रचनाकार परिचय:-


लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित
dineshchandrapurohit2@gmail.com

अँधेरी-गळी, आसोप री पोळ रै साम्ही, वीर-मोहल्ला, जोधपुर.[राजस्थान]
नाटक - दबिस्तान-ए-सियासत
अंक एक
पहला मंज़र आ गया नूरिया, स्कूल में !
राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित
किरदारों की पहचान



साबू भाई – डवलपमेंट कमेटी के मेंबर और नगर परिषद के ठेकेदार ! वय – उम्र ५५ वर्ष के बुजुर्ग, डवलपमेंट कमेटी के मेंबर और नगर परिषद के ठेकेदार ! पहनावा – सर पर जोधपुरी साफ़ा पहना हुआ है, बदन पर धोती और कमीज़ पहने, चेहरे पर घनी मगर रौबदार बांकड़ली सफ़ेद मूंछें ! पांवों में हवाई चप्पल !

मनु भाई – डवलपमेंट कमेटी के मेंबर और रिटेल किराणा व्यापारी ! ५५ वर्ष के बुजुर्ग, सांवला रंग, चेहरे पर दफ़्तरेनिग़ार टाइप छोटी मूंछें, पहनावा पतलून और बुशर्ट, पांवों में मारवाड़ी जूत्तियाँ !

रशीदा बेग़म – स्कूल की हेडमिस्ट्रेस ! उम्र ५५ वर्ष मगर बालों में गार्नियर डाई लगी होने से उम्र कम लगती है ! गोरा रंग, चेहरे पर हल्का मेकअप, बदन पर क्रीज़ की हुई प्लेन साड़ी और उस साड़ी को मेच करता ब्लाउज़ और शाल ! पांवों में मेट्रो चप्पल !

आक़िल मियां – बड़े बाबू और स्कूल के खाज़िन ! उम्र करीब ५५ वर्ष, रंग गोरा, चेहरे पर मुगलिया मूंछें, बालों पर हीना लगा रखी है ! शरीर थोड़ा भारी, बदन पर क्रीज़ किये हुए पतलून और बुशर्ट ! पेंट पर बेल्ट लगा हुआ, और पांवों में एक्शन कंपनी के बूट !

नूरिया – जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से तबादला होकर आया एक जैलदार ! चेहरे पर कहीं-कहीं चेचक के दाग, चेहरे पर सफ़ाचट दाढ़ी-मूंछ, सांवला रंग और बिखरे हुए बालों को वह बार-बार मिथुन स्टाइल में जमाने का आदी ! बिना क्रीज़ की पतलून और बुशर्ट पहने ! बुशर्ट पतलून से बाहर निकला हुआ है ! पांवों में बिना पोलिस किये हुए, बाटा कंपनी के बूट पहने हुए ! उम्र करीब चालीस साल !

शमशाद बेग़म – स्कूल की जैलदार [चपरासिन] है ! रंग सांवला, उम्र ५५ के लगभग ! ग्रामीण वेशभूषा पहने रहती है ! पांवों में दो पट्टी के चप्पल पहने रखती है ! बालों पर हीना लगाए रखती है ! बच्चियां इनको ख़ालाजान या ख़ाला कहती है, इसलिए स्टाफ वाले सभी इनको इसी नाम से पुकारा करते हैं !

अन्य – मेडमें और बच्चियां !

[मंच रोशन होता है, मज़दूर बस्ती का मंज़र सामने आता है ! इस बस्ती से कुछ दूर हाई वे पर एक सूती वस्त्र बनाने की मिल है ! इस कारण आस-पास के क्षेत्र को मिल क्षेत्र के नाम से पुकारा जाता है ! सुबह का वक़्त है, मिल के साइरन की आवाज़ सुनकर, इस बस्ती में रहने वाले मज़दूर टिफन लिए मिल की तरफ़ जाते नज़र आ रहे हैं ! अब रफतः-रफतः रोशनी डेयरी जाने वाली सड़क पर गिरती है ! इस रोड पर एक सरकारी गर्ल्स सेकेंडरी स्कूल दिखायी देती है ! इस बिल्डिंग के कमरे अंग्रेजी के हर्फ़ “E” के सेप में बने हैं ! मुख्य सड़क पर, इस स्कूल का मेन गेट है, उसके पास ही अन्दर की तरफ़ एक बबूल का पेड़ है ! जिसके तले, स्कूल की बच्चियों ने अपनी साइकलें खड़ी कर रखी है ! इसके कुछ आगे ही ही स्कूल की मेडमों ने, अपने स्कूटर खड़े किये हैं ! इस डेयरी रोड का वह मोड़ जो मिल की तरफ़ जाता है, वहां नुक्कड़ पर मियां भंवरु खां ने प्याऊ बना रखी है ! उसके पास ही छात्राओं और मेडमों के लिए नगर-परिषद ने पाख़ाने बना रखे हैं, इन पाखानों के निर्माण का ठेका इस स्कूल के सामने रहने वाले मियां साबू खां ने लिया था ! प्याऊ के पास पाख़ाने बनाने से इस प्याऊ और आस-पास के क्लास-रूम में बराबर बदबू बनी रहती है ! इस कारण छात्राएं अपने क्लास-रूम की खिड़कियां बंद रखती है ! स्कूल के में गेट के सामने, नगर परिषद ठेकेदार मियां साबू खां का मकान है ! मकान के आगे के हिस्से में, उन्होंने कतारबद्ध दुकानें बना रखी है ! पहली दुकान को उन्होंने अपने मित्र मनु भाई को किराए पर दे रखी है, जहां वे रिटेल किराणा के व्यापार करते हैं ! अगली दुकान पर इनका बड़ा पुत्र स्टेशनरी की दुकान चलाता है ! इस दुकान के आगे वाली दुकान में इन्होने इन्होंने सीमेंट का गोदाम बना रखा है ! अंतिम दुकान में ये ज़नाब, कमठा मेटीरियल बेचने का व्यापार करते हैं ! इसके साथ कमठा सम्बंधित घोड़ा, अडाण वगैरा सामान साबू भाई किराए पर पर देने का धंधा करते हैं ! स्कूल के में गेट के पास चारदीवारी से सटा हुआ किसी अनजान बाबा की मज़ार बनी हुई है, इसका निर्माण कार्य साबू भाई के हाथों हुआ है ! ताकि वे इस मज़ार के पास, चारदीवारी से सटाकर कमठा मेटीरियल रख सके ! मज़ार के कारण ही इनके द्वारा किया गया अतिक्रमण बना रहता है, किसी की हिम्मत नहीं हो पाती जो इनके किये गए अतिक्रमण का विरोध कर सके ! यहाँ पर, इंटें, चूना, खंडे आदि सामान, बेचने के लिये साबू भाई ने लाकर रखा है ! बांस के बने स्टूल, रस्सियाँ, अडाण आदि सामान जो साबू भाई किराए पर दिया करते हैं..वह सामान भी, यहीं रखा है ! साबू भाई और इनके मित्रों को, स्कूल की राजनीति पर गुफ़्तगू करने का बहुत शौक है ! इसलिए साबू भाई ने मनु भाई की दुकान के बिलकुल सामने दो बेंच लगा रखी है, जो एक-दूसरी के आमने-सामने हैं ! और छांया के लिए, यहाँ दो पेड़ भी लगा दिए गए है ! यहाँ बैठकर ये लोग आपस में गुफ़्तगू करते रहते हैं, और स्कूल में आने-जाने वाले आदमी इनकी निगरानी में रहते हैं ! स्कूल की राजनीति में हस्तक्षेप बनाए रखने के लिए साबू भाई की मित्र-मंडली, स्कूल की विकास समिति की मेंबर बनी हुई है ! अब इन बेंचों पर बैठी मित्र-मंडली एक नौजवान को देखती है, जो सनसनाता हुआ तेज़ी से हेडमिस्ट्रेस रशीदा बेग़म के कमरे की तरफ़ क़दम बढ़ा रहा है ! फिर क्या ? बिना किसी की अनुमति लिए वह हेडमिस्ट्रेस के कमरे में दाख़िल हो जाता है ! इस वक़्त हेडमिस्ट्रेस स्कूल की मेडमों के साथ गुफ़्तगू कर रही है, इस वक़्त इसके अन्दर आ जाने से इनकी गुफ़्तगू में बाधा उत्पन्न हो जाती है ! गुस्से से, रशीदा बेग़म अपने होंठों में ही कहती है !]

रशीदा – [होंठों में ही, कहती है] – हाय अल्लाह, अब बर्दाश्त नहीं होता ! ऐसे बदतमीज़ लोगों को देखकर, तबीयत बेकैफ़ हो जाती है ! ऐसे ज़ाहिल बदतमीज़ इंसानों को अल्लाह मियां दोज़ख़ नसीब करें, तो ज्यादा अच्छा ! अब करें, क्या ?

