रचनाकार परिचय:-


लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित
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अँधेरी-गळी, आसोप री पोळ रै साम्ही, वीर-मोहल्ला, जोधपुर.[राजस्थान]
मारवाड़ी हास्य-नाटक  [सियासती बकरों को हलाल करने] खंड 10 लेखक और अनुवादक -: दिनेश चन्द्र पुरोहित


[मंच रोशन होता है, रेल गाड़ी का मंज़र सामने दिखाई देता है ! इस वक़्त रशीद भाई, किस्सा बयान करते नज़र आ रहे हैं ! रशीद भाई ठहरे, अस्थमा के मरीज़ ! इसी कारण इतनी देर से, किस्सा बयान करते रहने से... उनकी सांस फूल गयी है...! अब वे, लम्बी-लम्बी सांसें ले रहे हैं ! ताज़ी हवा खाने के लिये, खिड़की खोलते हैं, फिर वे अपने दोस्तों से आगे कहते हैं !]

रशीद भाई – इस तरह मामू का निकाह, दिलावर सेठ की इकलौती बेटी से हो गया ! अब मामू की पांचों अंगुलियां घी में तिरने लगी, वे घर जंवाई बनकर दिलावर खां की हवेली में रहने लगे ! फिर क्या ? अब उनके सर पर दिलावर सेठ और उनकी बेटी की सारी जिम्मेदारी आ गयी, ख़ुदा के मेहर से उन्होंने दारु छोड़ दिया है ! बाद में वे, ख़ुशहाल ज़िंदगी बसर करने लगे !

[अब रेल गाड़ी की रफ़्तार, कम होती जा रही है ! रशीद भाई उठकर, बैग से साबुन की टिकिया और नेपकीन बाहर निकालते हैं ! नेपकीन को अपने कंधे पर रखते हुए, कहते हैं!]

रशीद भाई – [नेपकीन को कंधे पर रखते हुए, कहते हैं] – किस्सा बयान करते-करते मुझे मालुम ही नहीं पड़ा कि, कितना वक़्त बीत गया है ? अब पीर दूल्हे शाह हाल्ट आने वाला है ! अब चलते हैं, बाबा का हुक्म हो गया है ! [टुसकी [पाद] की, दुर्गन्ध फैलती है]

सावंतजी – [रुमाल से नाक दबाकर, कहते हैं] – कमबख्त, पूरे दिन चरता रहता है ! तेरे जैसे लोगों के पास बैठना अब हो गया है, नाक़ाबिले बर्दाश्त ! नामाकूल तूझे शर्म नहीं आती, पास बैठा-बैठा न मालुम कब से तोप छोड़ता जा रहा है ? भगवान जाने, न मालुम, क्या-क्या खाता रहता है दिन-भर ? मुर्गमुस्सलम, कबाब...अरे रामसा पीर, पूरे केबीन में बदबू फैला दी इस कमबख्त ने ? या तो अब बैठे-बैठे इसका पाद सूंघते जाओ, या फिर केबीन बदल डालो !

दीनजी – क्या करें, सावंतजी ? फुठर मलसा के पास बैठें तो ज़र्दे से कपड़े ख़राब होंगे, और साथ में अपने इस सुन्दर मुखड़े पर थूक और ज़र्दे का मेक-अप भी हो जाएगा ! रशीद भाई के पास बैठें तो, बैठे-बैठे इनका पाद सूंघते जाओ भय्या ! परेशानी दोनों ओर है, सावंतजी सेठ ! अब आप, बर्दाश्त करना सीखो ! ज़नाब यह अपना घर नहीं है, रेल गाड़ी है..यहां यह सब-कुछ चलता है !

[रशीद भाई इनके कोमेंट्स सुनते-सुनते, आख़िर नाराज़ हो जाते हैं ! अब वे इन सबको, खारी-खारी नज़रों से देखते जाते हैं ! फिर बड़बड़ाते हुए, वे पाख़ाने की ओर अपने क़दम बढ़ा देते हैं ! तभी इनको पाख़ाने से बाहर आते, फुठर मलसा दिखाई दे जाते हैं ! उनको देखने के बाद भी, वे बड़बड़ाना बंद नहीं करते हैं !]

रशीद भाई – [बड़बड़ाते हुए, कहते हैं] – ये कैसे हैं, मेरे दोस्त ? इन मर्दूदों को किस्सा सुनना होता है, तब मेरा यह मेरा पाद इनको गुलाब के इत्र की सुगंध देता है ! किस्सा खत्म होते ही, इस पाद से इनको दुर्गन्ध आती है !

फुठर मलसा – [सामने से आते हुए, कहते हैं] – क्या कहा रे, रशीद ? गुलाब के इत्र की सुगंध आती है, या दुर्गन्ध ? क्या बात है, कढ़ी खायोड़ा ? तेरा नाक तो ख़राब नहीं हो गया, रशीद ?

रशीद भाई – [चिढ़े हुए, कहते हैं] – करम फूटे हुए हैं, मेरे...अब क्या पूछते हो, मुझे ? अभी-अभी आपकी तारीफ़ सुनकर आया हूं, अब आप जाकर सुन लीजिये..आपके ये दोस्त, आपकी शान में क्या कसीदे निकाल रहे हैं ?

[इस तरह झगड़े के बीज बोकर रशीद भाई, तो फटा-फट दाख़िल हो जाते हैं पाख़ाने में ! उधर फुठर मलसा हो जाते हैं उतावले कि, कितना जल्दी इन साथियों के पास जाकर तहक़ीकात करें.... कि, वे इनके बारे में क्या कह रहे थे ? फिर, क्या ? वे झट जा पहुंचे, केबीन में और वहां पहुंचकर उन लोगों को खिल खिलाकर हंसते देखकर, वे भौंए चढ़ाते हुए उनसे कहते हैं !]

फुठर मलसा – [भौंए चढ़ाते हुए, कहते हैं] – भोड़ा, क्या कर रहे हो यहां बैठे-बैठे ? क्यों आग में घी डाल रहे हो, कढ़ी खायोड़ा ? कुछ कहना है तो मेरे सामने कह दीजिये, पीठ पीछे हिज़ड़ों की तरह हीಽಽ हीಽಽ करते जा रहे हो यार ?

ठोक सिंहजी – हुज़ूर ! हिज़ड़ों की बातें आप जानते होंगे, मालिक ! आप तो है, ज़नाब..क्या कहते हैं महापुरुष..

सावंतजी – हुज़ूर, महापुरुष यानि..

ठोक सिंहजी – [मुस्कराते हुए, कहते है] – आप ही कहिये..[धीरे-धीरे, कहते हैं] जनाब, आप तो पुरुष ही नहीं हैं !

[माइंड डाइवर्ट करने के लिए, फुठर मलसा जेब से पेसी निकालते हैं ! फिर पेसी को खोलकर उसमें से ज़र्दा और चूना निकालकर हथेली पर रखते हैं ! ज़र्दा और चूने को मिलाकर अंगुठे से मसलकर खेनी तैयार करते हैं ! इसके बाद, डाकू गब्बर सिंह की तरह उस खेनी की गोली बनाते हैं ! फिर मुंह खोलकर, उसमें फेंकते हैं...जो सीधी जाकर, उनके होठों के नीचे चली जाती है ! इस तरह होंठों के नीचे खेनी दबाकर, फुठर मलसा डाकू गब्बर सिंह की तरह गरज़ते हैं ! मगर, उन्हें क्या पता ? खेनी तैयार करते वक़्त, ज़र्दे की खंक उड़कर बेचारे ठोक सिंहजी के नासाछिद्रों में चली गयी हैं ! फिर क्या ? वे छींकों की झड़ी लगा देते हैं ! छींकते-छींकते वे अपना स्थान बदलकर, कहते हैं..]

ठोक सिंहजी – हुज़ूर ! [छींकते हैं] आंक...छींಽಽ..आंक...छींಽಽ ! आप तो ज़नाब, महापुरुष हैं ! [धीरे-धीरे कहते हैं] मगर, आप पुरुष नहीं हैं !

फुठर मलसा –[ज़ोर से कहते हैं] – क्या बोला रेಽಽ.., ठोक सिंह ? [सावंतजी के पास बैठ जाते हैं, आगे आने वाली आफ़त से बचने के लिए, सावंतजी झट अपने मुंह पर रुमाल रख देते हैं]

ठोक सिंहजी – अरे ज़नाब, मैं तो आपकी शान में कसीदे निकाल रहा हूं ! कितना सस्ता है, आपका यह नशा ? [वापस छींकते हैं] आंक छीं ಽಽ ! हुज़ूर ! जुकाम, खांसी वगैरा सभी रोग दूर हो जाते हैं, इस ज़र्दे के सेवन करने से !

सावंतजी – [लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए, कहते हैं] – बीमारी दूर हो जाती है, और इसके साथ आपके पास बैठने वाले मुसाफिर ज़र्दे की बरसात से डरकर केबीन छोड़कर चले जाते हैं ! फिर क्या ? फायदा ही फ़ायदा ! हम लोगों को बैठने के लिए सीट मिल जाती है ! बस, हम झट कब्ज़ा कर लेते हैं, उन सीटों पर !

[अब बेचारे फुठर मलसा क्या कहते ? उनके समझ में कुछ नहीं आ रहा है, ये इनके साथी उनकी मज़ाक़ उड़ा रहे हैं या उनकी शान में कशीदे निकाल रहे हैं ? इधर आली ज़नाब कुछ कहना भी चाहते हैं, मगर कैसे बोलते ? उनके मुंह में ठूंसा हुआ ज़र्दा, उनको बोलने नहीं देता ? मगर, उनसे बोले बिना रहा नहीं जाता ? तभी रेल गाडीकी रफ़्तार धीमी हो जाती है, पीर दूल्हे शाह हाल्ट स्टेशन आ जाता है ! गाड़ी के रुकते ही, फुठर मलसा खिड़की से मुंह बाहर निकालकर ज़र्दे की पीक थूकते हैं ! तभी तेज़ हवा का झोंका आता है, और मुंह से निकला ज़र्दा और थूक ‘बरसात के छींटों’ की उछलता है ! और ये छींटें उछलकर, प्लेटफोर्म पर खड़ी मोहतरमा के ऊपर गिरते हैं ! इस बदबूदार ज़र्दे और थूक की बरसात का आभास पाकर, वह मोहतरमा इधर-उधर निग़ाहें डालती है ! उसे भय है, कहीं किसी यात्री ने, खिड़की के पास आकर पानी से जूठे हाथ न धो डाले हो ? ज्यों ही उसकी निग़ाहें, पीक थूक रहे फुठर मलसा पर गिरती है ! बस, फिर क्या ? गुस्से से भरी वह मोहतरमा फुठर मलसा और उनकी आने वाली सात पुश्तों को, मुग्लजात बकती हुई हुड़दंग मचाने लगती है !]

मोहतरमा – [दोनों हाथ कमर पर रखकर, कहती है] – अरे, ए दोज़ख़ के कीड़े ! बोल तू, मेरी ओढ़नी को नापाक कैसे कर डाली ! ओ दोज़ख़ के कीड़े, तेरी सात पुश्तें जाए जहन्नुम में ! हरामखोर कहीं के !

फुठर मलसा – [खिड़की से मुंह बाहर निकालकर, कहते हैं] – अरी, ए फातमा ! हम तो जा रहे हैं, पाली..सरकारी टूर पर ! अगर तूझे दोज़ख़ में जाने का शौक है तो, क्या तेरे अल्लाह मियां के पास तेरी शिफायत लगा दूं ? [ठहाके लगाकर, हंसते हैं]

[उनका इस तरह ख़िलखिलाकर हंसना, उस मोहतरमा को कैसे अच्छा लगता ? वह तो झट निकालती है, दायें पांव से ऊंची एडी का सैंडल ! फिर उसे सेबरजेट की तरह फेंकती है, फुठर मलसा के ऊपर ! तभी इंजन सीटी दे देता है, और आसकरणजी टी.टी.ई दरवाज़े के खड़े होकर अन्दर दाख़िल होने की कोशिश करते हैं ! मगर, यह क्या ? चालाक फुठर मलसा अपना मुंह झट खिड़की के अन्दर ले लेते हैं, अब वो सैंडल दरवाज़े के पास खड़े आस करणजी के सर को चटका देता है ! यह मंज़र देखते ही, फुठर मलसा ख़िलखिलाकर ज़ोर से हंस पड़ते हैं ! उनके हंसी के ठहाके सुनकर, उस मोहतरमा के दिल पर क्या गुज़री होगी ? बस बेचारी मुंह उतारे, चलती रेल गाड़ी को देखती रही ! इधर आस करणजी अपना सर दबाते हुए, केबीन में आते हैं और आकर फुठर मलसा के पास बैठ जाते हैं ! सर दबाते-दबाते, वे दीनजी भा’सा से कहते हैं !]

आस करणजी – [दीनजी भा’सा से, कहते हैं] – दीनजी भा’सा ! आपने आज बाल गोपाल का प्रसाद नहीं दिया, कोई बात नहीं ज़नाब ! मगर फुठर मलसा ने दिलवा दिया मुझे ऐसा प्रसाद, जो...

ठोक सिंहजी – [लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए, कहते हैं] – क्या कह रहे हैं, हुज़ूर ? कहीं, किसी हूर के सैंडल का प्रसाद ?

सावंतजी – कुछ नहीं, मालिक ! फुठर मलसा तो रोज़ ऐसा प्रसाद खाया करते हैं, आज आपके भाग्य अच्छे..यह महाप्रसादी, आपको मिल गयी ! वो भी एक सुन्दर मोहतरमा के हाथ से ? [फुठर मलसा की ओर देखते हुए, कहते हैं] साहब, सच्च बात कही ना ?
[रेल गाड़ी की रफ़्तार बढ़ती जा रही है, थोड़ी देर बाद पाली की कृषि-मंडी और आवासन-मंडल की कोलोनी दिखाई देने लगी ! अब रशीद भाई पाख़ाने से निपटकर, केबीन में आ गए हैं ! बैग के अन्दर नेपकीन और साबुन की टिकिया रखकर, सावंतजी के पास बैठ जाते हैं ! पीर दूल्हे शाह हाल्ट पर बीते किस्से को पूरा सुनकर, वे फुठर मलसा से कहते हैं !]

रशीद भाई – साहब, गेहूं के साथ धूण भी पिसा जाता है ! बस, आप हम लोगों को आप धूण ही समझ लीजिएगा ! हमें डर लगता है, आपकी हरक़तों से ! कहीं आपकी हरक़तों के कारण,हमारे सर पर चांदमारी न हो जाय ? इसलिए आप हाथ-पानी ले लीजिएगा कि, आगे से आप ज़र्दा सेवन नहीं करेंगे ! अगर ऐसा नहीं करते हैं आप, तो फिर आप हमारा साथ छोड़ दीजिएगा !

फुठर मलसा – [मुस्कान अपने लबों पर छोड़ते हुए, कहते हैं] – क्यों दांत निपोरकर, मेरा सर खा रहा है ? मेरा तबादला हो गया यार, कब का साथ छोड़ चुका हूं तुम लोगों का ! इतना भी भूल गए तुम, तबादला हुए काफ़ी दिन बीत गए हैं !

रशीद भाई – हमें, कैसे मालुम होगा ? आपने जाते वक़्त, कब स्नेह-मिलन की चाय पिलायी हमें ? हुज़ूर, अभी पाली स्टेशन पर पिला दीजिये चाय, तब हम सभी मान लेंगे कि, आपका तबादला जोधपुर हो गया और आप हम-सबको छोड़कर चले गए !

फुठर मलसा – छोड़कर जाए, मेरे दुश्मन ! कमबख्तों क्या तुम मुझे, इस खिलक़त को छोड़ने का कह रहे हो ? अब तुम लोग चले जाओ, झट बैग लेकर डब्बे के दरवाज़े के पास ! पाली स्टेशन आ गया है !

सावंतजी – [बैग उठाकर, कहते हैं] – अब जा रहे हैं, ज़नाब ! [आस करणजी से, कहते हैं] मालिक, क्या आप आराम से बैठे हैं ? आज फुठर मलसा, हमारे पाली डिपो चलेंगे ! आप भी चलिए हमारे साथ, आली ज़नाब आपको स्थान-स्थान पर जूत्तों का प्रसाद खिलाते रहेंगे ! चलिए, चलिए हुज़ूर !

[बेचारे आस करणजी खिसियानी सूरत बनाए, उन सबको जाते हुए देखने लगे ! अब पाली स्टेशन आ गया है, रेल गाड़ी के रुकते ही पाली उतरने वाले सभी यात्री प्लेटफोर्म पर उतरने लगे ! ठोक सिंहजी, रशीद भाई, सावंतजी और दीनजी भा’सा रूख्सत होते नज़र आ रहे हैं ! थोड़ी देर बाद, इंजन की सीटी सुनायी देती है ! फुठर मलसा झट अपना बैग उठाकर, प्लेटफोर्म पर उतर जाते हैं ! अब रेल ने गाड़ी स्टेशन छोड़ दिया है, धीरे-धीरे इसकी रफ़्तार बढ़ती जा रही है ! मंच पर, अंधेरा छाने लगता है ! थोड़ी देर बाद, मंच वापस रोशन होता है ! पाली डिपो का मंज़र सामने आता है, डिपो मैनेजर का दफ़्तर दिखाई देता है ! दफ़्तर के कमरे के अन्दर, बेंच पर रशीद भाई और सावंतजी बैठे हैं ! नीचे ज़मीन पर बिछी जाजम पर करणी दानजी बैठे हैं, वे इन दोनों से गुफ़्तगू कर रहे हैं !]

रशीद भाई – अच्छा हुआ, आज काजू साहब के कमरे में अधिकारियों की बैठक चल रही है ! बड़ी मुश्किल से हम लोगों को, थोड़ा आराम करने का मौक़ा मिला है ! न तो ये अधिकारी लोग कभी हम लोगों को मौक़ा नहीं देते, आराम करने का !

सावंतजी – [चिढ़ते हुए, कहते हैं] – ऐसा आप लोग, करते क्या हैं ? हमाली करते हो, अनाज की बोरियां उठाते हो ? आप तो ऐसे हो कमबख्त, झट मौक़ा पाकर पहुंच जाते हो उस छप्परे के नीचे..जहां यह अफ़ीमची पड़ा रहता है नशे में ! अगर ये करणी दानजी न होते तो, रशीद भाई आपको रोज़ इन अधिकारियों के उलाहने सुनने पड़ते !

रशीद भाई – दमे की बीमारी है, भाईजान ! क्या करूं, मुझे बार-बार ताज़ी हवा खाने खुली हवा में आना पड़ता है ! जितनी ताकत है इस शरीर में, उतना तो काम मैं करता ही हूं !

करणी दानजी – जाने दीजिये, सावंतजी ! बेफिज़ूल की बकवास लेकर, आप क्यों बैठ गए ज़नाब ? जब-तक इस नौकरी में हूं, और यहां का अन्न-जल लिखा है तब-तक करता रहता रहूंगा इनकी मदद ! सेवानिवृत होने के बाद, रशीद भाई जाने और इनका काम जाने !

