रचनाकाररचनाकार परिचय:-


नाम: नीतू सिंह ‘रेणुका’
जन्मतिथि: 30 जून 1984
प्रकाशित रचनाएं: ‘मेरा गगन’ नामक काव्य संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2013), ‘समुद्र की रेत’ कथा संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2016)
ई-मेल: n30061984@gmail.com



कल कॉलेज फिर से खुल रहा है, पूरे दो महीने की छुट्टियों के बाद। रात के नौ बज रहे हैं और मैं अपना सफ़ेद रंग का सूट प्रेस कर रही हूं जो मुझे कल पहनकर जाना है। मुझे सफ़ेद रंग बहुत पसंद है। वैसे तो मेरे पास सफ़ेद रंग के बहुत सारे कपड़े हैं लेकिन ये मेरा पसंदीदा सूट है जिस पर पीले रंग के बड़े-बड़े फूल बने हुए हैं। मैंने इसे कल ही धोकर नील दिया था। कैसा सफ़ेद चमक रहा है। क्यों न हो? उजाला कि सफेदी जो है। इसका दुपट्टा अभी इतना मैला नहीं हुआ था कि नील देना पड़े, इसलिए केवल धोकर सुखा दिया।

सुबह अलार्म बजते ही मैं उठ गई। मैं अक्सर अलार्म बंद कर सो जाया करती हूं पर आज कॉलेज में पहला दिन है ना! मैं नहा-धोकर अपना पसंदीदा सूट पहन घर से निकली। जब पश्चिम की ओर गली में मुड़ी तो लगा जैसे गुलाब के पौधों पर चमकती हुई सूरज की रोशनी सूरज से नहीं बल्कि मेरे सूट से उन पर पड़ रही है। अब मैं मेन रोड पर आ गई कि अचानक मैं ठिठक कर रुक गई।

सामने ब्यूटी पार्लर की दुकान में लगे शीशे पर मेरी नज़र पड़ी। ओह! नहीं, यह नहीं हो सकता। मैंने अपने दुपट्टे को नील नहीं दिया। अब क्या करूँ? वापस गई तो लेट हो जाऊँगी। काफ़ी दुविधाजनक स्थिति में रहने के बाद मैंने निर्णय लिया कि कॉलेज चलते हैं। जो होगा देखा जाएगा।

मैं अभी कॉलेज के अन्दर पहुंची ही थी कि मेरी नजऱ कुछ शरारती लडक़ों पर पड़ी। इनका काम रास्ते में खड़े होकर आने-जाने वालों पर चुटकी लेकर हँसना और छेडऩा है। मैं कई बार इन्हें ऐसा जवाब देकर चुप करा चुकी हूं कि वे दुबारा मुंह न खोलें। पर आज शायद उनकी बारी है। वे ज़रूर मुझ पर हँसेंगे।’हर कुत्ते के दिन आते हैं‘, मैं इसी ख्याल में उनके आगे से गुज़री पर कुछ नहीं हुआ।

लेकिन अभी दो कदम आगे गई ही थी कि वे आपस में ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। मैंने मुडक़र देखा कि कहीं मुझ पर तो नहीं हँस रहे हैं। पर वे इधर नहीं देख रहे हैं। लेकिन वो आ$िखरी दो तो मुझे ही देख रहे हैं। यानी वे मुझ पर ही हँस रहे हैं। हे भगवान! मैं किस मुसीबत में फँस गई? क्यों मैं नील देने में आलस कर गई?

कॉलेज ऑफिस के सामने आई तो प्रिया मिली। उसे अपने कपड़े, सैंडल़, पर्स आदि दिखाने का बहुत शौक है। आते ही बोली’ मेरा सूट कैसा है? इन छुट्टियों में मुंबई गई थी, वहाँ से लाई हूं। यू वोंट विलीव; मैं केवल फोर हन्ड्रेड में लाई हूं।’ मैंने कहा’ये सूट तो तुझे ढाई सौ में ही खड़े बाज़ार में मिल जाता।’ ’अरे नहीं, इसकी क्वालिटी तो देख, ऐसा सूट तुझे पूरे शहर में नहीं मिलेगा’। मुझे लगा शायद वह मेरे सूट पर बिना मैंचिग के सफेद दुप्पट्टे को देख कह रही है। मैं वहाँ से बहाने बनाकर निकली।

हे भगवान! अगर मैं रास्ते से ही लौट जाती तो कितना अच्छा होता। अगर मैंने दुपट्टे में नील दे दिया होता तो प्रिया को अच्छी तरह से बता सकती थी कि उसका चार सौ का सूट लड़कियाँ ढाई सौ में पहनकर घूम रही हैं। नीलिमा ने भी तो वही सूट खरीदा था; ढाई सौ में। $खैर, अभी मेरा वक्त बहुत बुरा चल रहा है। कल देखूंगी उसे।

