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"वो क्या ले गए जो सिकंदर के वाली थे। जब गया सिकंदर दोनों हाथ खाली थे।"


 महावीर उत्तरांचली रचनाकार परिचय:-



१. पूरा नाम : महावीर उत्तरांचली
२. उपनाम : "उत्तरांचली"
३. २४ जुलाई १९७१
४. जन्मस्थान : दिल्ली
५. (1.) आग का दरिया (ग़ज़ल संग्रह, २००९) अमृत प्रकाशन से। (2.) तीन पीढ़ियां : तीन कथाकार (कथा संग्रह में प्रेमचंद, मोहन राकेश और महावीर उत्तरांचली की ४ — ४ कहानियां; संपादक : सुरंजन, २००७) मगध प्रकाशन से। (3.) आग यह बदलाव की (ग़ज़ल संग्रह, २०१३) उत्तरांचली साहित्य संस्थान से। (4.) मन में नाचे मोर है (जनक छंद, २०१३) उत्तरांचली साहित्य संस्थान से।

"वो क्या ले गए जो सिकंदर के वाली थे। जब गया सिकंदर दोनों हाथ खाली थे।" शमशान के द्वार पर एक पागल फ़क़ीर बड़े ऊँचे सुर में चिल्ला रहा था। शव के साथ आये लोगों ने उस पागल की बात पर कोई विशेष ध्यान न दिया; क्योंकि शमशान में यह आम बात थी। अभी-अभी जिसका शव शमशान में लाया गया था वह शहर के सबसे बड़े रहीस सेठ द्वारकानाथ थे। पृष्ठभूमि में नाते-रिश्तेदारों का हल्का-हल्का विलाप ज़ारी था। लेकिन उनमे अधिकांश ऐसे थे, जो सोच रहे थे—द्वारकानाथ की मृत्यु के बाद अब उनकी कम्पनियों का क्या होगा? बंटवारे के बाद उन सबके हिस्से में कितना-कितना, क्या-क्या आएगा? शहर के अनेकों व्यवसायी महंगे परिधानों में वहां जमा थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था—क्या करें? क्या कहें? वह सिर्फ़ द्वारकानाथ से जुड़े नफ़े-नुकसान की बदौलत वहां खड़े थे।शमशान में भी उन्हें शोक करने से ज़ियादा आनंद अपने बिजनेस की बातों में आ रहा था।

"और मेहरा साहब क्या हाल हैं? आपका बिजनेस कैसा चल रहा है।" सूट-बूट और टाई पहने व्यक्ति ने अपने परिचित को देखते हुए कहा।

"अरे यार वर्मा क्या बताऊँ?" महरा साहब धीरे से बोले ताकि अन्य लोग न सुन लें, "द्वारकानाथ दो घण्टे और ज़िंदा रह जाते तो स्टील का टेण्डर हमारी कम्पनी को ही मिलता। उनके आकस्मिक निधन से करोड़ों का नुक्सान हो गया।"

"कब तक चलेगा द्वारकानाथ जी के अंतिम संस्कार का कार्यक्रम?" मेहरा से थोड़ी दूरी पर खड़े दो अन्य व्यक्तियों में से एक ने ज़ुबान खोली, "मेरी फ्लाईट का वक्त हो रहा है।" "यह तो आज पूरा दिन चलेगा। शहर के अभी कई अन्य गणमान्य व्यक्ति, राजनेता भी आने बाकी हैं। सेठ द्वारकानाथ कोई छोटी-मोटी हस्ती थोड़े थे। उनका कारोबार देश-विदेश में काफ़ी बड़े दायरे में फैला हुआ है। जैसे अंग्रेज़ों के लिए कहा जाता था कि उनका सूरज कभी डूबता ही नहीं था। ठीक द्वारकानाथ जी भी ऐसे ही थे।"

"बंद करो यार ये द्वारकानाथ पुराण।" तीसरे व्यक्ति ने बीच में प्रवेश करते हुए कहा, "सबको पता है द्वारकानाथ, बिजनेस का पर्यायवाची थे। खाते-पीते, सोते-जागते, उठते-बैठते, नहाते-धोते हर वक्त बिजनेस का प्रचार-प्रसार, नफ़ा-नुक्सान ही उनकी ज़िंदगी थी। शेयर बाज़ार की गिरती-बढ़ती हर हलचल उनके मोबाईल से लेकर लेपटॉप तक में दर्ज़ होती थी।"

"यार मुझे तो फ्लाईट पकड़नी है और यात्रा के लिए सामान भी पैक करना है।" पहला व्यक्ति बड़ा बेक़रार था।