सावंतजी – करणी दानजी ! इस खबीस को छोड़िये ! इससे बड़ा ख़बीस माना राम की तो, आपके बिना बारह बज जायेगी..आपके जाने के बाद, कौन करेगा उसकी
मदद ? मैं तो चला जाऊंगा जोधपुर, तबादला करवाकर ! फिर..

करणी दानजी – फिर..फिर बाद में बोलते रहना ! पहले उसे ढूंढिये, वह नशेड़ी कहाँ चला गया ? वह कुत्तिया का ताऊ, सुबह से दिखाई नहीं दे रहा है ?

सावंतजी – होगा कहीं, पड़ा होगा छप्परे के नीचे ! कमबख्त...

रशीद भाई – भाईजान आप ऐसे मत कहिये, बल्कि वहां चलकर उनकी खैरियत पूछनी चाहिए ! बेचारे पंडितजी, गोयल अस्पताल से डिस्चार्ज होकर आये हैं ! उन्होंने पूरा इलाज़ भी नहीं लिया है, अब क्या करेंगे बेचारे ?

सावंतजी – इलाज़ ? [मुस्कराकर, आगे कहते हैं] अरे यार, ये माना रामसा है एक नंबर के अफ़ीमची ! इन्होंने कब लिया, पूरा इलाज़ ? अरे ज़नाब, इनको तो चाहिए सुबह और शाम..अफ़ीम ! वहां किसको गर्ज़ पड़ी है, जो इनको अफ़ीम लाकर देगा ? वह अस्पताल है, ज़नाब ! इस अफ़ीम को आने ही नहीं देते, अपने परिसर में !

रशीद भाई – [सावंतजी का कंधे दबाते हुए, कहते हैं] – कुछ भी हो, भाईजान ! आख़िर माना रामसा है तो, अपने साथी ! इनकी खैरियत पूछना, हमारा फ़र्ज़ है ! चलना तो पडेगा, भाईजान आपको !

सावंतजी – [कंधों से उनके हाथ दूर लेते हे, कहते हैं] – तीमारदारी तूझे अच्छी लगती है, मियां ! तू जाकर कर लेना, उनकी तीमारदारी ! हम तो उस छप्परे के नीचे बैठकर, खायेंगे खाना ! ले लीजिये अपना अपना खाने का टिफ़िन, और चलिए छप्परे के नीचे !

[अब सावंतजी, ठोक सिंहजी, रशीद भाई और करणी दानजी टिफ़िन लिए आते हैं ! सभी खाने का टिफ़िन लेकर, छप्परे की तरफ़ अपने क़दम बढ़ाते हैं ! मंच पर, अंधेरा छाने लगता है ! थोड़ी देर बाद, मंच वापस रोशन होता है ! छप्परे के नीचे, माना रामसा अफ़ीम के नशे में लेटे हैं ! उनके पास ही बारदान की बोरियां बिछी हुई है ! इन बिछी बोरियों पर बैठकर, वे सभी अपने टिफिन खोलते है ! टिफ़िन खोलते ही, सब्जियों की महक फैलती है ! अब यह महक, माना रामसा के नासछिद्रों में चली जाती है ! यह महक पहुंचते ही, वे चेतन हो जाते हैं ! वे झट उठ जाते हैं, और दोनों हाथ ऊपर ले जाते हुए अंगड़ाई लेते हैं ! अब वे, आराम से बैठ जाते हैं ! फिर, वे कहते हैं !]

माना रामसा – [हाथ ऊपर ले जाकर, अंगड़ाई लेते हुए कहते हैं] – जय जय शिव शंकर, कांटा लगे न कंकर ! [हाथ पर लगी घड़ी को, देखते हैं] अरे रे ಽಽ रे ಽಽ, भोले शिಽಽव शम्भु ! भूल गया उस्ताद, आपको प्रसाद चढ़ाना ! [जेब से, अफ़ीम की पुड़िया निकालते हैं]

रशीद भाई – अरे ಽಽ पंडितजी, यह क्या कर रहे हैं ज़नाब ? अभी आप प्रसाद चढ़ाएंगे और फिर हमें यह प्रसाद बांटोगे, इस तरह आप हम सबको बना देंगे अफ़ीमची !

[रोटी का निवाला, सब्जी में डूबाकर खाते है]

माना रामसा – ए मोमीन की औलाद, तू अपने आपको कैसे दिखला रहा रहा है..इमाम ? साले ना तो तू करता है वज़ू, और न अता करता है जुम्मे की नमाज़ ! अब बड़ा आया, मेरे महादेव को अफ़ीमची बनाने वाला ? अब बता तू, बिना नमाज़ अता किये कैसे रोटी गटक रहा है ? अब बोल, बिस्समिलाह कौन करेगा ?

सावंतजी – अरे पंडित,अब सब चलता है ! यह केवल अपने मन की सोच है, और कुछ नहीं ! अब सुन, जिस मैदान में हम लोग लघु-शंका करने जाते हैं..तू उसी स्थान पर गड्डा खोदकर उसमें अफ़ीम की थैली छुपाकर आता है ! फिर जब तूझे वक़्त मिलता है, तब तू गड्डा खोदकर ले अता है उस अफ़ीम को..और अरोग लेता है ! गधे ! यदि कभी इन कस्टम वालों को मालुम हो गया तो, ये नामुराद तूझे हवालात के अन्दर बैठा देगे !

करणी दानजी – अस्पताल की हवा तो खाकर आ गए, माना रामसा ! अब हवालात की हवा खानी बाकी है ! यह हवा खा लेंगे, फिर तो ज़नाब को आराम ही आराम है ! निलंबित हो गए तो, फिर क्या ? बबूल की छांव में, आराम से पड़े रहेंगे ! बबूल नहीं नज़र आया तो, ज़नाब इस छप्परे के नीचे पड़े रहेंगे...आख़िर खानी तो इनको हवा ही है ! फिर इनको, दफ़्तर आने की तकलीफ उठाने क्या ज़रूरत ?

सावंतजी – पंडितजी आकर, करते भी क्या ? अफ़ीम ठोककर, छप्परे के नीचे सो जाते है ! इनके लिए हवालात की हवा खानी या छप्परे के नीचे हवा खानी, बात तो एक ही है ! आख़िर, खानी तो हवा ही है !

[अचानक एक कुत्ता भौंकता हुआ आता है वहां, जहां उनसे कुछ क़दम दूर नीम के पेड़ की नज़दीक जाने का प्रयास करता है ! मगर ठोक सिंहजी उसे वहां जाने नहीं देते, वहां से एक पत्थर लेकर तड़ाक से उस पर फेंकते हैं ! बेचारा कुत्ता दुम दबाकर, भग जाता है ! यह मंज़र देखकर, रशीद भाई के दिल में रहम की दरिया प्रवाहित होती है ! वे ठोक सिंहजी की बात बिना सुने, उनको उलाहना देने बैठ जाते हैं !]

रशीद भाई – ठोक सिंहजी ! यह ग़लत काम कर डाला, आपने ! यहां तो रोज़ मैं , इस कुत्ते को रोटी खिलाता हूं ! और आप इस कुत्ते पर पत्थर फेंककर, कर रहे हैं गुनाह ?

[तभी वो कुत्ता वापस लौट आता है, उसे आया देखकर रशीद भाई झट टिफिन में बची रोटी निकालकर उसकी तरफ़ फेंकते हैं ! फिर क्या ? वह कुत्ता उस रोटी को मुंह में दबाकर, चला जाता है !]

ठोक सिंहजी – [समीप आकर, कहते हैं] – क्या आपको मालुम है, या आप आंखें होते हुए भी अंधे बने बैठे हैं ? लोग दिखावे सेवाभावी बने फिरते हैं, आप ? आंखें खोलकर, देखो सामने ! फिर कहूंगा मैं, आपकी आंखें है या आलू ? देखिये, पेड़ के नीचे क्या पड़ा है ? यह चीಽಽ चींಽಽ करता जा रहा कौए का बच्चा, आपको दिखाई नहीं दे रहा है ?

[ज़मीन पर पड़ा कौए का बच्चा चींಽಽ चींಽಽ करता, अपने मां-बाप को पुकार रहा है ! इस बच्चे की तरफ़, अंगुली का इशारा करते हुए ठोक सिंहजी कहते हैं !]

ठोक सिंहजी – [कौए के बच्चे की तरफ़, इशारा करते हुए कहते हैं] – यह बच्चा घोंसले से बाहर निकलकर नीचे ज़मीन पर गिर गया ! यह कुत्ता दौड़कर आया था, इसे खाने ! क्या इस बच्चे को बचाना, कोई गुनाह है ?

[रशीद भाई बड़े ध्यान से, नीम तले पड़े उस कौए के बच्चे को देखने लगे ! उस बच्चे के पूरे पंख आये नहीं है, जिससे वो बेचारा बच्चा, उड़ नहीं पा रहा है ! वह चीं चीं करता, अपने मां-बाप को लगातार पुकारता जा रहा है ! उस बच्चे के मां-बाप कांव-कांव करते, उस पर मंडराते जा रहे हैं !]

सावंतजी – [बीच में, बोलते हैं] – ऐसे आप रहमदिल हैं, तो रख दीजिये ना इस बच्चे को वापस उसके घोंसले में ! बड़े बने फिरते हैं आप, सेवाभावी ?
तभी जोगा राम चाय वाले का छोरा कानिया सामने सेआता दिखाई देता है, आते वक़्त वह इन लोगों की बातें सुन लेता है ! अब वह इनके पास आकर, केतली से चाय कपों में भरकर इन सबको थमा देता है ! फिर वह, रशीद भाई से कहता है !]

कानिया – [रशीद भाई से कहता है] – चच्चा, आप बड़े सेवाभाई ठहरे ! बस, अब आप इस कौए के बच्चे को उठाकर इसके नीड़ में रख आयें ! आपसे रखा नहीं जाता तो मैं स्वयं पेड़ पर चढ़कर, इस बच्चे को रख आऊंगा..इसके घोंसले में !

सावंतजी – तू रखकर क्यों आयेगा, क्या तू सेवाभावी है ? इस जगत में यह सेवाभावी का टाइटल रखने वाले, केवल ये तेरे चच्चा रशीद भाई ही है ! इनके सिवाय, कौन बन सकता है, सेवाभावी ? अभी पलक झपकाते ये रखकर आ जायेंगे इसे, इसके नीड़ में ! और तू यहां खड़ा-खड़ा, देखता ही रह जाएगा !

रशीद भाई – [तैश में आकर, कहते हैं] – छोरा कानिया, तू देखता रह ! अभी इस कौए के बच्चे को, इसके नीड़ में छोड़कर आता हूं ! [जेब से रुमाल निकालते हैं]

कानिया – अरे ज़नाब, थोड़ा रुक जाइए ! मैं अभी तगारी लेकर आता हूं !

[इतना कहकर कानिया पेड़ के नीचे रखी तगारी उठाकर लाता है ! फिर, कहता है !]

कानिया – [तगारी थमाता हुआ, कहता है] - आप इस तगारी को अपने सर पर टोप की तरह रख दीजिये, फिर पेड़ पर चढ़ने का प्रयास करना !

रशीद भाई – [तगारी को नीचे ज़मीन पर रखकर, कहते हैं] – तू क्या ज्यादा समझदार है ? जोगिया का छोरा, कल का जन्मा आज तू मुझे सीख दे रहा है ? जानता है, तू ? मेरे साहब है दयाल साहब, जो विज्ञान के अच्छे जानकार हैं ! उनके पास रहकर मैं सीख गया हूं कि, किसी परिंदे को हाथ से उठाना नहीं चाहिए ! ताकि, उसके बदन के जर्म्स अपने हाथों पर न लगे ! ठोकिरा, कुछ समझा या नहीं ?

कानिया – अरे चच्चा ! आप सर पर तगारी रख लीजिएगा, फिर पेड़ पर चढ़ना ! आप नहीं जानते, इन कौओं की आदतें !

रशीद भाई – चुप रह, शैतान ! क्या यहां तू समझदार की पूंछ बनकर आया है....बावली पूंछ ? क्या तेरे कहे-कहे मैं इस तगारी को सर पर रख दूंगा, केज्युअल लेबर की तरह ?

[रशीद भाई रुमाल से उस कौए के बच्चे उठा लेते हैं, फिर नीम के पेड़ पर चढ़ते हैं ! फिर क्या ? अपने बच्चे को खतरे में पाकर, यह कौओं की जोड़ी रशीद भाई की टाट पर चोंचे मारने लगी ! चोंचों का वार झेलते हुए, रशीद भाई आकर नीचे ज़मीन पर गिरते हैं ! और, दर्द के मारे वे चीत्कार उठते हैं !]

रशीद भाई – [चित्कारते हुए, कहते हैं] – हाय अल्लाह, मर गया ! मर गया रेಽಽ ! सूज़ा दी मेरी टाट !

[एक हाथ से अपनी टाट सहलाते हैं ! रशीद भाई इतने क़मजोर आदमी नहीं है, वे जोश में आकर एक बार और उस बच्चे को हाथ में थामे चढ़ते हैं पेड़ पर ! फिर आयी, शामत ! कौओं की जोड़ी वापस उनकी टाट पर चोंचे मारने लगी ! चोंचों का प्रहार करते-करते, उस कौए की जोड़ी ने उनकी टाट लहूलुहान कर डाली ! इस तरह रशीद भाई कई बार पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करते रहे, मगर उनको सफलता मिलने का कोई सवाल नहीं ! फिर क्या ? वे जिद्द पर उतर गए कि, किसी तरह उस बच्चे को उसके नीड़ में रखकर आयेंगे ! इस तरह पक्का निश्चय करके, वे अपने साथियों से कहते है !]

रशीद भाई – मैं इस मामूली कौओं की जोड़ी से हार मानने वाला नहीं हूं, इस बच्चे को इसके नीड़ में रखकर ही आऊंगा !

कानिया – मान जाओ, चच्चा ! तगारी को रख दीजिएगा, अपने सर पर ! अब तो आपको अक्ल आ जानी चाहिए, इतनी चोटें खाने के बाद ?

रशीद भाई – तू क्या समझता है, भंगार के खुरपे ? देख, अभी रखकर आता हूँ इसे..इसके नीड़ में !

कानिया - [ज़ोर से, कहता है] – चच्चा ! रहने दीजिए, फिर भी आप मेरा कहना नहीं मानते हैं तो आप मुझसे शर्त लगा दीजिएगा ! शर्त यही है, आप इस कौए के बच्चे को हाथ में थामे इस दफ़्तर के चारों ओर दो चक्कर लगा दीजिएगा ! चक्कर काट लेंगे तो आपका एक रूपया और मेरे सौ रुपये...फिर मैं मान जाऊंगा कि, आप कितने अक्लमंद और बहादुर आदमी हैं ! तब...

रशीद भाई – [क्रोधित होकर, कहते हैं] – कुत्तिया के ताऊ ! तूने पूरा प्लान बना रखा है, मेरी टाट को चटकाने का ? अब मैं पहले तूझे यह कह रहा हूं कि, भंगार के खुरपे, या तो पहले तू रख यहां एक सौ एक रुपये, या फिर यहां बुलाकर लाता हूं तेरे बाप जोगिए को ! वह यहां खड़ा रहेगा, गवाह बनकर ! अगर तू नहीं देगा रुपये, तो तेरे बाप से वसूल कर लूंगा ! समझ गया, या नहीं ?

[बाप के बुलावे की बात सुनते ही, छोरा डरता है ! फिर क्या ? खाली केतली और जूठे कप उठा लेता है, और चलने की तैयारी करता है ! मगर वो ठहरा, कुबदी नंबर एक ! रशीद भाई का दिल जलाने के लिए, एक जुमला अलग से बोलकर चल देता है !]

कानिया- अरे चच्चा, आप डस्ट ऑपरेटर ही बने रहो ! इस तगारी को काम में लेकर, आप केज्युअल लेबर मत बनना ! तो मैं जान लूंगा क..क... ? अपनी टाट पर कौओं की चोंचो का प्रहार झेलते हुए, इस टाट को बना देना मतीरा !

रशीद भाई – अबे जा रहा है, या नहीं ? नहीं जाता है तो, तेरे सर पर चार ठोले मारकर उसे तबले के माफ़िक बना दूं..? [उसे ठोकने की स्टाइल से अपना हाथ ऊपर लेकर उसे डराते हैं, फिर कहते हैं!] बड़ा आया, तीसमारखां ? मुझे ही सीख देने चला, नामुराद !

[कानिया तो ठहाका लगाता हुआ, वहां से भग जाता है !]

ठोक सिंहजी – [हंसी के ठहाके लगते हुए, कहते हैं] – अबे ओ सेवाभावी..अल्लाह के बन्दे ! अब आपके दिल में सेवा करने की मंशा रह गयी, क्या ? नीड़ में बच्चे को नहीं रखना है तो, आप साफ़-साफ़ मना कर दीजिये ! और कह दीजिये कि, मैं हार गया !

रशीद भाई – सेवाभावी हूँ, मुझे सेवाभाव का धर्म निभाना है ! जीव-जंतुओं की सेवा करना मेरा पहला फ़र्ज़ है ! अब भले कुछ भी हो, मैं इस बच्चे को इसके नीड़ में रखकर ही धैर्य धारण करंगा ! चाहे ये कौए कितना ही खून निकाल दे, मेरी टाट से ! मुझे, कोई परवाह नहीं ! चाहे, मेरी जान निकल जाए ! मैं इस पुण्य कार्य को करके, गर्व महशूश करूंगा !

[फिर क्या ? जोश में आकर तगारी को अपने सर पर रखते हैं, फिर उस कौए के बच्चे को हाथ में लिए चढ़ते हैं नीम के पेड़ पर ! आदत से लाचार दोनों परिंदे तगारी के ऊपर चोंचों का वार करते गए, यह रशीद भई की टाट तो है नहीं ! यह ठहरी लोहे की तगारी,अब ख़ुदा ही जानता है उन परिदों की चोंचों की क्या हालत हुई होगी ? अचानक, लंगड़िया साहब के पुकारने की आवाज़ सुनायी देती है !]

लंगड़िया साहब – [स्टोर रूम से, उनके पुकारने की आवाज़ आती है] – ए रे, रशीद ! सावंत सिंह..! कहाँ मर गए, तुम सभी ? यहां आ जाओ ! डेल्टा पाउडर तोले बिना, कहाँ चले गए ? अब कौन तोलेगा, मेरे बाप ? अब जल्दी आओ, स्टोर में !

[उनकी आवाज़ सुनकर, करणी दानजी दफ़्तर की तरफ़ मुंह करते हैं ! मगर सावंतजी, रशीद भाई और ठोक सिंहजी ठहरे, गाड़ी के मुसाफिर ! उन्होंने झट टिफिन को बैग में रखा और अपने क़दम में गेट की तरफ़ बढ़ा देते हैं ! रास्ते में, सावंतजी कहते हैं !]