[तभी वह नौजवान अपने दोनों हाथ कमर पर रखकर, बदतमीज़ों की तरह तनकर खड़ा हो जाता है ! फिर अपनी लाल-सुर्ख आँखों से, हेडमिस्ट्रेस रशीदा को जंगली जानवर की तरह घूरता है ! उसका यह रूप देखकर रशीदा बेग़म सोच में पड़ जाती है, वह सोचती है कि, “ऐसे बदतमीज़ इंसान ज़रूर इस मज़दूर बस्ती के दारुखोरे ही हो सकते हैं, आये होंगे दस्तावेज़ सत्यापित करने..यहाँ इस स्कूल में इनको भेजने का काम, इस नगरपरिषद के सदस्यों का करा-कराया काम है ! ये कमबख्त, आये दिन वोटों के ख़ातिर न मालुम क्या-क्या दस्तावेज़ तैयार करवाते रहते हैं ?” बस, फिर क्या ? सारा गुस्सा इन नगरपरिषद के पार्षदों के ऊपर उतर आता है ! वह सोच रही है कि, “इन नामाकूलों को यहाँ इस स्कूल में भेजने वाले ये नगर परिषद के पार्षद ही है, नामुराद आये-दिन इन कमबख्तों को दस्तावेज़ सत्यापित करवाने के लिए यहाँ भेज देते हैं ! इनके लिए मैं हेडमिस्ट्रेस न होकर, अदालत के बाहर बैठने वाली नोटरी हूँ ?” अब वह होंठों में ही, बड़बड़ाती नज़र आती है !]

रशीदा – [होठों में ही, बड़बड़ाती है] – इस नगरपरिषद ने इस स्कूल को एक भवन बनाकर क्या दे दिया, ये कमबख्त पार्षद और इनके ये दारुखोरे आदमी आये दिन व्यवधान फैला देते हैं, इस स्कूल के दफ़्तर में ? कम से कम इन पार्षदों को चाहिए कि, ‘इनको भेजने के पहले अपने इन चमचों को, अधिकारियों से बात करने का सलीका तो सिखला देते ?

[आख़िर नाक-भौं की कमानी को ऊपर चढ़ाकर, वह गुस्से से कह बैठती है !]

रशीदा – [गुस्से से, कहती है] – आ जाते हो मियां, बदतमीजों की तरह इस स्कूल में ? जानते हो, यह सरकारी स्कूल है न कि तुम्हारे लिए सैर-ओ-तफ़रीह करने का बेग़म विक्टोरिया का पार्क ? इस इलाके में केवल हम ही गज़टेड अफ़सर नहीं हैं, मियां और भी है ! आ गए सुबह-सुबह, मुंह खोले ? जाओ किसी दूसरे दफ़्तर में जाकर करवा लो सत्यापन, तुम्हारे दस्तावेज़ों का !

नौजवान – [हकलाता हुआ, कहता है] – बे..बे.. बेन जी !

रशीदा – [फटकारती हुई, कहती है] – बे बे क्या बकता है, नामाकूल..बकरी है क्या ? चल, निकल बाहर ! न जाने, कहाँ से आ गया, यह दारुखोरा ?

[सकपकाकर वह नौजवान बाहर चला आता है, उसके कमरे से बाहर आते ही वहां बैठी मेडमों के कहकहे बुलंद हो जाते हैं ! कहकहे सुनकर वह नौजवान ख़िल-खिलाकर हंस पड़ता है, फिर वह अपने जेब से कंघा निकालकर अपने खिचड़ी नुमा बालों को संवारता है ! बाल संवारता हुआ कमरे के बाहर बैठी जैलदार शमशाद बेग़म से कहता है !]

नौजवान – [बाल संवारता हुआ, कहता है] – हम तो उस्ताद आये हैं, सरकारी मुलाज़िम बनकर ! तबादला-ए-ख़याल, आख़िर यहाँ आया क्यों ‘नूर’ ? यहाँ तो डिस्को नचा दिया हमको, बिना फ़रियाद सुने ? लानत है, इन मेडमों को...

शमशाद बेग़म – हाय अल्लाह, यह नामाकूल क्या बक रहा है ?

नौजवान – [तेज़ी खाकर, बोलता है] – क्या जानें ये मेडमें, होता क्या है डिस्को ? ज़रा आ जाओ हमारे साथ, मंच पर ! फिर तुम सोचोगी, खिसको खिसको !

[जेब से पर्स और साइकल की चाबी निकालता है, फिर वह पर्स में लगी फिल्म अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती की फोटो को निहारता हुआ चाबी को गोल-गोल घूमाता है ! फिर, आगे कहता है !]

नौजवान – [साइकल की चाबी घूमाता हुआ, आगे कहता है] – बाबा मिथुन अब हम हैं, अब देखो हमारा डिस्को ! कहकहे बंद हो जायेंगे, तब कहोगी खिसको खिसको !

[इतना कहकर, वह मिथुन स्टाइल में नाचने लगता है ! और साथ में गाता है बेसुरा “आई एम ए डिस्को डांसर..” ! इसके गाने की आवाज़ सुनकर, क्लासों में बैठी बच्चियां झट बाहर निकल आती है ! और इस नाच रहे नौजवान को देखकर, वे सभी ख़िल-खिलाकर ज़ोर से हंस पड़ती है ! जैसे ही उस नौजवान की निग़ाह इन बच्चियों पर गिरती है, वह खुश होकर और तेज़ रफ़्तार से नाचने लगता है ! उसका नाच देख रही बच्चियां, अब तालियाँ पीटने लगती है ! इधर इन बच्चियों का शोर, और उधर साथ में शमशाद बेग़म की हंसी गूंज उठती है ! अचानक शमशाद बेग़म की नज़र दीवाल घड़ी के कांटों पर गिरती है, रिसेस का वक़्त हो गया है..वह उठकर घंटी लगा देती है ! अब क्लासों में बैठी सारी बच्चियां घंटी की आवाज़ सुनकर, क्लासें छोड़कर बाहर मैदान में दौड़ आती है ! और वहां आकर, वे खेलने लगती है ! उधर शमशाद बेग़म घंटी लगाकर, उस लोहे के डंडे को यथास्थान रख देती है ! फिर वह, स्कूल के खाज़िन आक़िल मियां के कमरे की तरफ़ क़दम बढ़ा देती है ! वहां जाकर दरवाज़े पर दस्तक देकर, कहती है !]

शमशाद बेग़म – [दस्तक देकर, कहती है] – ज़नाब, अन्दर आने की इज़ाज़त चाहती हूँ !

[रोकड़ बही लिख रहे आक़िल मियां, सर उठाकर कहते हैं !]

आक़िल मियां – [सर उठाकर, कहते हैं] – आइये, ख़ालाजान ! तशरीफ़ लाइए, आपको पूछने की क्या ज़रूरत ?

शमशाद बेग़म – [अन्दर दाख़िल होकर, कहती है] – आदाब अर्ज़ है, ज़नाब ! एहबाब के तौर पर कह देती हूँ ज़नाब, आप इस कोलोनी के इन बेअक्ल लौंडों को अपने मुंह न लगाया करें !

आक़िल मियां – [लबों पर, मुस्कान बिखेरते हुए कहते हैं] – सुनिए, “कौन अच्छा है इस ज़माने में, क्यूं किसी को बुरा कहें कोई !”

शमशाद बेग़म – हुज़ूर, आप इनकी तरफ़दारी न करें, आप जानते नहीं है इन लोगों को ! आज़कल न जाने कितने निक्कमें लोग सैर-ओ-तफ़रीह करने आ जाते हैं, स्कूल में ? शौक से यह बगीचा क्या लगाया, आपने ? बस ये नामुराद किसी न किसी बहाने को गढ़कर, आ जाते हैं इस स्कूल में !

आक़िल मियां – आपका मतलब क्या है ?

शमशाद बेग़म – [झुंझलाकर, कहती है] - हाय अल्लाह ! आप कुछ समझते ही नहीं ? इन नामाकूलों को जब रोकती हूँ, तब यह बड़ी बी क्या कहती हैं..सुना आपने ? [रशीदा की आवाज़ की नक़ल करती हुई, कहती है] ख़ाला, यह अवाम है..अपने माई-बाप ! इनकी ख़िदमत करना ही, आपका फ़र्ज़ है !
आक़िल मियां – [हंसते हुए, कहते हैं] – आगे कहिये, ख़ाला ! ‘नहीं रोकने पर, यह मोहतरमा अपने मुख से अंगारे उगलती होगी ? अब आपको, करना क्या है ? अपना काम करती रहिये, और क्या ? सुनिए, ‘हमारे घर की दीवारों पे 'नासिर' उदासी बाल खोले सो रही है !’ फिर आप काहे की मगज़मारी करके, अपना बेशकीमती वक़्त जाया करती हैं ?

शमशाद बेग़म – अरे ज़नाब, वक़्त जाया कैसे न होगा ? वह ऐसे बोलेगी कि ‘ख़ाला आपको सलीका आता नहीं, मुलाकाती को मेरे कमरे में कैसे भेजा जाता है ? अलाहौल-विल-कूव्वत, बेकैफ़ हो गयी मैं ! बेकार की बकवास छोड़ो, ख़ाला ! पहले मुलाकाती की पर्ची भेजा करो, अन्दर ! बाद में मेरी इज़ाज़त लेकर, उसे अन्दर भेजा करो !’

आक़िल मियां – तो हो गया, क्या ?

