं !]
गुलाब खां – [रोनी आवाज़ में अलाप लेते हुए, कहते हैं] – आಽಽ..आಽಽ... आಽಽಽಽಽಽ हाಽಽ लागीಽಽ लागीಽಽ लाಽಽ...! लागी जूत्ती हमारे सर पे.. मुख दिखाऊंಽಽ कैसे, जूत्ती हमरे सर पेಽಽ..लागीಽಽ लागीಽಽ लाಽಽಽಽ लाಽಽ...!

मजीद मियां - [उनसे अपनी जूत्ती लेकर अपने पांव में पहन लेते हैं, फिर कहते हैं] - क्या हुआ, यार ? खैरियत तो है ?

गुलाब खां – [अलाप लेते हुए, कहते हैं] – लागीಽಽ जूत्ती हमरे सर पे...अब जाऊं कैसे..अब मुख दिखाऊंಽಽ कैसे, जूत्ती हमरे सर पे...म्होरा दरदवा ऐसा प्यारे...बताऊं कैಽಽसे...लागीಽಽ जूत्ती हमरे सर पे..!

[मामूजान और रशीद भाई उठकर, उन्हें सलाम करते हैं ! उधर मजीद मियां को भय सता रहा है, कहीं गुलाब खां साहब इस पास राखी कुर्सी को उठाकर उन पर न फेंक दें ? शायद उनका गुस्सा, लोगों की तरह नाक़ाबिले बर्दाश्त रहा हो तो..? फिर, वे क्या करेंगे ? झट बड़े मियां उस कुर्सी को खिसकाते हुए, उसे दूर रख देते हैं ! मगर शरारतों के मामले में, मामूजान ठहरे उस्ताद ! झट उसी कुर्सी को उठाकर उसी जगह रख देते हैं, वापस ! अब चाहे गुलाब खां साहब उस पर बिराज जाए, या फिर उसे उठाकर मजीद मियां को सज़ा के तौर..उन पर, पटक दें ? कुर्सी भी मजीद मियां के इतनी नज़दीक रखी है, ताकि गुलाब खां बैठे-बैठे उनसे हाथापाई कर सके !]

मामूजान – [कुर्सी यथास्थान रखते हुए, कहते हैं] - आदाब हुज़ूर ! अब आप इस नापाक जूत्ती के ऊपर, कशीदे न निकालें ! कुर्सी पर बैठकर, आप इसके हत्थों को मजबूती से थाम लीजिये..ना तो दूल्हे भाई का कोई वसूक नहीं, कब वे इसे खींचकर कहीं दूर रख आयेंगे ? फिर हुजूरेआला, खड़े-खड़े अलाप ही लेते रह जायेंगे ! क्या करें, ज़नाब ? आज़कल सभी, कुर्सी के पीछे लगे हैं..इसे, कोई नहीं छोड़ते !

मजीद मियां – [मामूजान से कहते हैं] – अरे साहबज़ादे, आपने यह क्या कर डाला...इनको कुर्सी थमाकर ? कहीं आपका दंगल करवाने का मूड तो नहीं है ? कहीं तुम्हारे ये मुअज्ज़म इस कुर्सी को उठाकर, मुझ पर न उछाल दे ?

मामूजान – [हंसते हुए, कहते हैं] – क्यों डर रहे हैं, दूल्हे भाई ? इनको बिठाने के लिए कुर्सी रखी है, मैंने..फेंकने के लिए नहीं ! मुझे मालुम है, आपके दिल में कौनसा भय सता रहा है...आपको ? धीरज रखिये, ज़नाब ! हमारे ये मुअज्ज़म आपकी तरह जूत्ती फेंकने के माहिर जंगजू नहीं है, न आपकी तरह जूत्ती फेंकेगे और न आप पर कुर्सी उछालेंगे ! शरीफ़ आदमी ठहरे, केवल संगीत की रागों को ज़रूर छेड़ लिया करते हैं ! अब मैं इनसे पूरी दास्ताँ सुनना चाहूंगा कि, इन्होंने आपकी फेंकी हुई मिसाइल का वार कैसे झेला ?

[इतना कहने के बाद, वे रशीद भाई की तरफ़ देखते हुए उनसे कहते हैं]

मामूजान – [रशीद भाई से, कहते हैं] – अरे, ए भाणजे ! अब मनसद पर बैठा जाय, और वहां रखे साजों को संभाला जाय ! चल यार,जल्दी कर ! अब सबसे पहले, मुअज्ज़म गुलाब खां साहब की तान सुन लेते हैं..हुज़ूर की गायकी के कई किस्से, सुन रखे हैं हमने !

मजीद मियां – [उनकी मज़ाक़ उड़ाते हुए, कहते हैं] – ये क्या गायेंगे ? इनकी, कैसी तान ? अरे साहबज़ादों इनकी तान को मुर्गे की बांग कह दें, तो बेहतर होगा !

[अचानक पड़ोस के दड़बे से, मुर्गा ज़ोर से बांग देता है ! यह कोई वक़्त बांग देने का नहीं, अभी दोपहर के वक़्त यह मुर्गा बांग कैसे दे रहा है ? शायद वह ख़ूबसूरत मुर्गीयों को रिन्झाने के लिए, बेवक्त बांग दे बैठा हो ? उसक बांग के पीछे, मुर्गियों की कुड़ कुड़ की आवाज़ का कलरव सुनाई देता है ! मुर्गियों का कलरव सुनकर, मुर्गा एक बार और ज़ोर से बांग देता है ! शोर सुनकर, मुंडेर पर बाल संवार रही फातमा बी को सुब्हा हो जाता है, कहीं दड़बा खुला रह जाने से पड़ोसी की मुर्गियां नीचे चौक के अन्दर चली आयी हो ? उन मुर्गे-मुर्गीयों को बाहर भगाने के लिए वह झट सीढ़ियां उतरकर आ जाती है, नीचे चौक में ! फिर, वह ज़ोर से कहती है]

फातमा बी - [चौक में आकर, ज़ोर से कहती है] – बेवक्त किसने दी है, बांग ? मैं तो सोच रही थी, कहीं पड़ोसी के दड़बे से मुर्गे-मुर्गी तो नहीं चले आये यहां ?

[मजीद मियां को देखती हुई, कहती है] छोटे नवाब, उतावली से फ़टाफ़ट सीढ़ियां उतरकर आयी हूं...चौक में ! [गुलाब खां साहब पर निग़ाह गिरते ही, वह उन्हें ग़ौर से देखती है ! फिर, वह कहती है] अरे, यह कौन ?

गुलाब खां – [नीमत-स्लीम करते हुए, कहते हैं] – आಽಽदाब, आपाजान ! झनझनाए तार सितार के हायಽಽ [किन्नरों की तरह बजाते हैं, ताली] मियां की जूत्तीಽಽ मेಽಽरेಽಽ सर [गाते हुए, आगे बयान करते हैं] हायಽಽ रेಽಽ दरदवा...

[उनके गाने की स्टाइल को देखकर मामूजान रशीद भाई को साथ लेकर बैठ जाते हैं, मनसद पर ! मामूजान झट पकड़ लेते हैं हारमोनियम की पेटी, और फिर रशीद भाई को थमा देते हैं तबला ! फिर क्या ? साज़ की आवाज़ सुनकर, अब गुलाब खां साहब के पांव बिना थिरके कैसे रहते ? साज़ के बजते ही, उनके पांवों में हलचल पैदा हो जाती है ! वे फटाक से, नृत्य-मुद्रा में आ जाते हैं ! झट कंधे पर रखे उपरने से अपनी कमर बांध लेते हैं ! फिर, कत्थक की मुद्रा में आ जाते हैं ! अब वे थिरकते हुए, आते हैं फातमा बी के पास, उनके पास आकर झट उमराव जान की तरह मुजरे का सलाम पेश करते हैं !]

गुलाब खां – [सलाम करते हुए, कहते हैं] – हुज़ूर ! मल्लिका –ए-आज़म, हमारा सलाम कुबूल हो ! आपकी ख़िदमत में, यह नाचीज़ गुलाबो हाज़िर है ! हुक्म, दे मेरे आका !

फातमा बी – [गुस्से से, कहती है] – गुलाबा की बच्ची, साला मर्दूद..हितंगिये ! कमबख्त पच्चास साल का हो गया, और ये तेरे लक्खन ? शर्म नहीं आती है रे, तुझको ? नाच-गाना करता-करता हो गया पूरा निक्कमा ! ये ही तेरे हाल रहे, तो मरेगा कुंवारा !

[उनके कुर्सी पर बैठते ही, मामूजान और रशीद भाई साज़ बजाना बंद कर देते हैं]

मजीद मियां – [हंसते हुए, कहते हैं] – अब ख़्वाब मत देखो, आपा ! इसकी बरात अब निकलने वाली नहीं !

फातमा बी – [झल्लाती हुई, कहती है] – क्यों नहीं देखूं, अभी-तक इसकी उम्र हुई क्या है ? चारों तरफ़ से, ख़ुदा इस लंगूर पर मेहर बरसा रहा है ! इतनी दौलत है, इसके पास..अगर यह दोनों हाथों से लुटाता रहे तो भी, यह दौलत ख़त्म होने वाली नहीं ! मगर यह कमबख्त ठहरा, करमठोक ! इसकी शादी...

मजीद मियां – औलाद हो तो, औलाद का सुख मिलता है ! मगर शादी नहीं, तब औलाद का सुख मिलेगा कैसे ?

गुलाब खां – [रोनी आवाज़ में कहते हैं] – देख लिया, आपा ! [शर्माते हुए, आगे कहते हैं] मज़ाक़ कर रहा है, शैतान ! [मजीद मियां को टिल्ला मारते हुए, कहते हैं] अभी तो मेरे अरमान बाकी है, घोड़ी पर चढ़ने के ! आपा मुझ में कमी क्या है? खूब कमाता हूं, बड़े-बड़े मुसाहिबों से रहते हैं मेरे ताल्लुकात ! ये लोग मेरे नाच-गाने की कला से, बहुत प्रभावित हैं ! फिर क्या, आपा ? क्या आपको भी दिखलाऊं, मेरा जलवा ? देखकर, आप भी मेरी कला के कद्रदान बन जायेंगी !

[इतना सुनते ही, फातमा बी उनको जहरीली नज़रों से देखती है ! मगर, गुलाब खां साहब को क्या परवाह ? वे झट आकर बैठ जाते हैं मनसद पर, अपनी गायकी का जौहर दिखलाने ! उनके बैठते ही, मामूजान और रशीद भाई की अंगुलियां साज़ पर थिरकने लगती है ! थोड़ी देर बाद, मंच पर अंधेरा छा जाता है !]

[३]

[मंच पर रोशनी फ़ैल जाती है, हवेली का चौक दिखाई देता है ! मजीद मियां और फातमा बी कुर्सियों पर बैठे हैं ! उधर गुलाब खां साहब मनसद पर बैठे हैं, और वे अपनी गायकी का जौहर दिखलाने के लिए तैयार दिखाई दे रहे हैं ! हारमोनियम को संभाल रहे मामूजान, और उनके साथ तबले पर संगत कर रहे रशीद भाई..अपनी कला का कमाल दिखला रहे हैं ! अचानक गुलाब खां साहब को चौक में पड़ा दुपट्टा दिखाई देता है, वे झट जाकर उसे उठा लाते हैं ! फिर फिल्म पाकीज़ा की नायिका साहिब जान की तरह उस दुपट्टे को ओढ़ लेते हैं ! फिर क्या ? साज़ बजाते ही वे झट उठकर, गीत ‘इन्ही लोगों ने...’ गाते हुए ठुमका लगाते हुए नृत्य करते हैं !]
गुलाब खां – [गीत गाते हुए, नाचते जा रहे हैं] - ‘इन्ही लोगों ने, इन्ही लोगों ने ले लिया दुपट्टा मेरा...होजी हो दुपट्टा मेरा’

[अचानक इस दुपट्टे पर, आपाजान फातमा बी की बुलंद निग़ाह गिरती है ! अपने हाथ से धोये हुए उज़ले बुर्क दुपट्टे की यह हालत देखकर, फातमा बी की क्या हालत हुई होगी..? वो तो अब, अल्लाह पाक ही जाने ! उस दुपट्टे की ऐसी बुरी हालत, अब आपाजान के लिए नाक़ाबिले बर्दाश्त ठहरी..वो, कैसे बर्दाश्त करें ? वह फटाक से उठती है, और जाकर गुलाब खां साहब से वो दुपट्टा छीन लेती है ! फिर ताबड़ तोड़ बोलती है, ज़ोर-ज़ोर से !

फातमा बी – [दुपट्टा छीनती हुई, कहती है] – खामोश ! मेरा दुपट्टा ले लिया, मरदूद ! और ऊपर से कहता जा रहा है [भोंडी राग में, गाते हुए] ‘इन्ही लोगों ने, इन्ही लोगों ने ले लिया दुपट्टा मेरा...होजी हो दुपट्टा मेरा’ [दुपट्टा समेटती हुई, कहती है] बंद कर, यह नौटंकी ! एक तो तूने नापाक कर डाला मेरे दुपट्टे को और ऊपर से बेहूदगी से कहता जा रहा है, ले लिया दुपट्टा मेरा ? बोल मरदूद, यह दुपट्टा कैसे तेरा हो गया ?

[समेटे हुए दुपट्टे को लेकर फातमा बी वापस बैठ जाती है, कुर्सी पर ! एक मर्तबा खामोशी छा जाती है ! मगर गुलाब खां साहब के लगे हैं, तीतर के पंख...उनसे चुप-चाप बैठा नहीं जाता ! झट नाज़र की तरह ताली बजाकर, खामोशी तोड़ते हैं ! फिर मटक-मटककर जाते हैं फातमा बी के पास, वहां खड़े रहकर उनसे अर्ज़ करते हैं !]

गुलाब खां – [मटक-मटककर, कहते हैं] – हुज़ूर, आपकी खिदमत में एक शानदार नगमा पेश कर डाला है हमने ! अब कहिये, आपाजान...आप मेरा निकाह कब करवा रही हैं...आप ?

फातमा बी – [गंभीरता से, मजीद मियां से कहती है] – देखो छोटे नवाब ! यह गुलाब तुम्हारा ख़ास दोस्त है या नहीं ? कुछ सोचा है आपने, इसके बारे में ? कल आप तो बन जायेंगे नाना दादा, और यह कुंवारा महफिलों में नाचता रहेगा ! फ़िक्र करो, छोटे नवाब आखिर यह तुम्हारा दोस्त है ! कुछ तो कीजिये, मियां !

