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जननायक [लघु कथा]- प्राण शर्मा

प्राण शर्मा रचनाकार परिचय:-

प्राण शर्मा वरिष्ठ लेखक और प्रसिद्ध शायर हैं और इन दिनों ब्रिटेन में अवस्थित हैं। आप ग़ज़ल के जाने मानें उस्तादों में गिने जाते हैं। आप के "गज़ल कहता हूँ' और 'सुराही' काव्य संग्रह प्रकाशित हैं, साथ ही साथ अंतर्जाल पर भी आप सक्रिय हैं।


अपने आपको प्रतिष्ठित समझने वाले गुणेन्द्र प्रसाद के मन में एक अजीब सी लालसा जागी , यदि बाल गंगाधर तिलक ,मदन मोहन मालवीय , मोहन दास करम चाँद गांधी , जवाहर लाल नेहरू , सुभाष चन्द्र बोस , लाला लाजपत राय ,भगत सिंह इत्यादि को क्रमश: लोकमान्य , महामना , महात्मा , चाचा , नेताजी ,शेरे पंजाब और शहीदे आज़म की उपाधियों से विभूषित किया जा सकता है तो उन्हें क्यों नहीं ? भले ही झूठ को सच और को झूठ करने वाला वकालत का उनका पेशा है लेकिन तीस सालों से वे जन - सेवा कर रहे हैं और कई संस्थाओं को दान दे रहे हैं।

विचार - विमर्श के लिए गुणेन्द्र प्रसाद जी ने अपने कर्मचारियों को बुलाया। निश्चित हुआ कि गुणेन्द्र प्रसाद जी को ` जननायक` की उपाधि से विभूषित किया जाना चाहिए।

प्रचार - प्रसार का बिगुल बज उठा। दो सप्ताह बाद रविवार को कम्पनी बाग़ में जन सभा रखी गयी। घोषणा की गयी - ` जन सभा में आने वाले हर व्यक्ति को पाँच सौ ग्राम का शुद्ध खोये के लड्डुओं का डिब्बा दिया जाएगा। `

छोटा - बड़ा हर कोई जन सभा में पहुँचा। गुणेंद्र प्रसाद खुशी का पारावार नहीं रहा। जन समूह ने हाथ खड़े कर के उन्हें ` जननायक ` घोषित कर दिया। यह
अलग बात है कि आज तक किसी ने भी उन्हें जननायक नहीं कहा है।

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1 टिप्पणियां

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जाकी रही भावना जैसी.... : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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