शमशाद बेग़म – अभी-तक आप समझे नहीं ? अरे हुज़ूर इस बड़ी बी ने कैसे कह डाला कि ‘मुझे सलीका आता नहीं ? साहेब, क्या मैं गोद में खेलने वाली बच्ची हूँ ? जिसको, कोई सलीका आता नहीं ! हुज़ूर, मैंने ४० साल इस महकमें में नौकरी करके भाड़ नहीं झोंकी ?

आक़िल मियां - क्या कहती है...? भाड़ झोंकना, उनका काम ! आप तो, अपने काम पर ध्यान दीजियेगा !

[अब इसी लग्व के कारण, आक़िल का ध्यान बंट जाता है ! वे रोकड़ बही के ज़रब को सही नहीं कर पाते, आख़िर केलकुलेटर लेकर ज़रब के क्रोस की जांच करते हैं ! ज़रब का क्रोस न मिल पाने से आख़िर, अपने दोनों हाथ अपने जबीं पर रखकर बैठ जाते हैं ! फिर, वे शमशाद बेग़म से कहते हैं !]

आक़िल मियां – [सर पर हाथ रखे हुए, कहते हैं] – कितनी बार कहा है ख़ाला आपको कि आप क़ायदे का ध्यान रखा करें, ताकि आप बेफ़िजूल की बकवास से बची रहेंगी !

[अब आक़िल मियां को जबीं पर हाथ रखे देखकर, वह उन्हें आश्चर्य से देखती है ! फिर गैस के चूल्हे के निकट जाकर, चाय बनाने लगती है ! आक़िल मियां के कमरे के बाहर ही सामने के कमरे की खिड़की के पास एक टेबल रखी है ! जिस पर गैस का चूल्हा रखा है, और उसकी गैस की टंकी नीचे रखी है ! पास ही एक टेबल पर पटवारी साइज़ की लोहे की अलमारी रखी है, जिसमें चाय बनाने के सामान रखे हैं ! स्कूल के स्टाफ़ का टी-क्लब चलता है, जिसकी चाय यहाँ ही बनती है और इसी बरामदे में बैठकर, मेडमें चाय का लुत्फ़ उठाती है !]

शमशाद बेग़म – [शेर पेश करती हुई, कहती है] - ‘ऐ दोस्त हम ने तर्क-ए-मोहब्बत के बावजूद, महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी कभी !’ जनाब, अब चाय बना देते हैं ! एक मर्तबा, सेरीडोन की गोली चाय के साथ ले लीजियेगा !

[गैस का चूल्हा जलाती है, अब चाय का पानी चढ़ाने के लिए पानी से भरा भगोना गैस पर रखती है !]

आक़िल मियां – [जबीं पर रखे दोनों हाथों को हटाकर, कहते हैं] – हाँ ख़ाला, आपने वज़ा फ़रमाया ! बस आप चाय में तुलसी की पत्ती डाल देना, प्लीज़ भूलना मत !

शमशाद बेग़म – [खिन्नता से, कहती है] – तुलसी को छोडिये, हुज़ूर ! जैसे आप हुक्म देंगे, वे सभी चाय के मसाले दाल चीनी, काली मिर्च, सूंठ वगैरा डाल दूंगी ! बस मालिक, आप एक पकड़ का बंदोबस्त कर देते तो...

आक़िल मियां – आपका मफ़हूम क्या है, आख़िर ? जो हर्ज़-बुर्ज़ हो, सामने रखिये ! कहिये, क्या है आपकी हर्ज़-बुर्ज़ ? ख़ालाजान आप अपने दिल में क्या सोचती है, हमें क्या मालुम ? बस, आप यह बता दीजिये कि, आपकी हर्ज़-बुर्ज़ कैसे मिटाई जा सकती है ?

शमशाद बेग़म – [रुंआसी होकर, कहती है] – क्या करूं, हुज़ूर ? जब चाय उबल रही हो और तब उस भगोने को रिदा से पकड़कर उठाती हूँ..ख़ुदा रहम, कहीं भगोना हाथ से छूट गया तो अल्लाह कसम मेरा बदन जल गया तो...?

[इतना कहा ही था, शमशाद बेग़म ने...तभी वह नौजवान लपककर चला आता है आक़िल मियां के कमरे में ! आकर वह कमबख्त आक़िल मियां के पाँव कसकर पकड़ लेता है ! बेचारे आक़िल मियां को, क्या मालुम ? वह लंगूर, कब चुपके से अन्दर दाख़िल हो गया ? ज़नाब तो रोकड़ बही की ज़रब का क्रोस मिलाने में ऐसे तल्लीन थे, जनाब और कुछ देख नहीं पा रहे थे ? जब वह ज़ोर-ज़ोर से पाँव दबाने लगा, और इससे उनके पांवों में अकड़न पैदा होती है..फिर उस पैदा हो रहे दर्द के कारण, आक़िल मियां पांवों की तरफ़ देखते हैं, वहां उसे पाँव दबाते देखकर वे चिल्लाकर कहते है !]

आक़िल मियां – कौन है रे, नामाकूल ?

नौजवान – हुज़ूर...हुज़ूर, मैं आपका ख़िदमतगार..आ गया हूँ अब..हुज़ूर ! अब मैं आपकी खूब ख़िदमत करूंगा !

आक़िल मियां – [लबों पर मुस्कान लाकर, कहते हैं] – सदका उतारूं, तेरा ! अल्लाह की कसम, कमाल का डिस्को डांस करता है तू....कहीं मियां, हमारी नज़र न लग जाए तुम्हें ? अब तो तूझे इमामबाड़ा से कारचोब वाला इमामजामिन मंगवाकर, पहन लेना चाहिए ! अरे कमबख्त, अब तो छोड़ दे मेरे पाँव..दर्द हो रहा है !

नौजवान – वाह हुज़ूर ? आप तो भूल गए मुझे, पहचाना नहीं मुझे ? मैं हूँ मास्टर साहेब भंवरु खांजी का नेक दख्तर ! हुज़ूर की दुआ से मेरा तबादला आपकी स्कूल में हो गया ! ज़ोर इस बन्दे को सभी नूर मोहम्मद कहते हैं, और प्यार से नूरिया बन्ना कहते हैं ! [अभी-तक वह नामुराद ज़ोर-ज़ोर पाँव दबाता जा रहा है !]

आक़िल मियां – ख़िदमत तू बाद में करना, अभी तो मियां...मेहरबानी करके मेरे इन पांवों पर रहम खाओ, और छोड़ दो इन पांवों को !

नूरिया पाँव छोड़ देता है, और फिर वह तनकर खड़ा हो जाता है ! आक़िल मियां हाथों को ऊपर ले जाते हुए जम्हाई लेते हैं ! फिर, कहते हैं !]

आक़िल मियां – अब तू ऐसा कर, तेरी जॉइननिंग लिख देता हूँ मैं ! [पेड से एक काग़ज़ निकालकर उस पर उस नूरिये की ड्यूटी जॉइन करने की दरख्वास्त लिख देते हैं ! फिर उसे कलम थमाकर, कहते हैं] अब इस पर, तू अपने दस्तख़त कर दे ! और देकर आ जा, बड़ी बी को ! वापस आकर, चाय पी लेना !

नूरिया – [दरख्वास्त पर दस्तख़त करता हुआ, कहता है] – अभी देकर आता हूँ यह दरख्वास्त ! फिर नूरिया आकर ज़रूर पी लेगा, गरमा-गरम मसालेदार चाय ! ग्लास भरकर गरमा-गरम चाय तैयार रखना, हुज़ूर ! यह लीजिएगा, अपनी कलम !

[कलम रर्ख देता है, टेबल पर ! फिर दरख्वास्त लेकर नूरिया चला जाता है, अब आक़िल मियां फ़िक्र के मारे सोचने बैठ जाते हैं !]

आक़िल मियां – [सोचते हुए] - यह बच्चा मास्टर भंवरु खांजी का नेक दख्तर है ! मेरे बड़े भाईजान जब हायर सेकण्ड्री स्कूल में पढ़ा करते थे, उस दौरान भंवरु खांजी उनको भूगोल विषय पढ़ाया करते थे और साथ में वे स्कूल में स्काउट मास्टर भी थे ! अब यह कमबख्त नूरिया, इस रब्त को दूर की कोड़ी बनाकर ले आया !

[उधर चाय उबलकर तैयार हो गयी है, शमशाद बेग़म रिदके से उस भगोने को पकड़कर उठाती है और उसे टेबल पर रखती है ! इसके बाद वह चीनी के प्यालों में चाय डालती है ! उबली हुई चाय की खुश्बू फ़ैल जाती है ! मगर आक़िल मियां के दिमाग़ में चल रहे विचारों के सागर में कोई उथल-पुथल नहीं ? वे शान्ति से, सोचते जा रहे हैं ! वे अभी भी होंठों में ही, कहते जा रहे हैं !]

आक़िल मियां – [होंठों में ही, बड़बड़ाते जा रहे हैं] – ख़ुदा की पनाह ! बड़ी बी ने देख ली है, इस नूरिये की बदतमीज़ी ! अब वह इस कोदन को माफ़ करने वाली नहीं ! मगर, मैं जानता हूँ कि, ऐसे मंदबुद्धि के लोग सक्लोजिकल ट्रीटमेंट से ठीक हो सकते हैं ! बस, इन लोगों को ज़रा सी सिम्पेथी मिलनी चाहिए ! आख़िर, दिमाग़ भी एक मशीन की तरह है, ख़ुदा की कसम ऐसी मशीनों के लिए क़ाबिल इंजीनियर की ज़रूरत है !