मजीद मियां – [हंसते हुए, कहते हैं] – होना क्या, आपा ? अपने नाती-पोते सभी चलेंगे इस मरदूद की शादी में ! इसके अलावा, आप मुझसे क्या कहलाना चाहती हैं..?

गुलाब खां – [रोनी आवाज़ में, कहते हैं] – बरात में नहीं, जनाब...बाद में, आप सभी मेरे जनाज़े में शरीक होना !

[गुलाब खां साहब के एक-एक शब्द दर्द से भरे हैं, सभी की आंखों में उनके लिये रहम दिखाई देता है ! अब फातमा बी समेटे हुए दुपट्टे को ले जाकर, बरामदे की खुली खिड़की में रख देती है ! फिर वापस आकर, वह कुर्सी पर बैठ जाती है ! शान्ति से गुलाब खां साहब को समझाती हुई, उनसे कहती है !]

फातमा बी – [गुलाब खां साहब से, कहती हुई] – जनाज़े में शरकत करें, तुम्हारे दुश्मन ! मज़ाक करना छोड़ो, बरखुदार ! अब आप, काम की बात कीजिये !

रशीद भाई – अब इस मतले को, किसी तरह निपटाना ही होगा ! आख़िर, हमें फूफीजान की बात का मान भी रखना है ! अब तो कैसी भी औरत चलेगी, चाहे वो बेवा हो या तलाकशुदा ! इसके सिवाय, अब कोई चारा नहीं ! इसके आगे, मैं आपसे क्या कह सकता हूं ?

फातमा बी – साहबज़ादे ! ख़ुदा की दी हुई इतनी लम्बी ज़बान, कैंची की तरह चला दी आपने..फिर अब आगे बयान क्यों नहीं करते ? बोलिए, बोलिए ! काहे रुक गए मियां ? क्या अब आपको बोलने के लिए, मैं अलग से इज़रा जारी करूं ?

रशीद भाई – क्या कहूं, हुज़ूर ? यह इनकी बदक़िस्मती...कोई वालिद अपनी बेटी का हाथ इनके हाथ में नहीं देता...

मजीद मियां – वजा फ़रमाया, बरखुदार ! जब-तक गुलाब खां साहब इन नाच-गानों को नहीं छोड़ देते, तब तक..[फातमा बी को देखते हुए, कहते हैं] आप ही बताइये, आपाजान ! ऐसा कौनसा मूर्ख ख़ुदा का बन्दा होगा, जो खुली आंखों से देखता हुआ इस करमठोक को अपनी बेटी निकालकर देगा ?

गुलाब खां – नाच-गाना तो मेरा पेशा है, ज़नाब ! इसे मैं, कैसे बंद कर सकता हूं ? इन नाच-गानों के कारण, अब एक बुरी लत गयी, बातें करते-करते मैं [कत्थक की मुद्रा में आकर, नाचते हुए आगे कहते हैं] ‘ताक थई धिक् धिक् तई था’ करने लग जाता हूं आपाजान !

फातमा बी – [ज़ोर से, कहती है] – खामोश ! मैं आदतों का जिक्र सुनना नहीं चाहती, बहुत सुन ली आपकी यह बकवास !

मजीद मियां – हम सभी दोस्तों ने इनको कई मर्तबा समझा दिया कि, आप अपना पेशा बदल डालिए ! मगर, यह बात इनके दिमाग में चढ़ती ही नहीं ! बस, हम लोग कहते-कहते थक गए..मगर इनके सर पर एक जूं भी नहीं रेंगी !

फातमा बी – छोटे नवाब ! आप क्या कहना चाहते हैं, अच्छी तरह से समझा दीजिये ! एक मर्तबा, आप वापस कहिये !

मजीद मियां - [मनसद की तरफ़, अंगुली से इशारा करते हुए] – आपाजान, आप ख़ुद देखिये ! ये साज़ के सामान यहाँ क्यों रखे गए हैं ?

फातमा बी – इसमें, क्या नयी बात ? आप ठहरे नवाब ख़ानदान के, संगीत की महफ़िल जमानी होगी आपको ! इसके अलावा, और क्या कारण हो सकता है ?

मजीद मियां – नहीं आपाजान , यह बात नहीं है ! मैं यह चाहता हूं, गुलाब खां अपने पेशे का रूप बदल ले ! यह गुजारिश करता आ रहा हूं कि, ये आली ज़नाब सूफी गायकी सीख ले ! फिर क्या ? महफिलों की जगह, अब आप सूफ़ी फकीरों की पाक मजारों पर झूम-झूमकर गायेंगे सूफी गीत ! और इस सूफ़ी संगीत के जरिये ख़ुदा के बन्दों को, अल्लाह पाक के दीदार करायेंगे ! और क्या कहूं, आपाजन ? इनकी गायकी के अन्दर, रूहानी शक्ति पहले से मौजूद है !

फातमा बी – मगर पहले यह बता मुझे, यहाँ साज़ के सामान क्यों रखे गए हैं ?

मजीद मियां – आपाजान, आप सरदार अली साहब के चच्चाजान असगर अली साहब को जानती ही होंगी ? ये आली ज़नाब ठहरे बड़े सूफी गायक, इस इलाके के ! उनको यहाँ आने की दावत दी है मैंने, अगर वे रजामंद हो जायेंगे तो वे यहाँ रोज़ आकर इनको सूफी संगीत की तालीम देते रहेंगे ! अभी इन दिनों, ज़नाब पड़ोस के लायकन मोहल्ले में...अपनी पुश्तेनी हवेली में, रहने आए हैं !

फातमा बी – उनको मैं जानती हूं, उनके गले की मीठास का क्या कहना ? मगर इतने बड़े आदमी, क्या वे इतना वक़्त दे पायेंगे इन्हें ?

मजीद मियां – आपाजान मैं यह कहना चाहता हूं, अगर असगर अली साहब ने मंजूर कर लिया इनको तालीम देना, तो गुलाब खां तीन दिन के अन्दर सीख लेंगे यह सूफ़ी गायकी ! कारण यह है, बाकी तो ज़नाब में सारे हूनर हैं ! बस, केवल इनको उस्ताद का इशारा चाहिए ! आगे, खुदा जाने !

गुलाब खां – आपाजान आपका हर हुक्म तामिल होगा, मैं बदल डालूँगा मेरा पेशा ! अब आप आ जाइए वापस, शादी के मुद्दे पर !

फातमा बी – छोटे नवाब ! मैं आपको ही दोष दूंगी, आप आंखें मूंदकर चल रहे हैं..कहां नज़र आ रही है, आपकी कोशिश ? ये गुलाब खां आपके ख़ास दोस्त हैं, और सलाह मैं आपको दे रही हूं...यह कहां का उसूल ? मियां, देखो अपने दायरे को ! न तो पूछो इस मामू प्यारे से, यह निगोड़ा फिर क्या काम का ?

मजीद मियां – सौ फीसदी सच्च बात कही, आपने ! यह तीसमारखां, भले कब काम आयेगा ? यह तो कौए की तरह गली-गली में मंडराता रहता है, धूल चाटने !
[मामूजान से कहते हैं] कहो कौए मियां, क्या आपको हमारे दोस्त पर रहम आ रहा है या नहीं ? उनके लिए ज़रा अपनी कलाग [काक] नज़र घूमाकर ले आइये, कोई अच्छा रिश्ता ! अब देर मत कीजिये, आपकी कोशिश से मेरे दोस्त का घर बन जाएगा !

मामूजान – [नखरे करते हुए, कहते हैं] – ऊँ हूँ ಽಽ ! नहीं, दूल्हे भाई ! आप मुझे, ऐसा क्यों कह रहे हैं ? मैं तो ठहरा, आपका जासूसी कुत्ता ! बड़ा बदतमीज़ हूं, ना ? मैं वही हूं, जिसने ससुर और दामाद के आपसी सम्बन्ध में ज़हर घोल रखा है ? [रशीद भाई को झंझोड़ते हुए, कहते हैं] क्यों रे, भाणजे ! मैं सच्च कह रहा हूं, या नहीं ? तू तो मेरा पक्का गवाह है, ना ?

रशीद भाई – चच्चाजान, वक़्त का फेर है ! अब मामू को पटाकर, अपना काम निकलवा लीजिये ! आप तो जानते ही हैं, यह मामू बड़ी कुत्ती चीज़ है ज़नाब !

मामूजान – [गुस्सा करते हुए, ज़ोर से कहते हैं] – भाणजे, अब रहने दे ! कमबख्त अब तू भी मुझे गाली देने लगा है ? क्या बोला रे, अभी तू ? [रशीद भाई की नक़ल उतारते हुए, कहते हैं] मैं कुत्ती चीज़ हूं..[वापस अपनी आवाज़ में, कहते हैं] फिर तू क्या है रे, गली का पिल्ला ? कुई कुई बोलने वाला, बदबूदार जानवर !

रशीद भाई – वाह, मामू वाह ! क्या कहा रे, तूने ? मैं कुई कुई चिल्लाने वाला पिल्ला हूं ? फिर बोल रे, मेरे चच्चाजान क्या हैं ? उनका तो मैं, सगा भतीजा हूं ! बोल, बोल..अब चुप क्यों हुआ ?

मजीद मियां – [मस्कागिरी करते हुए, रशीद भाई से कहते हैं] – मेरे नेक साहबज़ादे ! मेरे प्यारे प्यारे भतीजे, इस चच्चा पर मेहरबानी करते हुए चुप हो जा बेटे ! मेरे दोस्त के बनते काम को, बिगाड़ मत ! ख़ामोश हो जा, अभी !

मामूजान – कौनसा काम, दूल्हे भाई ? मैं आख़िर ठहरा, गली-गली में मंडराने वाला काला कौआ ! मुझे तो केवल कांव कांव करना आता है, सुना दूल्हे भाई..? [कौआ कैसे कांव कांव की आवाज़ निकालता है, और कैसे अपने पंख फड़फड़ाता है ? इसकी नक़ल करते हैं]

मजीद मियां – [अपने कान पकड़ते हुए, कहते हैं] – अब माफ़ करना प्यारे मियां, मुझसे ग़लती हो गयी ! अब आगे से ऐसी ग़लती कभी नहीं होगी, बस आप यही समझ लीजिये कि यह कांव कांव करने वाला कला कौआ मैं ही हूं...और, वो भौंकने वाला कुत्ता भी मैं ही हूं ! तुम तो प्यारे, नेक-दिल फरिश्ते हो !
[मजीद मियां के मुंह की कही बात सुनकर, मामूजान का दिल खुश हो जाता है ! फिर गुलाब खां साहब के मसले में कुछ कहने की इजाज़त, फ़ातमा बी से चाहते हैं ! उनसे अर्ज़ करते हुए, वे कहते हैं]

मामूजान – [फातमा बी से, कहते हैं] – आपका हुक्म हो तो, कुछ अर्ज़ करूं ?

फातमा बी – [बनावटी गुस्सा ज़ाहिर करती हुई, कहती है] – अबे ए लंगूर, अब क्या तू मेरी जान लेगा ? कुत्तिया के ताऊ, बक फटा-फट !

[पहले तबले पर थाप देते हैं, फिर मामूजान कहते हैं !]

मामूजान – [तबले पर थाप देकर, कहते हैं] – मैं आली जनाब मजीद मियां का साला ‘प्यारे मियां’ एलान करता हूं कि गुलाब खां साहब को जन्नत-ए-हूर [अंगूठे और तर्जनी के पोर को मिलाकर, ख़ूबसूरत होने का इशारा करते हैं] गज़ब की ख़ूबसूरत, क़यामत ढाहने वाली...

फातमा बी – कुछ आगे तो बक, कमबख्त !

मामूजान – [गुलाब खां साहब की तरफ़ देखते हुए, कहते हैं] – मुमताज़ बेगम, कहिये कैसी रहेगी ? [रशीद भाई के कान में फुसफुसाते हुए, कहते हैं] क्यों रे, भाणजे..ठीक रहेगी ना ?

[रशीद भाई कुछ नहीं कहते है, बस हिचकी पर अंगुली रखते हुए ख़ामोश रहते हैं !]

मामूजान – तूझे कह रहा हूँ, भाणजे ! [वापस उनके कान में फुसफुसाते हुए, कहते हैं] कान में तेल डालकर बैठा मत कर, काम की बात सुना कर ! क्या तू भूल गया, उस प्यारी मुमताज़ को ?

[अब इन दोनों को फुसफुसाकर बातें करते देख, फातमा बी इनको कठोर नज़रों से देखने लगी ! मगर, गुलाब खां साहब का क्या कहना ? वे तो ख़ुश होकर अपने दांत निपोरते हुए चहकते जा रहे हैं !]

गुलाब खां – [चहकते हुए, कहते हैं] – कहो बेटे, आगे कहो बेटा ! और आगे, क्या कहोगे ? अभी कहा आपने, ख़ूबसूरत..और क्या, वह ज़रूर चौदवी के चाँद की तरह ख़ूबसूरत होगी ? बोलो बेटा, आगे बोलो !

रशीद भाई – [अनजान बनते हुए, कहते हैं] – मैं कुछ समझा नहीं, मामू !

मामूजान – बिदाम का हलुआ खाया कर, सब भूल गया मर्दूद ! याद कर, एक मीनार मस्जिद के पास वाली गली !

[रशीद भाई कुछ सोचते हुए नज़र आते हैं, अचानक उन्हें कुछ याद आता है, अब वे पिछली यादें चित्र बनकर उनकी आँखों के आगे छा जाती है ! मंच पर अंधेरा छा जाता है, थोड़ी देर बाद मंच वापस रोशन होता है ! जोधपुर शहर का भीड़भाड़ का इलाक़ा, खांडा फ़लसा का बाज़ार दिखाई देता है ! वहां इन तांगों, और साइकिलों की खरड़-खरड़ आवाज़, और इधर भीड़ से कुचले जा रहे बूढ़े लोगों की चीत्कार सुनायी दे रही है ! इस भीड़ के उतावली करने वाले जवान छोरों ने आगे बढ़ने के लिए इन बूढ़ों को धक्का दिया है, जिससे वे बेचारे बूढ़े, लोगों के बीच दबे हुए करते जा रहे हैं हाका-दड़बड़ कि ‘मरो रे, दूर हटो रे !’ ज़ोर-ज़ोर से बोलते चिल्ला रहे हैं ! इधर नमाज़ का वक़्त हो गया है, आस-पास की गलियों से निकले नमाज़ियों का हजूम एकाएक इस भीड़ में शामिल हो गया, क्योंकि अभी उनको जुम्मे की नमाज़ अता करनी है ! इन सभी नमाज़ियों के क़दम, एक मीनार मस्जिद की तरफ़ बढ़ रहे हैं ! तभी पास वाली गली के नुक्कड़ पर मामूजान नज़र आते हैं, मुंह में पान के गिलोरी को चबाते हुए गली से आती-जाती ख़ूबसूरत मोहतरमाओं को अपनी एक आंख से देखते जा रहे हैं ! इतने में उन्हें, एक बहुत ख़ूबसूरत लड़की दिखाई दे जाती है ! इस ख़ूबसूरत लड़की को देखते ही, बरबस उनके मुख से उसकी तारीफ़ के शब्द फ़िल्मी नगमें के रूप में निकल पड़ते हैं !]

