रचनाकार परिचय:-


डॉ. सूर्यकांत मिश्रा
जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
मो. नंबर 94255-59291
email- sk201642@gmail.com



13 मई द्वितीय रविवार मां दिवस पर विशेष...
त्याग की लकीरें है, मां के चेहरे की झुर्रियां
० अखंड ज्योति की पावन ज्वाला है-मां


 

प्रति वर्ष मई का महीना शुरू होते ही या फिर अप्रैल के आखिरी सप्ताह से मेरे भाव मां की महिमा का गुणगान करने मचलने लगते है। मां की तपस्या हर उस तपस्या से कहीं अधिक प्रभावी है, जो एक संत और ऋषि द्वारा वर्षों भूखे प्यासे रहकर की जाती है। कारण यह कि संत और ऋषि भी तपस्या से पूर्व कामना को संजोकर ही तप या यज्ञ जैसी कठिन प्रक्रिया का अनुसरण करते है। मैंने अपने इस छोटे से जीवन में कभी किसी मां को ऋषि मुनियों की तरह तपस्या में लीन माला फेरते नहीं देखा। मां की तपस्या को मैंने तपती दोपहरी में अपने बच्चों के लिए धधकते अंगारों में रोटी सेकते देखा है। पूष की कड़कड़ाती ठंड में सुबह ब्रम्हमुहूर्त में जागकर परिजनों के लिए चाय-नाश्ते की तैयारी में ठिठुरन को चुनौती देते देखा है। इतना ही नहीं एक मां को श्रावण मास की झड़ी में अपने बच्चे को छोते के आवरण में लेकर खुद खुले आसमान के नीचे बरसाती थपेड़ों को बर्दाश्त करते मेरी इन नजरों ने देखा है। मजाल है एक मां के रहते किसी भी प्रकार की कठिनाई या दर्द उकेरने वाली समस्या उसके बच्चे को स्पर्श भी कर जाये! क्या उसी मां को आज हम सम्मान दे पा रहे है? क्या हमने उसके शरीर को झुर्रियों पर स्नेह का मरहम लगाने की जवाबदारी समझी? उम्र के उस पड़ाव में जब उसे हमारे सहारे की जरूरत है, क्या हम उसकी बैसाखी बन पाये? महज मां दिवस मना लेने से उक्त विभिषकाओं का अंत नहीं होगा।
अनंत शक्तियों से उर्जित है मां
एक मां ही वह शख्स है जो अनंत शक्तियों की धारणी कही जा सकती है। यही कारण है कि उसे ईश्वरी शक्ति का प्रतिरूप मानकर ईश्वर की तरह सम्मान देने शास्त्रों में भी कहा गया है। मां के समीप रहकर उसके आंचल की शीतल छाया का आनंद प्राप्त कर, उसकी सेवा का अकल्पनीय सुख उठाकर, उसके स्नेहील वचनों और शुभ आशीषों के बल पर जो आनंद प्राप्त किया जा सकता है, वह वास्तव में कलमबद्ध नहीं किया जा सकता अथवा अवर्णनीय ही है। मां एक सुखद अनुभूति है। वह अनंत शक्तियों का पूंज है। वह एक शीतल आवरण है, जो हमारे दुख तकलीफ को ढंक लेती है। उसका साथ और उसका होना ही हमे जीवन की हर जंग लडऩे की शक्ति प्रदान करता है। उसके नि:स्वार्थ जीवन और त्याग के कारण ही विजय पथ का मार्ग हमारा अभिनंदन करता दिखाई पड़ता है। यदि कोई कहे मां को पारिभाषित करने के लिए शब्दों का मायाजाल प्रस्तुत करें तो शायद यह संभव नहीं है। मां जैसे छोटे से शब्द, जिसमें अवर्णनीय त्याग, तपस्या, करूणा, दया, वीरता और अदम्य साहस का सागर समाया हो, उसे उपमाओ अथवा शब्द सीमा में पिरोना नितांत असंभव ही है। मैं तो मां के लिए चंद शब्द इन पंक्तियों के माध्यम से भावनाओं को उकेरते हुए कह सकता हूं-
उसके रहते जीवन में, कोई गम नहीं होता,
धोखा भले ही दे दे यह दुनिया,
पर मां का प्यार, कभी कम नहीं होता।।
लालची भी होती है मां-बच्चों की खुशी के लिए
इस नस्वर संसार में मां भी हमारी तरह एक इंसान ही है। मैंने अन्य लोगों की तुलना में मां को एक अलग ही रूप में पाया है। एक मां ही इंसानियत की ऐसी प्रतिमूर्ति है जो लालची स्वभाव भी रखती है तो अपने संतान की खुशी के लिये। मां शब्द में सारा संसार व्याप्त है। संसार को संचालित करने वाली अपने बच्चों और परिवार के लिए संसार से लड़ जाने वाली, अपने हर संतान को एक बराबर प्यार देने वाली मां ही हमारी पहली गुरू भी होती है। एक मां ही होती है जो अपने प्रत्येक कर्तव्य को बिना किसी चाह के पूरा करती है। उसे तो इसी में असीम आनंद की अनुभूति होती है कि उसके कार्यों से उसके बच्चे प्रसन्न होते है। वह मां ही होती है जो असहनीय पीड़ा को हंसते हुए पराजित कर अपने शिशु को जन्म देती है। श्रीमद् भगवत गीता में भी कहा गया है कि मां की सेवा से मिला आशीर्वाद सात जन्मों के पाप को नष्ट कर हमें सुखी जीवन प्रदान करता है। मां की ममता और उसके आंचल की महिमा को आज तक बड़े से बड़ा साहित्यकार और कवि ने भी शब्दों में नहीं समेट पाया है। यह एक ऐसा शब्द है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। इसलिए गीता जैसे ग्रंथ में कहा गया है-