[मेज़ पर चाय का कप रखते ही विचारों की कड़ियाँ टूट जाती है, सामने शमशाद बेग़म को खड़ा पाकर आक़िल मियां कहते हैं !]

आक़िल मियां – देखो ख़ाला, यह नूरिया यानि नूर मोहम्मद आपकी केडर का जैलदार [चपरासी] है, ‘इंस्पेक्टर ऑफ़ स्कूल’ दफ़्तर से तबादला होकर इस स्कूल में ड्यूटी जॉइन करने आया है ! जब यह बड़ी बी के कमरे से लौट आये, तब आप इसे चाय पिला देना ! भूलना मत, ख़ाला !

[तभी नूरिया दरख्वास्त देकर, लौट आता है ! उसे देखते ही शमशाद बेग़म, उसे चाय से भरा प्याला थमा देती है ! फिर, वह उससे कहती है !]

शमशाद बेग़म – बन्ना ! चाय पी लेना, शर्म करना मत ! यह बात अपने दिमाग़ में बैठा लेना कि, तुम पराये नहीं हो ! जानते हो ? तुम्हारे वालिद मेरे फूफाजी हैं !

नूरिया – [दूसरा हाथ जिससे कप थामा नहीं गया, उसी को नचाता हुआ कहता है] – जो हुक्म, ख़ालाजान ! आपकी ख़िदमत करना मेरा फ़र्ज़ है ! कहिये, मेरे लिए कोई काम ?

शमशाद बेग़म – [चेहरे पर मुस्कान लाकर, कहती है] – ठीक है, बन्ना ! पहले आराम से बैठकर चाय की चुश्कियाँ ले लीजिये, फिर बाद में चाय बनाने का भगोना और जूठे बरतन मांजकर धो देना ! बरामदे में जहां पानी की मटकी रखी है, उसके सामने नल है..वहां बैठकर इस काम को निपटा लेना ! अब मैं बड़ी मेडम और अन्य मेडमों को, चाय सर्व करती हुई वापस लौट रही हूँ ! जाती हूँ, मियां !

[तश्तरी में चाय से भरे प्याले रखती है, फिर उसे उसे उठाये बड़ी बी के कमरे की तरफ़ क़दम बढ़ा देती है ! मंच पर, अँधेरा फ़ैल जाता है !]

मंज़र – २ ‘क्या चुग्गा खां बन गए, दफ़्तरेनिग़ार..?’

राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित
नए किरदार -:

मेमूना – मरियल सा नौजवान, जिसका तबादला इस स्कूल में हुआ है ! अब वह, स्कूल में ड्यूटी जॉइन करने आया है ! इसने बिना क्रीज़ की हुई, सफ़ेद वर्दी पहन रखी है ! और इसने, अपने चेहरे पर कैदियों के समान रीश [दाढ़ी] बढ़ा रखी है !

चुग्गा खां – सेकेंडरी पास जैलदार ! क्रीज़ किया हुआ सफ़ेद सफ़ारी सूट पहन रखा है ! ये शख्स बहुत सलीकेदार है, इनको पहली नज़र में लोग देखकर इन्हें दफ़्तरेनिग़ार समझने की ग़लती कर बैठते हैं !

ग़ज़ल बी – हिंदी विषय की सीनियर टीचर है ! यह सभ्य महिला है, मगर किसी की आलोचना करने में, अपना फ़ायदा ज़रूर देखती है ! स्कूल में, सियासती चाले चलने में माहिर ! यानि मंजी हुई कलाकार ! बोलने में, वाक्-पटुता काम लाती है ! स्कूल की लोकल एग्जामिनेशन की निजाम !

[मंच पर, रोशनी फैलती है ! बड़ी का कमरे का मंज़र सामने आता है ! रशीदा बेग़म के आस-पास रखी कुर्सियों पर स्कूल की मेडमें बैठी है ! रशीदा बी हेड मिस्ट्रेस की कुर्सी पर बैठी, इन मेडमों से गुफ़्तगू कर रही है ! तभी चाय के प्यालों की तश्तरी उठाये शमशाद बेग़म कमरे में दाख़िल होती है ! सभी मेडमों को चाय भरे प्याले थमाकर, अब वह रशीदा बेग़म को चाय का प्याला थमाकर कहती है !]

शमशाद बेग़म – हुज़ूर ! हमने सुना है, आप नूरिया बन्ना से खफ़ा हैं ?

रशीदा बेग़म – देखो, ख़ालाजान ! मैं ऐसे कोदन इंसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकती, जो दफ़्तर में काम करने के अदब से अनजान हो ! यह नूर मोहम्मद इसी तरह का, कोदन इंसान हैं !

शमशाद बेग़म – हुज़ूर, जानती हूँ मैं ! इस तरह के कोदन इंसानों को हर घड़ी अपने सामने देखना आपको गवारा नहीं ! इसको ड्यूटी पर रखना अपने लिए मुसीबत लाने से कोई कम नहीं है ! मगर हुज़ूर...

रशीदा बेग़म – [आखों की त्यौंरिया चढ़ाती हुई, कहती है] – मगर क्या ? आप कहना क्या चाहती हैं ख़ाला ?

शमशाद बेग़म – [हाथ जोड़कर, कहती है] – हुज़ूर, यह भोला है ! दफ़्तर के तौर-तरीके जानता नहीं ! मगर, है दिल का भोला ! रफ्तः-रफ्तः सब सीख जाएगा !

रशीदा बेग़म – [चिढ़ती हुई, कहती है] – क्या सीख जाएगा ? निरा उल्लू ठहरा, यह कोदन लंगड़ी बहू की तरह काम करता रहेगा ! दस-दस आदमी चाहिए इसे संभालने के लिए, जो हर वक़्त हाज़िर रहे स्कूल में ! एक आदमी इसका हाथ पकड़ेगा तो दूसरा पकड़ेगा इसकी टांग और तीसरा...माफ़ करो ख़ाला, मुझे अपना सर-दर्द नहीं बढ़ाना इस कोदन को ड्यूटी पर लेकर !

शमशाद बेग़म – हुज़ूर ! मकबूले आम बात यही है, मुहब्बत से इंसान क्या ? पत्थर भी मोम बन जाता है ! फिर यह तो हुज़ूर, यह इंसान है ! आप नहीं जानते, मेरे शौहर को, ज़नाब न जाने कैसी-कैसी वाहियात हरक़तें करते हैं ? इतमीनान से झेलना पड़ता है, न मालुम कितनी अफ़सोसनाक ज़हालत से मुझे गुज़रना पड़ता है ?

रशीदा बेग़म – क्या कहना चाहती हो, ख़ाला ?

शमशाद बेग़म – हुज़ूर, आख़िर वे मेरे शौहर हैं ! उनसे अमीक रब्त है, मुझे ! दिल की तमन्ना है, कभी तो सुधरेंगे आख़िर ! उनको इस हालत में कैसे छोड़ सकती हूँ, हुज़ूर ? आख़िर, अल्लाहताआला को क़यामत के दिन ज़वाब जो देना हैं ! इसलिए, हुज़ूर...

रशीदा बेग़म – इसलिए, क्या ? आगे कहो, ख़ाला !

शमशाद बेग़म – यह कह रही थी, हुज़ूर ! आपका भला होगा, आप इस पगले की नौकरी को सलामत रहने दें ! इसके बीबी-बच्चे आपको दुआ देंगे, हुज़ूर ! आप जानते ही हैं, हमारे एजुकेशन महकमें में, कई विकलांग, बेवा, तलाकशुदा वगैरा लाचार लोगों को नौकरी देकर यह सरकार सवाब का काम करती रही है ! फिर, आप जैसी रहमदिल..

[शमशाद बेग़म की बात सुनकर, रशीदा बेग़म को रहम आ जाता है उस कोदन मुलाज़िम पर ! झट उसकी दरख्वास्त पर, जॉइन करने के मंजूरी हुक्म लिखकर दस्तख़त करती है ! फिर उस दरख्वास्त को, शमशाद बेग़म को थमा देती है ! फिर, उससे कहती है !]

रशीदा बेग़म – अब जाओ, इस दरख्वास्त को आक़िल मियां को दे देना ! और कहना, इस नूरिये के हाज़री रजिस्टर में दस्तख़त हो गए हों तो इस दरख्वास्त को जोइनिंग फ़ाइल में नत्थी कर दें ! फिर, दो मिनट के लिए मेरे पास आयें, मुझे किसी ख़ास मुद्दे पर उनसे बात करनी है !

शमशाद बेग़म – जैसी आपकी मर्ज़ी ! अभी कहती हूँ, उनसे !