"अरे यार चुपके से निकल जाओ। तुमने हाज़री तो लगवा ही दी है। अब यहाँ खड़े-खड़े मुखाग्नि थोड़े दोगे। फिर द्वारकानाथ कौन-सा किसी के सुख-दुःख में शामिल होता था। शायद ही पिछले तीन दशकों में कोई लम्हा बीता होगा। जब द्वारकानाथ जी ने अपने लिए जिया हो।" तीसरे व्यक्ति ने कहा।

"बंद करो ये बकवास। तुम यहाँ मातम मनाने आये हो या गपशप करने। शर्मा जी, हमको और आपको भी जाना है, एक दिन वहां।" चौथे व्यक्ति ने तीसरे व्यक्ति से कहा। और बातचीत में मौजूद तीनों व्यक्ति शर्मिदा होकर चुपचाप खड़े हो गए।

"हाय! हाय! हम अनाथ हो गए।" एक नौकर बोला। बाकी घर के दो-चार अन्य नौकर उससे सहमति दर्शाने लगे।

"हमें कौन देखेगा? सेठजी हमारे पिता की तरह थे।" उस नौकर का बिलाप जारी था।

"हाय! हाय! सेठ जी! क्यों चले गए आप? काश आपकी जगह हमें मौत आ जाती।" दूसरे नौकर ने कहा।

"सेठ द्वारकानाथ जी, उठिए न। आज तो आपको और भी कई महत्वपूर्ण डील फ़ाइनल करनी हैं। हमारी कम्पनियों को आज और भी करोड़ों रुपयों का मुनाफ़ा होना था।" सूट-बूट में खड़े व्यक्ति ने द्वारकानाथ के शव से कफ़न हटाते हुए कहा। शायद वह उनका निजी सचिव या कोई मैनेजर था। उनका चिर-निद्रा में सोया हुआ चेहरा ऐसा जान पड़ रहा था जैसे, अभी उठ पड़ेंगे।

"आख़िर मिल ही गया मुलाकात का वक्त तुम्हे, मेरे अज़ीज़ दोस्त!" एक व्यक्ति जो द्वारकानाथ के शव के सबसे निकट खड़ा था। यकायक बोला।

"आप कौन हैं?" मैनेजर ने उस अनजान व्यक्ति से पूछा।

"आप मुझे नहीं जानते, लेकिन द्वारकानाथ मुझे तब से जानता था, जब वह पांचवी क्लास में मेरे साथ पढता था।" उस व्यक्ति ने बड़े धैर्य से कहा।

"लेकिन आपको तो कभी मैंने देखा नहीं! न ही सेठजी ने कभी आपका ज़िक्र किया!" मैनेजर ने कहा।

"वक्त ही कहाँ था, द्वारकानाथ के पास? मैंने जब भी उससे मुलाकात के लिए वक्त माँगा। वह कभी फ़्लाइट पकड़ रहा होता था। या किसी मीटिंग में व्यस्त होता था। मैं उसे पिछले तीस वरसों से मिलना चाहता था!" उस व्यक्ति ने कहा, "और विडंबना देखिये आज मुलाकात हुई भी तो किस हाल में! जब न तो द्वारकानाथ ही मुझसे कुछ कह सकता है! और न ही मैं द्वारकानाथ को कुछ सुना सकता हूँ।"

इस बीच न जाने कहाँ से पागल फकीर भी द्वारकानाथ के शव के पास ही पहुँच गया था। वह कफ़न को टटोलने लगा और शव को हिलाने-डुलाने लगा।

"ऐ क्या करते हो?" द्वारकानाथ के नौकरों ने पागल फ़क़ीर को पकड़ते हुए कहा।

"सुना है यह सेठ बहुत अमीर आदमी था।" पागल फ़क़ीर ने कहा।

"था तो तेरे बाप का क्या?" मैनेजर ने कड़क कर कहा।

"मैं देखना चाहता हूँ। जिस दौलत के पीछे यह ज़िंदगी भर भागता रहा। अंत समय में आज यह कफ़न में लपेटकर क्या ले जा रहा है? हा हा हा …" पागल फ़क़ीर तेज़ी से हंसने लगा।

"अरे कोई इस पागल को ले जाओ।" मैनेजर चिल्लाया।

"नौकर चाकर छोड़ के, चले द्वारकानाथ। दाता के दरबार में, पहुँचे ख़ाली हाथ।" पागल फ़क़ीर ने ऊँचे सुर में दोहा पढ़ा। भूतकाल में शायद वह कोई कवि था क्योंकि दोहे के चारों चरणों की मात्राएँ पूर्ण थीं। नौकरों ने अपने हाथों की पकड़ को ढीला किया और फ़क़ीर को छोड़ दिया। साथ ही सब पीछे को हट गए। वह कविनुमा पागल फ़क़ीर अपनी धुन में अपनी राह हो लिया।

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