सावंतजी – ढाई बज गए हैं, अभी बेंगलूर एक्सप्रेस ज़रूर मिल जायेगी ! अब जल्दी चलो ! पतली गली से निकलना ही अच्छा, कहीं लंगड़िया साहब हमें रोक न दे ?

[थोड़ी देर बाद वे तीनों में गेट पर खड़ी ट्रक में चढ़ जाते हैं ! अब यह ट्रक, रेलवे स्टेशन की ओर दौड़ती हुई दिखाई देती है ! मंच पर, अंधेरा छाने लगता है !]

[मंच पर, रोशनी फ़ैल जाती है ! रेल गाड़ी का मंज़र, सामने आता है ! शयनान डब्बा दिखाई देता है, जिसके एक केबीन में सावंतजी, रशीद भाई, फुठर मलसा, ठोक सिंहजी और दीनजी भा’सा बैठे दिखाई दे रहे हैं ! रोज़ की आदत के अनुसार फुठर मलसा ने खिड़की वाली सीट पर अपना कब्ज़ा जमा रखा है ! दीनजी और सावंतजी आपातकालिन खिड़की के पास वाली सीटों पर बैठे हैं ! फिर बाकी रहे, कौन ? ठोक सिंहजी और रशीद भाई, वे इन लोगों के आस-पास वाली सीटों पर बैठ गए हैं ! अब फुठर मलसा को ज़र्दे सेवन करने की तलब, परेशान कर डालती है, वे झट पेसी से ज़र्दा और चूना निकालकर बायीं हथेली पर रखते हैं, फिर इन दोनों को अच्छी तरह मिलाकर अंगूठे से मसलकर सुर्ती तैयार करते हैं ! फिर वे दायें हाथ से उस मिश्रण पर लगाते हैं, ज़ोर की थप्पी ! जिससे ज़र्दे की खंक उड़ती है ! यह खंक केबीन में दाख़िल हो रहे चाय वाले के नासा-छिद्रों में, चली जाती है ! फिर क्या ? वह बेचारा, तड़ा-तड़ा छींकों की झड़ी लगा देता है !]

चाय वाला – [केबीन में दाख़िल होता हुआ] – आंक छींಽಽ आंक छींಽಽ..! [फिर, वो अनाप-शनाप गालियां बोलने लगता है] यह कौन है, माता का दीना ? जो गेलसफे की तरह, ज़र्दा उड़ात जा रहा है ? कमबख्त..आंक छींಽಽ..!

[इन छींकों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं, बेचारा किसी तरह चाय की टंकी को रख देता है बेंच पर ! मगर इन तड़ा-तड़ आ रही इन छींकों के कारण वह ऊपर की बर्थ को देख नहीं पाता, और बेचारे बदनसीब का सर टकरा जाता है उस बर्थ से ! सर टकराने से उठा दर्द नाक़ाबिले बर्दाश्त है, और इधर उसकी छींकें बंद होती दिखाई नहीं दे रही है ? फिर क्या ? वह बैठे इन गाड़ी के मुसाफिरों को खारी-खारी नज़रों से देखता है, फिर टंकी को अच्छी तरह से संभालता हुआ बेंच पर थोड़ा आगे खिसका देता है ! अब, वह कहता है !]

चाय वाला – [घबराकर टंकी को संभालकर रखता है, फिर कहता है] – अरे मेरी टंकी, अभी नीचे गिर जाती ?

फुठर मलसा – [तैयार सुर्ती को होंठों के नीचे दबाते हुए, कहते हैं] – बोल कढ़ी खायोड़ा, काहे की बकवास करता जा रहा है ?

[फुठर मलसा के बोलते ही, उनके श्रीमुख से ज़र्दे की बरसात होने लगी ! और फिर, क्या ? बेचारे चाय वाले के चेहरे पर, ज़र्दे और थूक का मेक-अप हो जाता है ! यह मेक-अप तो, लाली-लिपस्टिक से लिपे-पुते मेक-अप को पीछे रखने वाला है ! आख़िर बेचारा चाय वाला जेब से रुमाल बाहर निकालकर, मुंह और नाक साफ़ करता है ! फिर गुस्से से भरा वह चाय वाला, फुठर मलसा को अपशब्द कहने के लिए उनके सामने देखता है ! अब अपशब्द कहना तो बहुत दूर, यहां तो वह उनसे नज़र मिलाकर भी बात नहीं कर पाता ? उनकी राठौड़ी मूंछे देखकर, बेचारा चाय वाला सहम जाता है ! अब उसे धंधे को बढ़ाने के लिए, मीठे शब्दों से लबरेज़ जुमले बोलने पड़ते है !]

चाय वाला – चाये गरमा-गरम मसालेदार, चाये ! [रशीद भाई से, कहता है] सेठ साहब, कहिये मालिक कितने कप चाय डाल दूं...चाय ?

रशीद भाई – [गुस्से में कहते है] – डाल दे..डाल दे, क्या डाल दे ? तू तो उंडेल दे, मेरे सर पर !

ठोक सिंहजी – [लबों पर मुस्कान फैलाकर, कहते हैं] – सेठ साहब ने, क्या कहा ? अब, खड़ा क्यों है ? उंडेल दे सारी चाय इनके सर पर, इनकी सोजन आयी टाट का सेक हो जाएगा ! कमबख्त कौए ने चोंच मार-मारकर, इनकी टाट सूजा डाली ! मानो इनकी यह टाट नहीं है, बल्कि कोई मतीरा है ?

रशीद भाई – [ठोक सिंहजी को, गुस्से से कहते हैं – ए गेलसफ़ी टाट ! तू पहले अपनी टाट पर गरम-गरम चाय का सेक करवा दे ! फिर, मेरे लिए कहना ! [दोनों हाथ ऊपर ले जाते हुए, अल्लाह मियां से अर्ज़ करते हैं] या अल्लाह, अब ज़माना नहीं रहा..किसी का भला करने का !

सावंतजी – [हंसते हुए, कहते हैं] – अब और किसी की भलाई करने की तमन्ना बाकी रह गयी, क्या ? पहले भलाई की थी उस शैतान कौए की, और अब...मेरे भाई, अब कहीं यश मिलने वाला नहीं ! क्यों करते हो, भलाई ?

फुठर मलसा – [मुंह से ज़र्दा और थूक उछालते हुए, कहते हैं] – क्या कहा ? अरे, रामसा पीर ! क्या ज़माना आ गया ? राम, राम ! अभी-तक मैंने चाय माँगी नहीं इनसे, और इन शातिरों ने पहले ही मुझे बदनाम कर डाला ? चाय मत पिलाइए, मगर इस तरह ताने तो मत दीजिएगा !

[फुठर मलसा का, बोलना भी क्या होता है ? आली ज़नाब के मुंह को, मुख मत कहिये ! उसे ऐसे ज्वालामुखी का नाम दे दीजियेगा, जिससे शोलों की जगह ज़र्दा और थूक का लावा उगल जाया करता है ! जैसे ही फुठर मलसा का श्रीमुख खुला, और उससे होने वाली ज़र्दे और थूक की बरसात से बचने के लिए बेचारा चाय वाला झट पीछे खिसकता है..फिर क्या ? उसके पीछे केबीन में दाख़िल हो रहे वेटेनरी कम्पाउंडर माथुर साहब से, वह टकरा जाता है ! इस अचानक हुई टक्कर से, माथुर साहब का ऐनक और बैग छूटकर नीचे गिर जाते हैं ! ये आली ज़नाब ठहरे वेटेनरी कम्पाउंडर, और उनके दिल में एक ही धारणा है कि, ‘इंसान के अन्दर जानवर होता है, इस लिए दोनों की दवाई एक ही है केवल दवाई की मात्रा अलग-अलग होती है !’ इस तरह, इनको इंसान के अन्दर बैठे जानवर को देखने की आदत से अलग पड़ गयी है ! इनकी यह आदत, एम.एस.टी. वालों को बहुत बुरी लगती है ! बेचारे माथुर साहब, करें भी क्या ? अस्पताल में इनके डॉक्टर साहब ज़्यादातर रहते हैं सरकारी टूर पर, और अस्पताल में आने वाले रोगी पशुओं का इलाज़ माथुर साहब को करना होता है ! इस कारण, इनको अपने चारों तरफ़ आदमी के स्थान पर पशु ही नज़र आते हैं ! एम.एस.टी. वालों के बीच में आली ज़नाब, डॉक्टर का औहदा रखते हैं ! उनको कोई कम्पाउंडर नहीं कहते, सभी इन्हें डॉक्टर साहब के नाम से पुकारते हैं ! एम.एस.टी. वालों का इलाज़ भी, आली ज़नाब कर लिया करते हैं ! इनका दवाई देने का फ़ॉर्मूला है भी, निराला ! ज़नाब कहते हैं कि, जानवर को उसके शरीर के माफ़िक बड़ी गोली दी जाती है तो, इंसान के लिए उसकी मात्रा आधी कर लेनी चाहिए ! इस तरह पशु और इंसान को एक ही दवाई कार करती है, केवल फ़र्क है तो वह है केवल दवा की मात्रा में ! इस तरह रेल गाड़ी में कई ज़रूरतमंद एम.एस.टी. वाले बुखार, पैचिश, सर-दर्द वगैरा बीमारियों को दूर करने के लिए इनसे दवाई की गोलियां लेकर निरोग हो जाया करते हैं ! इस तरह ये आली ज़नाब, रेल गाड़ी में यश लूटते रहते हैं !]

फुठर मलसा – क्या हुआ, रशीद भाई ? कहीं आपकी टाट पर, आमलेट बन गयी क्या ?

रशीद भाई – आमलेट, आमलेट क्यों कहते जा रहे हैं..साहब ? आप क्या जानते हैं, साहब ? उस शैतान कौए ने मेरी टाट पर चोंच मार-मारकर, मुझे बेहाल कर डाला..ज़नाब !

ठोक सिंहजी – उस कौए को आप शैतान मत कहा करो, रशीद भाई ! क्या आपने, यह कहावत सुनी नहीं ? जानते हो, कौआ जिसकी टाट पर चोंच मारता है वह इंसान भाग्यशाली होता है ! अब समझे रशीद भाई, आप जैसे भाग्यशाली बिरले ही मिलते हैं !

रशीद भाई – [चिढ़े हुए, कहते हैं] – फिर क्या, बुला दूं उस कौए को ? आकर आपकी टाट पर चोंचें मारता रहेगा, और आप भी मेरी तरह भाग्यशाली बन जायेंगे !

[माथुर साहब को सुनाते हुए, कहते हैं] एक कौआ, मेरा भी दोस्त है ! आप कहते हैं तो, मैं उसे बुला दूं ? आकर, आपकी ख़िदमत करके चला जाएगा !

[बेचारे माथुर जैसे ही ऐनक उठाने के लिए नीचे झुकते हैं, और उनके कानों में रशीद भाई के शब्द गिरते हैं ! अब उनको गुस्सा आना, वाजिब है ! बस, फिर क्या ? वे गुस्से से उबलते हुए, कहते है !]

माथुर – मिज़ाज़ ठिकाने तो है, मैंने आपका क्या बिगाड़ा है खां साहब ?

रशीद भाई – [अपना दर्द भूलकर, मुस्कराते हुए कहते हैं] – माथुर साहब आपने कुछ नहीं किया, मगर मैं ज़रूर आपकी बिरादरी वाले का शिकार बना हूं ! [दीनजी भा’सा से, कहते हैं] आपको तकलीफ दे रहा हूं, भा’सा ! मेरे बैग से सोफ़रामाइसिन ट्यूब निकालकर दीजिएगा, थोड़ी ट्यूब इस टाट पर मसल डालूं, शायद आराम मिल जाए ? अब माथुर साहब को, क्या कष्ट देना ? ये आली ज़नाब ठहरे पशु चिकत्सक, और हम ठहरे इंसान !

दीनजी – रशीद भाई, करवा लीजिये इनसे इलाज़ ! आप पशु में, घटते क्या हैं ? इंसान तो बेचारा एक बार ठोकर खाकर संभल जाता है, दूसरी बार वह गलती करता नहीं ! मगर आप बार-बार इस कौए की चोंच का वार झेलते गए, मगर सर पर तगारी न रखकर अपना बचाव नहीं किया ! इस तरह बार-बार ग़लती करते गए, पशु की तरह ! अब कहिये, आप पशु है या...

माथुर – करवा लीजिएगा, मुझसे इलाज़ ! फिर क्या ? पशु को देते हैं एक बड़ी गोली, और आप उस गोली का आधा हिस्सा ले लेना ! आज़कल इन इंसानों में कहाँ रहा है, प्रेम ? प्रेम नहीं रखने वाले इंसानों को, अगर पशु भी कह दें..तो ग़लत नहीं ! इसलिए कहता हूं ज़नाब, आप पशु की तरह पूरी गोली ले सकते हैं ! अब तो ज़नाब, पूरी गोली लेने से ही आपको फायदा होगा !

[इस तरह माथुर साहब उनकी खिल्ली उड़ाकर, अपने क़दम बढ़ा देते हैं...दूसरे केबीन में, जाने के लिए ! रशीद भाई दीनजी भा’सा से ट्यूब लेकर, चोट लगी अपनी टाट पर मसलते हैं ! अचानक अब, रशीद भाई को ठोक सिंहजी के बोले गए शब्द याद आ जाते हैं ! फिर क्या ? वे झट, कड़वे शब्द ठोक सिंहजी को सुना देते है !]

रशीद भाई – [कड़वे शब्द सुनाते हुए, कहते हैं] – ठोक सिंहजी, आप राम को सर पर रखकर बोला कीजिये ! क्यों गलत कहते हो, यार ? यार भाग्यशाली तो थे, मामूजान ! कई कमियाँ थी उनमें, फिर भी उनका आख़िर विवाह हुआ ! अरे क्या कहूं, यार ? वे तो इतने बड़े अलाम थे, उन्होंने सियासती लीडरो को भी नहीं छोड़ा ! वे तो इन लोगों की जेब से, पैसे निकलवा दिया करते ! और इस तरह, वे अपना उल्लू सीधा कर लिया करते !

सावंतजी – ये सियासती लीडर यानि राजनेता, क्या कहूं मेरे बाप ? ये लोग तो अपनी पैदा करने वाली मां को भी, नहीं छोड़ते हैं ! ये लोग धुण की तरह जनता का सारा पैसा हड़प जाते हैं, उनकी जेब से पैसा निकलवाना कोई टेडी खीर है ! मुझे ऐसा नहीं लगता, यह मामू इन सियासती लीडरों को चूना लगा पाया हो ? बस, आप पूरा किस्सा ही बयान कर डालिए कि, मामू ने इन कमबख्तों को कैसे चूना लगाया ?

[अब रशीद भाई किस्सा बयान करते नज़र आते हैं, गाड़ी की रफ़्तार बढ़ती जा रही है ! मंच पर, अंधेरा छाने लगता है ! जबरू उस्ताद की हवेली का मंज़र सामने आता है ! रशीद भाई चौक में आते हैं, इस वक़्त इन्होंने अपने बदन पर, सफ़ेद कुरता और पायजामा और काली जाकेट पहन रखी है ! नेता स्टाइल में सर पर गांधी टोपी भी अलग से पहन रखी है ! चौक मे आकर ऊपर मुंडेर की तरफ़ देखकर तसल्ली कर लेते हैं कि, उनकी फूफ़ी फातमा बी वहां खड़ी है या नहीं ? फातमा बी को वहां न पाकर वे फ़क़ीर की आवाज़ मुंह से निकालते हुए, भीख माँगने के लहजे से ज़ोर से आवाज़ देते हुए कहते हैं !]

रशीद भाई – [आवाज़ बदलकर, ज़ोर से कहते हैं] – अल्लाह हू, अल्लाह हू ! जो दे उसका भला और न दे उसका भी भला ! दे दे अल्लाह के नाम से, इन्टर नेशनल फ़क़ीर आये हैं ! मोमिनों, अल्लाह के नाम कुछ देकर सवाब लुट लीजिये ! [सूफ़ी गीत गाते हैं] बाಽಽबा काली कमली वालेಽಽ से कह दोಽಽ...

[रशीद भाई को फ़क़ीर समझकर, जबरू उस्ताद की अम्मी मरियम बी ऊपर झरोखे से कहती है!]

मरियम बी – [झरोखे से, कहती है] – ला रही हूं, बाबा ! ज़रा रुकिए, अभी आयी !

[आटे से भरी कटोरी लिए, मरियम बी सीढ़ियां उतरकर नीचे चौक में आती है ! फिर सर के पल्लू को सर पर लेती हुई, कहती है !]

मरियम बी – [सर के पल्लू को सर पर लेती हुई, कहती है] – लीजिये बाबा, भर लीजिये आपकी झोली !

[मगर यहां है कहाँ, यह फ़क़ीर बाबा ? फ़क़ीर के स्थान पर उन्हें नज़र आते हैं, रशीद भाई ! उनको देखते ही, वह समझ जाती है कि, रशीद भाई ने उनके साथ परिहास किया है ! अपनी हंसी उड़ती देखकर, उनके चेहरे पर गुस्से के भाव झलकते हैं ! उनका तमतमाया हुआ चेहरा देखकर, रशीद भाई ज़ोर से हंसी का ठहाका लगाते हैं, फिर कहते हैं !]

रशीद भाई – [हंसी का ठहाका लगाकर, कहते हैं] – भर लीजिये हमारी झोली, मामूजान को वोट देकर..और साथ में अड़ोस-पड़ोस, सगे-सम्बन्धियों के वोट मामू के लिए लाकर डालिए इस झोली में ! सारे वोट मामू के पक्ष में पड़ने चाहिए ! यह इन्टर नेशनल फ़क़ीर, आपको खूब दुआ देगा !

मरियम बी – [भौंओ पर ऐनक चढ़ाकर, कहती है] – रशीद, तू है..कमबख्त, कुचामादिये का ठीकरे ? मुझसे मज़ाक़ कर रहा है, नामुराद ! वोट क्या ? अब तूझे दूंगी सोट, तेरे भूसे भरे खोपड़े पर..

रशीद भाई – क्या कह रही हैं, खालाजान ? आपसे मजाक करके, मुझे बिना मौत आये मरना है क्या ? मुझ बदनीब में कहाँ है, इतनी हिम्मत..जो आपसे मज़ाक़ करूं ?

मरियम बी – हाय अल्लाह, अब किसको दूं दोष...इसके ऐसे लक्खनों को देखकर ? मामू के बच्चे ने इसको बिगाड़ डाला, बना डाला इसे अपने जैसा कालिया शैतान !

रशीद भाई – वज़ा फरमाया, ख़ालाजान ! मुझको बना डाला कालिया शैतान, इस मामू ने ! फिर, आप पीछे क्यों रहती हैं ? आप अपना वोट देकर उस मामू को बना डालिए, म्युनिसपलटी का मेंबर !