मामूजान – [ख़ूबसूरत लड़की को निहारते हुए, गाते हैं] – ‘चौदवी का चाँद हो,..या आफ़ताब हो, जो भी हो तुम ख़ुदा की कसम..

[आगे मामू क्या बोलते ? ख़ुदा जाने किसी ने पीछे से उनके कंधे पर एक ज़ोरदार धोल जमा दिया है, तब पीछे मुड़कर वे क्या देखते हैं ? सामने खड़े हैं, एक ख़ूबसूरत १८-२० साल के नौजवान आफ़ताब मियां ! उनका गोरा रंग, नीली आंखें और कटीले नक्श उनके चेहरे की ख़ूबसूरती को बढ़ा रहे हैं ! अभी ज़नाब ने, पठानी वेशभूषा पहन रखी है ! अब वे उनके कंधे से अपना हाथ उठाते हुए, व्यंग कसते हुए कहते हैं !]

आफ़ताब – [कंधे से हाथ हटाते हुए, कहते हैं] – ओ मेरे ईद के चाँद, पहले इस आफ़ताब के दीदार कर लीजिएगा [हंसते-हंसते नज़्म गाते हुए, कहते हैं] ‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना...’ वाह, मियां नैनसुख ! कहाँ जा रही है, आपकी निग़ाहें ? मेरे बब्बर शेर, आपकी एक मात्र आंख क्या कमाल दिखला रही है ?

मामूजान – [शर्मसार होते हुए, कहते हैं] – अरे हुज़ूर, आपको ही ढूँढ़ रहा था..अल्ला की कसम ! मगर, आप आगे निकल गए हमसे....आपने पहले ढूँढ़ लिया, मुझे !

आफ़ताब – अमां यार, आज हमारे इस इलाक़े में गुलाब के फूल के कांटे कैसे नज़र आ रहे हैं ? अरे ज़नाब, आप वो गुलाब का फूल कहाँ छोड़ आये..? जिसकी हिफ़ाज़त में आप, जासूसी कुत्ते की तरह तैनात रहा करते हैं !

मामूजान – उसी गुलाब के फूल को ढूँढ़ता इधर आया हूं, अमां यार मुझे निक्कमा मत समझना ! दूल्हे भाई की दी गयी जिम्मेदारी को, मुस्तेदी से निभा रहा हूं !

आफ़ताब – फिल्म लगी है, एक फूल दो माली ! मगर यहां तो तुम यार, दो फूल के एक मात्र माली हो ! अब कहिये किस फूल के पीछे, आपने यहां आने की ज़हमत उठायी ? अरे मेरे यार, अभी-अभी मैंने देखा है उस तुम्हारे एक फूल को ! आपका जो एक फूल है ना, वो ही कायरा रशीद..उसको मुमताज़ के घर में दाख़िल होते देखा है, मैंने !

मामूजान – अब चुप मत रहो, मियां..झट-पट बता दो उस मुमताज़ का घर, आख़िर वो घर है, कहाँ ?

आफ़ताब – [हाथ के इशारे से समझाते हैं, उसका घर किधर है] – ऐसा करो, मियां...नाक की सीध में उस नुक्कड़ वाले मकान की ओर चले जाओ, जिसकी मुंडेर पर कई बंधेज के दुपट्टे सूख रहे हैं ! बस, यही पहचान है, मुमताज के मकान की ! अब कहो, मकान को पहचान लोगे ?

मामूजान – शुक्रिया, आफ़ताब मियां ! क़लाग़ [कौआ] वाला मकान दिखला दिया, मुझे ! ढूँढ़ लूंगा हुज़ूर, ढूँढ़ लूंगा ! जासूसी कुत्ता तो मैं था ही, अब आपने मुझे बना डाला क़लाग़ ! कुछ नहीं प्यारे, क़लाग़ की तरह इस पूरी गली में मंडराता हुआ ढूँढ़ लूंगा..कौआ वाला मकान ! अब, फिर मिलेंगे ! अल्लाह हाफ़िज़ !

[आफ़ताब मियां को वहीं छोड़कर, मामूजान चल देते हैं..उस दिखलाये गए मकान की तरफ़ ! मामू के लिए मकान ढूँढ़ना कोई मुश्किल काम है नहीं, आख़िर वे ठहरे जासूसी कुत्ते..जो सूंघ-सूंघकर अपनी मंजिल तय कर लेता है ! झटपट मुमताज़ के मकान के दरवाज़े के पास पहुंचकर, उस पर अपना कान लगा देते हैं..अन्दर हो रही बातों को सुनने ! अब उन्हें रशीद भाई की आवाज़ के साथ, किसी जनानी की आवाज़ सुनायी देती है..जिसे सुनकर मामू के कान तेज़ हो जाते हैं, उसे सुनने !]

रशीद भाई – मुमुजान ! यह क्या हलत बना रखी है, अपने कोमल बदन की ? हाय कहीं मेरा यह चौदवी का चाँद, इन विपत्ति के बादलों के बीच खो न गया हो ?

मुमताज़ – क्या हो गया, मियां ? इंशाअल्लाह ! सब, ख़त्म हो गया ! अब्बूजान और अम्मीजान के इन्तिकाल के बाद, इस घर की दुर्दशा हो गयी प्यारे ! अब कुछ नहीं रहा, बस इस ज़िंदगी को किसी तरह बसर करना है !

रशीद भाई – दिल-ओ-जान ! हम बैठे हैं ना, आपके ख़िदमतगार ! आपको, मैं अपनी पलकों में बैठाऊंगा ! [फिल्म ‘वीर दुर्गा दास’ का गीत गाते हुए, कहते हैं] ‘थानै काज़लियो बणा दूं, थानै नैणा में बसा दूं...’ फिर आपको किस बात की फ़िक्र, मेरी मुमु...मेरी चौदवी का चाँद ?

मुमताज़ – [सिसकती आवाज़ में] – प्यारे ! तुम्हारे प्यार के ये दो मीठे बोल, मैंने क्या सुन लिए..? बस इन शब्दों से मझे हिम्मत मिल गयी है, जीने की ! अब तो लख्ते ज़िगर, आपका ही आसरा है !

[अब इतना वार्तालाप सुनकर, मामूजान को ऐसा लगता है...मानो रशीद भाई किसी हसीन नवयुवती को पटाने के लिए, उससे प्रेम भरी बातें कर रहे हैं ! अचानक उनको सिसकारी की आवाज़ सुनायी देती है ! उन्हें ऐसा लगता है, मानो वे उस नवयुवती को आगोश में ले रहे हैं ? यह वहम होते ही, मामू के कान बजने लगे..अब उनको महशूश होता है कि, मुमताज़ शर्म के मारे प्यार भरी आवाज़ में कुछ कह रही है ? वह आवाज़ किसी सुन्दरी की लगती है, जो किसी मर्द के आगोश में आ जाने के बाद वह उसके बाहुपोश से निकलने के प्रयास करती हुई मीठी सिसकारी की आवाज़ निकालती हुई....प्यार भरे मीठे बोल, निकाल रही है ?]

मुमताज़ – [शर्म के मारे, धीरे-धीरे कह रही है] – अहा... ! प्यारे..धीरे धीरे, दर्द हो रहा है !

रशीद भाई – मेरे सीने से लगना, कैसा लगा मुमु जान ? अब शर्म करना छोड़ो, फिर यहां है कौन ? बस, अब आप अपने दिल की चाहत को लबों पर आने दो !

मुमताज़ – [शर्म करती हुई, कहती है] – मुझे बहुत शर्म आ रही है, मगर आप ठहरे मेरे हमदर्द..अब आपसे क्या छुपाऊं, मेरी दास्तान ? ये..ये गली के लौंडे मुझको जैसे ही देखते हैं, कमबख्त सीटी बजानी शुरू कर देते हैं ! क्या कहूं, आपसे ? अब तो मेरा इस गली से गुज़रना, मुश्किल हो गया है !

[रशीद भाई उसकी बात सुनकर, हंसी का किल्लोर छोड़ देते हैं !]

मुमताज़ – एक तो मियां, ये निगोड़े छोरे मुझे छेड़ा करते हैं...इससे, मैं परेशान हूं ! और आप इधर, मुंह फाड़कर हंसते जा रहे हैं ? आपको क्या पता, जब-कभी दुपट्टे बेचने के लिए मुझे बाहर निकलना होता है..तब इन निगोड़े छोरों को छोड़ो, ये निगोड़ी हसीन छोरियें दुप्पटे ख़रीदते वक़्त मेरे रुखसारों पर चिकोटी काटकर इन कोमल गालों को चूम लेती है !

रशीद भाई – और क्या ? इस तरह, शर्माना अच्छा नहीं ! मुमताज़ मेरी जान, मैं कोई ग़ैर नहीं हूं ! अब आगे कहो, और क्या-क्या हरक़तें करते हैं ये निगोड़े आपके साथ ?

मुमताज़ – मुंडेर और पनवाड़ी की दुकान पर खड़े जवान छोरे, फब्तियां कसते हैं मुझे देखकर ! हाय अल्लाह, इनको क्या कहूं ? ये मुर्दे इस तरह गाते हुए जुमले अलग से कसते हैं [गीत गाती हुई, आगे कहती है] ‘चौदवी का चाँद हो, या आफ़ताब हो...’

[अब मामूजान को, रशीद भाई के ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाने की आवाज़ सुनायी देती है !]

मुमताज़ – खिल्ली न उड़ाओ, प्यारे ! आख़िर आप..आप मेरे क्या हो..?

रशीद भाई – [हंसते हुए, कहते हैं] – नाराज़ मत हो, मेरी प्यारी मुमु जान ! आप झटपट आ जाइए, मेरे आगोश में..आपके दिल को, ठंडक मिल जायेगी ! [आगोश में आ जाने से, सिसकारी की आवाज़ सुनायी देती है] अब मेरी इच्छा नहीं है, आपको छोड़ने की ! कैसे छोड़ दूं, आपको ?

[मीठी-मीठी सिसकियों से भरी आवाज़ सुनायी देती है, ऐसा लगता है मानो वह मेहरारू रशीद भाई के बाहुपोश में चली आयी है !अब मामू को ऐसा लगता है, मानो रशीद भाई उस हसीना को अपने आगोश में लेकर, प्यार करते जा रहे हैं ! थोड़ी देर बाद, रशीद भाई की आवाज़ सुनायी देती हैं !]

रशीद भाई – [उसे आगोश में लिए, कहते हैं] – अब इस आगोश से आपको मुक्त करने का मेरा जी नहीं करता ! यही रहो मेरी मुमु..बस अब जन्नत का आनंद उठाओ, मेरी जान ! [फिल्म बाबोसा री लाडली का गीत गाते हैं] ‘हिवड़े सूं दूर मत जाय, लग जाय तावड़ियो...’

[बाहर खड़े मामूजान को ऐसा लगता है, कहीं रशीद भाई अपने आगोश में मुमताज़ को लेकर बाहों के ज़ाल को कसते जा रहे हैं ! अब मामू के लिए, बर्दाश्त करने की सारी हदें टूट जाती है ! गुस्से से उफ़नते हुए, मामूजान बिना कूठा लगे किवाड़ों को धड़ाम से धक्का देकर खोल देते हैं ! और भनभनाते हुए, दहलीज़ पार करके घर में दाख़िल हो जाते हैं..!]

मामूजान – [गुस्से से उबलते हुए, कहते हैं] – ओ बेशर्म भाणजे ! कमबख्त काला मुंह कर रहा है, इस छोरी के साथ ?

[जोश में आकर मामूजान, उनको पीटने के लिए आगे बढ़ते हैं ! तभी बीच में उनके बचाव में मुमताज़ का खड़ा हो जाना..उनके लिए, अब बाधा बन गयी है ! फिर क्या ? झट उसे धकेल कर, कहते हैं !]

मामूजान – [गुस्से से मुमताज़ को, हाथ से धक्का देकर उसे दूर हटाते हुए कहते हैं] – बेहया छोरी ! हट मेरे सामने से, अब मेरे बीच में आयी तो....

रशीद भाई - [आगे बढ़कर मामूजान की बांह थामते हुए, कहते हैं] – मामू प्यारे, खा गया चक्कर ? [ठहाके लगाकर, ज़ोर से हंसते हैं] काठ के उल्लू, तेरी आंखें है या आलू ? क़ब्रिस्तान के मुर्दे, देख इसे ग़ौर से ! यह छोरा है या छोरी ?