'जननी जन्मभूमिश्च, स्वर्गादपि गरीयसीÓ
अर्थात जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि जननी और जन्मभूमि के बगैर स्वर्ग भी बेकार है। सीधे शब्दों में कहूं तो हर वह घर स्वर्ग है, जहां मां का अस्तित्व कायम है, क्योंकि यह तो निश्चित है कि हमें स्वर्ग में हमें मां का साथ नहीं मिल सकेगा। किसी शायद ने सुंदर रचना की है-
हालातों के आगे जब, न जुबां होती है,
पहचान लेती है, खामोशी में हर दर्द,
वो सिर्फ मां होती है।।
जीवन के हर किस्से में मां का साथ
दुनिया में ऐसा कोई इंसान नहीं, जिसके जीवन में अच्छे और बुरे किस्सों के पन्ने न हो। अच्छे समय में तो सारी दुनिया अपने साथ दिखाई पड़ती है किंतु दुख या बुरे वक्त की परछाई भी अपनों को दूर कर देती है। एक मां ही है जो बुरे वक्त में अपने बच्चों का संबल बनकर खड़ी होती है। जीवन के हर बुरे किस्से में हमें मां का ही साथ मिलता है और वह भय की बदली को हमारे जीवन में सूर्योदय की सुखद किरण के रूप में परिवर्तित कर दिखाती है। हम अपनी कठिनाई या तकलीफ दुनिया के सामने कितने भी अच्छे ढंग से रखे, वह उसे समझने में सफल नहीं हो पाती है। मां की वह किरदार है जो दुख को कहने से पहले ही उसे जान लेती है और अपने बच्चों को तकलीफों पर एक डॉक्टर से भी बेंहतर मरहम लगाकर उसे संकट के बादल से उबार लेती है। अपनी मां के चरण स्पर्श करने वाला कोई भी शख्स हर प्रकार की उलझन को सुलझा लेने वाला शूरवीर होता है। कहते है मां के चरणों में ईश्वरी सत्ता है। सुबह-शाम उसके चरण स्पर्श करने वाले बच्चों पर ईश्वर भी कहर बरपाने से पहले थर-थर कांप उठता है, क्योंकि उसे भी जन्म देने वाली एक मां ही है। मां की इसी त्याग तपस्या पर एक शायर की चंद लाईनें इस प्रकार है-
$गम हो, दुख हो, या खुशियां,
मां जीवन के हर किस्से में,
साथ देती है,
खुद सो जाती है भुखी,
पर बच्चों में रोटी अपने,
हिस्से की बांट देती है।।
त्याग की प्रतिमूर्ति होती है-मां
मैं प्रतिवर्ष मां दिवस पर अपने विचारों को कलमबद्ध करने इंतजाररत रहता हूं। यही कारण है कि हर उस किस्से, अथवा कहानी पर से अपने नजरें नहीं हटा पाता, जो मां के त्याग से भरी होती है। मैंने शायद वर्ष भर पूर्व एक किस्सा पढ़ा था, जो मां के त्याग का दिल छू लेने वाला लम्हा कहा जा सकता है। एक मां अपने बच्चे का भविष्य संवारने अपनी दुनिया को अंधकार की कोठरी में झोंक देने से भी पीछे नहीं रहती है। ऐसी ही एक मर्मस्पर्शी कहानी में एक अंधी मां अपने बच्चे केा पढ़ा लिखाकर बड़ा इंसान बनाने का सपना संजोय रात-दिन मेहनत करती है। वह अपने बच्चे को उच्च शिक्षा के लिए बाहर तक भेजती है। खुद को पैसों की इंतजाम के लिए लाठी के सहारे चलते घर-घर साफ सफाई और लोगों की सेवा का काम करती है। उसका बेटा भी पढ़ लिखकर अधिकारी बन जाता है। अब उसे यह अच्छा नहीं लगता कि कोई उसे अंधी की लड़का कहे। अपने बेटे की उपलब्धि के बाद वह उससे मिलने जाती है, तो वह उसे लौटा देता है। एक दिन कुछ ऐसा ही होने के बाद जब वह ऑफिस जाने लगता है तो देखता है कि एक वृद्धा अंधी महिला सड़क हादसे में मौत के घाट उतर चुकी है। वह देखता है तो महिला उसकी मां होती है। उसके हाथ में फंसे कागज की टुकड़े को पढऩे के बाद बेटे का पश्चाताप चरम पर होता है। उस पर लिखा होता है- बेटा! तू जब बचपन में खेल रहा था तो सरिया घूस जाने से तेरी दोनों आंखें चली गयी, तब मैंने अपने आंखे तुझे दे दी थी। तब मुझे कहना पड़ता है-
मां ने तो उम्र भर सम्हाला ही था,
हमें तो जिंदगी ने रूलाया है,
कहां से पड़ती कांटों की आदत हमेंं,
मां ने हमेशा अपनी गोद में सुलाया है।।




प्रस्तुतकर्ता
डा. सूर्यकांत मिश्रा
न्यू खंडेलवाल कालोनी
प्रिंसेस प्लेटिनम, हाऊस नंबर-5
वार्ड क्रमांक-19, राजनांदगांव (छ.ग.)
मो. नं.-9425559291


sk201642@gmail.com



0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget