रचनाकार परिचय:-

दीपिका मित्तल

09412342584


99, Natrajpuram

Kamla nagar

Agra
लघुकथा - महिला दिवस

अशोक कुमार गुप्ता जिन्हें लोग लल्ला बाबू के नाम से ज्यादा जानते थे,फिरोजाबाद के सभ्रांत परिवार सेताल्लुक रखते थे और चूड़ी कारोबारी थे। उनके परिवार में उनकी माँ सावित्री देवी, पत्नी ममता और दो जुड़वाँबेटियां रिद्धि और सिद्धि थी जो कक्षा सात में पढ़ती थी। आठ मार्च की सुबह लल्ला बाबू ने चाय पीते हुए अपनी माँ और पत्नी को बताया कि आज शाम महिला दिवस पर फिरोजाबाद क्लब में शहर की एक प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था द्वारा ममता को नारी शक्ति सम्मान से नवाज़ा जायेगा। जिसमें उनका पूरा परिवार आमंत्रित है और शाम का खाना भी क्लब में ही है।

शाम सात बजे ही सभी तैयार होकर लल्ला बाबू की लम्बी कार में बैठ कर चल दिए। ममता गाड़ी में बैठे बैठे बीती बातों को याद करने लगी कि किस तरह लल्ला बाबू की अधिक शराब पीने की लत ने उनका लीवर खराब कर दिया था और उसने अपना लीवर देकर उनकी जान बचाई थी। शायद इसीलिए उसे आज महिला दिवस के मौके पर उसे सम्मानित किया जा रहा है। पर उसको कोई खास उमंग नहीं थी क्योकिं उसकी शादी तो अशोक बाबू से हुई थी जो अपने नाम के विपरीत शोक हरने वाले नहीं अपितु दुःख देने वाले ज्यादा थे।

अशोक बाबू में शराब की आदत जो थी सो थी किन्तु उनकी तुनकमिजाजी इस कदर थी कि जरा खाने में स्वाद और नमक को लेकर वो ममता पर कई बार हाथ छोड़ चुके थे। उनकी तला-भुना और मिर्च मसालेदार खाने की आदत ने लीवर की बीमारी को और बढ़ा दिया था। सास सावित्री देवी तो हमेशा ममता को यही ताना मारती कि आदमी के दिल तक पहुंचने का रास्ता उसके पेट से होकर जाता है और एक तू है जो उसे अच्छा खाना भी बनाके नहीं खिला सकती। इसीलिए तो वो बाहर जाकर मसालेदार खाना खाता है और संग साथ में दोस्तों के चक्कर में शराब पी लेता है।

लेकिन ममता को पता था कि ज्यादा मसालेदार खाना लल्ला बाबू की सेहत के लिए ठीक नहीं है।पर उसकी सास इस तथ्य को जानकर भी अनजान बनी रहती थी और लल्ला बाबू को समझाने की बजाय वो सारा दोष उसी पर मढ़ देती थी। उसे याद है कि किस तरह उसने अपने सुहाग को बचाने के लिए अपनी परवाह किये बिना अपना जीवन भी दांव पर लगा दिया था और उन्हें यमराज से वापस ले आयी थी। ममता यादों में खोई थी कि तभी अचानक लल्ला बाबू बोले “चलो उतरो सब क्लब आ गया।’’

पूरा परिवार समारोह में शामिल हुआ। समारोह में आये हुए सभी लोगों को ममता की पूरी कहानी बताई गई और उसे एक सर्वश्रेष्ठ महिला बताते हुए नारी शक्ति सम्मान का प्रतीक एक समृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया। यह सब देखकर ममता की सास सावित्री देवी फूली नहीं समां रही थी। ममता की सब लोगों द्वारा प्रशंसा करते देख उन्हें अपनी बहू पर गर्व हो रहा था। ममता की दोनों बेटियां भी बड़ी खुश थी। वह दोनों अभी छोटी ही थी पर दुनियादारी की खूब समझ रखती थी। उन्हें पता था कि किस तरह उनकी माँ पापा के कारण हमेशा परेशान रहती है। दुनिया भले ही उनकी माँ का कितना भी सम्मान करे पर पापा ने माँ त्याग को कभी नहीं समझा।