[सभी चाय पीकर ख़ाली प्याले मेज़ पर रख देते हैं ! शमशाद बेग़म उन जूठे प्यालों को वापस तश्तरी पर रखकर, तश्तरी को उठाती है और चल देती है ! वह सारे काम लिए गए बर्तनों को नल के नीचे रखकर, आक़िल मियां के कमरे की तरफ़ क़दम बढ़ती है ! उधर शमशाद बेग़म के बड़ी बी के कमरे से जाने के बाद, एक मरियल सा नौजवान, जिसकी रीश बढ़ी हुई है..कमरे में दाख़िल होता है ! यह नौजवान इतना मरियल सा लगता है, मानों कोई टी.बी. का मरीज़ सरकारी टी.बी. अस्पताल से भागकर यहाँ आया है ? उसकी बढ़ी हुई रीश को देखकर ऐसा लगता है, मानों कोई कैदी तिहाड़ जेल से छूटकर सीधा यहाँ आया है ? अन्दर दाख़िल होता है, फिर तहज़ीब से झुकता हुआ बड़ी बी को सलाम करता है !]

मरियल सा नौजवान – [झुककर, सलाम करता है] – हुज़ूर, सलाम !

रशीदा बेग़म – [उसे सर से पाँव तक, घूरती हुई, कहती है] – कौन हो, भाई ? जानते नहीं, तुम ? यह सरकारी अस्पताल नहीं, यह सरकारी दफ़्तर है ! [होंठों में ही, कहती है] आज़कल ये टी.बी. के मरीज़ खुले-आम अवारागर्दी पर उतर आये हैं, अभी थोड़ी देर पहले मेंटल अस्पताल का मरीज़ आ गया ड्यूटी जॉइन करने..और, अब आ गया यह टी.बी. का मरीज़ ?

[दोनों हाथ ऊपर करती हुई, ख़ुदा से दुआ मांगती हुई अपने दिल में कहती है !]

रशीदा बेग़म – [दोनों हाथ ऊपर ले जाती हुई, होंठों में ही कहती है] – ख़ुदा रहम ! इस स्कूल पर रहम बख्स, मेरे मालिक ! न जाने किस खबीस की बुरी नज़र इस पर लग गयी है ? सदका उतारूं...हाय अल्लाह, बुरे दिन आ गए इस स्कूल के ! कोई ख़ता मुझसे हो गयी है, तो माफ़ कर रहमदिल परवरदीगार ! [बड़बड़ाती है] अस्पताल के चक्कर...

मरियल सा नौजवान – हुज़ूर, वज़ा फ़रमाया आपने ! अस्पताल के चक्कर काटता-काटता थक गया हूँ, हुज़ूर ! आप मेरे लिए अल्लाह मियां से दुआ मांगिये, हुज़ूर ! आख़िर, पैसे का काम पैसे से ही सलटता है हुज़ूर ! बस, आप तनख्वाह दिलवा दीजिये हुज़ूर ! आपकी मेहरबानी होगी, अल्लाह पाक आपको सलामत रखेगा !

रशीदा बेग़म – [होंठों में ही, कहती है] – हाय अल्लाह ! यह तो वही ख़बीस निकला, जो अपनी अबसेंटी तो भिजवा देता है, मेरे पास ! मगर कमबख्त यहाँ आकर ड्यूटी जॉइन करता नहीं ! [उस मरियल नौजवान से, कहती है] अबे ए बोतल में पड़ी पुरानी शराब, जहां काम करता है वहीं जाकर अपनी तनख्वाह मांग !

मरियल सा नौजवान – [अदब से, अर्ज़ करता है] – हुज़ूर, यही अर्ज़ कर रहा हूँ आपसे ! वहां से रिलीव होकर आपकी इस स्कूल में आ गया हूँ, ड्यूटी जॉइन करने ! ड्यूटी पर ले लीजिये, हुज़ूर ! फिर बाद में, बकाया तनख्वाह दिलाने के हुक्म इज़रा करें !

[बड़ी बी के पहलू में बैठी ग़ज़ल बी, रहम खाती हुई बीच में बोल पड़ती है !]

ग़ज़ल बी – बड़ी बी ! इस बेचारे पर रहम कीजिएगा, तनख्वाह नहीं मिलने के कारण इसका दिमाग़ ठिकाने आ गया है ! अब यह ऐसी ग़लती नहीं करेगा, यह नामाकूल समझ गया है कि जिस स्कूल से तनख्वाह उठायी जाती है, वहां ड्यूटी पर रहकर काम भी करना पड़ता है ! हमारी स्कूल में वेतन प्रतियोजनार्थ तनख्वाह उठाने के आदेश नहीं चलते हैं ! आख़िर, आ गया नामाकूल ड्यूटी जॉइन करने !

रशीदा बेग़म – [अपनी फ़तेह पर खुश होती हुई, कहती है] – क्या तुम सच्च कह रहे हो, वास्तव में आ गए तुम ड्यूटी जॉइन करने ?

मरियल सा नौजवान – [मरी हुई आवाज़ में, कहता है] – हुज़ूर यही अर्ज़ कर रहा था, आपसे ! दफ़्तर से रिलीव होकर आ गया हूँ आपके पास, अब आप ड्यूटी जॉइन करने का हुक्म इज़रा करें ! जॉइन करके, मैं आपकी ख़िदमत में रहूँगा हुज़ूर ! आप बेफिक्र हो जायें, ज़नाब !

[इतना कहकर उस मरियल नौजवान अपनी जेब से ज्वाइन करने की अर्ज़ी निकालता है, फिर अर्ज़ी बड़ी बी को थमा देता है ! बड़ी बी उस अर्ज़ी पर हुक्म इज़रा करके उस पर दस्तख़त करती है, फिर उस अर्ज़ी को उसे थमा देती है ! फिर, कहती है !]

रशीदा बेग़म – [अर्ज़ी थमाते हुए, कहती है] – बाबू साहेब के पास जाकर, इसे फ़ाइल में नत्थी करवा देना !

[जैसे ही वह मरियल सा नौजवान बाहर आता है, वहां उसे बरामदे में खड़े जैलदार चुग्गा खां के दीदार हो जाते हैं ! जो क्रीज़ की हुई सफ़ेद सफ़ारी पहने हुए हैं, उनकी पर्सनल्टी एक सभ्य सलीकेदार दफ़्तरेनिग़ार के समान नज़र आती है ! यह मरियल नौजवान, उनको दफ़्तरेनिग़ार समझ लेता हैं ! फिर, क्या ? झट झुककर, उनको सलाम ठोक देता हैं !]

मरियल सा नौजवान – [झुककर सलाम करता हैं, फिर आगे कहता हैं] – सलाम, साहेब ! बड़ी बी ने भेजा है, आपके पास ! कहा है, जोइनिंग की दरख्वास्त आपको संभला दूं ! [दरख्वास्त थमाता है, फिर कहता है] हुज़ूर लीजिये, दरख्वास्त ! हुज़ूर के इस बन्दे को मोहम्मद अली कहते हैं, और प्यार से सभी हमें मेमूना भाई कहते हैं !

[मेमूना की बात सुनकर, चुग्गा खां दफ़्तरेनिग़ार की तरह अकड़कर खड़े हो जाते हैं ! फिर चुग्गा खां मेमूना भाई को सर से लेकर पाँव तक घूरकर देखते हैं ! फिर, ज़नाब कहते हैं !]

चुग्गा खां – [मेमूना भाई को सर से लेकर पाँव तक देखकर, फिर कहते हैं] – हुम...ठीक है ! अब, जी लगाकर काम करना !

मेमूना भाई – [खुश होकर] – हुज़ूर ! आपको कभी भी मेरी शिकायत का मौक़ा नहीं मिलेगा !

[अब चुग्गा खां दरख्वास्त को अच्छी तरह से थाम लेते हैं, फिर बाद में वे वे कुछ सोचते हुए नज़र आते हैं !]

चुग्गा खां – [होंठों में ही, कहते हैं] – जब तक तू नहीं जानता कि, मैं कौन हूँ ? तब-तक बेटा मेमूना, मैं तेरे जैसे बेवकूफ से खूब सेवा लेता रहूँगा ! कबतूरों को छोड़िये, ज़नाब ! मैं वह परवाना हूँ, जो इंसानों को भी चुग्गा डाल सकता है !

[फिर चेहरे पर मुस्कान लाकर, चुग्गा खां कह देते हैं !]

चुग्गा खां – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – जोइनिंग की एप्लीकेशन मैं अपने पास रख लेता हूँ, मेमूना भाई ! रजिस्टर में आपके दस्तख़त बाद में करवा दूंगा ! अभी म्यां जाओ, वहां ! [उंगली के इशारे से, झाडू रखने की ठौड़ दिखलाते हुए कहते हैं] वहां रखा है झाडू, उसे उठाइये और जाकर कमरा नंबर १ से ६ तक सफ़ाई करके आ जाओ वापस ! फिर वापस आकर, नल के नीचे रखे चाय के प्याले धो डालना !

[बरामदे में स्टूल पर बैठी शमशाद बेग़म, आराम से चाय नोश फ़रमा रही है ! अब मेमूना भाई को देखकर, वह उनसे कहती है !]

शमशाद बेग़म – [ज़ोर से, कहती है] – अरे मियां, चाय के प्याले तो धुलते रहेंगे ! पहले तुम बाहर जाओ, और बाहर दुकान से दूध लेते आओ ! यह मेज़ पर रखी बरनी उठा लेना, इसमें ही रखे हैं दूध के पैसे ! वापस झट आकर, कमरों की सफ़ाई कर लेना !