[मामूजान उसे सर से लेकर पांव तक, नज़र गढ़ाकर देखते हैं, उधर रशीद भाई का चुप रहने का कोई सवाल नहीं ! वे तो, बेलगाम बोलते ही जा रहे हैं]

रशीद भाई – क्या देख रहा है, मूर्ख ? यह लड़का है, लड़की नहीं ! मुझ पर तूझे वसूक नहीं था, साले ऐसे देख रहा है अब ..मानो सामने खड़ी हो, कोई हूर की परी ? [हंसते हैं]

[मामूजान की आंखें फटी की फटी रह जाती है, वे क्या देखते हैं ? उनके सामने गोरा-चिट्टा १६-१७ साल का लड़का...? जिसके काले-काले बाल और उसकी जुल्फें काले बादलों की तरह चेहरे के आगे छायी हुई..उसकी ख़ूबसूरती पर चार चाँद लगा रही है ! उसकी आंखें तो, वाकयी हिरनी की आँखों को मात दे रही है ! उन शरबती आँखों को देखकर ऐसा लगता है, मानो उन आँखों में दारु के जाम छलक रहे हो ? बदन पर, गुलाबी चूड़ीदार पायजामा और कुर्ता उस मुताज़ ने क्या पहने हैं ? इनको कपड़ो को देखकर मामू, आश्चर्य चकित है ! वे बेचारे कब से कुरते-पायजामे को, किसी सुन्दर लड़की की सलवार-कुर्ती ही समझ रहे थे ! पान की गिलोरी चबाते वक़्त, उस मुताज़ के रस भरे पतले-पतले लाल-सुर्ख होंठों का क्या कहना ? लबों पर मुस्कान फैलाते वक़्त, उसके सुन्दर दांत अनार की फांक के समान दिखाई दे रहे हैं ! उन दांतों की ऐसी चमक है, मानो अन्धेरी रात में किसी मणिधर नाग की मणि चमक रही हो ? अब मामूजान का दिल किसी अवस्था में, यह मुमताज़ को लड़का नहीं मान रहा है..वे तो इसे, लड़की ही मानने को विवश हो जाते हैं ! बस, वे उसकी मोहिनी सूरत पर मुग्ध होकर बेहया की तरह उसे अपलक देखते जा रहे हैं ! अब मामूजान को, बेहया क्या कहें ? वे ज़नाब तो, उस मुमताज़ की ख़ूबसूरती पर बावले हो गए हैं ! बस वे अब ऐसे आमदा हो गए हैं, झट उस ख़ूबसूरत मुमताज़ को आगोश में ले लें ! मगर जैसे ही वे उसे बाहुपोश में लेने के लिए आगे बढ़ते हैं, वो कमबख्त मुमताज़ झट वह स्थान छोड़कर रशीद भाई के पीछे आकर खड़ा हो जाता है ! और बेचारे मामूजान आगे रखी पीतल की बड़ी छाब में आकर गिर पड़ते हैं, फिर क्या ? दुपट्टो को रंगने का रंग, जो उस छाब में रखा है...उसमें गिरते ही मामूजान का सफ़ेद चोला-पायजामा, छाब में पड़े रंग से रंगीन हो जाता हैं ! यह मंज़र देख रहे मुमताज़ के गुलाब की पंखुडियां जैसे मद भरे होंठों पर, मधुर-मधुर मुस्कान फ़ैल जाती है ! फिर मुमताज़ आगे बढ़कर, मामू को हाथ का सहारा देकर छाब से उठाता है ! फिर प्यार भरी मुस्कान अपने लबों पर छोड़कर, मृग़नयनी नारी की तरह शहद जैसे मीठे बोल बोलता हुआ वह कहता है !]

मुमताज़ – [लबों पर जानलेवा मुस्कान, बिखेरता हुआ मधुर आवाज़ में कहता है] – कहीं लगी तो नहीं, मामू प्यारे ?

[मगर, मामूजान क्या बोल पाते ? वे तो बावले बने हुए, मुमताज़ की नारी सुन्दरता को अपलक देखते जा रहे हैं ! वे अपने नयनों की प्यास मिटाते-मिटाते, सारी सुध-बुध खो देते हैं ! इस दशा में उनको यह भी भान नहीं कि, छाब में गिर जाने से उनके कपड़ो पर रंग लग गया है ! इनकी ऐसी दशा देखकर, रशीद भाई उनसे कहते हैं..]

रशीद भाई – क्या हुआ, मामू ? घायल हो गया क्या, इसके बांके कजरारे नयनों से ?

मामूजान – [अचेतनत अवस्था में, कहते हैं] – सुभानअल्लाह ! वाकयी मुमताज़ तो कोहिनूर है !

रशीद भाई – ऐसे बोल, यार ! वाकयी ख़ूबसूरत बला है, इसकी ख़ूबसूरती के आगे जोधपुर की हसीनाएं पानी भरती है !

[इधर रशीद भाई ऊंघ में पड़े-पड़े, इस वाकये को याद करते बड़बड़ाते जा रहे हैं...और इस जुमले को वे कई बार बड़बड़ाते हुए दिखाई देते हैं ! अचानक उनको ऐसा लगता हा, कोई उनका कन्धा झंझोड़ते हुए उनको कोई मुअज्ज़म उठा रहे हैं ! और, वे उनसे कुछ कह रहे हैं ! घबराकर, वे अपनी आंखें मसलते हुए खोलते हैं ! आखें खोलते ही, उनको सामने गुलाब खां साहब नज़र आते हैं ! जो उनका कंधा झंझोड़ते हुए, कुछ कहते नज़र आ रहे हैं !]

गुलाब खां – [कंधा झंझोड़ते हुए, कहते हैं] – ख़ूबसूरत बला क्या ? वह तो हूर की परी होगी, जो तुम्हारी चाची बनने वाली है ! बस, तुम लोग जाकर रिश्ता लेकर ले आ जाओ !

[अब मामूजान और रशीद भाई उनका भोला मुंह देखते हुए, अपने लबों पर मुस्कान छोड़ देते हैं ! फिर ख़ुदा जाने, वे दोनों साज़ पर विदाई की तान छोड़ देते हैं ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है !]

[४]

[मंच पर रोशनी फ़ैल जाती है, अब हवेली के चौक का मंज़र नज़र आता है ! मजीद मियां, फातमा बी और गुलाब खां साहब कुर्सियों पर बैठे हैं ! उधर मनसद पर बैठे मामूजान और रशीद भाई ग़म से भरी विदाई की तान साज़ पर छोड़ रहे हैं ! इतने में मामूजान उस तां पर बेसुरी आवाज़ में नज़्म गाने लगते हैं !]

मामूजान – [हाथ छाती पर रखते हुए, गा रहे हैं] – अब दिल ही टूट गया, अब जीकर क्या करेंगे..

फातमा बी – साहबज़ादे ! यह ख़ुशी का वक़्त है, यह ग़मज़दा नज़्म क्यों गा रहे हो ? बता, किसका दिल टूट गया ?

गुलाब खां – आपाजान, अब दिल जोड़ने का वक़्त आ गया है ! [मामूजान से कहते हैं] प्यारे मियां, अब यह ग़मज़दा नज़्म गाना बंद कीजिये ! अब आप दोनों मिलकर, मेरे दिल को दुल्हन के दिल से मिलाने का प्रयास करो ! कल सगाई हो जाए, और परसों हो जाए शादी ! इसी कोशिश पर डटे रहो, साहबज़ादे !

मजीद मियां – इतनी उतावली किस काम की, मेरे दोस्त ? इतने साल सब्र किया, अब थोड़ा और इंतज़ार कर लीजिये..सब्र का फल, मीठा होता है !

गुलाब खां – [ख़ुश होते हुए, कहते हैं] – घोड़ी पर...अब तो मियां, हम घोड़ी पर चढ़ेंगे ! बस बाद में निकाल लेना मेरा ज़नाज़ा ! मेरे दोस्त, मेरे हमदर्द अब आपको, केवल दो दफे ही पैदल चलना होगा !

मजीद मियां – [चौंकते हुए, कहते हैं] - क्या कह रहे हो, मेरे दोस्त ? होश में तो हो ?

गुलाब खां – [गंभीरता से, कहते हैं] – मुक्तताजाए उम्र में, दो ख़्वाब बाकी रहे हैं [कलाम पेश करते हैं] ’गुस्ताख़ी होगी हमसे सिर्फ दो बार, जब सब चलेंगे पैदल कभी हम घोड़ी पर कभी कंधों पर ! वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो, उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा !”

[इधर गुलाब खां साहब ने कलाम पेश किया, और उधर न जाने कहां से तेज़ हवा का झोंका आता है..जिससे, गलियारे की सभी खिड़कियाँ खुल जाती है ! अब खिड़की में रखा फातमा बी का दुपट्टा उड़कर पायदान के पास उड़कर चला आता है, और वहां रखी जूत्तियों को ढक देता है ! यह झोंका, क्या आया..? इसके कारण, वहां क़ब्रिस्तान जैसी शान्ति छा जाती है ! आख़िर मजीद मियां इस नीरवता को तोड़ते हुए, कहते हैं...]

मजीद मियां – घोड़ी पर आप ज़रूर चढ़ना, ज़नाब ! मगर हमारे कंधों पर सवार मत होना ! [दोनों हाथ ऊपर ले जाते हुए, अल्लाह से अर्ज़ करते हैं] ए मेरे परवरदीगार, ऐसा दिन कभी न दिखलाना..मुझे नहीं जाना, इनके जनाज़े में शरीक होने !

[मजीद मियां ग़मगीन हो जाते हैं, अपनी नम आँखों से छलक रहे आंसूओं को पोंछ डालते हैं ! अब वे ग़मज़दा आवाज़ में कहते है !]

मजीद मियां – [ग़मज़दा आवाज़ में, कहते हैं] – आपकी ऐसी बातें सुनकर, अब मेरा दिल यहां रुकने का नहीं हो रहा है ! मैं भूल गया, मैंने अपनी जूत्तियां कहां रख दी ? शायद मैं पाख़ाना गया हूंगा, तब पायदान के पास खोल दी होगी ! अब मुझे, रूख्सत होना पडेगा ! [बैसाखी का सहारा लेकर, वे उठते हैं !]

गुलाब खां – पायदान के पास ही रखी है, आपकी जूत्तियां ! आप बैठिये, अभी लेकर आता हूं मैं...आपकी जूत्तियां ! मेरे दोस्त, अब आप मेरे सर पर सेहरा बंधवाने की तैयारी कीजिये !

[गुलाब खा साहब उठते हैं, और जाते हैं पायदान के पास ! वहां रखी मजीद मियां की जूत्तियों को वे दुपट्टे सहित उठा लाते हैं ! अचानक फातमा बी की बुलंद नज़र जूत्तियों को ढके अपने दुपट्टे पर गिरती है, अपने दुपट्टे की यह दुर्दशा देखकर वह आग बबूला हो जाती है ! फिर क्या ? क्रोध के मारे वह, गुलाब खां और मजीद मियां को छठी का दूध पिलाने की कमर कस लेती है ! फिर क्या ? उन दोनों की पिटाई करने के लिए, शेरनी की तरह उन दोनों पर लपकती है ! फातमा बी को बहुत लग रहा है कि, ‘आज ये दोनों करमठोक, क्यों उसके दुपट्टे के पीछे खा-पीकर लग गए हैं ? कोई तो उससे अपना मुंह ढांप लेता है, तो कोई उसको ओढ़कर नाचने का शौक पूरा करता है...बाकी रही कसर, अब यह मर्दूद जूत्तियों को साफ़ करने के लिए, इस दुपट्टे को इस्तेमाल कर रहा है ?’ मगर गुलाब खां साहब ठहरे दुबले-पतले फुर्तीले बदन वाले, वे ‘ताक थई था’ करते-करते भग जाते हैं दरवाज़े की तरफ़ ! दरवाज़े के पास रखी अपनी जूत्तियां उठाकर, मियां बाहर दौड़ जाते हैं ! मगर मजीद मियां ठहरे खोड़े आदमी उनसे इस तरह फुर्ती से भगा नहीं जाता, बेचारे जूत्तियां पांवों में पहनकर अपनी बैसाखी संभालते हैं..तब-तक फातमा बी आकर, दो-चार धोल उनकी कमर पर जमा देती है ! किसी तरह बेचारे मजीद मियां ले ख़ुदा करीम का नाम लेकर, उठाते हैं ! किसी तरह आपा जान के हाथों से बचकर, वे बाहर का रास्ता देखते हैं ! मगर फातमा बी ठहरी, गुस्से की खारी ! वो कसी तरह, दरवाज़े के पीछे रखा डंडा ढूँढ़ लेती है ! फिर क्या ? हाथ में डंडा उठाये फातमा बी, पूतना राक्षसनी की तरह उन दोनों के पीछे लपकती है ! ऐसा मंज़र, कभी-कभी देखने को मिलता है ! अब मामूजान, इसका लुत्फ़ उठाने ने में पीछे क्यों रहे ? वे झट खिड़की से अपनी मुंडी बाहर निकालकर, बाहर खड़े कुत्तों को उन मुज्ज़मों पर भौंकने के लिए उकसाते हैं !]

मामूजान – भूस...भूस ! कालिया भूस..भूरिया भूस प्यारे ! छू..हुड़ छू.. ! [उन मुज्ज़मों के पीछे भौंकने का, अंगुली से इशारे करते हैं]

[इशारा पाते ही, कुत्तों के झुण्ड का क्या कहना ? वे अपने बिरादर जासूसी कुत्ते प्यारे मियां का कहना, क्यों नहीं मानेंगे ? फिर क्या ? उन दोनों मुज्ज़मों के पीछे डंडा लिए दौड़ रही फातमा बी के पीछे, दौड़ते हैं और साथ में भौंकते भी जाते हैं ! अब बेचारी फातमा बी का क्या हाल क्या होगा, उन भौंकते कुत्तो ने ? यह तो अब, अल्लाह पाक ही जाने ! मगर मामूजान को मज़ा आ गया, और वे ठहाके लगाकर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे !]

मामूजान – [कुतों के भौंकने की, नक़ल करते हैं] – भौंಽಽभौंಽಽ..हुड़..हुड़ !

रशीद भाई – [मामूजान की हरक़त से, परेशान होकर कहते हैं] – बहुत भौंक लिया, मामू ! अब इंसान बन जा, और दांत निपोरना बंद कर दे ! चुपचाप बैठ जा, यहां आकर !

मामूजान – मैं निक्कमा नहीं हूं, भाणजे जो तेरे पास बैठकर करूं बकवास ? मेरे पास बहुत काम है, अब मैं चलता हूं !

[रशीद भाई उठते हैं, और मामू को पकड़कर लाते हाँ ! फिर उन्हें मनसद पर बैठाकर, शान्ति से कहते हैं !]

रशीद भाई – मामू अब तू यहां चुपचाप बैठ जा, इस तरह जाने की उतावली मत कर ! अभी-तक जिक्र करना बहुत बाकी है ! तूने कह तो दिया, इस बूढ़े के साथ मुमताज़ का निकाह हो जाएगा ! मगर मैं कह रहा हूं उस्ताद कि, तू एक बूढ़े के साथ एक लडके की शादी कैसे कराएगा ? यह ऐसे, हो कैसे सकता है ?

मामूजान - [हंसते हुए, कहते हैं] – अरे यार भाणजे, क्यों फ़िक्र करता है ? दूल्हा बूढ़ा है, तभी तो अपना काम बन रहा है प्यारे ! देख मर्दूद, इस बूढ़े में अब कहां रही जवानी ? इसके सारे औजार बेकार हो गए हैं, यह अब कुछ नहीं कर सकता ! इस तरह, अब इस अपने मुमताज़ की इज़्ज़त सलामत रह जायेगी ! इसके आगे, तू कुछ जानता है या नहीं ? अन्दर की रिपोर्ट है, मुमताज़ ठहरा जनखा..इज़्ज़त बनी रहेगी, कुछ गलत नहीं होगा !