इसके बाद सब खाने के लिए दूसरे हॉल में आ गए। पर ये क्या। इतनी भीड़ देखकर लल्ला बाबू बोले "न जाने कहाँ कहाँ से लोगों को बुला लिया है। इतनी भीड़ में घुस कर कौन खाना खायेगा।’’ तुनकमिजाज लल्ला बाबू फिर बोले "चलो सब घर। घर पर ही खाना खायेंगे।’’ राजू गाड़ी निकालो!ड्राइवर को आवाज़ मारते हुए लल्ला बाबू क्लब के बाहर आ गए। पर ममता तो शून्य सी वहीँ खड़ी रह गयी।

तभी लल्ला बाबू ने आवाज़ मारी "ममता चलो बेठों गाड़ी में।" ममता गाड़ी में बैठ तो गयी पर उसका शरीरघर में आने वाले तूफान की आहट सुनकर चेतना शून्य होने लगा क्योकि घर पर इस समय आलू के अलावाकोई सब्जी न थी। वो इस बात से अनभिज्ञ थी कि ऐसा भी हो जायेगा। वो इतनी परेशान हो गयी कि उसे पसीना आने लगा। उसने अपना शीशा नीचे उतारा। घर पर होने वाला क्लेश उसकी आँखों के सामने साफ़ दिखाई दे रहा था। रात के साढ़े नौ बज रहे थे और इस समय कोई सब्जी वाला भी मिलने से रहा। पर वो अपनी परेशानी कहे तो किससे कहे, उसको समझने वाला उसके परिवार में कोई न था। तभी अचानक से ब्रेक लगे और उसका स्मृति चिन्ह उसकी गोद से गिरकर कार के फर्श पर आ गिरा। ममता ने समृति चिन्ह को उठा तो लिया पर मन ही मन वो उस सम्मान को कोस रही थी। जैसे कहना चाहती हो कि इसी सम्मान के कारण ही वो आज इस मुसीबत में फंसी है, न सम्मान मिलता और न ही ये बखेड़ा खड़ा होता। वैसे भी इस बाहर की दुनिया के सम्मान से उसकी स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है और न ही इस सम्मान से उसके परिवारीजनों की सोच में कोई परिवर्तन होने वाला है।

उनका घर आ गया। लल्ला बाबू ने कार से उतरते हुए ममता से कहा “सुनो जल्दी से कुछ बढ़िया सा बना लो बड़ी भूख लग रही है।’’ ममता हूँ कहकर दोनों बच्चियों को उठाने लगी जो कार में ही सो गयी थी। घर में घुसते ही ममता सीधे किचिन में आ गयी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस परस्थिति से कैसे बाहर निकले क्योंकि लल्ला बाबू के स्वभाव से वो सत्रह सालों से परिचित जो थी। वो न जाने कितनी बार अपने आपको कोस चुकी थी कि वो इस सम्मान समारोह में गयी ही क्यों।

तभी सावित्री देवी किचिन में आकर बोली “ममता क्या हुआ खाना नहीं बना रहीं लल्ला भूखा है।’’ इतना सुनते ही ममता की रुदाली फूट पड़ी। ममता को इस तरह इस तरह रोता देखकर वो सारी बात समझ गई। उन्होंने ममता को गले लगाते हुए कहा “रो नहीं मेरी बेटी, आज का दिन तुम्हारे लिए बहुत बड़ा है। ये तुम्हारी इच्छाशक्ति ही है जिसने मेरे बेटे को नयी जिंदगी दी है।’’ इतना कहकर वो भी ममता के साथ रो पड़ी। तभी भूख से व्याकुल लल्ला बाबू की आवाज आई "खाने का क्या हुआ ममता।" इससे पहले ममता कुछ कह पाती, सावित्री देवी ने ही तेज स्वर कहा "अभी खाने में समय लगेगा लल्ला, तब तक तुम कुछ और खा लो और हां आज हम सब केवल आलू की सब्जी से ही खाना खायेंगें।’’ लल्ला बाबू को जवाब देते हुए सावित्री देवी किचिन से बाहर आ गयी।

ममता अब जल्दी जल्दी आलू छीलने लगी थी वो सोच रही थी कि केवल नारी ही नारी का साथ दे तो आज नारी को किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है। उसे आज एहसास हो रहा था कि नारी ही नारी की सबसे बड़ी शक्ति है। आज महिला दिवस पर अपनी सास से मिला ये सम्मान है उसे क्लब में मिले सम्मान से कहीं ज्यादा बड़ा नजर आ रहा था। आज का ये महिला दिवस वो अपनी जिंदगी में कभी नहीं भूलेगी।

लेखिका - सीए दीपिका मित्तल

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