[मेमूना भाई दूध लाने की बरनी और पैसे उठा लेते हैं ! फिर, रुख्सत हो जाते हैं ! तभी नूरिया आता है, चुग्गा खां उसे रोककर उसे स्टूल पर बैठाते हैं ! फिर, नूरिये को हिदायत देते हुए कहते हैं !]

चुग्गा खां – देख नूरिया, तूझे अगर इस स्कूल में रहना है तो सबकी आँखों का तारों बनकर रहना होगा !

नूरिया – [पागलों की तरह, साइकल की चाबी को घुमाता हुआ कहता है] – हाँ जी, दिल का तारा बनेगा..डिस्को डांस करेगा, ज़नाब आप मेरा डिस्को डांस देखना चाहेंगे ? चलिए, आपको डिस्को डांस करके दिखलाता हूँ ! [डांस करता हुआ गाने लगता है] आई एम ए डिस्को डांसर..हू हू ! आई एम ए डिस्को डांसर ! [डांस रोककर कहता है] अजी साहेब, हमारी डांस पार्टनर छमक-छल्लो ऐश्वर्या को तो बुला दीजियेगा !

शमशाद बेग़म – तुम्हारी ऐश्वर्या को अब कहाँ से ढूँढ़कर लायें ? कर ले, किसी दूसरी को एडजस्ट !

नूरिया – वाह ख़ाला ! क्या बात कही, आपने ? चलिए, आपका हुक्म मान लेते हैं ! ऐश्वर्या न सही तो, क्या हुआ ? [चुग्गा खां की बांह थामता हुआ, कहता है] चलिए ख़ाला, हम इस हेमा मालिनी से काम चला लेंगे ! आप भी अपने राजेश खन्ना को लेकर, आ जाइयेगा ! खूब नाचती हैं आप, हेलन की तरह !

[फिर क्या ? यह नूरिया तो जबरा ठहरा, कमबख्त चुग्गा खां का हाथ पकड़कर उनको नचाने लगा ! बेचारे चुग्गा खां की हालत बहुत बुरी हो जाती है, प्रोबलम हो गयी कि अब इस पागल से अपनी जान कैसे छुड़ायें ? क़िस्मत अच्छी है उनकी, तभी आक़िल मियां वहां तशरीफ़ लाते हैं ! आक़िल मियां को देखते ही, नूरिया डरकर चुग्गा खां का हाथ छोड़ देता है ! हंसी को दबाकर, आक़िल मियां चुग्गा खां से कहते हैं !]

आक़िल मियां – [चुग्गा खां से, कहते हैं] – चुग्गा खां ! इस नूरिया बन्ना को पाठ पढ़ाते रहना, यह बड़ी काम की चीज़ है ! परसों हाफ इयरली के एक्ज़ाम शुरू होंगे, इसे आप नाईट ड्यूटी में अपने साथ ले लेना ! आपकी दी हुई ट्रेनिंग से यह कोदन कुछ सीख लेगा ! बड़ी बी ने मुझे अभी बुलाया है, मैं चलता हूँ !

[आक़िल मियां जाते हैं, उनके जाने की पदचाप सुनायी देती है ! अब बड़ी बी के कमरे में, आक़िल मियां दाख़िल होते हैं ! रशीदा बेग़म एक रजिस्टर लिए बैठी है ! उनके बगल में, ग़ज़ल बी कुर्सी पर बैठी है !]

आक़िल मियां – [दाख़िल होकर, कहते हैं] – फ़रमाइये, हुज़ूर !

रशीदा बेग़म – एक बात कह देती हूँ, सरकारी नौकरी में ना रिश्तेदारी चलती है और न जान-पहचान ! मुझे मालूम है, आपने...

आक़िल मियां – क्या जानती हैं, आप ?

रशीदा बेग़म – आपने थोड़ी सी जान-पहचान के कारण नूरिये का केस अपने हाथ में ले लिया ! अब मैं चाहती हूँ, आप उसे किसी तरह की सहूलियत नहीं देंगे ! हमारे लिए सभी मुलाज़िम बराबर हैं, समझ गए आप ? [ग़ज़ल बी की तरफ़ मुंह फेरती हुई, कहती है] देखो ग़ज़ल बी, एग्जामिनेशन के रोज़ आप इसको डोरा लाने का कहेगी और यह कोदन ले आयेगा रस्सी !

ग़ज़ल बी – [हंसती हुई, कहती है] – वज़ा फरमाया, आपने ! कुछ नहीं मेडम, अगर यह कोदन रस्सी लाएगा तो मैं उस रस्सी से उसको ही बाँध दूगी !

रशीदा बेग़म – रस्सी से बांधकर उसे बन्दर की तरह नचाते रहना ! फिर कोई आपको मदारी कहे, तो आप मुझे दोष मत देना !

ग़ज़ल बी – बन्दर बनाकर नचायें या इससे स्कूल की चौकीदारी करवाएं ? यह काम ठहरा, आक़िल मियां का ! आख़िर, वे ठहरे इनके निजाम ! जहां आक़िल मियां जैसे निजाम, और आप जैसी तुजुर्बेदार ऑफ़िसर ! वहां हम लोगों को, मदारी बनने की कहाँ ज़रूरत ?

[हास्य के पुट में, ग़ज़ल बी ने क्या कह दिया ? इसका मफ़हूम न समझकर रशीदा बेग़म कहती है !]

रशीदा बेग़म – क्यों झूठी तारीफ़ करती है, आप ? हम कहाँ है, इतने तुजुर्बेदार ?

ग़ज़ल बी – भूल गयी, मेडम ? पहले वाली स्कूल में आपने स्कूल के दफ़्तरेनिग़ार को छठी का दूध पिला दिया..बेचारे को सस्पेंड करवा दिया, कोर्ट से हुक्म इज़रा करवाकर ! अब कमबख्त भूल गया होगा, सरकारी नौकरी के साथ प्राइवेट धंधा करना ! [धीरे से, कहती है] कहाँ ज़रूरत थी, उसे सस्पेंड करवाने की ? ‘मारी बेचारी मेंढ़की, और बन गयी सूरमा ?’

[गजल बी क्या कह रही है, धीमे-धीमे..? रशीदा बेग़म सुनती नहीं, वह तो उसके कहे जुमले को अपनी तारीफ़ समझकर कह देती है !]

रशीदा बेग़म – वक़्त-वक़्त की बात है, ग़ज़ल बी ! दिनमान का असर है, देख लीजिये आप ! ये छोटे-बड़े टटपूंजिये चढ़ आते हैं स्कूल में, फ़रमाते हैं “डवलपमेंट कमेटी के खर्चों का हिसाब, उनको बताया जाय ?” अरे ज़नाब, यहाँ हम ख़ुद हैं चेयरमैन इस डवलपमेंट कमेटी के ! और वे है, कौन ? जो हमारी ओर, उंगली करने की जुर्रत करे ?

[ग़ज़ल बी आश्चर्य से, रशीदा बेग़म का अभिमान भरा चेहरा देखती रह जाती है ! तभी, मंच पर अँधेरा छा जाता है !]

मंज़र ३ “इधर सियासत और उधर कबूतर का कुआ”

राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित

[मंच पर, रोशनी फ़ैल जाती है ! रशीदा बेग़म के कमरे में ग़ज़ल बी रशीदा बेग़म से बात का रही है और आक़िल मियां चुप बैठे हैं, कुर्सी पर ! अब, ग़ज़ल बी से कह रही है !]

ग़ज़ल बी – बड़ी बी ! परेशानियां इंसान ख़ुद पैदा करता है ! उसे अपनी गलतियाँ कभी नज़र आती नहीं !

रशीदा बेग़म – [नाराज़गी से, कहती है] – क्या बकती जा रही हैं, ग़ज़ल बी ? एजुकेशन महकमें ने तज़वीज़ आख़िर [फाइनल जजमेंट] लेने का हक़ मुझे दिया है, कमेटी की चेयरमें मैं ख़ुद हूँ ! फिर किस हक़ से ये टटपूंजिये पूछते हैं मुझसे, कि ‘मैं उनको कमेटी का हिसाब, इनके सामने रखूँ ?’ अब बताइये ग़ज़ल बी, मैंने ख़ुद ने कौनसी परेशानी अपने लिए पैदा की है ?

ग़ज़ल बी – [घबराकर, कहती है] – मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा, बड़ी बी ! आपका नाराज़ होना नागवर है, हमने तो ख़ाली मकबूले आम राय रखी है ! बस आपको यही बताया है कि, ‘इंसानी फ़ितरत, क्या काम करती है ?’

आक़िल मियां – बड़ी बी, काफ़ी वक़्त बीत गया है मुझे यहाँ बैठे ! अब आप, मुझे जाने की इज़ाज़त दीजिये !

[बड़ी बी कोई ज़वाब नहीं देती, उधर क्लासों में मेडमों के न होने से बच्चियों का शोर बढ़ जाता है ! फिर क्या ? ग़ज़ल बी झट उठती है, उनको शक हो जाता है कि कहीं बड़ी बी उन पर क्लास ख़ाली रखने का आरोप न झड़ दें !’ वह इस डर को ज़ाहिर होने नहीं देती, और खिड़की के पास आकर बाहर झांकती है ! मगर अब उसे शोर-गुल सुनायी नहीं देता है, ऐसा लगता है पी.टी.ई. मेडम के राउंड काट लेने से बच्चियां चुप-चाप क्लासों में बैठ गयी है ! तसल्ली हो जाने के बाद, वापस आकर वह बड़ी के पास रखी कुर्सी पर बैठ जाती है ! मगर आदत से लाचार, बड़ी बी से बिना बोले रह नहीं पाती ! आख़िर, अपनी कैंची की तरह चलने वाली ज़बान चला देती है !]