मरियम बी – क्या कहा, साहबज़ादे ? क्या..क्या दूं उसे, मेरा सोट ? अभी लाती हूं, बाथ रूम से उसे उठाकर ! तू तेरे मामू को बुलाकर ला यहां, फिर तुम दोनों को उस सोटे से ऐसा पीटूंगी कि, तुम दोनों की अक्ल ठिकाने आ जायेगी !

[दरवाज़े के पास, जबरू उस्ताद जूत्ते उतार रहे हैं ! जूत्ते उतारते वक़्त, वे अपनी अम्मी के गुस्से से भरे बोल सुन लेते हैं ! फिर क्या ? झट जूत्ते उतारकर, जबरू उस्ताद चौक में आते हैं ! आकर, अपनी अम्मीजान से कहते हैं !]

जबरुद्दीन – [नज़दीक आकर, कहते हैं] – यह क्या कह रही हो, अम्मीजान ? रशीद भाईजान तशरीफ़ लाये हैं, मामूजान के लिए वोट माँगने...और, आप इनको बाथ रूम के सोटे [कपडे धोने का सोटा] से पिटाई करने की बात कह रही हैं ? ऐसा कहना, अपनी तहजीब के ख़िलाफ़ है या नहीं ?

मरियम बी – [जीने के अन्तिम स्टेप पर कटोरी रखकर, कहती है] – क्या कहा ? [दोनों के पहने वस्त्रों को, गौर से देखती हुई, कहती है] – तुम दोनों ने, ये मंगते-फकीरों जैसे वस्त्र क्यों पहने हैं ? कहीं तुम दोनों का फ़क़ीरों की टोली में मिलकर, भीख माँगने का इरादा तो नहीं है ? अरे साहबज़ादे, ख़ानदान की इज़्ज़त काहे उछाल रहे हो ? हम इन फ़क़ीरों को खैरात देते हैं, जाकर कहीं खैरात माँगते नहीं !

[जबरू उस्ताद के पीछे-पीछे, अब मजीद मियां आते दिखाई देते हैं ! वे दरवाज़े के पास, जूत्तियां खोलकर रखते हैं ! फिर बैसाखी का सहारा लेकर पहुंच जाते हैं चौक में ! बैसाखी को स्टूल पर रखकर, ख़ुद पास रखी कुर्सी पर बैठ जाते हैं ! आते वक़्त वे मरियम बी का बोला गया जुमला सुन लेते हैं, फिर क्या ? वे मरियम बी से सहमत होकर, उनसे कहते हैं !]

मजीद मियां – वज़ा फरमाया, भाभीजान ! ये दोनों निशर्मे, सारी शर्म-हया बेचकर खा गए ! क्या कहूं, आपसे ? इन दोनों ने इस ख़ानदान की इज़्ज़त धूल में मिला डाली !

मरियम बी – [नीचे रखी चौकी पर बैठकर, कहती है] – सत्य कहा, आपने ! हम ठहरे, हवेली वाले ! पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे रसूखात रहे हैं, जोधपुर के साथ ! रजवाड़े के काल में हमारे पूर्वजों को, दरबार मे बड़े ओहदे दिए गये थे ! मगर अब ये मर्दूद इस तरह फ़क़ीरों का लिबास पहनकर, इस ख़ानदान की साख पर बट्टा लगा रहे हैं ? हाय अल्लाह, अब क्या कहूं छोटे नवाब ? मुझे किसी को, मुंह दिखलाने के क़ाबिल नहीं रखा ! [पल्ले से मुंह छुपाकर, सिसकती जाती है]

रशीद भाई – ख़ाला जान ! आप ऐसी बेतुकी बातें, क्यों करती जा रही हैं ? मामूजान बढ़ा रहे हैं, अपना ओहदा..चुनाव लड़कर ! जैसे ही वे चुनाव में जीत जायेंगे, वे बन जायेंगे म्युनिसपलटी के वार्ड मेंबर ! फिर खालाजान आप जोधपुर की किसी भी गली से गुज़रेंगी...वहां खड़े लोग आपको देखकर कहेंगे कि, लीजिये देखिये, म्युनिसपलटी वार्ड मेंबर प्यारे मियां की आपाजान तशरीफ़ लायी है..एक तरफ़ होकर, इनको रास्ता दीजिये !’

मरियम बी – [तल्ख़ आवाज़ में, कहती है] – भंगार के खुरपे ! क्या तूने मुझे, मेहतरानी समझ रखा है ? जिसके निकलते वक़्त, लोग उसके जाने के लिए रास्ता छोड़ देते हैं !

रशीद भाई – खालाजान काहे नाराज़ हो रही हैं, आप ? मामू तो नेता बन जाएगा, चुनाव लड़कर ! फिर आप...

मरियम बी – [गुस्सा ज़ाहिर करती हुई, कहती है] - चुनाव लडेगा ? ख़ुदा रहम, अब तो यह प्यारे मियां लड़ने के लिए आमदा हो गया ? हम शरीफ़ों की ज़िंदगी पर कालिख़ पोत दी, हाय ख़ुदा ! हम शरीफ़ लोग दस क़दम दूर रहते हैं, इन लड़ाई-झगडों से ! मगर यह शरीफ़ज़ादा तो चुनाव लड़ने को उतारू हो गया है ?

जबरुद्दीन – अम्मी ऐसी भोली बातें न कीजिये, मामूजान चुनाव लड़ रहा है, कोई शमशीर लेकर जंगजू बना हुआ जंग नहीं लड़ रहा है ! इतना समझ लीजिये, अम्मीजान ! मामू चुनाव लड़ रहा है यानि चुनाव के मैदान प्रत्याशी के रूप में खड़ा है ! आज़कल चुनाव लड़ना, अमीरों का शौक बन गया है !

मजीद मियां – [बैसाखी को आँगन पर दो-तीन बार पटकते हुए, तल्ख़ आवाज़ में कहते हैं] - तू हम दोनों को बेवकूफ समझता है, साहबज़ादे ? जिस जम्हूरियत की स्कूल की तू बात कह रहा है, उस स्कूल का मैं हेडमास्टर रह चुका हूं ! कुछ आया समझ में, तेरी इस भूसे भरी खोपड़े में ?

रशीद भाई – वाह ज़नाब, वाह ! हुज़ूर, आप तो रेलवे में नौकरी करते-करते यह हेडमास्टर बनने का अंश कालीन काम कब से करने लगे ? बड़े क़ाबिल आदमी ठहरे आप, अब मुझे ज़रूर आपके चेहरे पर काला टीका लगाना होगा..कहीं बुरी नज़र न लग जाए, आपको ?

मामूजान – [चिढ़े हुए, कहते हैं] – साहबज़ादे ! तेरे दिमाग़ के अन्दर भरे कचरे को बाहर निकाल, बेअदब अब यह चुनाव लड़ने का काम इन करप्ट लोगों का रह गया है ! इन कमबख्तों ने, इस भोली जनता को बेवकूफ बनाने का धंधा खोल रखा है !

[अब मजीद मियां हो गए बहुत नाराज़, इन दोनों सहबज़ादों से ! वे इन दोनों को, खारी-खारी निग़ाहों से देखने लगे ! अचानक, हवेली के बाहर बच्चों का शोरगुल बढ़ने लगा ! इन बच्चों की नारे लगाने की आवाज़ें, इनको सुनायी देने लगी ! वे खिड़की से मुंह बाहर निकालकर क्या देखते हैं कि, बच्चों की टोली ज़ोर-ज़ोर से मामू को जिताने के लिए नारे लगा रही है !

एक बड़ा बच्चा – [एक हाथ ऊंचा करके, ज़ोर से बोलता है] – जीतेगा भाई, जीतेगा !

सभी बच्चे – [एक साथ ज़ोर से चिल्लाते हुए, कहते हैं] – उल्लू वाला जीतेगा !

बड़ा बच्चा – [एक हाथ ऊंचा करके, ज़ोर से चिल्लाता हुआ कहता है] – वोट किसको दोगे ?

सभी बच्चे – [एक साथ, ज़ोर से कहते हैं] – उल्लू के निशान को !

[यह खिलका देखकर, मजीद मियां अपना मुंह वापस अन्दर लेते है ! और वापस आकर, कुर्सी पर बैठ जाते है ! फिर खिसियानी हंसी हंसते हुए, मरियम बी से कहते हैं !]

मजीद मियां – [खिसियानी हंसी हंसते हुए, कहते हैं] – देखिये गली के सारे गेलसफे इकट्ठे हो गए हैं, बाहर ! उम्र है आठ-दस साल की, और ये नौसिखिये चले हैं वोट देने ? कई साल बिताने के बाद, इनका वोट लगेगा ! और अभी से ये कुचामादिये के ठीकरे, अभी से मचाने लगे हैं शोरगुल ?

[अब बच्चों के शोरगुल की आवाज़ आनी बंद होजाती है, ऐसा लगता है मानो यह बच्चो की टोली आगे बढ़ गयी है ! अब जिलकन हटाकर, मामूजान अन्दर तशरीफ़ लाते हैं ! अन्दर चौक में आकर वहां रखी कुर्सी पर बैठ जाते हैं ! अभी मामू ने भी, नेताओं वाली पोशाक पहन रखी है !]

मामूजान- [मजीद मियां से, कहते हैं] – दूल्हे भाई, देख लीजिएगा ! ये मोहल्ले के सारे बच्चे, मेरे साथ है ! आप नहीं जानते कि, ये आज के बच्चे कल की बुनियाद है ! इसलिए आपसे कह रहा हूं, आप इनको हलकी नज़रों से न देखें ! आज नहीं, तो क्या ? कल तो...

मजीद मियां – [बात काटते हुए, कहते हैं] – देंगे वोट, तेरे जैसे उल्लू को ? तब चुनाव में खड़े हो जाना ! अभी तो प्यारे मिया, लोगों को उल्लू बनाने का काम छोड़िये ! अब आप एक नंबर के उल्लू होकर मत समझा करो, अपने आपको हीरों का हार ! आख़िर आप है, क्या ? इस सियासत के मैदान मे, मूंगफली के दाने के बराबर !

मामूजान – आप कुछ नहीं जानते, दूल्हे भाई ? ये सारे बच्चे, मेरा सपोर्ट कर रहे हैं ! वे घर में अपनी अम्मियों को समझायेंगे कि, वोट उल्लू को देना है ! इनकी अम्मियां समझाएगी अपने-अपने मियां को कि, वोट उल्लू को देना है ! इस तरह मतपेटी में, मेरे पक्ष में थोकबंद वोट गिरेंगे !

मजीद मियां – इन बच्चो की बात सुनकर उनके वालिद आकर फेंकेगे, आप जैसे उल्लू के ऊपर पत्थर ! फिर मुंह छुपाते, न मालुम कहाँ-कहाँ भटकेंगे आप ?[ज़ोर से ठहाका लगाकर, हंसते हैं]

मामूजान – क्यों हंस रहे हैं, दूल्हे भाई ? सच्च कह रहा हूं, उनके कहने से उनके अब्बूजान क्या ? उनके दादा, चाचा, मामा, नाना सभी उल्लू को वोट देंगे ! आपकी दुआ से यह आपका साला प्यारे मियां, चुनाव जीतकर म्युनिसपलटी का वार्ड मेंबर ज़रूर बन जाएगा !

मजीद मियां – हां बात तो सही है, ज़रूर मेरा यह साला उल्लू जीत जाएगा चुनाव ! [गंभीरता से, कहते हैं] मियां, यों परवाज़े-तख़य्यूल में उड़ने से काम नहीं चलता ! आप क्या समझ सकते हैं, दुनियादारी की बातें ? आख़िर, आप ठहरे उल्लू !

मामूजान – [हंसते हुए, कहते हैं] – कुछ भी कह दीजिये, दूल्हे भाई ! आख़िर हूं मैं, आपकी बिरादरी का ! आप चाहे तो मुझे उल्लू कह दीजिये, या कह दीजिये गधा ! जो चाहे कह दीजिये मुझे, मगर मैं हूं तो आपका साला ! जैसा मैं हूं, वैसे आप भी हैं !

[मामू का यह जुमला सुनते ही, जबरू उस्ताद और रशीद भाई ज़ोर से ठहाके लगाकर हंसते है ! इससे, मजीद मियां क्रोधित होकर कहते हैं !]

मजीद मियां –[गुस्से से उबलते हुए, कहते हैं] – क्यों छक्कों की तरह हंसते ज रहे हो, मूर्खो ? कुछ तो शर्म करो !

मामूजान – [लबों पर मुस्कान बोखेरते हुए, कहते हैं] – हंसने-हंसाने से खून बढ़ता है, दूल्हे भाई ! आप भी रोज़ खुलकर, हंसा करें ! इस बुढ़ापे में आपको बहुत ज्यादा ज़रूरत रहती है, हंसने की !

मजीद मियां – क्या कहा, साहबज़ादे ?

मामूजान – [हंसी को दबाते हुए, कहते हैं] – यह कहा दूल्हे भाई कि, आप रोज़ खुलकर हंसा करें ! इस उम्र में, वापस आ जायेगी जवानी ! [धीरे से, कहते हैं] फिर, क्या कहना ? बूढ़ी घोड़ी, लाल लगाम !

मामूजान – आपकी ज़रा सी तारीफ़ कर डाली हमने..कह रहा था कि, आपके सर पर..

मजीद मियां –[उतावली दिखलाते हुए, कहते हैं] – कहिये, कहिये..रुकिए मत, साहबज़ादे ! झट कहिये, आप क्या कहना चाह रहे थे ?

मामूजान – आपके सर पर पगड़ी पहनी होती तो, हुज़ूर आप महाराजा हणवंत सिंहजी की तरह दिखाई देते !

[इतना कहकर, मामूजान ने सोचा कि ‘अगर मैं यहां बेफिज़ूल की बकवास करने बैठ गया तो, कौन निपटायेगा चुनाव संबंधी काम..अरे भाई, अभी कई काम निपटाने हैं...मुझे ?’ फिर क्या ? मामू जबरू उस्ताद और रशीद भाई को, चुपचाप यहां से निकल जाने का इशारा कर डालते हैं ! उनके चले जाने के बाद, ख़ुद मामूजान भी वहां से खिसक जाते हैं ! मजीद मियां को पता नहीं, ये तीनों अलाम कब बाहर निकल गए ? वे तो पुराने ख्यालों में डूबे, कहते ही जा रहे हैं !]

मजीद मियां – [ख़ुश होकर, कहते हैं] – आपका कहना सौ फीसदी सही है , साहबज़ादे ! एक बार आपाजान कह रही थी कि, ‘छोटे नवाब, अगर आप पगड़ी पहने खड़े हो जाय तो सच्च कहती हूं कि, फिल्म मुगलेआज़म के शहजादा सलीम बने दिलीप कुमार भी आपके सामने धूल चाटते नज़र आएंगे ! [मरियम बी से, कहते हैं] आपको भी मालुम होगा, यह बात वालिद साहब भी कह रहे थे कि, छोटे मियां...

मरियम बी – [बात काटती हुई, कहती है] – ख़ुद की शान में, कशीदे निकालना अच्छा नहीं ! छोटे नवाब, मियां मियां मिट्ठू बनना अच्छी बात नहीं है ! ज़रा पीछे मुड़कर देख लिया करो, जिन्हें आप सुना रहे हैं, वे साहबज़ादे आपको छोड़कर कहाँ चले गए ? अब आप किसे सुना रहे हैं, अपनी तारीफ़ में..

[जैसे ही मजीद मियां पीछे मुड़कर देखते है, वे तीनों अलाम दिखाई नहीं दिए ! तब वे शर्मसार होते हुए, कहने लगे !]

मजीद मियां – [शर्मसार होते हुए, कहते हैं] – अगर आप पहले मुझे इशारा कर देती, तो कितना अच्छा होता ? कि, ये तीनों शैतान जा चुके हैं ! फिर क्या, मैं इतनी देर किसे सुना रहा था ? क्या, इन दीवारों को..?

[अब यहां कौन बैठा है, निक्कमा...जो मजीद मियां बांची जा रही पाबूजी की फ़ड़ को, बैठकर शान्ति से सुने ? मरियम बी झट उठकर, सीढ़ी पर रखी आटे से भरी कटोरे को उठा लेती है ! फिर वह, सीढ़ियां चढ़ने लगती है ! तभी हवेली के बाहर, मोहल्ले के कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनायी देती है ! जिसे सुनकर, मजीद मियां के मुंह से बरबस ये शब्द निकल जाते हैं !]

मजीद मियां – [अपने-आपसे, कहते हैं] – अब यहां मैं भौंक रहा हूं, या ये मोहल्ले के कुत्ते ?

[मंच पर, अंधेरा छा जाता है !]

[३]

[मंच पर वापस रोशनी फैलती है, माणक चौक का मंज़र सामने आता है ! पूरे चौक में स्थान-स्थान पर, चुनाव के बेनर, पोस्टर और चुनावी लगे हैं ! पूरा चौक इन चुनावी झंडियों से सज़ा हुआ है, ऐसा लगता है...मानो स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे की पताकाएं लगी हो ! आमने-सामने के मकानों के बीच में, चुनावी फरियों से भरी डोरियाँ बांधकर चौक को सजाया गया है ! ज़्यादातर रमज़ान मियां के दुकान का चबूतरा, मंच का काम करता है ! कभी यह ताजिये के तीजे की रस्म फूल प्याला के लिए मंच बन जाता है, तो कभी यह चबूतरा चुनावी मंच भी बन जाया करता है ! आज यहां म्युनिसपलटी चुनाव के उम्मीदवार दूल्हे मियां कबाड़ी की, चुनावी मीटिंग होने वाली है ! इस चबूतरे पर गद्दे बिछाए गए हैं, जिस पर दिलावर सेठ और उनके शागिर्द बैठे हैं ! सुमेर मार्केट के ख़ास कबाड़ी दूल्हे मियां के सपोर्ट में, आज उनकी पहली चुनावी सभा है ! इस समय दूल्हे मियां मोहल्ले के मौज़िज़ मोमिनों के साथ खड़े हैं, इन्होंने सफ़ेद शेरवानी, चूड़ीदार पायजामा और सर पर कश्मीरी टोपी पहन रखी है ! इन कपड़ों में, वे दूल्हे राजा की तरह दिखाई दे रहे हैं ! मीटिंग का वक़्त होने जा रहा है, इसलिए दूल्हे मियां झट मंच पर रखे माइक के पास आते हैं और उसकी आवाज़ को टेस्ट करते जा रहे हैं ! मंच के नीचे ज़मीन पर कई जाजमें बिछी है, जिन पर पार्टी के कार्यकर्ता और अवाम विराजमान है ! कई दुकानों के चबूतरों पर मोहल्ले के मौज़िज़ आदमी आकर बैठ चुके हैं, अभी वे आपस में गुफ़्तगू करते जा रहे हैं ! इनकी गुफ़्तगू का मुख्य विषय यह है कि, चुनाव में कौन जीतेगा ? अब जैसे ही माइक की आवाज़ सेट हो जाती है, और दूल्हे मियां की आवाज़ साफ़-साफ़ माइक पर सुनायी देती है !]