रशीद भाई – मगर, यह अब होगा कैसे ? यह चिकना लौंडा रजामंद है, या नहीं ?

मामूजान – तू तो डोफ़ा रहा, भाणजे ! इस मामू उस्ताद के साथ रहने के बाद भी, तू इतना नहीं समझता..कि, यह मर्दूद मुमताज़ तो है बहुत ग़रीब ! दो जून की रोटी यह जुटा नहीं सकता, और इस साले में भरे पड़े हैं छोरियों के लक्खन ! इससे बेहतर जीवन बसर करने का अवसर इसे कब मिलेगा, इस बूढ़े के मरने के बाद यह अटूट दौलत किसको मिलने वाली ? तूझे, याद है ? यह लंगूर गया था, कमला बाई की हवेली..किन्नर बनने ! और, अब यह..

रशीद भाई - [मामू की बात को पूरी करते हुए, कहते हैं] – गुलाब खां साहब के हवेली में, यह करेगा ऐश ! अब यह सौदा, इसके लिए फ़ायदे का ही लगता है ! अब मुझे सारी बात समझ में आ गयी कि, यह बूढ़ा आख़िर जियेगा कितने साल ? केवल दो या चार साल,और क्या ? इससे ज्यादा नहीं ! मगर मामू, इस दुल्हन के वालिद और घराती लाओगे कहाँ से ? इस सम्बन्ध में, अगली बात कर मामू !

मामूजान – देख भाणजे, इस मामू उस्ताद को तू समझता क्या है ? बोल एक बार, तिकड़मी नंबर एक ! और तूझे पता है, सबको मैं कैसे देखता हूं ? बोल, बोल !

रशीद भाई – एक नज़र से, यानि देखता है तू एक आंख से ! [धीरे से कहते हैं] आख़िर है तो साला, कौआ काणा ! फिर देखेगा ही, एक आंख से !

मामूजान – क्या कहा, कायरे ? ज्यादा होशियार बनने की कोशिश मत कर ! तू जिस स्कूल में पढ़ा है, उस स्कूल का मैं हेड मास्टर मैं रह चुका हूं ! भाणजे, कुछ समझा या नहीं ?

रशीद भाई – [धीमी आवाज़ में, कहते हैं] – साले, उल्लू के पट्ठे ! गोबर गणेश, अनपढ़ गंवार ज़ाहिल ! [ज़ोर से कहते हुए] मामू ! मैं कह रहा था, आगे क्या...?
मामूजान – देख भाणजे ! ध्यान से, सुनना ! क्या तू चाहता है, या नहीं..शादी में रशीदा जान आये ? नहीं बुलाया उसे, तो शादी में सारी मस्ती फीकी रह जायेगी ! जानता नहीं, उसके मुज़रे से रौनक छा जाती है !

रशीद भाई – हां क्यों नहीं, ज़रूर ज़रूर आनी चाहिए वो ख़ूबसूरत रशीदा जान !

मामूजान – अब, तू आगे सुन ! मुमताज़ की बूढ़ी मज़लूम फूफीजान, क़ब्रिस्तान के पास वाली मामू-भाणजे की दरगाह में वह अपनी ज़िंदगी के शेष दिन गुज़ार रही है ! उसके....

रशीद भाई – [बात काटते हुए, कहते हैं] – यह क्या कह रहा है, मामू ? क्या अपुन दोनों मर गए, क्या ? अपुन दोनों की याद में, इन मुरीदों ने पहले दरगाह कैसे बना डाली ? दरगाह तो, मरने के बाद बनती है रे !

मामूजान – [झुंझलाते हुए, कहते हैं] – ए सड़े हुए आलू-प्याज ! वे मामू-भाणजे तीन सौ साल पहले हो गए थे शहीद, वो मामू-भाणजे की जोड़ी अमर हो गयी, उनकी याद में यह दरगाह बनी है ! अब समझा या नहीं ? अब तू ज्यादा सवाल करके मेरा भेजा मत खा, और ला इधर तेरा कान !

[अब मामूजान सारा प्लान, रशीद भाई के कान में कहकर उन्हें समझा देते हैं !]

रशीद भाई – [पूरा प्लान समझने के बाद, कहते हैं] – कमाल है, यार ! वाकयी, करिश्मा हो गया रे ! अब तो चच्चाजान की सम्पादक वाली बात सौ आना फीट बैठ गयी है ! [हंसते हैं, ज़ोर-ज़ोर से]

मामूजान – [दरवाज़े की तरफ़ देखते हुए, कहते हैं] – अरे मर्दूद चुप हो जा, तेरी नानी आ रही है...संभल जा !

[दरवाज़े की तरफ़ देखकर, रशीद भाई कहते हैं]

रशीद भाई – नानी नहीं रे, यह तो आफ़त की पुड़िया है !

[फातमा बी हाथ में डंडा लिए, आती दिखाई देती है ! डंडे को दरवाज़े के पीछे रखकर, पायदान के पास अपने चप्पल खोलकर रख देती है ! फिर, चौक की तरफ़ अपने क़दम बढ़ाती है ! वहां आंगन में पड़े सलवटे खाये दुपट्टे को उठाकर, चारों तरफ़ अपनी नज़र दौडाती है ! फातमा बी की मात्र उपस्थिति से ही, शान्ति छा जाती है ! इंसान क्या ? यहां तो बेचारे परिंदे भी उनके खौफ़ से, पंख फड़फड़ाना भूल गए हैं ! अब इन दोनों को भी भय सताने लगा, कहीं यह शैतान की ख़ाला उन पर कहर न ढाह दे ? आख़िर, फातमा बी ख़ामोशी तोड़ती हुई कहती है !]

फातमा बी – [दोनों से, कहती है] – अरे, ओ शैतानी दिमाग़ रखने वालों ! मर्दूदों, अब चुप कैसे चुप बैठ गए ? कहीं तुम दोनों, कोई नया शैतानी कारनामे को अंजाम देने वाले तो नहीं ?

रशीद भाई – जी नहीं, हम दोनों भोले-भाले अल्लाह के बन्दे हैं ! आप हमें ,अल्लाह मियां की गाय भी कह सकते हैं !

फातमा बी – [व्यंग में, कहती है] – रशीद मियां, आप हैं ख़ुदा के बन्दे और यह निगोड़ा प्यारे मियां है अल्लाह मियां की गाय ! तब फिर बाकी कौन रही, मैं ! अब मैं हूं शैतान की ख़ाला..और, क्या ? यही मफ़हूम है ना, तुम दोनों का ?

रशीद भाई – हुज़ूर, हम दोनों ऐसा क्यों कहेगे अपने मुअज्ज़म को..कि, आप हैं शैतान की ख़ाला ? यह बात तो आप ख़ुद अपनी तारीफ़ में कह रही हैं, इस मसले में हम क्या बोलें ? जब आपने ख़ुद ‘शैतान की खाला’ बनाना मंजूर कर लिया, हुज़ूर इसमें हम दोनों क कोई ग़लती नहीं..क्योंकि, हम दोनों हैं अल्लाह मियां के भोले-भाले बन्दे और आप हैं मेरी फूफ़ीजान ! इसके अलावा, हम क्या कह सकते हैं ?

[फातमा बी कुछ नहीं कहती, बस वह इन दोनों शैतानों को खारी नज़रों से देखती जाती है ! और वह अपने दिल में यही सोच रही होगी कि, ‘शायद , ये कमबख्त मेरी जूत्तियां तो नहीं घिस रहे हैं ?’]

मामूजान – क्या आप इस भाणजे की, फूफीजान नहीं हैं ? [रशीद भाई से, कहते हैं] तब ठीक है, भाणजे ! कल से तू इनको, फूफ़ीजान कहकर मत बुलाना ! जो नाम इनको पसंद है, उसी नाम से इनको बतलाना ! जैसी, इनकी मर्ज़ी ! अगर ये ख़ुद को ‘शैतान की ख़ाला कहलानी चाहे, तो तुम वही कह दो इनको..इसमें उज्र किस बात का ? इनकी इच्छा को, पूरी होने दें !

[मुंह चढ़ाकर, फातमा बी दुपट्टे को लिए रूख्सत हो जाती है ! झट जीने की सीढ़ियां चढ़कर अपने मकान की मुंडेर पर चली जाती है !]

रशीद भाई – ऐसे क्यों बोला, मामू ? तूने फूफ़ीजान को नाराज़ कर डाला !

मामूजान – डफ़र का डफ़र ही बना रहेगा, भाणजा तू तो ! आख़िर, तूझे क्या कहूं ? सड़ा हुआ आलू, या प्याज ? बोल, क्या कहूं ? या कहूं, सड़ा हुआ गोबर ? अपने दिमाग़ को रखकर आ गया, हसीना के पास..और, यहां बैठ गया मुझसे सलाह लेने ?

रशीद भाई – देख मामू, हसीना को बीच में मत ला ! नहीं तो तूझे, छठी का दूध पिला दूंगा ! तू मुझे, डफ़र मत समझ ! आ गया साला यहां, गोबर करने ?

[मामूजान मुंडेर की तरफ़ देखते हैं, और तसल्ली कर लेते हैं ‘कहीं वो शैतान की ख़ाला उनकी बातें सुन नहीं रही हो ?’ तसल्ली हो जाने के बाद, अब मामूजान निसंकोच होकर कहते हैं..]

मामूजान – ले अच्छा हुआ, भाणजे ! वह शैतान की ख़ाला तो हुई रवाना ! अब अपुन की बातें लीक होने का, कोई सवाल नहीं ! आराम से बैठकर, कर लेते हैं गुफ़्तगू ! ला इधर, तेरा कान..ख़ुदा जाने कभी-कभी दीवारों के भी कान हो जाया करते हैं ! [धीमी आवाज़ में, कहते हैं] अब समझा, कुछ ? ओ सड़े आलू-प्याज ! कुछ समझ में आया ? अब-तक मैं, तुम्हारी फूफ़ीजान का ध्यान हटा रहा था ! इस कारण मुझको देनी पड़ी उनको, फुटास की गोली ! नहीं तो, दोनों की खैर नहीं !
रशीद भाई – अब पूरी हो गयी, तेरी दिल-ए-तमन्ना ? अब बता, हमें क्या करना है ?

मामूजान – अब लगा तू, अपने दिमाग़ पर ज़ोर ! [धीमी आवाज़ में] जो तेरे पास है नहीं !

रशीद भाई – क्या बक रहा है, मामू ? ज़ोर से बोल, तेरे अन्दर हिम्मत हो तो ?

मामूजान - कह रहा हूं, यार ! रशीदा जान की फूफ़ी, आला नंबर की अभिनेत्री है ! वह अब बन जायेगी, मुमताज़ की अम्मीजान ! अपने आफ़ताब मियां के दोस्त और उनकी आपाजान की सहेलियां बन जायेगी घराती ! अब बोल, कौनसा रोल बाकी रहा ?

रशीद भाई – क्या, ऐसा हो सकता है ?

मामूजान – काठ के उल्लू ! यहां कौन जानता है, आफ़ताब मियां को ? और उस डोकरी को पहचानने का कोई सवाल ही नहीं, फिर आफ़ताब मियां और उनके दोस्त...और ये आपा, और उनकी सहेलियां सभी मंजे हुए रंगमंच के कलाकार हैं ! अब बोल, तेरे भेजे में कोई बात घुसी या नहीं ?

रशीद भाई – बाकी रहे क़ाज़ी, मुल्ला-मौलवी और बराती..इन सबका इंतज़ाम, मजीद मियां ख़ुद देख लेंगे ! अब चलते हैं, यार ! काम बहुत है, वक़्त है कम !
[दोनों उठकर जाते हैं, मंच पर अंधेरा छा जाता है !]

[५]

[मंच पर रोशनी फैल जाती है ! कुरेशियों के मोहल्ले का मंज़र सामने आता है ! मोहल्ले के चौक में मोहल्ले के बच्चे गिल्ली-डंडा खेल रहे हैं ! आँगन में मुर्गियां दाना चुग रही है ! कहीं-कहीं बकरियों के झुण्ड के पास खड़े बकरे ,एक-दूसरे पर सींगों का प्रहार करते अपनी मर्दानगी से मादा बकरियों को प्रभावित कर रहे हैं ! कहीं दो-चार खड़े बुजुर्ग, देश की सियासत पर तक़रीर पेश कर रहे हैं ! मगर मामू की चाण्डाल चौकड़ी इन सब से दूर, एक बरगद के नीचे चबूतरे पर बैठकर ताश के पत्ते खेल रही है ! इतने में दिखाई देते हैं, आफ़ताब मियां ! जो, बरगद की तरफ़ अपने क़दम बढ़ा रहे हैं ! इस चौकड़ी के सदस्य मामूजान, रशीद भाई, जबरू उस्ताद और शफ़ी मोहम्मद, उनको आते देख रहे हैं !

आफ़ताब – [नज़दीक आकर, कहते हैं] – आदाब !

शफ़ी मोहम्मद – [ऊंचा मुंह करके, कहता है] – सुभानअल्लाह ! दुल्हन के भाईजान तशरीफ़ लाये हैं ! मुबारक हो, मुबारक हो !

मामूजान – अरे, ए पतझड़ के सूखे पत्ते ! शफ़िया, सोच थोड़ा..शादी हुए, बीत गए दस रोज़ ! तू कब-तक, इन्हें मुबारकबाद देता रहेगा ? डोफ़ा, अब जा ! आफ़ताब साहब के लिए मीठे पान की गिलोरी और अपुन सब के लिए चाय-वाय लेता आ !

शफ़ी मोहम्मद – हुज़ूर ! पहले पैसे दीजिये ! नहीं तो मालिक बाद में आप कहेंगे, मैंने कब मंगवाए ?

मामूजान – भंगार के खुरपे, तूझे दिखाई देता नहीं ? मेहमान के सामने पैसे मांगकर, करमठोक मेरी साख धूल में मिला रहा है ? कह देना पनवाड़ी और उस चाय वाले को, भाणजे के खाते में ओळी मांड दें ! [रशीद भाई से कहते हुए] क्यों रे, भाणजे ? ठीक है, बाद में हिसाब कर लेंगे ! यह साला शफ़िया लंगूर, मेहमान के सामने अपुन की साख को धूल में मिला रहा है ?

आफ़ताब – जाने दो, मामू प्यारे ! यह बेचारा, नादान बच्चा है ! और, हम कौनसे ग़ैर हैं ?

मामूजान – [अपने पहलू का स्थान, हथेली से साफ़ करके कहते हैं] – आइये ज़नाब, अपुन के पास ही बैठ जाइए ! [शफ़ी मोहम्मद से, कहते हैं] अरे, ए फूटे हुए तरबूज ! अभी-तक गया नहीं, तू ? तूझे यहां बैठने का, किसने कहा ? जा, चाय और मीठे पान की गिलोरी लेते आ !