ग़ज़ल बी – इंसान को सुधारा कैसे जाय, मेडम ? बस, आपको फ़ितरत के क़ानून को एक नज़र देखना होगा ! इस तरफ़ ध्यान दीजियेगा, मैं एक गोपनीय ख़बर आपको सुनाती हूँ..मगर आप सुनने के बाद किसी को वापस मत कहना, यही मेरी रिक्वेस्ट है ! यह भी मत कहिएगा कि, यह ख़बर मैंने आपको दी है !

रशीदा बेग़म – कहने में, क्या उज्र है ? वल्लाह भरोसे की बात है तो, आपको मुझ पर आपका भरोसा होना चाहिए ! अगर भरोसा नहीं रहा, तब काहे कहने की तकल्लुफ़ करती हैं आप ? मत कहिये, मुझे क्या ?

ग़ज़ल बी – बात को समझिये हुज़ूर, मुझे डर है कही यह मामला बाइसेरश्क का न बन जाए ? जो ख़बर में आपको दे रही हूँ...[झट, ख़बर परोस देती है] बाद में इमतियाज़ बी यही कहेगी कि ‘जलन के कारण ग़ज़ल बी ने, मेरे खिलाफ़ यह मामला बड़ी बी को परोसा है !’ अब आगे क्या कहूं मेडम, आपको..

रशीदा बेग़म – इतना कह दिया है, तो बाकी की बात कह दीजिये ! अब चूको मत, कहने में ! नहीं कहने से अगर आपके पेट में दर्द हो गया तो खैरख्वाह आप मुझे दोष मत देना, कि ‘मैंने आपकी बात नहीं सुनी !’

ग़ज़ल बी – मैं कह रही थी, हुज़ूर ! आज़ इमतियाज़ मेडम, दूसरी मेडमों को भड़का रही थी कि ‘ख़ुदा जाने इस ग़ज़ल बी के पास कितना मक्खन है, न मालुम वह कितना मक्खन लगा देती है बड़ी बी पर ? यही कारण है, इसका लोकल एग्जामिनेशन का इंचार्ज बनने का !’ अब कहिये, बड़ी बी ! क्या आप इस तरह, अपनी चमचागिरी करवाना पसंद करती हैं ? बता दीजियेगा, क्या मैं आपके मक्खन लगाती हूँ ? [धीमे से, कहती है] मक्खन लगा देती तो, आपकी क़ीमती साड़ियाँ ख़राब हो जाती ?

रशीदा बेग़म – [गुस्से से, उबलती हुई कहती है] – उस इमतियाज़ की, इतनी हिम्मत ? [गुस्से को दबाती हुई, कहती है] और भी, कुछ कहा उस शैतान की ख़ाला ने ?

[ग़ज़ल बी के हाथ लग जाता है, बड़ी बी को भड़काने का हथियार ! बस, फिर क्या ? वह क्यों नहीं, इस सुनहरे मौक़े का फ़ायदा उठायेगी ? झट इमतियाज़ के खिलाफ़, शिकायतों का पुलिंदा परोस देती है !]

ग़ज़ल बी – [अन्दर ही अन्दर, खुश होकर कहती है] – हुज़ूर ! उसने आगे यह कहा कि ‘यह ग़ज़ल बी ठहरी शैतान की ख़ाला..जिसने बड़ी बी को भड़का रखा है ! बड़ी बी को हम सबके खिलाफ़ एक-एक मोती पिरोकर, कहती है ‘देखिये बड़ी बी, यह पारी इंचार्ज आयशा कब आती है, कब जाती है ? और..और...

रशीदा बेग़म – और कुछ कहना है, आपको ?

ग़ज़ल बी – [थोड़ी सहमती हुई, कहती है] – आप ज़रा सोचिये, हुज़ूर ! मैंने कुछ ग़लत नहीं कहा, बस यही कहा है कि ‘जब इंचार्ज ख़ुद बच्चों की तरह स्कूल छोड़कर घर भग जाती है, तब वह बच्चियों को कैसे स्कूल के क़ायदे सिखा पाएगी ?’

[चुप्पी छा जाती है, थोड़ी देर बाद रशीदा बेग़म आक़िल मियां पर निग़ाह डालती हुई कहती है ! जो जाने की उतावली में खड़े हो गए हैं, न जाने कब से उनको बड़ी बी ने यहाँ बैठा रखा है ?]

रशीदा बेग़म – [आक़िल मियां से, कहती है] – बार-बार उचक लट्टू की तरह काहे खड़े हो जाते हैं, आप ? तसल्ली से तशरीफ़ आवरी रहिये, कुर्सी पर ! अभी करते हैं, आपसे बात !

[आक़िल मियां वापस बैठ जाते हैं, कुर्सी पर ! रशीदा बेग़म के सामने आयशा की बुराइयों का कच्चा चिट्टा खुल जाने पर, अब वह आयशा को सही रास्ते पर लाने की स्कीम सोचने लग जाती है !]

रशीदा बेग़म – [होंठों में ही, कहती है] – बहुत चालाक है, आयशा ! अब मैं ऐसा करती हूँ जिससे, मज़बूर होकर आयशा ख़ुद मेरे पास आकर गिड़गिड़ाये और कहें कि ’पारी इंचार्ज उसे नहीं रखा जाय !’ फिर बनाऊंगी, इस ग़ज़ल की बच्ची को पारी का इंचार्ज ! तब इसे मालुम हो जाएगा कि ‘स्कूल के क़ायदे, क्या होते हैं ? उलाहने देने जितना आसान है, उतना ही कायदों को निभाना मुश्किल है !’

[ग़ज़ल बी आयशा की बुराई करके, अब खुश हो गयी है ! अब आगे का मंज़र क्या होता है, ऐसी बातें सोचनी उसकी फ़ितरत में नहीं है ! उधर बड़ी बी अभी भी, सोचती जा रही है कि ‘अगला क़दम क्या उठाना है ? अब इन दोनों को सबक सिखाना ही होगा, अब ऐसा वक़्त आ गया है !’ फिर क्या ? उधर ग़ज़ल बी भी अपने दिल में सोचती जा रही है, कि ‘इस इमतियाज़ और आयशा नाम की चुहियों को, रशीदा बी नाम की बिल्ली के सामने किसी तरह लाना ही होगा !’ फिर क्या ? होने वाले इस वक़्ती इख्तिलाफ़ का फ़ायदा, कैसे उठाया जाय ?’ अब रशीदा बी के दिल में विचारों का मंथन अलग चल रहा है, वह सोचती जा रही है कि ‘किस तरह दोनों चुहियों को अपने काबू में लेना है ?’]

रशीदा बेग़म – [होंठों में ही, कहती है] – ये दोनों आपस में लड़ेगी, बाईसे इफ्तिराक से मेरे पास आयेगी और वे एक दूसरे की कमज़ोरियां बताती जायेगी ! इन दोनों की कमज़ोरियां मालुम करने के बाद, हम बताएँगे कि “क़ायदे किसे कहते हैं ? और, इन कायदों को कैसे लागू किया जा सकता है ?”

[पूरी प्लानिंग सोचकर अब, रशीदा बेग़म आक़िल मियां से कहती है !]

रशीदा बेग़म – आक़िल मियां ! ज़रा आयशा बी के खिलाफ़ दफ़्तरे हुक्म तैयार करें ! उसमें यह कलमबंद करें कि “उनके पारी इंचार्ज होने व टेंथ क्लास की क्लास टीचर होने की हैसियत से, हमने हुक्म दिया कि..

आक़िल मियां – क्या हुक्म दिया था, आपने ?

रशीदा बेग़म – हुक्म यह दिया था, “जो बच्चियां सेकेंडरी बोर्ड में बैठ रही है, उनकी डेट ऑफ़ बर्थ स्कॉलर रजिस्टर से मिलान करके आपको वेरीफाई करनी है ! मगर आपने ऐसा न करके, हमारे हुक्म की परवाह नहीं की !”

आक़िल मियां – अच्छा ज़नाब ! इसके आगे क्या लिखूं ?

रशीदा बेग़म – आगे लिखिए कि “अभी-तक आपने हुक्म तामिल करने की रिपोर्ट पेश नहीं की !

आक़िल मियां – ठीक है जी, अब इसके आगे क्या लिखूं ?

रशीदा बेग़म – अभी-तक, रिपोर्ट पेश नहीं की है !

आक़िल मियां – लिख दिया जी, अब इसके आगे कहिये क्या लिखना है ?

रशीदा बेग़म – लिखिए, इसलिए आज़ छुट्टी के पहले वे अपना ज़वाब लिखित में तैयार करके मेरे सामने पेश करें ! इतना लिखने के बाद आप यह भी लिखिए कि “उन्होंने हुक्म अदूली क्यों की ? क्यों नहीं आपके खिलाफ़, प्रशासनिक कार्यवाही प्रस्तावित की जाए ?” समझ गए, आक़िल मियां ?