दूल्हे मियां – [माइक थामे हुए, कहा रहे हैं] – ओ मेरे गुड़-खांड के व्यापारियों ! मैं दूल्हे मियां, हमेशा आपका वज़न उठाता आया हूं ! [कार्यकर्ताओं की तरफ़ देखते हुए, कहते हैं] तालियां ! [इशारा पाते ही, कार्यकर्ता ज़ोर-ज़ोर से तालियां पीटते हैं, और उधर मंच पर बैठे दूल्हे मियां के समर्थक दिलावर खां की बुलंद आवाज़ गूंज़ती है !]

दिलावर सेठ – [ज़ोर से बोलते हुए, कहते हैं] – क्या उठाते हो, मियां ? वापस कहिये !

[जगह कम होने के कारण, नीचे बैठी अवाम में एक आदमी आराम से पालथी मारकर बैठ नहीं पाया..वो उचक लट्टू की तरह उचकता हुआ ज़ोर से कहने लगा !]
उचक लट्टू – [ज़ोर से, बोलता है] – और, क्या उठायेंगे ? उठायेंगे गुड़-खांड की बोरियां..और क्या ?

[उस उचक लट्टू का जवाब सुनकर, दिलावर सेठ झट उठकर खड़े हो जाते हैं, और वे ज़ोर-ज़ोर से दिलावर मियां से कहने लगे !]

दिलावर सेठ – ओ दूल्हे मियां ! गुड़-खांड की बोरियां, मैं अपने तांगे में डालकर लाया करता हूं ! फिर ये तुम्हारे कार्यकर्ता क्यों झूठ बोल रहे हैं ? कमबख्तों ने अभी-तक, मेरे उल्टे हाथ का झापड़ खाया नहीं है ! [झट दूल्हे मियां के समीप जाकर, उनके कंधे पर हाथ रखकर कहते हैं] अब कहिये, दूल्हे मियां मियां ! आपका यह कार्यकर्ता, झूठ क्यों बोल रहा है ? कहीं आप लोगों का, आटा तो वादी नहीं कर रहा है..आज़कल ?

[बेचारे दूल्हे मियां की पहली चुनावी मीटिंग की शुरुआत, ही खोटी हुई है ! बेचारे दूल्हे मियां, अब क्या करते ? झट उनको हाथ जोड़कर, वापस बैठा देते हैं ! उनके बैठने के बाद, वे माइक पर वापस बोलने लगे !]

दूल्हे मियां – [हाथ जोड़कर दिलावर सेठ को बैठने के लिए निवेदन करते हुए, कहते हैं] – आली ज़नाब, मेहरबानी करके विराजिये ! कुछ गलत कहा हो तो, आप मुझे माफ़ कीजियेगा ! यह आपका ख़िदमतगार गुड़-खांड की ख़ाली बोरियां ही उठाता है, वो भी वाजिब दाम देकर ! गुड़-खांड से भरी हुई बोरियां, आप जैसे मेहरबान ही उठाया करते हैं ! मुझमे इतनी कहाँ है, क़ाबिलियत..जो भरी हुई बोरियां उठा सकूँ ?

[इतने में दिलावर सेठ के शागिर्द बीच में बोल उठते है, इनके व्यंग भरे कथन सुनकर सभी श्रोताओं में हंसी की लहर उठ जाती है !]

शागीर्द – उस्ताद, आपको क्या करना ? कटले का सारा कचरा दूल्हे मियां उठाते हैं, आपको क्या परेशानी ? देण होगी तो सफ़ाई कर्मचारी को, आपको क्या ? इसमें, आपका क्या गया ? चाहे वे खाली बोरियां उठाये, या फिर उठाये काग़ज़ों का कचरा ! कचरा कहो, या कबाड़ कहो..बात एक ही है !

दूसरा शागिर्द – अरे उस्ताद ! ये दूल्हे भाई ठहरे, नफ़े के सौदाग़ र ! क्या कहें, इनको ? ये तो ज़नाब, जन्म-जात कबाड़ी ठहरे ! इनके बाप-दादा, सभी कबाड़ी रहे हैं ! क्या कहें, इनको हर स्थान पर कबाड़ ही नज़र आता हैं ? कबाड़, कैसा भी हो ? इनके लिए, वह सोना बन जाता है !

तीसरा शागीर्द – अरे नामाकूलों मेरी बात सुनिए, इनका जन्म हुआ तब इनके दादाजन ने इनको कचरे के ढेर पर सुला दिया ! फिर मौलवी साहब ने आकर एलान किया
कि, ‘यह बच्चा कचरे से, बहुत प्रेम करेगा ! इसलिए इस बच्चे का नाम कचरू खां रखा जाता है !’

दूसरा शागीर्द – अरे मियां, जिन मां-बाप का बच्चा जीवित नहीं बचता है तब वे ऐसे बच्चों को कचरे के ढेर पर सुला देते हैं, फिर मौलवी साहब आकर इन बदनसीबों के नाम कचरू खां, कचर दास, कचेरू दीन जैसे नाम रख देते हैं !

[इनकी बातें सुनते लोगों के बीच हंसी के फव्वारे छूटते जा रहे हैं, बेचारे दूल्हे मियां की मीटिंगे की ऐसी की तैशी होती देख दिलावर सेठ अपने शागीर्दों पर गरज़ उठते हैं ! उनकी एक ही दहाड़ से इनके शागीर्दों की बोलती बंद हो जाती है !]

दिलावर सेठ – चुप हो जाओ, मूर्खों ! यहां तो तुम लोग बेचारे दूल्ल्हे मियां की जन्म-पत्री पढ़ने बैठ गए..नामाकूलों ! इतना तो सोचा होता, हम लोगों की ख़िदमत करते बेचारे दूल्हे मियां आजीवन कुंवारे रह गए ! इस सेवा की एवज़ में हम-सब, इनको कचरू खां के स्थान पर दूल्हे मियां के नाम से पुकारते हैं ! अब आप लोग चुपचाप बैठकर, कचरे आज़म दूल्हे मियां की बात सुनिए ! अब ये बताएँगे कि, वे आपकी ख़िदमत में क्या-क्या काम करेंगे ?

[अब लोगों को इनकी बातों में रस आने लगा ! इस तरह मीटिंग में श्रोताओं की संख्या बढ़ने लगी ! श्रोताओं की संख्या बढ़ती देखकर, दूल्हे मियां का जोश बढ़ने लगा ! अब वे माइक को थामे, जोशीली आवाज़ में भाषण देने लगे !]

दूल्हे मियां – [माइक थामकर, भाषण देते कह रहे हैं] – मेरा आप लोगों से वादा है, मैं सब-कुछ कर दूंगा साफ़ !

तीसरा शागिर्द – [उचककर, कहता है] – क्या साफ़ करोगे जनाब, कहीं लोगों की जेबें साफ़ तो नहीं करेंगे आप ?

[अचानक एक मक्खी आकर दूल्हे मियां की नाक पर आकर बैठ जाती है, उसको उड़ाने के लिए दूल्हे मियां अपना हाथ हिलाते हैं, मगर इसका असर इन कार्यकर्ताओं पर कुछ अलग ही पड़ता है ! वे बेचारे समझ लेते हैं कि, शायद दूल्हे मियां उनको तालियां पीटने का इशारा कर रहे होंगे ? बस, फिर क्या ? वे बिना सोचे-समझे, तालियां पीटने लगते हैं ! इस तरह तालियों की गड़गड़ाहट से, माणक चौक गूंज़ जाता है ! तालियों की गड़गड़ाहट से, श्रोताओं की हंसी के मारे क्या हालत हुई होगी ? वो ख़ुदा ही जाने, या बेचारे दूल्हे मियां का दिल जानता होगा ! अब इन लोगों को शांत करने के लिए, बेचारे दूल्हे मियां को वापस वही लाज़वाब जुमला दूसरे अंदाज़ से बोलना पड़ता है ! वे कहते हैं !]

दूल्हे मियां – [माइक थामे, बोलते हैं] – मेरा वादा है कि, मैं सब कर दूंगा साफ़ !

तीसरा शागीर्द – [हंसी के ठहाके लगाता हुआ, ज़ोर से कहता है] – क्या, ज़नाब ? सबकी जेबें साफ़ करने के बाद, अब आप किसकी जेब साफ़ करेंगे ? किसकी जेब बाकी रह गयी, ज़माब ?

[चुनावी मीटिंग में कार्यकर्ताओं का एक ही काम रहता है, वह है तालियां पीटना ! वे यह नहीं देखते, दूल्हे मियां क्या कह रहे हैं और वो दिलावर सेठ का शागीर्द क्या कहता जा रहा है ? उनका तालियां पीटने का अर्थ बन जाता है, दूल्हे मियां लोगों की जेबें साफ़ करने का वादा करते हैं ! अब श्रोता गण ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाते हुए, तालियां पीटने लगे जिससे दूल्हे मियां ने समझ लिया कि उनकी मीटिंग सफल होती जा रही है ! वैसे भी इस लोकतंत्र में भारी महंगाई के आगे, जनता की कमर झुक गयी है..और कोई नेता, उनकी महंगाई कम करने वाला नहीं ! जो नेता जनता को हंसा देता है, वही नेता इस लोकतंत्र में चुन लिया जाता है ! अब वे जोश में आकर, श्रोताओं को धन्यवाद देते हुए आगे समझाना शुरू करते हैं !

दूल्हे मियां - शुक्रिया, शुक्रिया ! दोस्तों याद रखना हमारा चुनावी निशान है, वज़न उठाने वाला हमारा गधा ! जो आपकी पूरी सफाई कर देगा ! बस..! आपको इस पर चौकड़ी लगाकर इसे जीतना है ! इस गधे की जीत, मेरी जीत...आपकी जीत ! अब ज़ोर से बोलिए ! [ज़ोर से नारा लगाते हुए] जीतेगा भाई, जीतेगा..

सभी कार्यकर्ता – [एक साथ, ज़ोर से बोलते हैं] – गधा वाला जीतेगा !

दूल्हे मियां – [ज़ोर से बोलते हुए] - वोट, किसको दोगे ?

सभी कार्यकर्ता – [एक साथ, ज़ोर से बोलते हैं] – गधे के निशान को !

दूल्हे मिंया – [एक हाथ ऊपर उठाते हुए, ज़ोर से बोलते हैं] - सबका साथी कौन है ?

सभी कार्यकर्ता - [एक साथ, ज़ोर से बोलते हैं] – गधा, हमारा ! गधा, हमारा !

[चारों तरफ़ इन नारों से, माणक चौक गूंज़ने लगा ! सभा में बैठे लोग, तालियां पीटते गए ! इधर दिलावर सेठ और उनके शागीर्द उठकर, दूल्हे मियां को पुष्प की मालाओं से लाद देते हैं ! मीटिंग ख़त्म हो जाने के अंदेशे से, मुंडेर पर खड़ी बच्चों की टोली एक साथ नारे लगाना शुरू करती है !]

एक बड़ा छोरा – [बुलंद आवाज़ में, नारे लगाता हुआ ज़ोर से बोलता है] – कचरा, कौन बीनेगा ?

सभी बच्चे – [बुलंद आवाज़ में, एक सुर में ज़ोर से बोलते हैं] – दूल्हे मियां..दूल्हे मियां !

एक बड़ा छोरा – [वापस बोलता है, ज़ोर से] – बोलो रे प्यारों, लीडर प्यारा कौन है ?

सभी बच्चे – [एक सुर में, ज़ोर से बोलते हैं] – मामू प्यारा...मामू प्यारा !

[बच्चो के वोट लगते नहीं, फिर क्यों दूल्हे मियां की पार्टी वाले इनको भाव देंगे ? और क्यों बेफ़ालतू इन बच्चों को, मीठी गोलियां और बिल्ले बांटेगे ? मगर मोहल्ले के बड़े-बूढ़े इनकी नज़रों में ठहरे वोट देने के हक़दार, इसलिए दूल्हे मियां के कार्यकर्ता इन बड़े-बूढ़ों की तगड़ी मनुआर करने लगे ! कोई इन लोगों को पान की गिलोरियां थमा रहा है, तो कोई इनको बीड़ी-सिगरेट ! इन बड़े-बूढों की तगड़ी मनुआर होते देखकर, बच्चे जल-भुन जाते हैं ! फिर क्या ? वे उनको परेशान करने के लिए, उनके विरोधी के पक्ष में नारें लगाते दिखाई देने लगे ! मामूजान ठहरे इन बच्चों के चहेते, वे सस्ते में हो रहे इस प्रचार से अपना हाथ क्यों खींचेगे ? बस, फिर क्या ? वे इन बच्चों के बीच मीठी गोलियां, टाफ़ी, चाकलेट और बिल्ले रोज़ बांटकर, उनसे नारे लगवा दिया करते ! इसलिए अब ये बच्चे मामू को जिताने के लिए, ज़ोर-ज़ोर से नारे लगाने लगे !]

एक बड़ा बच्चा – [हाथ ऊंचा करता हुआ, ज़ोर से बोलता है] – जीतेगा भाई, जीतेगा !

सभी बच्चे – [एक साथ, ज़ोर से कहते हैं] – पहले गोलियां-चाकलेट आने दो !

बड़ा बच्चा – मामू लेने गया है, डोफों ! [ज़ोर से कहता हुआ] अब बोलो रे, ज़ोर से ! जीतेगा भाई, जीतेगा !

सभी बच्चे – [एक साथ, ज़ोर से बोलते हैं] – मामू प्यारा, मामू प्यारा !

[अब ये बच्चे ज़ोर-ज़ोर से नारे लगाते हुए, आसमान को गूंजाने लगे ! मगर, दूल्हे मियां का क्या जाता है ? उनकी मीटिंग तो निपट गयी है, अब सब जाने लगे ! उनकी पदचाप, सुनायी देने लगी ! थोड़ी देर बाद, यह पदचाप सुनायी देनी बंद हो जाती है ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है !]

[४]

[मंच पर, रोशनी फैलती है ! सुमेर मार्केट का मंज़र, सामने आता है ! होली आने वाली है, मौहल्ले के कई बच्चे होली का हुड़दंग मचाने और चुनावी नारे लगाने में व्यस्त है ! मजीद मियां नए कपड़े पहनकर, बाहर निकलना नहीं चाहते ! क्योंकि, उनको रंग से कपडे ख़राब होने का भय सता रहा है ! इस कारण, वे पुराने फटे कपड़े पहनकर बाहर निकले हैं ! बैसाखी के सहारे वे धीरे-धीरे चलते-चलते, सुमेर मार्केट पहुंच जाते हैं ! उनकी एक जूत्ती की सिलाई उधड़ चुकी है, अब वे उस जूत्ती को हाथ में थामे रहीम मियां मोची के नज़दीक क़दम बढ़ा रहे हैं ! रहीम मियां घंटा-घर के पास वाले बिजली के खम्बे के पास बैठकर, जूत्तों की मरम्मत करने का काम करते हैं ! अब दोपहर की नमाज़ का वक़्त, होने जा रहा है ! मजीद मियां को फ़िक्र है, कहीं मुअज़्ज़िन अज़ान की आवाज़ न लगा दे ? अगर लगा दी, तो रहीम मियां यहां रुकने वाले नहीं..झट चल देंगे मस्जिद की ओर, नमाज़ अता करने ! तब वे जूत्ती लिए, यहां कब-तक बैठे रहेंगे ? उनका डर सही साबित हुआ, अज़ान की आवाज़ सुनायी देती है !]

मुअज़्ज़िन – [अज़ान देता हुआ] - “अल्लाह हू अकबर अल्लाह हू अकबर अशहदो अनला इलाह इल्लिलाह अश हदो अन्ना मुहम्मदुर रसूलिल्लाह हैइया लस सला हैइया लल फला हैइया लल फला...!”

[रहीम मियां झट उठकर, मरम्मत करने के सामान पेटी में डाल देते हैं ! उनको उठते देखकर, मजीद मियां उनको ज़ोर से आवाज़ देते हुए तेज़ी से आगे बढ़ते है..और साथ में, उनको आवाज़ भी देते जा रहे हैं !]

मजीद मियां – [तेज़ी से क़दम बढाते हुए, आवाज़ देते हैं] - “ओ रहम मियां, ओ रहीम मियां ! उठिए मत, आ रहा हूं !”

[मजीद मियां के पहने फटे-पुराने वस्त्र और उनके हाथ में फटी जूत्ती को देखकर रहीम मियां को भय सताने लगा, कही यह पागल उनको जूत्ती से पीटने तो नहीं आ रहा है ?” बेचारे, घबरा जाते हैं ! आज़ सुबह ही उन्होंने सुना था कि, कोई पागल ‘पागल खाने’ से छूटकर घंटा घर बाज़ार में घूम रहा है ! तभी अज़ान की आवाज़ दूसरी बार सुनायी देती है, कई दुकानदारों ने अपनी दुकानों पर ताला जड़कर, नमाज़ी टोपी पहन ली है ! अब वे इधर से ही, गुज़रने लगे !]
मजीद मियां – [नज़दीक आते हुए, ज़ोर से आवाज़ देते हुए कहते हैं] – ओ ज़नाब ! थोड़ा रुकिए, मेरी जूत्ती..
रहीम मियां के पास बैठने वाला मोची – [उठते वक़्त, मजीद मियां के बोले गए जुमले को पूरा बोल देता है] – ..और, रहीम मियां का सर !

[रहीम मियां आंखें फाड़े देखते हैं, मजीद मियां को ! वे सोचते हैं, या तो यह कमबख्त वही पागल होगा जो पागल खाने छूटकर भागा है..या फिर होली के मौक़े पर कोई भंगेड़ी, भंग पीकर इधर आया होगा ? जो होली का हुड़दंग मचाता हुआ, इधर आ रहा है ? तभी वहां खड़ी बच्चों की टोली को होली के माहौल में, शैतानी सूझती है ! वे मजीद मियां के बदन पर फटे-पुराने कपड़े देखकर, वे उन्हें पागल बनाने की स्कीम बना डालते हैं ! फिर क्या ? झट ज़मीन पर पड़े गाय के गोबर उठाकर, उनके कपड़ों पर फेंकना शुरू करते हैं ! अब इनके वस्त्रों पर, गोबर की तरह-तरह की चित्रकारीता दिखाई देने लगती है ! गोबर लग जाने से, मजीद मियां का क्या कहना ? गोबर से भरे फटे-पुराने कपड़े और हाथ में जूत्ती थामे मजीद मियां, वास्तव में पागल की तरह दिखाई देने लगे ! अब इस तरह इस रूप में मजीद मियां को समीप आते देखकर, रहीम मियां घबरा जाते हैं ! अब वे इस तरह डरते हैं कि, मानो उन्होंने कहीं किसी खबीस को देख लिया हो ? फिर क्या ? झट उन्होंने वहां से खिसकने का, प्लान बना डालते हैं ! उनको तो पक्का संदेह हो गया है कि, कहीं उनके जैसे सीधे-सादे आदमी उनके जैसे पागल के हाथ लग गए तो...? ना मालुम मजीद मियां, उनकी क्या गत बना डालेंगे ?]