[शफ़ी मोहमद जाता है, मामूजान ताश के पत्ते समेटकर आफ़ताब साहब को अपने पास बैठाते हैं !]

मामूजान – [आफ़ताब मियां से, कहते हैं] - आफ़ताब साहब, आप बुरा मत मानना ! यह शफ़ी ठहरा, सुअर की औलाद ! इस साले में लूण है, न लक्खन ! इसको भगाना बहुत ज़रूरी था, यह मर्दूद राज़ की बातें पोटली वाले बाबा की तरह गली मोहल्ले में घूमता-फिरता लोगों के बीच उन बातों का भेद खोलता जाता है ! यह कमबख्त ऐसे बोलता है, [शफ़ी की आवाज़ में] ‘ओ रज्जब मियां, ज़रा सुनना ! आज शमीमा से, मामू प्यारे बरगद के तले मिला ! अरे ओ मरियम फूफ़ीजान, गिरदी कोट बाज़ार में आपका लाडला ज़बरू मजीद मिया की छोरी को भेल पुड़ी खिला रहा था !'

जबरूद्दीन – [गाने की स्टाइल में, बोलते हैं] – ‘मैं लड़की पटा रहा था, तूझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं...मैं भेल पुड़ी खा रहा था..

आफ़ताब – जानता हूं, जानता हूं..जबरू उस्ताद ! खूब खिलाओ भेलपुड़ी, अपनी मंगेतर को ! कोई आपको कहने वाला नहीं ! [मामूजान से कहते हैं] हुजूरेआला, अब आप इज़ाज़त देते हैं तो कुछ कहूं !

मामूजान – ज़रूर, आफ़ताब मियां ! आपको इज़ाज़त लेने की क्या ज़रूरत ? आप तो मालिक सज़ा दीजिये दस्तरख्वान, बातों की फुलवारी से ! फरमाइए, क्या कहना चाहते हैं आप ?

आफ़ताब – मज़ाक़ न करो, मामू ! बात गंभीर है ! मैं अभी मुमताज़ के ससुराल से ही आया हूं ! वहां क्या हुआ, और क्या न हुआ ? अभी आपके सामने बयान करता हूं...बात यह है, मैं उसके ससुराल...

[आफ़ताब मियां किस्सा बयान करते जा रहे हैं, सबकी आँखों के आगे वाकये के चितराम घूमने लगते हैं ! मंच पर अंधेरा फ़ैल जाता है ! थोड़ी देर बाद, मंच रोशन होता है ! गुलाब खां साहब की हवेली के भीतर का, मंज़र सामने आता है ! इस वक़्त घूसलखाने से स्नान करके, मुताज़, बाहर आती है ! अपने गीले बालों को तौलिये से पोंछ रही है, तभी गुलाब खां साहब का शगिर्द सुलतान बेधड़क कमरे में दाख़िल हो जाता है ! वह उसे देखते ही, उससे भयभीत हो जाती है ! उसे आशंका है, न मालुम यह वहशी बड़े मियां की ग़ैर हाज़री में उसकी इज़्ज़त से खिलवाड़ न कर बैठे ?]

मुमताज़ – [मन में डरती हुई, सोचती है] – हाय अल्लाह ! यह बन्दर, अन्दर कैसे दाख़िल हो गया ? अब [डरने का अभिनय, करती है] ख़ुदा रहम, अब मैं क्या करूंगी ? यह ठहरा शागिर्द, बड़े मियां का ! दिल के अन्दर रखता है, खोटी नीयत ! यह तो निकाह के दिन से ही, मेरे आस-पास मंडराता रहा है ! और किसी को न देखकर, मेरे सामने वहशी डाइलोग बोलता रहा है ! हाय अल्लाह,अभी बड़े मियां भी घर में नहीं है, और न जाने यह कौनसी हरक़त कर बैठे ?

सुलतान – [नज़दीक आकर, मादक आवाज़ में कहता है] – मेरे चौदवी के चाँद ! तुम कितनी ख़ूबसूरत हो , मेरी जान ? वाह, जन्नत-ए-हूर..तेरे ऊपर मर मिटूं !

[नज़दीक आकर, उसके गीले बालों को अपने हाथ में लेकर सूंघता है] क्या सुगंध आ रही ही, तेरे बालों से ? मानो ये बाल नहीं, गुलाब के पुष्प की पंखुड़िया है ?
[उसके गालों को सहलाता हुआ, कहता है] वाह, क्या काले-काले बादलों की घटा इस ख़ूबसूरत चाँद पर छायी हुई है ? कैसे मादक लब..

[वह आगे क्या बोलता, उससे पहले हाथ का झटका देकर मुमताज़ अपने बाल छुड़ा लेती है ! और झट पीछे खिसक जाती है ! आज तो यह बड़े मियां की ग़ैर हाज़री में, यह सुलतान बहुत बोल्ड बन गया है ! लगता है, आज वो इस कमसीन कली को मसलने के ख्याल से ही...वह यहां, बड़े मियां की ग़ैर हाज़री में यहां आया है ! बस, फिर क्या ? वह तो मुमताज़ को आगोश में लेने के लिए, आगे बढ़ता ही जा रहा है ? मुमताज़ पीछे खिसकते-खिसकते, घूसलखाने के दरवाज़े के आगे पहुच जाती है ! फिर, तड़ककर कहती है..]

मुमताज़ – [कड़कती आवाज़ में, कहती है] – शर्म कर, बेहया ! बड़े मियां घर में है नहीं, तू उल्टे पांव यहां से चला जा ! भाग जा, कमबख्त !

सुलतान – [ढीट बनता हुआ, कहता है] – घर पर नहीं है, इसीलिए आया हूँ मेरी जान ! तेरे इन गुलाबी होंठों को चूषने, अब इन गुलाबी होठों को चूषने की ताकत अब उस्ताद में रही नहीं..अब आज से इन होंठों को चूषने का काम, उनका यह शागिर्द ही करेगा !

[एक बार उसके होंठों को, हाथ से सहला देता है, फिर अपने लब आगे बढ़ाता है..उन गुलाबी होंठों को चूषने के लिए !]

सुलतान – [मुमताज़ के रसीले होंठों को चूषने की कोशिश करता हुआ, कहता है] – आ जा, मेरे पास ! शर्म करना छोड़ दे, मेरी जान ! मेरे सीने से लगकर, तेरे तड़फते दिल को ठंडक मिलेगी ! तू भी कब से तड़फ रही होगी, किसी मर्द की बाहों में...

[इतना कहकर, सुलतान मियां तेज़ी से उसके होंठों को चूमने के लिए आगे बढ़ते हैं ! मगर, यह क्या ? मुमताज़ फुर्ती से दूर हट जाती है, और मियां तेज़ी से आते हुए बाथरूम में आकर गिर जाते हैं ! उठते वक़्त वहां फ़र्स पर रखे साबुन के ऊपर पांव पड़ जाता है, मियां का...और मियां फिसलकर बाथरूम में, और दूर चले जाते है ! किसी तरह मियां खड़े होने की कोशिश करते हैं, और इस कोशिश में उनका हाथ पछीत [अटारी] पर रखे एक बड़े संगमरमर के पत्थर पर रख दिया जाता है...ख़ुदा की पनाह, हाथ रखना क्या ? समूचा पत्थर ही आकर गिर पड़ता है, सुलतान मियां के सर पर ! फिर क्या ? चीख के साथ, मियां वहीं बेहोश होकर गिर पड़ते हैं ! बड़े मियां को शौक रहा है, संगमरमर के पत्थर से कलात्मक चीजें बनवाने का ! इसी मक़सद से यह पत्थर, बड़े मियां ने ख़ुद लाकर इस पछीत पर रखा था ! मगर शारीरिक कमज़ोरी के कारण, बेचारे इसे सही तरीके से से रख नहीं पाए ! जो थोड़ा सा दबाव पड़ते ही, सुलतान मियां के सर पर आ गिरा ! सुलतान के नीचे गिरते ही, झटपट मुमताज़ मौक़े का फायदा उठाती है ! और तत्काल, दरवाज़े को बंद करके कूठा जड़ देती है ! जैसे ही वह कूठा जड़कर वह पीछे खिसकती है, और वह टकरा जाती है मेज़ से ! इस टक्कर से उस पर रखा फूलदान आकर गिर पड़ता है मुमताज़ के मुलायम पांव पर ! बेचारी मुमताज़, असहनीय दर्द के मारे चीख उठती है ! इस फूलदान के गिरने की ‘खन न खन न’ आवाज़ और और मुताज़ की चीत्कार, हवेली में दाख़िल हो रहे आफ़ताब मियां के कानों में सुनायी देती है ! मुमताज़ की चीत्कार सुनकर वे घबरा जाते हैं, और झट जनानी ड्योडी में चले आते हैं !]

आफ़ताब – [घबराकर, आवाज़ देते हैं] – मुमताज़, मेरी बहन ! तू कहाँ है ? कहीं, तू गिर तो नहीं गयी ?

[आफ़ताब साहब अपनी नीली आँखों को घूमाकर, इधर-उधर देखते हैं ! तभी मुमताज़ के कराहने की आवाज़, उन्हें सुनायी देती है !]

मुमताज़ – [कराहते हुए, कहती है] – ऊ..ई..मर ई, मेरी अम्मी ! ओ भाईजान, मैं बाथरूम के बाहर पड़ी हूं ! वो कमबख्त फूलदान आकर गिर गया, मेरे पांव पर ! आप इधर ही आ जाइए, कमरे के अन्दर !

[आफ़ताब साहब अन्दर आकर क्या देखते हैं कि, डर के मारे मुमताज़ थर-थर धूज़ रही है और वह आँगन में बैठी, अपने चोट खाए पांव को दबाती जा रही ही ! घबाराते हुए आफ़ताब मियां उसको हाथ का सहारा देकर उसे खड़ा करते हैं ! फिर दिलासा देते हुए, उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहते हैं..]

आफ़ताब – [तसल्ली देते हुए, कहते हैं] – क्या हुआ, मुमताज़ ? ज्यादा चोट तो नहीं आयी, मेरी बहना ?

[मुमताज़ अपने सर को पल्लू से ढकती है, फिर कहती है]

मुमताज़ – [सर को पल्लू से ढककर, कहती है] – भाईजान, वह..वह..ख़बीस सुलतान बेहोशी की हालत में पड़ा है, बाथरूम में !

आफ़ताब – अरी मुमताज़ ! यह तो वही लम्पट है, जो निकाह के दिन तेरे आस-पास मंडरा रहा था ! और तूझे अपनी वहशी नज़रों से देखता जा रहा था, और कभी-कभी... ?

मुमताज़ – हां भाईजान, यह वही है ! जो...

आफ़ताब – [फ़िक्र करते हुए, कहते हैं] – अब फिर उस दिन की तरह, आज फिर...तूझे कहीं, चिकोटी तो न काट ली ? या उसने कोई बेहूदी हरक़त कर डाली ?

मुमताज़ – [कातर सुर में, कहती है] – बस भाईजान, अब सहा नहीं जाता ! किसी तरह आप इस राक्षस से मेरी इज़्ज़त बचा दिलिये ! हाय अल्लाह ! कहीं यह लम्पट, बड़े मियां के देखने में आ गया तो..वे मुझ पर, वहम करने लगेंगे ? भाईजान, अब कुछ कीजिये ! पहले सुन लीजिएगा, आज इसने क्या हरक़त की !
[अब वह पूरा वाकया, विगतवार उनको सुनाती है]

आफ़ताब – इस कमबख्त की, यह हरक़त ? अब मेरे दिमाग़ में एक प्लान है, उसके अनुसार काम करना है, मुमताज़ ! अब तू बता, घर में कहीं पुराने जनाना कपड़े है या नहीं ?

मुमताज़ – हां भाईजान, मिल जायेंगे ! अम्मीजान के पुराने कपड़े, रखे हैं..एक गाँठ में बांधकर ! महरी को देने के लिए रखे थे मैंने, अटारी पर ! मगर वह कमबख्त कई दिन से आ नहीं रही है, और इधर रसोईदारन की मां का इंतिकाल हो जाने से वह भी एक हफ्ते से नहीं आ रही है ! ऐसा लगता है, ये दोनों एक हफ्ते बाद आ जाएगी काम पर !

[अब मुमताज़ अटारी पर रखी कपड़ो की गाँठ उठा लाती है ! गाँठ खोलकर, गुलाब खां साहब की अम्मीजान के पुराने कपड़े निकालकर उनको दिखलाती है ! फिर क्या ? सुल्तान के नाप के जनाना कपड़े लेकर आफ़ताब मियां बाथरुम में जाते हैं ! इतनी देर में गुलाब खां साहब आ जाते हैं, हवेली में ! पोल में दाख़िल होते ही, वे मुमताज़ को आवाज़ देते हैं !]

गुलाब खां – [आवाज़ देते हुए, कहते हैं] – बहू बेगम ! ज़रा दीवानखाने में तशरीफ़ रखना जी !

[मुमताज़ अपने सर का पल्लू अच्छी तरह से ढककर, चली आती है दालान में ! जहां गुलाब खां बैठे हैं, कुर्सी पर ! उनके आस-पास मेहमानों के बैठने की चार-पांच कुर्सियां और एक छोटी गोल टेबल रखी है ! पास ही मनसद पर साज़ के सामन रखे हैं, और चांदी की तश्तरी में मीठे पान की गिलोरियां रखी है ! पास ही चांदी का पीकदान, और चांदी का तैयार हुक्का रखा है !]

मुमताज़ – [सलाम करती हुई, कहती है] – सलाम ! शौहर-ए-आज़म, खैरियत है ?

गुलाम खां – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – आइये बेगम, बैठिये ! [कुर्सी खींचकर, उसके आगे रखते हैं]

मुमताज़ – [कुर्सी पर बैठती हुई, कहती है] – मुशायरा में जाकर आ गए, ज़नाब ?

गुलाब खां – क्या कहें बेगम, आपको ? गए ज़रूर थे, मगर हमारा दिल यहीं था, आपके पास ! बस झट उठकर आना पड़ा, आपके पास ! अब जानेमन थोड़ा समीप आ जाओ, और इस तड़फते दिल को ठंडक पहुंचा दीजिये ना !

[मुमताज़ के रुखसार पर बोसा लेने के लिए, थोड़ा नज़दीक आते हैं !]

