रचनाकार परिचय:-

प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘
ए-1, एमपीईबी कालोनी
शिलाकुंज, रामपुर, जबलपुर
मो. 9425484452
पर्यावरण शुद्धि आवश्यक


भूमि, वायु, जल, उष्णता, नभ सब हैं बीमार
इससे जग मे मनुज का जीना है दुश्वार

लोभी मन ने किये सब नष्ट प्रकृति परिवेश
इससे ही अब है दुखी सारे देश प्रदेश

प्रकृति रही है युगों से सबका प्राणाधार
करती आई आज तक जीवों पर उपकार

जब दूषित हो जाते हैं मन के सोच विचार
तो लालच वश बिगडते जग के सब व्यवहार

बिना नीति औं नियम के चलता कोई न काम
नियमित है इस प्रकृति के युग से काम तमाम

अनुशासन से ही बंधी है जीवन की डोर
पर लोभी मानव का अब ध्यान नहीं इस ओर

इससे ही संसार मे बढे हैं अनुचित काम
भोग रहे सब लोग है इस के दुष्परिणाम

ब्हुत जरूरी है कि अब सबका मन हो शुद्ध
स्दाचार से संतुलित हो सब लोग प्रबुद्ध




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