रहीम मियां – [तेज़ क़दम चलते हुए, पीछे मुड़कर कहते हैं] – रहम करो, मियां ! मैं जा रहा हूं, मस्जिद में.. नमाज़ अता करने ! अभी मुझे, तुम्हारे जूत्ते नहीं खाने है !

[मगर मजीद मियां, यों ऐसे ही रहीम मियां को छोड़ने वाले कहाँ ? आख़िर उनको जाना है शाम को, अपने मित्र के घर... पुत्र की शादी की, दावत खाने ! वहां वे, फटी जूत्तियां कैसे पहनकर जा सकते हैं ? अगर चले गए तो, वहां लोग उनकी मज़ाक़ बना सकते हैं ! फिर क्या ? वे बैसाखी के सहारे तेज़ क़दम चलते हुए, रहीम मियां के पास पहुँचने के लिए पूरी बदन की ताकत जुटा लेते हैं ! ख़ुदा रहम, यह कैसा मंज़र ? हवा के झोंके से मजीद मियां के बाल बिखर जाते है ! गोबर से भरे उनके फटे कपड़े, बिखरे बाल और हाथ में फटी जूत्ती लिए लोगों को घुद्दा देते हुए आगे बढ़ते जा रहे हैं ! इस तरह अब ये मजीद मियां, पागल इंसान की तरह लोगों को नज़र आ रहे हैं ! मजीद मियां का यह रूप देखकर, रास्ता चलते लोग सहमते जा रहे हैं ! वे सोचने लगे ‘अगर यहां खड़ा रह गए, तो न मालुम यह पागल उनका क्या हाल बना डालेगा ?’ इस बाज़ार में कई ठेले वाले खड़े हैं, फेरी का सामान बेचने के लिए ! कई शुभचिंतक ग्राहक उनको सावधान करते जा रहे हैं कि, ‘वे अपने सामान को बचाने के लिए कुछ करें !’ इस तरह हलाबली मच जाती है, बाज़ार में !]
रास्ते में खड़ा एक आदमी – [रास्ते में खड़े क्रोकरी वाले से कहता हुआ, आगे निकल जाता है] – अरे ओ क्रोकरी वाले ! तेरे कप-प्लेट को संभाले रखना, देख उधर से एक पागल आ रहा है हाथ जूत्ती लिए ! कहीं तेरे कप-प्लेट न तोड़ दें ? [मजीद मियां की तरफ़, अंगुली से इशारा करता है]

क्रोकरी वाला – आप धैर्य रखें, भाईजान ! मैं भी, उस पागल से कम नहीं पड़ता हूं...

वह आदमी – [डरता हुआ, कहता है] – तब मुझे, आपसे भी खतरा है ! चलिए, मैं तो यह चला ! अब आप दोनों पागल, मचाते रहना हुड़दंग ! [झट तेज़ क़दम बढ़ाता हुआ जाता है]

क्रोकरी वाला – अरे हुज़ूर डरिये मत, ज़रा रुकिए ! देखिये, ज़नाब ! इधर उसके आते ही, मेरा यह डंडा तैयार है..उसका भोगना खोलने के लिए..! [आस-पास खड़े दूसरे ठेले वालों को सचेत करता हुआ उनको आवाज़ देता हुआ कहता है] ओ, हसन मियां ! काच की चुड़ियों का, ध्यान रखना ! आ रहा है, कोई पागल !

हसन मियां – [पास वाले ठेले वाले से, कहते हैं] – अरे, ओ अकरम मियां ! म्युनिसपलटी वाले क्या ध्यान रखते हैं, इन पागल इंसानों का ? ये माता के दीने ख़ाली तत्पर रहते हैं पागल कुत्तों को पकड़ने ! मगर, पागल इंसानों को कौन पकड़ेगा ?

अकरम मियां – [पास खड़े फल वाले सुलतान मियां से, कहते हैं] – सुलतान मियां, सुन रहे हो, तुम ? क्या बोल रहे हैं हसन मियां ? काहे के बने बैठे हैं, तुम...ठेले यूनियन के लीडर ? चलो यार उस कमबख्त को ठोकते हैं ज़रा ! यहां खड़े रहकर, क्या तमाशा देखना ?

[उधर मजीद मियां को पागल समझकर, ये ठेले वाले ही पीछे नहीं लगते हैं ? इनके पीछे आवारा कुत्तों का झुण्ड भी भौंकता हुआ, उनके पीछे लग जाता है ! इस तरह रहीम मियां पीछे आ रही लोगों की भीड़ और आवारा कुत्तों को देखकर, बेचारे घबरा जाते हैं ! मुख से एक ही जुमला निकालता है !]

रहीम मियां – [घबराकर, ज़ोर से कह बैठते हैं] - ‘ख़ुदा रहम, ऐसा कौनसा गुनाह हो गया हमसे ? जो पाक इबादत के लिए जाते मोमीन के पीछे, शैतानों की फ़ौज लग जाती है ?’

[फिर क्या ? बेचारे बेहताशे चिल्लाते हुए, क़दमों की रफ़्तार बढ़ा देते हैं !]

रहीम मियां – [चलने की रफ़्तार बढ़ाते हुए, कहते हैं] बचाओ, बचाओ ! ख़ुदा रहम..ख़ुदा रहम ! अरे मेरी जान बख्श दो, ख़ुदा के लिए !

[अब पीछे आ रहे कुत्तों के झुण्ड की निग़ाह, म्युनिसपलटी के कुत्ते पकड़ने के पिंज़रे पर गिरती है ! उसको देखते ही, वे भड़क जाते हैं ! पिछले माह इन कुत्तों के साथियों को, म्युनिसपलटी वाले कर्मचारी पिंज़रे में पकड़कर ले गए थे ! अभी तक उन कुत्तों का बिछोव इन कुत्तों को सता रहा है, इसलिए अब इस पिंज़रे को देखकर वे घबरा गए हैं ! अत: अब ये एक सुर में किलियाने लगे हैं ! वहां पास ही अमन क़ायम करने वाला एक सिपाही खड़ा है, जो खड़ा-खड़ा बीड़ी पी रहा है ! अब यह मुआ इन किलिया रहे कुत्तो को देखकर घबरा जाता है, कारण यह रहा, पिछले माह इस बेचारे सिपाही ने कुत्ते पकड़ने के कार्यक्रम मे म्युनिसपलटी के आदमियों की मदद की तब कोई पागल कुत्ता इसे काट खाया...और बेचारे को अस्पताल जाकर, पेट में १८ इंजेक्शन अलग से लगवाने पड़े ! तब से बेचारा इन किलियाते कुत्तों को देखकर, घबरा जाता है ! उसके पांव डर के मारे कांपने लगते हैं कि, कही कोई कुत्ता उसको वापस काट न खाएं ? अगर, काट खाया तो..? वापस अस्पताल जाकर, १८ इंजेक्शन लगवाने होंगे ! यह डर उसके बदन में ऐसा व्याप्त हुआ है कि, बीड़ी थामा हुआ उसका हाथ फड़-फड़ करता कांपने लगा ! बस, फिर क्या ? उस धूज़ते हाथ से सुलगती बीड़ी छूटकर एक किलिया रहे कुत्ते के ऊपर गिरकर उसके बालों में उलझ जाती है, और वह धीरे-धीरे उसकी खाल को जलाने लगती है ! खाल के जलने से उस कुत्ते को लगता है ऐसा करंट कि, वह अपना पूरा बदन झंझोड़ डालता है ! मगर बदन झंझोड़ डालने से भी उस बीड़ी से उसे छुटकारा नहीं मिलता, और इधर यह जलन नाक़ाबिले बर्दाश्त हो जाती है ! तभी उसकी निग़ाह में पास खड़ा सिपाही आ जाता है, उसको देखकर वह समझ लेता है ‘ज़रूर इस शैतान के चाचा ने, उस पर सुलगती बीड़ी फेंकी है ?’ बस, फिर क्या ? लपककर उस बेचारे सिपाही की पिंडी को काट खाता है, उस बेचारे को चिल्लाने का वक़्त भी नहीं मिलता है..तब तक तो वह नालायक उसकी दोनों टांगों के बीच घुस कर, अपने बदन को रगड़ डालता है ! इस तरह, वह सुलगती बीड़ी से छुटकारा पा लेता है ! छुटकारा पाते ही, वह दौड़ता है, मगर तब-तक उस सिपाही में हिम्मत लौट आती है...और वह गुस्से से हाथ में थामे गंगाराम यानि डंडे को फेंक देता है, उस दौड़ते कुत्ते के ऊपर ! मगर, उसका निशान चूक जाता है ! इस तरह निशाना चूकते ही, लाला मिश्रीलाल की होटल पर मक्खनियां चेपकर आ रहे मक्खन मियां की टाट को चमका देता है ! यह मक्खन मियां ठहरे, लाला मिस्रीलाल होटल के कर्मचारी ! जिन्हें आदत है, चोरी से लस्सी पीने की ! ग्राहकों को लस्सी का ग्लास देने के पहले ये ज़नाब, थोड़ी-थोड़ी लस्सी चुराकर अलग से छिपाकर रख लेते हैं ! फिर वक़्त मिलने पर, बिल्ली की तरह चट कर जाते हैं उस लस्सी को ! मगर आज बात हुई, कोई दूसरी ! यह चोरी से पी गयी लस्सी, दिखलाने लगी अपने भाव ! अब टाट चटकते ही, बेचारे मियां घबरा गए हैं..और ज़मीन पर पड़े उस पुलिसकर्मी के डंडे को देखते ही, ज़नाब को पुलिस की पिटाई का डर उनको सताने लगा ! डर के मारे, उनके पेट के मरोड़े उठने लगे ! फिर क्या ? तेज़ क़दम चलते हुए, पाख़ाने की तरफ़ बढ़ने लगे ! मगर यह मुआ पुलिसकर्मी, उनको जाते देख, पीछे से आवाज़ लगा बैठता है !]

पुलिसकर्मी – अरे, ओ मियां ! किधर जा रहे हो ? ज़रा रुकिए, जेब की तलाशी लेनी है ! आज़कल घंटाघर बाज़ार में, जेब कतरे बहुत बढ़ गए हैं...नामाकूल !
[यह पूरा खिलका सामने से आ रहे, भावी नेता दूल्हे मियां देख लेते हैं ! फिर क्या ? वे झट चले आते हैं, उस सिपाही के पास ! उसके कंधे दबाते हुए, बिना पूछे सलाह दे डालते हैं !]

दूल्हे मियां – [सिपाही के कंधे दबाते हुए, कहते हैं] – अरे ज़नाब, अब आपने काहे ज़हमत उठा रहे हैं ? आपने, यों ही बेचारे मक्खन मियां की टाट चटका डाली ? आपको मालुम नहीं, ये ठहरे लाला मिश्री लाला के ख़ास कामदार ! इनके मालिक हैं, सोने के अंडे देने वाली मुर्गी ! मुझको देते हैं, चुनाव लड़ने का चंदा और आपका चलाया करते हैं बीड़ियों का खर्चा ! फिर क्यों देते हो दोष, इस बेचारे मक्खन मिया को ?

[इतने में पीछे से फेरी वाले की पुकार सुनायी देती है ! वह ज़ोर से कह रहा है, कि..]

फेरी वाला – ओ हवलदार साहब, वह पागल मस्जिद की ओर गया है ! कहीं वह मस्जिद में घुसकर, हुड़दंग न मचा दे ? अगर वह एक बार मस्जिद में घुस गया, तो उसे बाहर निकालना हो जाएगा मुश्किल !

[उस फेरी वाले की बात सुनकर दूल्हे मियां की निग़ाह मजीद मियां और उनके पीछे लगी लोगों की भीड़ पर गिरती है ! एक नेता को, और क्या चाहिए ? बस, लोगों की भीड़ ! जिसे देखकर, दूल्हे मियां ख़ुश हो उठे, अनायस उनको भाषण सुनने वाले जो मिल गए ! उनके सर पर नेतागिरी का भूत चढ़कर बोलने लगा ! फिर क्या ? वे उन लोगों को आवाज़ दे देकर अपने पास बुलाने लगे, उन लोगों के इकट्ठे होते ही वे जोश से भर जाते हैं ! और, नेताई अंदाज़ से भाषण देना शुरूकर देते हैं !]
दूल्हे मियां – [नेताई अंदाज़ में, भाषण देते हुए कहते हैं] – भाइयों, यह ख़ुशी की बात है, जो आदमी मस्जिद की तरफ़ गया है..वह ज़रूर अल्लाह पाक की इबादत करने, मस्जिद के अन्दर जाएगा ! क्योंकि, वह अल्लाह का नेक बन्दा है ! उसको जाने दीजिये, आप उसका रास्ता मत रोकिये ! ख़ुदा के लिए एक बार इधर देखिये, ज़रा !

[दूल्हे मियां की पार्टी के कार्यकर्ता चुनाव चिन्ह गधे का बेनर लिए खड़े हैं, उनकी ओर हाथ का इशारा करते हुए दूल्हे मियां आगे कहते हैं !]

दूल्हे मियां – यह गधा आपका ही है ! इस गधे के निशान पर चौकड़ी की मोहर लगाकर, इसे जीता दीजिये ! इस गधे की जीत, आपकी जीत !

[दूल्हे मियां कुछ और बोलना चाहते थे, मगर इनके कार्यकर्ताओं ने नारे लगाने शुरूआत कर डाली...और बेचारे दूल्हे मियां को, बोलने का एक मौक़ा नहीं दिया ! बेचारे दूल्हे मियां कितनी कोशिश करते हैं, बोलने की ! मगर यहां..? उनकी एक न चली ! आख़िर, वे सुनना क्यों चाहेंगे ? उनको भी इस भीड़ के सामने नारे बोलकर, कुछ कर दिखाना है !]

एक कार्यकर्ता – [ज़ोर से, बोलता है] – जीतेगा भाई, जीतेगा !

सभी कार्यकर्ता – [एक साथ ज़ोर से, बोलते है] – गधा वाला जीतेगा !

एक कार्यकर्ता – [वापस ज़ोर से, बोलता है] – वोट किसको दोगे ?

सभी कार्यकर्ता – [एक साथ ज़ोर से, बोलते है] – गधे के निशान को !

एक कार्यकर्ता – [कूदता हुआ, ज़ोर से नारे लगाता है] – हवलदार साहब, किसको जिताएंगे ?

सभी कार्यकर्ता – [नाचते हुए, बोलते हैं ज़ोर से] – दूल्हे मियां ! दूल्हे मियां !

एक कार्यकर्ता – [दूल्हे मियां का एक हाथ, ऊपर करके ज़ोर से बोलता है] – दूल्हे मियां का, क्या निशान ?

सभी कार्यकर्ता – [कूद-कूदकर ज़ोर से, बोलते हैं] – गधा खड़ा है, सीना तान !

[इतने में मजीद मियां मुंह उतारे, आते दिखाई देते हैं ! उनको देखकर. भीड़ का एक मजूम एक सुर में ज़ोर-ज़ोर से बोलना शुरु करता है !]

मजूम का एक हुड़दंगी – [चिल्लाता हुआ, ज़ोर से बोलता है] - पागल आया, पागल आया !

सभी हुड़दंगी – [सभी हुड़दंगी एक साथ एक ही आवाज़ में, ज़ोर से बोलते है] - मारो सोटा, कर दो ठीक !

एक हुड़दंगी – [कूदता हुआ, ज़ोर से बोलता है] – मामू का जीजा !

सभी हुड़दंगी - [सभी हुड़दंगी एक साथ एक ही आवाज़ में, ज़ोर से बोलते है] – कुए में पड़ा !

एक हुड़दंगी – [ज़ोर से, बोलता है] – कुआ फूट गया !

सभी हुड़दंगी - [सभी हुड़दंगी एक साथ एक ही आवाज़ में, ज़ोर से बोलते है] – मजीद मियां मर गया !

[होली का माहौल, लोगों के दिमाग़ में मस्ती छायी हुई है ! मस्ती करते ये लोग मजीद मियां के के समीप आते हैं, और इनको नज़दीक आते देखकर मजीद मियां का दिमाग़ गरम हो जाता है ! वे जूत्ती हाथ में लिए, उन लोगों को पीटने के लिए उतारू हो जाते है ! ये लोग मजीद मियां को चिढ़ाते जा रहे हैं, और मजीद मियां खीजते हुए पागलों जैसी हरक़ते करने लगते हैं ! दूल्हे मियां अच्छी तरह से, मजीद मियां को जानते हैं ! वे यह भी जानते हैं, मजीद मियां के कहने से लायकान और व्यापारियों के मोहल्ले वालों के ठोक बंद वोट उनको मिल सकते हैं ! क्योंकि, मजीद मियां हवेली वालों के सम्मानित बुजुर्ग ठहरे ! उनका कहना, कोई टाल नहीं सकता ! इस कारण अब दूल्हे मियां, इस हो रहे हुड़दंग को रोकना चाहते हैं !]

मजीद मियां – [जूत्ती हाथ में लिये, ज़ोर से चिल्लाते हुए कहते हैं] – थोड़ा रुक जाओ, काफिरों ! अभी इस जूत्ती से करता हूं, तुम्हारी मरम्मत !

[अब दूल्हे मियां तमाशबीन बने आदमियों को रूख्सत देकर, मजीद मियां के पास आते हैं ! वे उनके नज़दीक आते हैं, फिर उनके कंधे पर अपना हाथ रखकर उनको शांत करने की कोशिश करते हैं ! उनकी नीचे गिरी बैसाखी को उठाकर, उन्हें थमा देते हैं ! फिर उन्हें अपने हाथ का सहारा देते हुए, वहां निकट खड़े ठेले के पास ले आते हैं ! ठेले वाले से स्टूल लेकर, उनको उस बैठाते हैं ! फिर हाथ जोड़कर, उनसे कहते हैं !]

दूल्हे मियां – आली ज़नाब ! हाथी के पीछे, कई कुत्ते भौंकते हैं ! मगर हाथी इसकी परवाह नहीं करता ! वह मस्ती से, अपने पथ पर चलता रहता हैं ! हुज़ूर, आप हाथी हैं...इन कुत्तों की काहे परवाह करते हैं ? मैं ज़रूर हुड़दंग महने वाले इन करने वाले मोचियों की, अक्ल ठिकाने लगा दूंगा ! इन कमबख्तों ने, इज्ज़तदारों की इज़्ज़त की भाजी बना डाली ? ख़ुदा रहम, इनकी नज़रों में इंसान की इज़्ज़त की कोई परवाह नहीं ?

[तभी सामने से एक तांगा आता हुआ दिखाई देता है, झट दूल्हे मियां उस तांगे वाले को पुकारकर तांगे को रोकने का कहते हैं !]

दूल्हे मियां – [ज़ोर से आवाज़ देते हुए, कहते हैं] - अरे, ओ नूरजी तांगे वाले ! ज़रा, साहब को तांगे में बैठाइए ! इनको आराम से पहुंचा देना, इनकी हवेली ! इनको कोई तकलीफ न आये, ध्यान रखना ! वापस आकर भाड़ा मुझसे ले लेना, इनसे मांगना मत !