गुलाब खां – [समीप आते हुए, कहते हैं] – आ जाइए, मेरी जान ! इस प्यासे दिल की प्यास बुझा दीजिये !

मुमताज़ – [उन्हें दूर हटाती हुई, कहती है] - क्या कर रहे हो, बड़े मियां ? भाईजान आये हुए हैं ! कहीं, उन्होंने देख लिया तो..?

गुलाब खां – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – साले साहब, पधारे हैं ? अरे बेगम वे कोई ग़ैर नहीं, उनसे काहे की शर्म ? आख़िर, हम आ रहे हैं अपनी जानेमन के पास ही..किसी दूसरी औरत के पास तो जा नहीं रहे ? फिर, काहे की शर्म ?

[तभी, आफ़ताब मियां की हंसी गूंज़ती है ! वे हंसते हुए, सामने से आते दिखाई देते हैं !]

आफताब – [हंसते हुए, कहते हैं] – वाह, दूल्हे भाई वाह ! क्या अब हम, ख़ास नहीं रहे ? [नज़दीक़ आकर, कहते हैं] क्यों ज़नाब ? मुझे अब क्या समझा, आपने ?

गुलाब खां – हां, हां...साले साहब, आप तो ख़ुद आफ़ताब हैं ज़नाब ! आपकी मेहरबानी से ही मुझे यह कोहिनूर का हीरा मिला है ! [उनको खड़े देखकर, कहते हैं] ज़नाब, आप खड़े क्यों हैं ? बैठिये, ज़नाब ! [आफ़ताब मियां के की तरफ़, पास रखी कुर्सी रखते हैं]

[आफ़ताब मियां उस कुर्सी पर बैठते हैं ! उनके बैठने के बाद, गुलाब खां कहते हैं उनसे]

गुलाब खां – अब हुक्म कीजिये, साले साहब ! आपकी क्या ख़िदमत करूं ? आपने, हमारी हवेली आने की कैसे तकलीफ़ की ?

आफ़ताब – क्या करूं, दूल्हे भाई ? बहन की तकलीफ़ अब मुझसे देखी नहीं जाती, आपके जाने के बाद यह इतनी बड़ी हवेली में अकेली रह जाती है, कोई और औरत इस हवेली में है नहीं...जो उसका हाथ बंटाने वाली हो ? बेचारी, किससे बातें करके अपना जी बहलाए ? आप तो आये दिन चले जाते हैं, मुशायरे में, कभी चले जाते हैं सूफ़ी मजारों पर अपनी गायकी दिखाने ! कहिये ज़नाब, क्या मैं ग़लत बोल रहा हूं ?

गुलाब खां – आप ही बताएं, यह तो मेरा धंधा है ! फिर, इसे कैसे छोड़ दूं ? और,आपकी बहन की कैसे मदद करूं ?

आफताब – आप ख़ुद देख लीजिएगा, बेचारी खाना पकाती है, कभी आपके लिए चाय बनाती है ! आपके बिना कहे आपके लिए हुक्का तैयार करके रखती है, इतने सारे काम करने के बाद उस बेचारी की क्या हालत होगी ? इधर कई दिन से महरी और रसोइदारिन आ नहीं रही है काम पर ! आख़िर मुझे कोशिश करके एक काम वाली बाई को यहां लाना पड़ा ! लीजिये, मैं उसे बुलाता हूं ! [आवाज़ देते हैं] अरी ओ शहनाज़ बीबी ज़रा इधर शरबत-ए-आज़म लेती आना, बड़े मियां मुशायरे से लौटे हैं !
[थोई देर बाद, जिलकन हटाकर, शहनाज़ बीबी आती है ! वह घूंघट निकालकर आती है, उसके हाथ में चांदी की तश्तरी है ! जिसमें, शरबत-ए-आज़म से भरी चांदी की ग्लासें रखी है ! वह नज़दीक आकर,कहती है]

शहनाज़ – [नज़दीक आकर, कहती है] – आदाब, हुज़ूर ! शरबत-ए-आज़म नोश फरमाए !

[अब वह तीनों को, शरबत से भरे ग्लास थमाती है ! फिर, सर झुकाये खड़ी रहती है !]

गुलाब खां – [शरबत की चुश्कियां लेते हुए, कहते हैं] – इस मोहतरमा की आवाज़, मुझे कुछ जानी-पहचानी लग रही है ! कही यह...

आफ़ताब – [बात काटते हुए, कहते हैं] – भुल्लकड़ कैसे बनते जा रहे हैं, दूल्हे भाई ? यह शहनाज़ पहले सुल्तान मियां की हवेली में काम किया करती थी ! और आपका वहां रोज़ का आना-जाना रहा है, शायद आपने इसको वहां काम करते देखा होगा ?

गुलाब खां – शायद, आपकी बात सही हो ? बढ़ती उम्र में यह कमबख्त यादाश्त भी कमज़ोर पड़ जाया करती है ! खुदारहम, मैं कैसे भुलक्कड़ बनता जा रहा हूं ?

मुमताज़ – [नाराज़गी ज़ाहिर करती हुई, कहती है] – यह क्या, ज़नाब ? कल तो आप मुझे भी भूल जायेंगे ? [शहनाज़ को हंसते पाकर, तल्ख़ आवाज़ में उससे कहती है] अब जा, शहनाज़ ! वक़्त ख़राब मत कर, सिंक में जूठे बरतन रखे हैं...उनको मांज दे जाकर ! और सुन, कड़ाव और भगोनों से सब्जी खाली करके उनको भी मांज देना ! इसके बाद, दस्तरख्वान सज़ाकर बड़े मियां को खाना खिला देना ! समझ गयी, शहनाज़ ?

आफ़ताब – [शहनाज़ से, कहते हैं] – और आगे सुन, इस काम से फारिग़ होकर सारे कमरे, होल, बरामदा आदि सभी हिस्सों में कचरा निकाल देना ! [गुलाब खां साहब से, कहते हैं] दूल्हे भाई, यह शहनाज़ आपको किसी शिकायत का मौक़ा नहीं देगी ! बर्तनों को यह कांच के माफ़िक साफ़ करती है, आप चाहे तो उनमें आप अपना चेहरा देख सकते हैं !

शहनाज़ – जो हुक्म, सभी काम वक़्त पर हो जायेंगे !

[शरबत की खाली ग्लासें तश्तरी पर इकट्ठी करती है, फिर शहनाज़ उन्हें लेकर चली जाती है !]

गुलाब खां – [हाथ ऊपर लेकर, अंगड़ाई लेते हैं] – अ हाಽಽ ! अब मैं स्नान कर लेता हूं, फिर नमाज़ अत्ता करके जल्द ही बेगम आपकी ख़िदमत में हाज़िर होता हूं !
[सब जाते हुए, दिखाई देते हैं ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है ! थोड़ी देर बाद, मंच पर रोशनी फ़ैल जाती है ! बरगद के चबूतरे पर मामूजान, आफ़ताब साहब, रशीद भाई, और जबरू उस्ताद बैठे दिखाई देते हैं ! अब किस्सा सुनाने वालों की आँखों के आगे, वाकये के चित्र आने बंद हो जाते हैं ! शफ़ी मोहम्मद चाय और पान की गिलोरी लेकर आ जाता है ! अब चाय पीने के बाद, मामूजान शफ़ी मोहम्मद को हुक्म दे देते हैं !]

मामूजान – उठ रे शाफ़िया, अब जा ! खाली-चाय की ग्लासें चाय की दुकान पर दे आ ! [शफ़ी मोहम्मद खाली ग्लासें इकट्ठी करके, ले जाता है ! अब वे कागज़ की पुड़िया से पान की गिलोरी निकालकर, आफ़ताब साहब को थमाते हैं ! पान की गिलोरी थमाते हुए, वे कहते हैं] लीजिये, पान की गिलोरी !

[पान मुंह में ठूंसकर, आफ़ताब मियां चुपचाप बैठ जाते हैं ! अब मामूजान आगे का किस्सा सुनाने के लिए, आफ़ताब साहब से कहते हैं !]

मामूजान – [आफ़ताब साहब को झंझोड़ते हुए, कहते हैं] – आगे, क्या हुआ ? जल्द कह डालिए, कहीं यह शफ़िया वापस न आ जाए ?

रशीद भाई – सही कहा, मामू ने ! इस लंगूर का पता नहीं, वह कब वापस आ जाए ?

आफ़ताब – सुनिए, इस तरह इस सुल्तान को उनकी हवेली की नौकरानी बनाकर आया हूं ! अब तो इस साले को पूरा सबक मिल जाएगा, मज़नूगिरी करने का !

मामूजान – आफ़ताब साहब, मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है कि, यह मर्दूद नौकरानी बनने के लिए कैसे रजामंद हो गया ?

आफ़ताब – मामू यार ! इस में, कौनसी बड़ी बात ? इतना तो आप जानते ही हैं, हर कोई इज्ज़तदार आदमी ऐसा कोई सबूत छोड़ना नहीं चाहता जिससे उसकी साख़ पर कलंक लगता हो ? मामू एक बात और ध्यान में रखो कि, कोई शागिर्द किसी भी तरह अपने उस्ताद की नज़रों से गिरना नहीं चाहता, वह उस्ताद की नज़रों में पाक-साफ़ ही दिखना चाहता है ! बस, यही कारण है कि ‘यह सुल्तान अपने उस्ताद गुलाब खां साहब की नज़रों में, पाक-साफ़ ही दिखना चाहता था !’

मामूजान – [मुस्कराकर, कहते हैं] – समझ गया, उस्ताद ! यह महरी और रसोइदारिन जब तक काम पर नहीं लौटेगी, तब-तक यह सुल्तान हवेली में कनीज़ बना हुआ करता रहेगा इन दोनों की ख़िदमत !

रशीद भाई – वल्लाह, क्या करिश्मा कर डाला यार ? अब तो इस कुत्तिया के ताऊ संपादक की तक़रीर हो गयी, सौलह आने सच्च ! कि, मर्द से औरत...

[अब सभी रशीद भाई की बात सुनकर, ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे ! उनकी हंसी चारों तरफ़ गूंज़ उठती है, और वे लोग एक साथ ज़ोर से कहते हैं कि, ‘वाह रे, वाह ! करिश्मा हो गया ! “मर्द से औरत !”..’ मंच पर अंधेरा छा जाता है ! थोड़ी देर बाद, मंच पर रोशनी फ़ैल जाती है ! सामने, गाड़ी का मंज़र दिखाई देता है ! गाड़ी का इंजन, तेज़ आवाज़ में सीटी देता है ! सीटी की तेज़ आवाज़ से, सभी साथियों की ऊंघ समाप्त हो जाती है ! चेतन होने पर वे आखें मसलते हुए सामने देखते हैं, सामने रशीद भाई जेब से अख़बार की कतरन निकालकर उन लोगों को दिखलाकर आगे कह रहे हैं..]

रशीद भाई – [अख़बार की कतरन निकालकर, उन लोगों को दिखलाते हुए कहते हैं] – अख़बार की इस कतरन में जिस इंसान का यह फोटो छापा गया है, वह इंसान पहले लड़का था..उसका नाम रहा है ‘सत्य जीत सिंह’ ! इस आदमी की उम्र २५ साल है ! यह जोधपुर शहर का निवासी है ! बचपन से ही यह अपने अन्दर, लड़कियों के गुण देखता आया है ! सेंट एंस स्कूल में, इसने कक्षा दस तक अध्ययन किया है ! किशोर अवस्था में यह लड़कियों की तरह बर्ताव करने लगा, जिससे इसके माता-पिता और इसके भाई-बहन इससे नाराज़ रहने लगे !

छंगाणी साहब – उनकी नाराज़गी वाजिब है, रशीद भाई ! इस खिलकत में ऐसे कौनसे माता-पिता होंगे, जिन्हें अपने बच्चे के अन्दर हिज़ड़ों के लक्खन अच्छे लगेंगे ?
सावंतजी – अगर मां-बाप ने पूर्व जन्म में अच्छे कर्म किये होंगे, तो इस जन्म में उनको लड़के का मुख देखना नसीब होता है ! फिर लड़का भी, ऐसा निवड़ जाय ? जो इस बेवकूफ औलाद की तरह, अपने अन्दर लड़कियों की आदतें पैदा कर ले..राम, राम उन मां-बाप का जीना हराम हो जाता है ! कहाँ तो बेचारे मां-बाप उसके लिए वधु लाने का सपना संजो रहे थे, और बेचारे पोते का मुंह देखना चाहते थे..मगर, ऐसी औलादें पैदा हो जाती है तो मालिक जाने..

रशीद भाई – फिर तो बेचारे समाज में, किसी को मुंह दिखलाने योग्य नहीं रहते ! अब आगे का किस्सा सुनिए ! मां-बाप और भाईबहन की नाराज़गी के कारण, यह इनसे नाराज़ होकर जयपुर चला गया ! और वहां आकर इसने एक ब्यूटी पार्लर में नौकरी कर ली, वहां काम-करते-करते इसने छ: लाख रुपये इकट्ठे कर लिए ! एक बार किसी सिलसिले में यह बम्बई आया, वहां इसने लिंग-परिवर्तन के बारे में सुना..फिर क्या ? झट दिल्ली के सीताराम अस्पताल के डॉक्टर एस.इ.कोतवाल के हाथों से लिंग ऑपरेशन करवाकर, सन २००२ में औरत बन गया ! इसके बाद..

छंगाणी साहब – कहिये रशीद भाई, आगे क्या हुआ ? आप किन्नर समाज के बारे में, काफ़ी जानकारी रखते हैं ! इस कारण, इस समाज से आपके अच्छे रसूखात हैं !
रशीद भाई – आप तो किस्से सुनते रहें, सुनने के बाद अपने कोमेंट करते रहना ! लीजिये सुनिए, उसने साथ-साथ हारमोंस ट्रीटमेंट ले लिया ! जिससे, वह पूरी तरह औरत बन गया ! डॉक्टर साहब के कहने के अनुसार यह ऑपरेशन केवल प्रोटोकोल के तहत ही होता है, गहरी मानसिक जांच दो-तीन साल तक चलती है ! इसने अपना नया नाम ‘हनी’ रखा है ! इसने एवालोन अकेडमी में दाखिला ले लिया है, अब यह एयर-होस्टेस बनने का ख़्वाब पाल रही है !

सावंतजी – नाम हनी हो, या बनी ठनी ? साला बना गया पूरा निक्कमा ! किन्नर बनकर, रह गया ! रशीद भाई, यार आपका किस्सा झट ख़त्म कर दीजिये !