अंग्रेज़ी का लेक्चर है इस वक्त। चलो क्लास में चलें। सर ने दो-चार सवाल पूछे। मैंने भी हाथ खड़ा किया, लेकिन सर ने मुझे छोड़ सभी को मौका दिया। ऐसा क्यूं? सर हमेशा मेरी तारीफ करते थे कि मैं सलीके से रहती हूं। कहीं मेरे पीले से दुपट्टे और सफेद सूट को देख वे भी मेरे बारे में गलत धारणा तो नहीं बना रहे। ओह! भगवान! ये क्या हो गया, ऐसे कैसे हो गया जो दुपट्टे में नील नहीं दिया।

बेहतर तो यही होगा कि मैं चुपचाप लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ती हूं। किसी से सामना भी नहीं होगा और दिन भी निकल जाएगा। मुसीबत की इस घड़ी में मैं बार-बार ईश्वर को याद करते हुए लाइब्रेरी पहुंची।

सामने लाइब्रेरियन खड़ा होकर मुस्कुरा रहा था। उसकी हँसी कुछ रहस्यमय लगी। कहीं वह मुझ पर तो नहीं हँस रहा। आखिऱ एक दिन हम भी उस पर हँसे थे।

उस दिन वह अपनी पैंट की जि़प बंद करना भूल गया था। उसे देख कुछ लोग खुसर-फुसर करने लगे। आ$िखर धीरे-धीरे लाइब्रेरी में पढ़ रहे सब लोगों को बात पता चली और सभी मुंह दबाकर हँसने लगे। गुस्से से उसने मुझे देखा और पूछा ’किस बात पे इतना खिखिया रही हो?’ यह प्रश्न सुन और उससे भी ज्य़ादा उसका उत्तर सोच मैं अपनी हँसी रोक न पाई और ठहाका लगाकर हँस पड़ी। मेरे हँसने की देर थी कि सभी हँस पड़े। लाइब्रेरियन को जब बात पता चली तो वह झेंप गया। आज तो मेरी शामत आई है।

अब तो तय कर लिया कि घर वापस जाऊँगी। लाइब्रेरी में कुछ देर बैठने के बाद बाहर निकली तो उषा मिली। उषा और मैंने मिलकर एक दिन एक लडक़ी का खूब मज़ाक उड़ाया था, क्योंकि उसके कॉटन सूट का एक कोना कमर पर ही चिपक कर रह गया था और उसे यह मालूम नहीं था। और आज; उषा मुझे देखेगी तो क्या कहेगी। ’ओह नहीं, क्या करूँ?’ वह दूर से ही मुस्कुराती हुई आ रही थी। इससे पहले की वो कुछ बोले मैंने कहा ’मैं जऱा जल्दी में हूं। बाद में मिलते हैं।’ मैं निकल गई और वह पुकारती रह गई। ’अरे जऱा सुन तो।’
दिन किसी तरह $खत्म हुआ और मैं घर के लिए निकली। रास्ते में लाला जी की दुकान पड़ती है। वहाँ से गुज़र ही रही थी कि उन्होंने आवाज़ लगाकर बुला लिया ’गुडिय़ा इधर तो सुनो।’ मैं वहां गई तो उन्होंने नील का एक डब्बा थमाते हुए कहा ‘पैसे बाद में दोगी तो भी चलेगा। ‘

मैं हैरान हो गई, ये तो हद हो गई। अपने आपको सॅंभालते हुए बस ’ठीक है’ कहा और झेंपते हुए घर चली आई।

घर पहुंचकर खाने पर बैठी तो सोचने लगी कि क्या सचमुच मैं इतनी बुरी दिखती हूं? इस सवाल का जवाब ढूँढने के लिए आइने के सामने खड़ी हुई। देखा तो दुपट्टे की सफेदी में और सूट की सफेदी में ज़्यादा $फर्क न था। फिर वो लडक़े मुझ पर हँसे क्यूं? लेकिन इसकी भी क्या गारंटी है कि वे मुझपर ही हँसे थे?

प्रिया फिर मुझे अपना सूट बार-बार क्यों दिखा रही थी? उसकी तो आदत है, फिर मैं कैसे मान लूं कि वह मुझे चिढ़ा रही थी?

लाइब्रेरियन का चेहरा तो हँसमुख है ही और उषा क्या कहना चाहती थी, मैंने सुना भी नहीं, ऐसे ही कुछ भी अनुमान लगा लिया।

लेकिन लालाजी का मज़ाक तो झूठा नहीं हो सकता। उन्होंने तो सच में हद कर दी, अरे मुझे नील का पूरा डिब्बा थमा दिया। आ$िखर उन्होंने ऐसा क्यों किया? वे तो मज़ाकिया स्वभाव के भी नहीं हैं। फिर उनका इरादा क्या हो सकता है?

अभी आइने के सामने खड़ी होकर मैं यह सब सोच ही रही थी कि माँ आई और बोली, ’लाला को मैंने फोन कर नील मॅंगाया था। घर में नील खत्म हो गया है। तू नील लाई क्या?’
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