[नूर मियां उनको सहारा देकर, आराम से तांगे में बैठाते हैं ! फिर घोड़े को चाबुक मारकर, तांगे को आगे बढ़ा देते हैं !]

[४]

[मंच पर, रोशनी फ़ैल जाती है ! माणक चौक का मंज़र सामने आता है ! चुनावी जलसे की तैयारी हो रही है ! पार्टी के लोग अलग-अलग गुट बनाकर चौक में जगह-जगह खड़े हैं, और चुनावी मुद्दे पर बातें करते जा रहे हैं ! चौक के पास वाली एक पतली गली में, बेलदारों ने अपने गधों को घोड़े की तरह सज़ाकर खड़ा किया है ! पूरा चौक बेनर, झंडियाँ और पोस्टर से साज़ चुका है ! आज चौक में, कहीं भी कूड़ा-करकट नहीं दिखाई दे रहा है ! इस सफ़ाई की तारीफ़ कर रहे मोहल्ले के बुजुर्ग व सम्मानित आदमी, दुकान के चबूतरे पर बैठकर गुफ़्तगू कर रहे हैं !]

एक बुजुर्ग – [रीश को हाथ से सहलाते हुए, कहते हैं] - देख लो, कासीम मियां ! बन्दे के काम करने के तरीके की, तारीफ़ करना वाजिब है ! देखिये, चौक में कचरा तो क्या ? घास का तिनका भी, दिखाई नहीं दे रहा है !

कासीम मियां – सफ़दर मियां ! ये तो दूल्हे मियां है, ज़नाब ! इनको है, किसकी फ़िक्र ? इनके कोई आगे हैं, न कोई पीछे ! पूरे साल, कुंआरे दूल्हे बने घूमते रहते हैं..पूरे शहर में ! कुंआरे भी ऐसे हैं, जो ताउम्र शादी करने वाले नहीं ! मैं तो कहूंगा, ज़नाब ! धूम-धाम से बरात निकालने में कितना कचरा पैदा हो जाता है, उस कचरे से दूल्हे मियां बच गए !

तीसरा बुजुर्ग – वाह ज़नाब, वाह ! दूल्हे मियां है ख़ुद कबाड़ी, फिर ज़नाब ने चुनावी निशान कैसा रखा है बेमिसाल...क्या है ? गधा ! और इनका नारा भी कैसा ज़ोरदार है..गधा है, या कचरादान ?

सफ़दर मियां – फ़िक्र काहे करते हैं, ज़नाब ? दूल्हे मियां, ऐसे-वैसे नहीं है ! आली ज़नाब गली-मोहल्ले की सफ़ाई का तो ध्यान रखेंगे ही, मगर सियासती गलियारे में बढ़ रहे भ्रष्टाचार के कचरे को हटाकर इस हिन्दुस्तान में सदाक़त की रोशनी फैलायेंगे ! [जलसे की तैयारी पूरी होती देखकर, आगे कहते हैं] चलिए, चलिए ! अब जलसे की तैयारी, पूरी हो चुकी है !

[अब ये बुजुर्ग जलसे में शामिल होने के लिए अपने क़दम आगे बढ़ाते हैं ! अचानक, माइक पर दूल्हे मियां की आवाज़ गूंज़ती है ! वे कह रहे हैं..]
दूल्हे मियां – [माइक थामे हुए, कहते हैं] – मेरे बहादुर साथियों, हमारी जीत निश्चित है ! मेरी जीत, आपकी जीत है ! हमारी ताकत का अंदाजा लगाकर, ओपोजिशन वाले घबरा गए हैं ! बस, आप सभी आगे बढ़ें मेरे कंधे से अपना कंधा मिलाकर ! जीत, हमारी ही होगी ! अब मैं आप सबसे निवेदन करता हूं, [हाथ जोड़कर, कहते हैं] मेहरबानी करके, आप सभी कतार में खड़े हो जायें ! [बैंड वालों की तरफ़ देखते हुए, कहते हैं] अरे, ओ बैंड वालों ! पान की दुकान पर खड़े होकर, क्यों पान चबा रहे हो ? आओ भाई, आओ ! और बजाओ आपका बैंड-बाजा ! जमकर बजाओ, यार !

[अब बैंड वाले बीच चौक में आकर, राजेश खन्ना अभिनीत गीत “मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हनियां...” की धुन पर जमकर बजाने लगे ! इस धुन को सुनकर, पास खड़े बुजुर्ग एक-दूसरे का मुंह देखने लगते हैं ! फिर क्या ? सफ़दर मियां से बिना बोले रहा नहीं जाता, वे तपाक से हंसते हुए बोल देते हैं !]
सफ़दर मियां – [हंसते हुए, कहते हैं] – गेलसफ़े, तेरी बहन तो है नहीं ! और तू ठहरा, अखंड कुंआरा ! फिर तू किसकी शादी कराएगा, कुत्तिया का ताऊ ? मां के...[गली की पर्ची निकालते हैं] यह कौनसी धुन बजवा रहा है, यहां ? तेरे बाप का नाम निकालने के लिए... ?

[थोड़ी देर बाद, यह चुनावी रैली चलने के लिए तैयार हो जाती है ! फिर क्या ? ऐसा शानदार मंज़र दिखाई देता है, जिसमें सबसे आगे-आगे कतार में चल रहे हैं...पूरा श्रृंगार किये हुए दूल्हे मियां के चुनावी निशान “गधे” ! उनके पीछे, बेनर लिए पार्टी के कई कार्यकर्ता ! उनके पीछे-पीछे ही बैल-गाड़ी पर बैठे, मोहल्ले के बुजुर्ग गण ! इन लोगों ने साज़ ले लिया है हाथ में, बजाने के लिए ! इनमें से कोई बजा रहा है, ढोलक..तो कोई बजा रहा है हारमोनियम ! कई बुजुर्ग मंजीरे और करताल बजाते जा रहे हैं ! जिनके पास कोई साज़ नहीं है, वे तालियां पीटते हुए इन लोगों का साथ देने लगे हैं ! कला प्रदर्शन करते ये बुजुर्ग गण, अपने-आप को अल्लारखा साहब के अवतार ही समझने लगे हैं ! इन बुजुर्गों में, असगर अली साहब गायकी में अपना नाम रखते हैं ! वे तो ऊंची तान में, दूल्हे मियां की तारीफ़ में बनाए गीतों को गाते जा रहे हैं ! इस बैल-गाड़ी के पीछे चार बैल-गाड़ियां बच्चों से भरी हुई चल रही है ! ये बच्चे ज़ोर-ज़ोर से नारे लगाते हुए, आसमान गूंजा रहे हैं !]

एक बड़ा बच्चा – [हाथ ऊंचा करके, नारे लगवाता है] - अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ, सौ में लगा धागा..!

सभी बच्चे – मामू प्यारा, दुम दबाकर भागा !

एक बड़ा बच्चा – [ज़ोर से, नारा लगवाता है] – बहुत हुआ, ज़ुकाम मामू को !

सभी बच्चे - [ज़ोर से लय-बद्ध बोलते हैं] – एक रोज़ इतना छींका, इतना छींका, इतना छींका, इतना छींका, दुम दबाकर उड़ गया उल्लू !

बड़ा बच्चा – [ज़ोर से, बोलता है] - आगे क्या हुआ, दोस्तों ?

सभी बच्चे – धोखा हुआ उस मामू को, जीत गये भाई दूल्हे मियां ! दूल्हे मियां दूल्हे मियां !

[इस तरह ये बच्चे नारे लगाते हुए, आसमान गूंजाने लगे ! इनके पीछे बैंड बाजे वाले चल रहे हैं, वे मधुर धुनें बजाते जा रहे हैं ! बैंड के पीछे पार्टी के पदाधिकारी गण, दूल्हे भाई और शहर के मौज़िज़ आदमी गुलाब के पुष्प की मालाएं पहने हुए चल रहे हैं ! इन पुष्पों की खुशबू, चारों तरफ़ फैलती जा रही है ! बेचारे दूल्हे मियां को लोगों ने इतनी सारी मालाएं पहना दी है, बेचारे इन मालाओं के वज़न से कभी इधर डिगते हैं तो कभी उधर ! मुंडेरों पर बैठी हसीन मोहतारामाएं, दुहे मियां को टका-टक निहारती जा रही है ! जैसे-जैसे यह जुलूस आगे बढ़ता है, कोलाहल बढ़ता जा रहा है ! थोड़ी देर बाद, यह शोरगुल सुनायी नहीं देता ! मंच पर, अंधेरा फैल जाता है ! थोड़ी देर बाद, मंच वापस रोशन होता है ! मामूजान और रशीद भाई जिलकन को हटाकर, हवेली में दाख़िल होते हैं ! फिर चौक में आकर, वहां रखी कुर्सियों पर बैठ जाते हैं ! फिर वे दोनों, गुफ़्तगू शुरू करते हैं !]

रशीद भाई – [जम्हाई लेते हुए, कहते हैं] – थका डाला यार, इस इलेक्शन ने ! मां कसम मामू यार, दो दिन लगा-लग मुझे तो यार घूमा-घूमाकर मेरी जूत्तियां घिसवा डाली तूने !

मामूजान – भाणजा यार, इतना झूठ मत बोल ! तेरी जूत्तिया तो रह गयी, पूरी सलामत ! मगर बेचारे दूल्हे भाई की जूत्तियां, घिस क्या गयी ? फट गयी, यार ! तूझे यह जानकर आश्चर्य होगा, घंटाघर बाज़ार का कोई मोची उन जूत्तियों की मरम्मत करने के लिए तैयार नहीं हुआ !

रशीद भाई – [नाराज़गी से कहते हैं] – अरे उल्लू की दुम ! तूने तेरे स्वार्थ के ख़ातिर, बेचारे चच्चाजान को फंसा दिया किसी पचड़े में ? वे बेचारे ठहरे भोले, तेरे सपोर्ट में घूम-घूमकर उन्होंने अपनी जूत्तियां फाड़ी होगी ! अरे...परवरदीगार, यह क्या हो गया...मेरे चच्चा के साथ ?

मामूजान – परवरदीगार को बीच में क्यों लाता है रे, भाणजे ? तेरे मुख़्तसर को तू ऐसा भोला मत समझ, क्या जानता है तू, उनके बारे में ? आख़िर, तू है कौन ? तू ठहरा, उल्लू की दुम ?

रशीद भाई – [घबराकर, कहते हैं] – अरे ख़ुदा ! मेरी जासूसी कर रहे थे, या करवा रहे थे ? यह कौन है मतीरे का बीज, जिसने मेरे चच्चा को भड़काया..? अब बोल, मामू ! [कमीज़ की बाएं चढ़ाते हैं, फिर तल्ख़ आवाज़ में कहते हैं] बोल मामू, अब किसकी शामत आयी ? बोल..बोल अब, चुप क्यों है ?

मामूजान – दूल्हे भाई को कौन भड़का सकता है ? किसकी शामत आयी, जो उनके पास जाए ? तुझे क्या पता, मेरे बेचारे दूल्हे भाई कितने हैं बदनसीब ? जिनको...

रशीद भाई – [घबराकर, कहते हैं] – क्या हो गया रे, मेरे चच्चाजान को ? बोल मर्दूद, क्या बात है ?

मामूजान – घबरा मत, कुछ नहीं हुआ ! घंटाघर बाज़ार में, इन मोचियों से हो गया दंगल ! बेचारे दूल्हे भाई फटी हुई जूत्तियां लेकर जा रहे थे मोची के पास, ताकि वे उनकी मरम्मत कर दे ! मरम्मत करना तो दूर, इन बेरहम मोचियों ने समझ लिया कि, मजीद मियां उनको जूत्ती से पीटने आ रहे हैं उनके पास !

रशीद भाई – क्या..क्या ? यह बात सच्च है ?

मामूजान – हां यार, क्या मंज़र था वह ? आगे-आगे दौड़ रहे थे मोची रहीम मियां, और पीछे-पीछे पागलों की तरह जूत्ती लिए दौड़ रहे थे दूल्हे भाई !

[अब मामूजान उस बीते वाकये को विगतवार, फुसफुसाते हुए उनके कान में बताने लगे ! सुनते ही रशीद भाई के दिल में, टीस उठती है ! उनके चेहरे पर, फ़िक्र की रेखाएं स्पष्ट दिखाई देने लगती है !]

रशीद भाई – [रोनी आवाज़ में, कहते हैं] – यह तो बहुत बुरा हुआ है, मामू ! अभी चुनाव का प्रचार चल रहा है, वोट पड़े नहीं ! और तेरी हो रही है, यह दुर्दशा ! बेवकूफ़, अब चच्चाजान हो गए नाराज़ ! अब वे तेरे सपोर्ट में घूमने वाले नहीं ! वैसे वे पहले से ही, तुझसे नाराज़ थे ! तूझे पता नहीं, घंटाघर बाज़ार में खड़ी बच्चों की टोली ने मजीद मियां के कपड़ो पर गोबर डालकर उनको परेशान किया ! ये वे ही बच्चे हैं, जो तुझसे गोलियां खाकर...

मामूजान – [ज़ोर से, कहते हैं] - काठ के उल्लू ! क्यों बेवकूफ़ो जैसी बातें, करता जा रहा है ? ज़रा दिमाग़ पर ज़ोर लगाकर सोच, ये हुड़दंगी बच्चे वो नहीं है..जो मुझसे गोलियां लेकर खाते हैं ! तू अच्छी तरह से समझ ले, ‘ये वे बच्चे नहीं हैं, जो मुझे सपोर्ट करते हैं !’ क्योंकि ये हैं, कबाड़ी दूल्हे मियां के मोहल्ले के !

रशीद भाई – [रोनी आवाज़ में, कहते हैं] – मामू तेरा चुनावी निशान है, उल्लू ! और तू है, उल्लू की दुम ! उल्लू के पट्ठे, अब डरता-डरता क्यों झूठ बोल रहा है ?

मामूजान – [लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए, कहते हैं] – नाराज़ क्यों हो रहा है, तू तो ठहरा उल्लू का बिरादर ! सोच ले, “हम वो सियासती शतरंज के बेताज़ बादशाह हैं, बच्चे ! जो हर मसले में, अपना फ़ायदा ढूंढ़ लेते हैं ! [हंसते हुए, आगे कहते हैं] अब यों सोच ले, भाणजे ! यह पूरा वाकया फायदा देने वाला ही है !

रशीद भाई – [उतावलेपन से, कहते हैं] – बता यार, कैसे ?

मामूजान – यों क्या यार, मुफ़्त में बता दूं ? मुझे क्या तूने, गेलसफ़ा समझ रखा है ? कुत्तिया के ताऊ, पहले जा ! मेरे लिए, चेतना ज़र्दा डाला हुआ पान तैयार करवाकर लेता आ !

[रशीद भाई खिड़की के पास जाकर खड़े होते हैं, गली से गुज़रते क़ाज़ी साहब के छोरे को देखकर वे उसे आवाज़ लगाते हैं ! फिर उसे, पान लाने का कहते हैं !]

रशीद भाई – [आवाज़ देते हुए, कहते हैं] – अरे, ओ नूर मियां ! ज़रा कासीम भाई पान वाले की दुकान से, मीठा पत्ता चेतना ज़र्दा वाला पान का बीड़ा तैयार करवाकर लेते आना ! अरे सुनो, पैसे मेरे खाते में लिखवा देना ! ज़्यादा देर मत करना, झट-पट लौट आना !

[नूर मियां पान वाले की दुकान की तरफ़, क़दम बढ़ाते नज़र आते हैं ! रशीद भाई वापस आकर, कुर्सी पर बैठ जाते हैं ! फिर वे, मामूजान से कहते हैं !]

रशीद भाई – ले मामू, तेरा हुक्म तामिल हो गया है ! अब तो कुछ बोल, यार ! मां कसम...

मामूजान – अल्लाह मियां ने ,तेरे इस खोपड़े के अन्दर दिमाग़ डाला है या नहीं ? देख भाणजा, मोचियों के साथ उनकी ख़ट-पट हुई या नहीं ? बोल किनसे हुई, यह ख़ट-पट ? अपने दूल्हे भाई से हुई है, समझ ग़या ? मेरे जीजा और जो तेरे च!च्चा जान है !

रशीद भाई – इससे क्या ?

मामूजान – पहले पूरी बात सुना कर, फिर बोला कर ! देख रे, दूल्हे भाई यानि मजीद मियां हैं हवेली वाले ! सभी हवेली वाले इनको सम्मान देते हैं, और इनकी बात माना करते हैं ! बोल, अब कुछ तेरे समझ में आया या नहीं ? अब मैं यही कहूंगा रे, कि...

रशीद भाई – आगे बक, गाड़ी क्यों रोक रहा है..बातों की ?

मामूजान – अबे ए रेल गाड़ी के थर्ड क्लास के मुसाफ़िर, थोड़ा चुप रहना भी सिखा कर ! सुन अब मैं यह अफ़वाह फैलाऊंगा कि, मोचियों और हवेली वालों के बीच में हो गया है झगड़ा !

रशीद भाई – आगे बोल !

मामूजान – पहले यह बता, मोचियों के वोट किसे मिलते हैं ? बोल, अकरम मियां को ?

रशीद भाई – इससे, अपुन को क्या ?

मामूजान – ठण्ड रख, यार ! [इधर-उधर देखकर तसल्ली कर लेते हैं, और फिर वे रशीद भाई से धीरे-धीरे कहते हैं] देख यार ! हवेली वालों के वोट एक साथ किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में पड़ते हैं, तो पांशा ही पलट जाता है !

रशीद भाई – हां..हां, यार ! यह तो मैं जानता ही हूं कि, मजीद मियां की एक ही आवाज़ से एक साथ हवेली वालीं के वोट एक ही झोली में पड़ते हैं ! [धीरे-धीरे, कहते हैं] यार मामू, अभी तो तेरे दूल्हे भाई तुझसे बहुत नाराज़ है ! फिर, ख़ाक तू इनका इस्तेमाल कर पायेगा ?

मामूजान – [हंसते हुए, कहते हैं] – डफ़ोल रह गया रे भाणजा, तू तो ! उनकी नाराज़गी की बात को जानता है, कौन ? तू या मैं, और कौन ? इस बात को, दूसरे क्या जान सकते हैं ? समझा, या नहीं ? अब फ़तेह अपनी ही है, मगर...

रशीद भाई – मगर, क्या ?

मामूजान – देख भाणजे ! मौक़े का फ़ायदा उठाना, अक्लमंद दानिशों का काम है !

रशीद भाई – [हंसते-हंसते, कहते हैं] – यह बकरे बेचने का काम नहीं है, मामू ! यह मसाला ठहरा, सियासत का !

मामूजान – बकरे नहीं बेचने हैं भाणजे, यह बात मैं जानता हूं ! मगर बकरे हलाल करने है, वो भी सियासती ! अब समझा, कुछ ?

रशीद भाई – क्या बोला, यार मामू ? कुछ समझ में नहीं आया, यार ! तू अच्छी तरह से विस्तार से समझा, तो कुछ पल्ले पड़े !

मामूजान – [लबों पर मुस्कान, बिखेरते हुए कहते हैं] – देख, भाणजा ! तू जानता है, मालदार अकरम मियां भी चुनाव में खड़े हैं ! उनके कान में एक ही बात डालनी है कि, मजीद मियां और मोचियों के बीच में छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है ! अब ये हवेली वाले वोट आपको मिलने से रहे, मगर मजीद मियां मेरी बात यानि इस मामू प्यारे की बात को टाल नहीं सकते ! अगर, आपको मंज़ूर हो तो...

रहीद भाई – [हंसी के ठहाके लगाते हुए, कहते हैं] – अरे वाह यार, मामू ! तू तो यार, तगड़ा सौदाग़र निकला ! मामू प्यारे, और क्या ? आगे बोल !

मामूजान – अब आगे सुन, भाणजे ! कबाड़ी दूल्हे मियां को अपुन इशारा करेंगे कि, ‘मामू प्यारे यानि मैं उनके सपोर्ट में बैठ जाऊं, तो हवेली वालों के सारे वोट एक मुश्त में किधर पड़ेंगे ?’ बस भाणजा, अब हमें दोनों सियासती बकरों को अलग-अलग हलाल करना है ! ये दोनों यही समझेंगे कि, मामू प्यारा उनके सपोर्ट में बैठकर उनकी झोली में वोटों के ढेर लगा रहा है ! इस तरह, मामू को बैठने के लिए दिए गए नोटों के बण्डल व्यर्थ नहीं गए ! अब बोल प्यारे, तेरे दिमाग़ में यह बात घुसी या
नहीं ?

[मामू का प्लान सुनकर, रशीद भाई ज़ोर-ज़ोर से हंसते हैं ! तभी नूर मियां तशरीफ़ लाते हैं, और मामू को पान का बीड़ा देकर वापस चले जाते हैं ! मामू अपने मुंह में पान का बीड़ा ठूंसकर, कुर्सी से उठ जाते हैं ! अब दोनों हंसी के ठहाके लगाते हुए, हवेली के बाहर चले आते हैं ! थोड़ी देर बाद, मंच पर अंधेरा छा जाता है !]

[५]

[मंच पर, वापस रोशनी फैल जाती है ! मोहल्ले का चौक नज़र आता है ! चौक में एक चबूतरा है, जिस पर एक बरगद का पेड़ लगा है ! इस चबूतरे पर, मजीद मियां बैठे हैं ! चबूतरे के सहारे, उनकी बैसाखी रखी हुई है ! तभी बुरका पहने, मरियम बी वहां आती है ! बुर्के की जाली थोड़ी हटाकर, वह मजीद मियां से कहती है !]

मरियम बी – अल्लाह का शुक्र है, आख़िर हज़रत के दीदार हो गए ! [मजीद मियां के चुप रहने पर, वे उनका कंधा झंझोड़कर उनसे कहती है !] कहां खो गए, छोटे नवाब ?

[मजीद मियां कोई जवाब नहीं देते हैं, उन्हें ख़ामोश पाकर मरियम बी झुंझला जाती है ! वह तुनककर कहती है !]

मरियम बी – [तुनककर कहती है] – छोटे नवाब, इन कानों में रुई डालकर बैठ गए क्या ? कब से आपको आवाज़ देती जा रही हूं, मगर आप कुछ जवाब देते ही नहीं ! अल्लाह के लिए, इन कानों से मैल निकालकर, जवाब दीजिये ! मैं कोई गेली-घूंगी नहीं हूं, जो यहां बैठकर बकवास करती रहूं ?

[मरियम बी की गुस्से से भरी आवाज़ सुनकर, मजीद मियां चमकते हैं ! और चेतन होकर, शान्ति से कहते हैं !]

मजीद मियां – [चमककर, कहते है] – अरे कौन...? मंझली भाभीजान..आप ? आप अब आयी, क्या कहूं, आपको ? इन सियासती लीडरों ने परेशान कर डाला, मुझे ! इनके बारे में सोचता जा रहा था, और मैं आपकी आवाज़ सुन नहीं पाया...और न मुझे मालुम पड़ा कि, कौन आया है और कौन गया है ?

मरियम बी – [चबूतरे पर बैठती हुई, कहती है] – खैरियत तो है, मियां ? मुझे केवल, आपकी खैरियत चाहिए ! मैं कहती हूं, अब आप क्यों इन सियासती लीडरों के मुद्दे में फंसते जा रहे हैं ? कहीं इस मामू ने, कोई ओछी हरक़त तो न कर डाली ? कमबख्त से, सीधा बैठा नहीं जाता !

मजीद मियां – उस बेचारे को छोड़ो, भाभीजान ! यह तो बेचारा ठहरा अल्लाह मियां की गाय ! बात यह है, परसों के दिन घंटाघर बाज़ार में मोचियों के साथ कहा-सुनी हो गयी ! बस तब से ये सियासती लीडर मेरे पीछे लग गये हैं, ये माता के दीने मुझसे जहां-कहीं मिल जाते हैं....बस ये तब कमबख्त, मक्खनबाजी पर उतर आते हैं ! क्या कहूं, भाभीजान ? ये तो...

मरियम बी – कुछ कहोगे, तब मुझे मालुम होगा ! यों ख़ामोश रहने से, काम नहीं चलता मियां !

मजीद मियां – [ज़ोर से, कहते हैं] – लाहोल-विल-कूव्वत ! ये..ये..काफ़िर [रुककर लम्बी-लम्बी सांसे लेते हैं, फिर कहते हैं] कड़का-कड़क नोटों की गड्डी थमाने की बेहूदी हरक़त करते हैं, और फिर...कहते हैं कि, ‘मेहरबानी करके आप अपने कुनबे के सारे वोट, हमारी झोली में डलवा दीजिएगा !’ मैं ठहरा ईमानदार आदमी, नोट कैसे ले लेता ?

मरियम बी – आगे क्या हुआ, छोटे नवाब ?

मजीद मियां – मैंने झट उनके मुंह पर वह नोट की गड्डी मारी, और अल्लाह मियां से अर्ज़ करने लगा कि, [आसमान की ओर देखते हुए, दोनों हाथ ऊपर ले जाते हुए कहते हैं] ‘या ख़ुदा इन भटके हुए लोगों को, सही रास्ता दिखला दे ! या मेरे मोला, मेरे इन उज़ले कपड़ों पर बेईमानी का दाग़ न लगने दे ! मुझे दोज़ख़ की आग से बचा, मेरे परवरदीगार !’

[फ़िक्र के मारे, मजीद मियां की पेशानी पर पसीने की बूंदे दिखाई देती है ! मरियम बी उनकी पेशानी पर, छाये पसीने के एक-एक कतरे को पल्लू से साफ़ करती हुई उनसे कहती है]

मरियम बी – [पसीने के एक-एक कतरे को, साफ़ करती हुई कहती है] – फिर, क्या हुआ छोटे नवाब ?

मजीद मियां – वे कहते रहे कि, ‘आप इस मामू प्यारे को बैठा दीजिएगा..इससे हवेली वालों के सारे वोट, आपकी मेहरबानी से हमारी झोली में पड़ जायेंगे ! एक भी वोट का फ़ायदा, कोई दूसरा उम्मीदवार उठा नहीं पायेगा ! बस, यह काम अब आपको ही करना है !’

[अचानक, बरगद के पत्ते हिलते हैं ! बरगद की डाल पर, छुपकर बैठे मामूजान नीचे कूदते हैं ! सहसा, आसेब की तरह उनके सामने प्रगट होते हैं ! अचानक आयी इस आसमानी आफ़त से, बेचारे मजीद मियां घबरा जाते हैं ! उनकी हालत ख़राब हो जाती है, मुंह से एक शब्द बाहर नहीं आता..और उनके हाथ-पांव धूज़ते जाते हैं, उनके धूज़ते हुए होंठ करने लगते हैं फ़र फ़र ! फिर क्या ? इस आफ़त से के बचने के लिए, बैसाखी उठाने का प्रयास करते हैं, मगर इन धूज़ते हाथों से उस बैसाखी को वे संभाल नहीं पाते ! फिर क्या ? वह बैसाखी धड़ाम से जाकर, चबूतरे के नीचे सो रहे काबरिये कुत्ते के ऊपर गिरती है ! अचानक आयी इस आसमानी शैतानी क़यामत का अहसास पाकर, वह कुत्ता ज़ोर से कूकता है ! तभी इस दुबके हुए कुत्ते को सामने नज़र आ जाते हैं, मजीद मियां ! फिर क्या ? अब वह समझ लेता है, इस नादान पर बैसाखी गिरानी की हरक़त मजीद मियां ने की है ! वह किलियाता हुआ आकर, मजीद मियां की पिंडी काट लेता है ! अक्समात हुई इस घटना से, बेचारे मजीद मियां का दिल बैठ जाता है ! और बचने के लिए, उनके हाथ-पांव चल जाते हैं ! बस, उनके पांव की लात उस कुत्ते के मोहरे पर पड़ती है ! लात खाकर, वह कुत्ता सरपट दौड़ता है, मगर जाता-जाता वह...अपना मुंह मरियम बी के फ़र-फ़र उड़ते दुप्पटे से मुंह रगड़कर, दौड़ जाता है ! इस मंज़र को देख रहे मामूजान, ज़ोर से ठहाके लगाकर हंस पड़ते हैं !]

मामूजान – [हंसते हुए, कहते हैं] – वाह...दूल्हे भाई, अंधे के हाथ बटेर लग गए ! अब चले हैं आप, मेरे जैसे ग़रीब को हलाल करने ! वाह मुफ़्त में हलाल करेंगे, इस बेचारे को ? वाह ज़नाब, आप तो छुपे रुस्तम निकले ?

[मगर यह काबरिया कुत्ता ठहरा, बड़ा जबरा ? दौड़कर गया तो क्या हो गया, कमबख्त थोड़ी दूर आगे जाकर खड़ा हो गया और वहां खड़ा होकर भौंकता रहा ! मगर जैसे ही वह अपने बिरादर जासूसी कुत्ते यानि मामूजान को, पेड़ से उतरते देखता है..स्वत: उसका भौंकना, बंद हो जाता है ! इधर अकस्मात् मामूजान को पेड़ से कूदते देखकर, मजीद मियां उनको पहचान नहीं पाते हैं ! मामूजान के बाल बिखरे हुए, और पहने सफ़ेद कपडे..ऐसा लगता है, मानो बरगद के पेड़ से लटका कोई आसेब अचानक उनके सामने आ गया हो ? फिर क्या ? बेचारे मजीद मियां डर के मारे, इस आसेब से बचने के लिए वज़ीफा पढ़ना शुरू करते हैं ! इतना भी नहीं सोच पाते कि, बरगद से कूदने वाला आदमी आसेब न होकर उनका ख़ास मर्ज़ीदान साला मामू प्यारे है !]

मजीद मियां – [धूज़ते हुए, बोलते जाते हैं] – अरेಽಽ अरेಽಽ रेಽಽ, तू कौन ? आहाಽಽ हाಽಽ भूत ! दूर हट, तू तो ज़िन्दा भूಽಽत...खबीಽಽ..स ! [वज़ीफा पढ़ना शुरू करते हैं] जिन्न तू ज़लाल तू आयी बला को टाल तू...ए पीर दूल्हे शाह..

मरियम बी – [हंसती हुई, कहती है] – काहे डर रहे हो, छोटे नवाब ? यह भूत नहीं है, कमबख्त मामू का बच्चा है !

मामूजान – [लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए, कहते हैं] – मैं मामू का बच्चा नहीं हूं, मैं ख़ुद मामू प्यारे हूं..दूल्हे भाई का साला आधा घर वाला ! यह ख़िलकत एक तरफ़, और जोरू का भाई एक तरफ़ !

[थोड़ी देर में, मजीद मियां को सारी बात समझ में आ जाती है ! डर के कारण उनकी सांसे जो धौंकनी की तरह चल रही थी, अब डर दूर हो जाने से ये सांसे सामान्य हो जाती है ! अब वे अपनी बैसाखी को संभालकर अच्छी तरह से रख देते हैं, फिर वे आराम से बैठ जाते हैं ! अब, वे शान्ति से कहते हैं..]

मजीद मियां – [शान्ति से, कहते हैं] – भाभीजान, यह साला ख़बीस मामू निकला ! यह तो ज़िंदा भूत है ! चुनाव में खड़ा होकर, मेरा खून पी गया कमबख्त ! इस खबीस के कारण ही, इन सियासती लीडरों ने मेरा सर-दर्द बढ़ा डाला !

मामूजान – [हंसते हुए, कहते हैं] – क्यों घबराते हो, दूल्हे भाई ? आपकी उम्र हो गयी है, ख़ुदा के नाम लेने की ! छोड़िये, ये सारे प्रपंच ! चिंता मुक्त होकर, परवरदीगार की इबादत कीजिये ! ये फ़िक्र करने के सारे काम, अब मुझ पर छोड़ दीजिएगा ! चुटकी बजाकर, ख़त्म कर दूंगा आपकी फ़िक्र ! आख़िर, यह मामू प्यारे है..कोई घसियारा नहीं !

मजीद मियां – फ़िक्र क्यों न करूं, साहबज़ादे ? अरे वाह, क्या कहा ज़नाब ने ? आपको पता है, आपके कारण ऐसे एरे-गैरे हरामखोर सियासती लीडर, मुझे बीच रास्ते में रोककर कड़का-कड़क नोटों के बण्डल थमाने लगे हैं..क्या मैं आपका दलाल हूं ? उनके ख़ातिर, तुमको चुनाव में बैठाने का सौदा करता रहूँ ? साहबज़ादे, तुम्हारे ही कारण ये हरामखोर, मेरे सफ़ेद कपड़ों पर दाग़ लगाने चले हैं !

मामूजान – अरे, ओ दूल्हे भाई ! अब किस बात की, फ़िक्र करना ? [इतने में मामूजान की नज़र, मजीद मियां के पायजामे से बाहर निकले तीज़ारबंद पर गिरती है ! फिर क्या ? उस तीज़ारबाद के दीदार पाते ही, वे झट उनके पास आकर उनका तीज़ारबंद पकड़ लेते हैं !] खोल दीजिये ज़नाब, दाग़ लगे इन कपड़ों को, मैं अभी धो डालता हूं इन्हें !

मजीद मियां – [तीज़ारबंद छुड़ाते हुए, कहते हैं] – अरे नालायक कुत्तिया के ताऊ, क्या तू सरे आम मुझे नंगा कर डालेगा ? छोड़, मेरा तीज़ारबंद !

[मरियम बी को ऐसी वाहियात हरक़त अच्छी नहीं लगती, वे इसे देखकर नाराज़ हो जाती है ! फिर क्या ? हाथ बढ़ाकर, पांव की जूत्ती निकालती है ! फिर, कहती है मामूजान से !]

मरियम बी – [पांव की जूत्ती दिखलाती हुई, कहती है] – बड़े-बुजुर्गों से मज़ाक़ करता है, नालायक ? आ इधर, अभी तेरी टाट को चटका देती हूं इस जूत्ती से !

[मामूजान झट उनका तीज़ारबंद छोड़कर, चबूतरे से नीचे उतर जाते हैं !

मजीद मियां – कहाँ जा रहे हो, मियां ? अब मुझे, इन सियासती बकरों से निज़ात कौन दिलाएगा ? साहबज़ादे, इस भंवर ज़ाल में पड़े तेरे दूल्हे भाई कुछ तो ख्याल करो ! भगो मत !

मामूजान – [हंसते हुए, कहते हैं] – हुज़ूर निज़ात मिल गयी है, आपको ! समझ लीजिये, समस्या का समाधान हो गया है ! अब यह सारा मामला मैं ख़ुद देख लूंगा ! अब मुझे आप, रूख्सत होने की इज़ाज़त दीजिएगा ! बस अब मैं जा रहा हूं, सियासती बकरों को हलाल करने ! उनका काम बनते ही, आपके कपड़ों पर दाग़ नहीं रहेगा !

[अब मामूजान, रूख्सत होते नज़र आते हैं ! उनके जाने के बाद, मजीद मियां और मरियम बी भी चले जाते हैं ! मंच पर, अंधेरा छाने लगता है ! थोड़ी देर बाद, मंच रोशन होता है ! रेल गाड़ी के शयनान डब्बे का मंज़र, नजर आता है ! गाड़ी का इंजन सीटी दे रहा है, अब गाड़ी की रफ़्तार धीमे हो जाती है ! आख़िर, पाली का स्टेशन आ जाता है ! गाड़ी से यात्री उतरते दिखाई दे रहे हैं ! थोड़ी देर बाद इंजन सीटी देता है, और गाड़ी स्टेशन छोड़ देती है ! अब सावंतजी, रशीद भाई, ठोक सिंहजी और दयाल साहब पटरियां पार करते, अपने दफ़्तर की ओर जाते दिखाए देते हैं ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है !]






लेखक का परिचय
लेखक का नाम दिनेश चन्द्र पुरोहित
जन्म की तारीख ११ अक्टूम्बर १९५४
जन्म स्थान पाली मारवाड़ +
Educational qualification of writer -: B.Sc, L.L.B, Diploma course in Criminology, & P.G. Diploma course in Journalism.
राजस्थांनी भाषा में लिखी किताबें – [१] कठै जावै रै, कडी खायोड़ा [२] गाडी रा मुसाफ़िर [ये दोनों किताबें, रेल गाडी से “जोधपुर-मारवाड़ जंक्शन” के बीच रोज़ आना-जाना करने वाले एम्.एस.टी. होल्डर्स की हास्य-गतिविधियों पर लिखी गयी है!] [३] याद तुम्हारी हो.. [मानवीय सम्वेदना पर लिखी गयी कहानियां].
हिंदी भाषा में लिखी किताब – डोलर हिंडौ [व्यंगात्मक नयी शैली “संसमरण स्टाइल” लिखे गए वाकये! राजस्थान में प्रारंभिक शिक्षा विभाग का उदय, और उत्पन्न हुई हास्य-व्यंग की हलचलों का वर्णन]
उर्दु भाषा में लिखी किताबें – [१] हास्य-नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” – मज़दूर बस्ती में आयी हुई लड़कियों की सैकेंडरी स्कूल में, संस्था प्रधान के परिवर्तनों से उत्पन्न हुई हास्य-गतिविधियां इस पुस्तक में दर्शायी गयी है! [२] कहानियां “बिल्ली के गले में घंटी.
शौक – व्यंग-चित्र बनाना!
निवास – अंधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर [राजस्थान].
ई मेल - dineshchandrapurohit2@gmail.com


 










3 comments:

  1. लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित जी बहुत बढ़िया लेख

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपको बहुत बहुत धन्यवाद ।
    दिनेश चंद्र पुरोहित (लेखक एवं अनुवादक)

    उत्तर देंहटाएं

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