रशीद भाई – सुनो ! एडमिशन लेकर अब अब अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रही है ! वर्तमान में वह, मोडलिंग और कई टी.वी.सीरियल्स में भाग ले रही है ! अब कहा जाय, यह सत्य है “इस कुत्तिया के ताऊ सम्पादक की तक़रीर सौलह आना सच्च हो गयी है कि, मर्द से औरत...’

[इंजन की सीटी सुनायी देती है, अब आगे रशीद भाई क्या कह रहे हैं ? वोअब, सुनायी नहीं देता ! थोड़ी देर बाद, मंच पर अंधेरा छा जाता है !]

- दिनेश चन्द्र पुरोहित [लेखक एवं अनुवादक]

लिंग परिवर्तन के अन्य प्रकरण -:

सरहद पार फेसबुक का प्यार : पाकिस्तानी प्रेमी के लिये हिन्दुस्तानी युवक ने कराया लिंग परिर्वतन [अजय कुमार, लखनऊ द्वारा प्रस्तुत] - प्यार अंधा होता है। उसे कुछ दिखाई-सुनाई नहीं देता है। न वह मजहब के दायरे में कैद होता है न किसी तरह की सीमाएं उसे बांध सकती हैं। न कोई प्यार पर पहरा बैठा सकता है, न ही न इसे जुल्मों-सितम से दबाया जा सकता है। यह बात सदियों से प्रेम करने वालों के लिये कही जाती रही है। चाहें भगवान कृष्ण की दीवानी राधा हो या फिर मीरा। लैला हो या मजनू, शीरी-फरहाद, हीर-रांझा, सलीम-अनारकली चंद ऐसे नाम हैं जिनकी बेपनाह मोहब्बत ने प्यार को नई ऊंचाइयां दी। आजकल भी एक ‘मीरा’ का प्यार चर्चा में हैं।
यह मीरा लखनऊ की है और उसका ‘कृष्ण’ पाकिस्तान में रहता है। अलग-अलग मुल्कों में रहने वाले इस आशिक जोड़े का प्यार उस समय परवान चढ़ रहा था जब दोनों मुल्कों के बीच तलवारें खिंची हुई थीं। बात पाकिस्तान के एक युवक की हिन्दुस्तान के दूसरे युवक से प्रेम प्रसंग की हो रही है। दोनों युवक थे और एक-दूसरे को प्यार करते थे, लेकिन यह प्रेम समलैंगिक नहीं था। इस बात से काफी लोग अंजान थे तो जिनको कुछ भनक थी,वह इस लिये परेशान थे क्योकि प्रेम कहानी के दोनों किरदार परस्पर दुश्मन मुल्कों के थे।

भारत और पाकिस्तान के तल्‍ख रिश्तों की कहानी किसी से छुपी नहीं है, लेकिन इसके उलट इन दोनों मुल्कों में रहने वालों लोगों की सोच और एक-दूसरे के प्रति प्यार का नज़रिया हमेशा से ही सियासी सरहदों से ऊपर रहा है। ऐसे ही प्यार की एक बुनियाद पिछले कुछ वर्षो से राजधानी लखनऊ मे अंगड़ाई ले रही थी, जहां कथक डांसर ग़ौरव (जो अपनी डांस कला के चलते ‘मीरा’ के रूप में भी पहचाना जाता था) अपने पाकिस्‍तानी प्रेमी रिजवान के लिए सेक्‍स चेंज ऑपरेशन कर ग़ौरव से खूबसूरत युवती आशना बन गया था।

तकरीबन पांच साल पहले पाकिस्तानी युवक रिजवान से फेसबुक पर हुई फ्रेंडशिप के बाद लखनऊ का कथक डांसर ग़ौरव से आशना बन गया। आशना बनने के लिये उसने मुंबई के डॉक्टरों से अपना लिंग परिवर्तन कराया था। पाकिस्तान के रिजवान से अपनी प्रेम कहानी को सही बताते हुए ग़ौरव इस रिश्ते को रुहानी करार देते हुए कहता है,‘पांच वर्ष पूर्व फेसबुक पर रिजवान की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई। रिजवान पाकिस्तान के सिंध के एक सूफी परिवार से ताल्लुक रखता है। मैंने रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली। धीरे-धीरे, हमारी बातचीत होने लगी। ज़्यादातर हमारी बातों का मुद्दा, सूफिज्म ही रहा ! यह सिलसिला बढ़ा तो पता ही नहीं चला कि कब उसे मुझसे और मुझे उससे मोहब्बत हो गई। दोनों को एक-दूसरे से मोहब्बत हो गई थी, लेकिन हम लोग कभी मिले नहीं थे, स्काइप चैट पर ज़रूर हम दोनों ने एक-दूसरे को दो बार पहले देखा था।

अतीत के झरोखे में झांकते हुए ग़ौरव ने बताया,‘ 5 मार्च 2012 को उसने फ़ोन किया। कहा - ‘ग़ौरव, मैं तुमसे निकाह करना चाहता हूं। मुझे भी उससे इश्क हो गया था, अंजाम की फिक्र किए मैंने तुंरत बिना बोल दिया - कुबूल है।’

ग़ौरव बताता हैं, ‘मैं हमेशा से ऐसा नहीं था। मेरी परवरिश एक लड़के की तरह हुई थी। यहां तक कि एक लड़के की तरह ही मैं लड़कियों के साथ अफेयर्स भी करता था। मेरी पीएचडी चल रही थी। पीएचडी के सिलसिले में मैं सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए पाकिस्‍तान के रिजवान से मिला। उनका भी टॉपिक सूफीजम से संबंधित था। इस दौरान दोनों एक दूसरे की काफी मदद करने लगे। समय बीतने के साथ ही रिजवान और मेरे बीच वर्चुअल दोस्ती लंबी चैट से बढ़ती गई। कुछ वीडियो कॉल के साथ, हम लोग एक दूसरे के काफी करीब आ गए। इस दौरान हम दोनों को ऐसा फील होने लगा कि, हम लोग दो शरीर एक आत्मा बन चुके थे।

ग़ौरव अपने प्यार को पाकीजा करार देते हुए कहता हैं कि हमारा रिश्ता जिस्मानी नहीं, रुहानी था, जिसे ज्यादातर लोग नहीं समझ पाते। वे हमें ‘गे’ ‘समलैंगिक कहेंगे। ‘रिश्ते की शक्ल’ पर हमारी ज़्यादातर बातें रिजवान से होती। इन सब बातों से मेरा परिवार अंजान था। मैं जानता था कि घर में बताने का मतलब अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना। इस बीच, मां ने मेरी शादी के लिए लड़की तलाशनी शुरू कर दी। मैं परेशान रहने लगा। तब मैने रिजवान से ही इसका हल पूछा तो वो बोला, ‘ हममें से किसी एक को अपना वजूद छोड़कर लड़की बनना होगा। पहले तो अजीब लगा,काफी सोचा-विचारा। बाद में इंटरनेट पर सेक्स चेंज से संबंधित जानकारियां ढूंढने लगा। शुरुआती जानकारियों से मैं घबराया तो रिजवान ने कहा, ‘तुम परेशान न हो, मैं अपना सेक्स चेंज करवा लूंगा।‘

तब मैंने सोचा कि, ‘रिजवान क्यों, मैं क्यों नहीं ऑपरेशन करवा सकता हूं ?’ लिंग परिवर्तन कराने के लिए घरवालों को मनाना जरूरी था। इसलिए मैने अपनी बहन अदिति शर्मा (बदला हुआ नाम) से बात की। वह भी कथक की बेहतरीन डांसर थी। उसने पहले तो मुझे समझाया, लेकिन मेरी जिद्द के आगे उसकी एक नहीं चली। मेरी दशा देखकर बाद में वह मेरे से सहमत हो गई और मेरा हौसला भी बढ़ाया। मां को मनाने की जिम्मेदारी भी उसी ने ले ली। किसी तरह उन्हें मनाया गया। ग़ौर व कहता है जब एक बार फैसला हो गया तो फिर उसके बाद मैं इंटरनेट पर डॉक्टर की तलाश में जुट गया। मुंबई के दो डॉक्टरों से सम्पर्क हुआ। डॉ. मिथिलेश मित्रा जो कि सर्जन थे और दूसरे डॉक्टर अम्या जोशी जो कि हार्मोन ट्रीटमेंट के एक्सपर्ट। उनसे मैंने इस बारे में बात की। बाद में डा0 मिथिलेश से मैंने अपना आपरेशन कराया।
ग़ौरव के शब्दों में, ‘पूरे ऑपरेशन के प्रोसेस में तकरीबन डेढ़ साल का वक्त और करीब आठ लाख रुपये का खर्च आया। सबसे पहले काउंसलिंग सेशन हुआ। वहां से हरी झंडी मिलने के बाद सर्जन ने अपना काम शुरू किया। पहली ही काउंसलिंग में डॉक्टर ने इजाजत दे दी, तो ट्रीटमेंट शुरू हो गया। लिंग बदलवाने के लिये नौ महीने में मेरे तीन मेजर ऑपरेशन हुए। तीसरा और फाइनल ऑपरेशन नवंबर या दिसंबर 2015 में होना था पर मेरे रिजल्ट अच्छे थे, इसलिए 10 अक्तूबर 2015 को ही अंतिम ऑपरेशन हो गया। ग़ौरव कहता है,‘यह इत्तेफाक है कि उनका जन्मदिन 10 अक्तूबर को पड़ता है। आशना भी उसी दिन बनी।

ग़ौरव को आशना बनाने वाले मुंबई के सर्जन डॉ. मिथिलेश मित्रा ऑपरेशन के बात स्वीकार करते हुए कहते हैं कि लिंग परिवर्तन के प्रोसेस को मेडिकल साइंस में ‘जेंडर रिअसाइनमेंट सर्जरी’ कहा जाता है। ऐसे ऑपरेशन आसान नहीं होते, क्योंकि इंसान जिस रूप में पैदा होता है, उसमें संतुष्ट होता है। कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो अपने शरीर से खुश नहीं होते। मेडिकल साइंस इतनी एडवांस हो चुकी है कि ऐसे लोगों का ऑपरेशन कर सेक्स चेंज किया जा सकता है। हालांकि ऐसे केस बहुत रेयर हैं। मैंने भी अपने कॅरिअर में ऐसे चार-पांच ऑपरेशन ही किए हैं। जहां तक ग़ौरव की बात है, तो जब वह मेरे पास आए तो मानसिक रूप से लड़की बनने के लिए पूरी तरह से तैयार था। यही वजह है कि उनका रिजल्ट सबसे कम समय में सबसे अच्छा रहा। वे काफी अवेयर था। वह डॉक्टरों की हर बात सुनता और उस पर फॉलो भी करता था।

खैर, बात दोनों के बीच समानताओं की कि जाये तो ग़ौरव और रिजवान की सोच और शौक लगभग एक जैसे हैं। सेक्‍स चेंज कराने के बाद गोपाल से आशना बनी अपनी प्रेमिका से मिलने के लिये रिजवान के मार्च के महीने में पाकिस्‍तान से हिन्दुस्तान आने की संभावना है। ग़ौरव और रिजवान ने फैसला ले लिया है लेकिन ग़ौरव से आशना बनने वाले इस कथक डांसर को लेकर हर कोई काफी चिंतित है। उसके साथी परेशान हैं। आखिर रिजवान और उसके बीच ये रिश्‍ता कैसा होगा..? रिजवान कब तक, आशना का साथ देगा..? यह ऐसे प्रश्न हैं, जिनका उत्तर हर कोई तलाश रहा है।

भले ही ग़ौरव के भविष्य को लेकर उसके घर वाले और यार-दोस्त चिंतित नजर आ रहे हों लेकिन ग़ौरव निश्चिंत है। वह कहता है, ‘रूह तो कब की मिल चुकी है, बस अब तो प्यार को जिस्मानी और सामाजिक मान्यता मिलना बाकी रह गया है।'' वह साथ ही जोड़ देता है कि ''मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी।''

उम्मीद की जानी चाहिए कि ग़ौरव आशना बनकर भी खुश रहेगा, लेकिन ग़ौरव के आशना बनने से लखनऊ को बड़ा नुकसान हुआ है। ग़ौरव न केवल कथक का बेहतरीन डांसर है, बल्कि वह इस पर कई किताबें भी लिख चुका हैं। प्यार होने से पहले तक ग़ौर व लखनऊ के कथक घराने पर रिसर्च की तैयारी में था। जिंदगी में आए इस नए मोड़ ने उसकी इस योजना को फिलहाल विराम दे दिया है। आशना बने ग़ौरव का प्रेमी रिजवान जो वजीर आबरू कराची सखर सिंध में रहता है, का कहना था, '‘इंशा अल्लाह मैं मार्च में हिंदुस्तान आऊंगा, पूरी कोशिश करूंगा लखनऊ की उस पाक जमीन को चूम सकूं जहां मेरा महबूब पैदा और बड़ा हुआ।''

[इस प्रकरण को लाने वाले लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.]



लेखक का परिचय
लेखक का नाम दिनेश चन्द्र पुरोहित
जन्म की तारीख ११ अक्टूम्बर १९५४
जन्म स्थान पाली मारवाड़ +
Educational qualification of writer -: B.Sc, L.L.B, Diploma course in Criminology, & P.G. Diploma course in Journalism.
राजस्थांनी भाषा में लिखी किताबें – [१] कठै जावै रै, कडी खायोड़ा [२] गाडी रा मुसाफ़िर [ये दोनों किताबें, रेल गाडी से “जोधपुर-मारवाड़ जंक्शन” के बीच रोज़ आना-जाना करने वाले एम्.एस.टी. होल्डर्स की हास्य-गतिविधियों पर लिखी गयी है!] [३] याद तुम्हारी हो.. [मानवीय सम्वेदना पर लिखी गयी कहानियां].
हिंदी भाषा में लिखी किताब – डोलर हिंडौ [व्यंगात्मक नयी शैली “संसमरण स्टाइल” लिखे गए वाकये! राजस्थान में प्रारंभिक शिक्षा विभाग का उदय, और उत्पन्न हुई हास्य-व्यंग की हलचलों का वर्णन]
उर्दु भाषा में लिखी किताबें – [१] हास्य-नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” – मज़दूर बस्ती में आयी हुई लड़कियों की सैकेंडरी स्कूल में, संस्था प्रधान के परिवर्तनों से उत्पन्न हुई हास्य-गतिविधियां इस पुस्तक में दर्शायी गयी है! [२] कहानियां “बिल्ली के गले में घंटी.
शौक – व्यंग-चित्र बनाना!
निवास – अंधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर [राजस्थान].
ई मेल - dineshchandrapurohit2@gmail.com


 










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