आक़िल मियां – [मंद-मंद मुस्कराते हुए, कहते हैं] – हुज़ूर आपके मेहर से पूरा ड्राफ्ट तैयार कर लूंगा ! अब हुज़ूर, जाने की इज़ाज़त दीजिये..दफ़्तर का काफ़ी पेंडिंग पड़ा है !

रशीदा बेग़म – अभी कहाँ रुख्सत हो रहे हो, मियां ? अभी-तक आपने यह नहीं बताया कि “नूर मोहम्मद का क्या करना है ?” यह एक बार और सोच लेना कि “उसका शराबी की तरह लड़खड़ाकर चलना, और मेरे सामने कमर पर हाथ रखकर जंगली जानवरों की तरह लाल-लाल आँखों से घूरना..यह उसकी यह बदसलूकी नाक़ाबिले बर्दाश्त है ! और, उसका इस तरह...”

[कहती-कहती, रशीदा बेग़म हांप जाती है ! फिर लम्बी सांस लेती हुई, आगे कहती है !]

रशीदा बेग़म – [लम्बी-लम्बी सांस लेती हुई, आगे कहती है] – हा..ह..उसकी बदतमीज़ी..शराबी की तरह लाल सुर्ख आँखों से घूरना..[हाम्पती है] अब बर्दाश्त के बाहर है ! [तल्ख़ आवाज़ में] मैं एक मर्तबा उसे, दफ़्तर में देखना नहीं चाहती !

आक़िल मियां – उसको नाईट ड्यूटी दे देंगे, हुज़ूर ! आप बिलकुल फ़िक्र न करें, सब इन्तिज़ाम हो गया है ! परसों हाफ इयरली एग्ज़ाम में नाईट ड्यूटी के लिए दो आदमी चाहिए, एक तो चुग्गा खां है ही..और दूसरा यह नूरिया उनकी शागिर्दगी में साथ रह जाएगा ! बाद में..

रशीदा बेग़म – ख़ाक ड्यूटी देगा, यह कोदन ? अरे मियां यह कोदन इतना शातिर है, आप जानते नहीं ! कमबख्त पूरे मोहल्ले के लोगों को नींद से जगाकर, उनको नचवा देगा डिस्को डांस !

आक़िल मियां – नहीं हुज़ूर, ऐसा नहीं होगा ! [अन्दर ही अन्दर, मुस्कराते हुए आगे कहते हैं] चुग्गा खां एक क़ाबिल सरकारी मुलाज़िम है, वे अपने इस शागिर्द को सिखा देंगे कि ‘नाईट ड्यूटी कैसे की जाती है ? फिर क्या ? क़ाबिले एअतबार है, आप ख़ुद बेक़रार रहेगी यह मुज़्दा सुनने के लिए, कि “नूर मोहम्मद सुधर गया !”

रशीदा बेग़म – [रोब से, कहती है] – चुग्गा खां से कह देना कि, पूरी ज़िम्मेदारी के साथ यह काम करें ! साथ में उसे हिदायत दे देना कि, काम में चूक आने पर वे गाँव जा नहीं पायेंगे ! क्योंकि, इस स्थिति में उनकी छुट्टियां क़ाबिलयत एतराफ़ नहीं होगी !

आक़िल मियां – [थकावट महशूश करते हुए, कहते हैं] – ज़रा एक बार, अपने कमरे में जाकर आ जाऊं ? फिर, तसल्ली से आपको रिपोर्ट दे दूंगा !

[आक़िल मियां सीट छोड़कर, उठ जाते हैं और अपने कमरे की ओर क़दम बढ़ा देते हैं ! जाते हुए उनके पांवों की पदचाप सुनायी देती है ! मंच पर अँधेरा छा जाता ! थोड़ी देर बाद, मंच रोशन होता है आक़िल मियां के कमरे का मंज़र सामने आता है ! आक़िल मियां सीट पर बैठे-बैठे इन जैलदारों की ड्यूटी लगाने का रजिस्टर देख रहे हैं, और सोचते जा रहे हैं कि ‘अब आने वाले दिनों में, किस जैलदार की कब ड्यूटी लगायी जाय ? तभी याद आ जाते हैं, चुग्गा खां ! अब उनकी याद आते ही, वे होंठों में बड़ाबड़ाने लगते हैं !]

आक़िल मियां – [होंठों में ही, बड़बड़ाते हैं] – यह चुग्गा खां फिर चला गया, घर ! यहाँ स्कूल के मैदान में, कबूतरों को दाना क्या डालता है ? कमबख्त अब ख़ुद भी, कबूतर जैसा बन गया ! अब इसके घर को कुआ ही कहें तो कोई ग़लत नहीं !

[अलमारी खोलकर, मियां निकालते हैं इन जैलदारों का ड्यूटी चार्ट ! फिर उसे टेबल पर रखते हैं और फिर उनका बड़बड़ाना फिर चालू हो जाता है !

आक़िल मियां – बस...! इस नामाकूल को ख़ाली कुआ ही नज़र आता है, कमबख्त बार-बार चला जाता है अपने कुए में...घूटर गूं घूटर गूं करने ! अब बड़ी बी के हुक्म का क्या करूं ? इसके वालिद से थोड़ी सी जान-पहचान ठहरी, और इस नूरिये-जमालिये ने फंसा डाला मुझे !

[कमरे के बाहर जहां चाय तैयार की जाती है, वहां खड़ी शमशाद बेग़म उनका बड़बड़ाना सुन लेती है, और लपककर वह कह देती है !]

शमशाद बेग़म – [लपककर, कहती है] – ज़नाब, क्यों फ़िक्र करते हैं आप ? हुज़ूर आप तो बड़े दानिश हैं, कभी आपने कहा था कि “हज़रत मोहम्मद ने कई भूले-भटके लोगों को राह दिखलायी !

आक़िल मियां – [तमतमाते हुए, तल्ख़ आवाज़ में कहते हैं] – और कुछ कहना बाकी रह गया, ख़ाला ? अब आप दिल में ऐसी-वैसी कोई बात रखना मत, जो हो वह उगल दीजियेगा !

शमशाद बेग़म – [लबों पर मुस्कान बिखेरती हुई, कहती है] – क्यों नाराज़ होते हैं, ज़नाब ? मैं तो यह कह रही थी ज़नाब कि, ‘महात्मा बुद्ध ने अपने दुश्मनों के दिल में मुहब्बत का चिराग़ जलाया, और महात्मा गांधी ने इस ख़िलक़त में मुहब्बत क़ायम करने के लिए अपने सीने पर गोलियां खायी !’

आक़िल मियां – जानता हूँ, ख़ाला ! इन सबको आज़ भी, यह ख़िलक़त याद करता है ! मगर यहाँ तो मैं ख़ुद ही फंस गया पेश की गयी अपनी तकरीरों के आगे !
[संभलते हुए, कहते हैं] आप क्या कहना चाहती हैं, ख़ाला ? वही बात बताएं, आप ! बाकी, लग्व करने की कहाँ ज़रूरत ?

शमशाद बेग़म – बस...बस ! इंसान को इस लायक बनने के लिए, मशक्कत करनी पड़ती है ! पाक परवरदीगार के दिए गए दिमाग़ से जुगत लड़ानी पड़ती है !

आक़िल मियां – [खिन्न होकर, आगे कहते हैं] – समझ गया, ख़ाला ! आप आगे यही कहना चाहती हैं कि, ‘हमारा नाम आक़िल है, हम ठहरे दानिश...इसलिए लोगों को मश्वरे देकर उनकी...

शमशाद बेग़म – हमने यह कभी नहीं कहा कि, आप नसीब बी और सितारा मेडम को बिना मांगे मश्वरा दे दिया करते हैं ! कि, “ब्लड प्रेसर का अलील आपने ख़ुद ने पैदा किया है ! फ़िक्र करती-करती, इस मर्ज़ को हवा आपने दी है ! और अब गोलियां फांककर, अब पैसे बरबाद करती जा रही हैं !

आक़िल मियां – [अपनी बात को क़ायम रखते हुए, आगे कहते हैं] – मैंने क्या ग़लत कह दिया, ख़ाला ? यही कहा कि ‘आप अल्लाहताआला पर वसूक रखती हुई, अब आप सारी तकलीफें भूल जाइए ! दिमाग़ में कोई तकलीफ़देह बात रहेगी नहीं, तब काहे की फ़िक्र ? फिर ब्लडप्रेशर होगा कहाँ से ? ना ब्लडप्रेशर होगा, ना बढ़ेगा अलील !

शमशाद बेग़म – तब यही बात आप पर लागू होती है, आप क्यों इस नूरिये की फ़िक्र करते जा रहे हैं ? अल्लाह ने बनाए हैं, ये मिट्टी के पुतले ! जिसमें एक ख़ास चीज़ डाली है, वह है नूर ! जिसे यह ख़िलक़त पसंद करता है, बस आपको उस ख़ास चीज़ यानि नूर को अल्लाह के मेहर से ढूँढ़ना है !

[फिर क्या ? आक़िल मियां को, सारी बात समझ में आ जाती है ! कि, अब किस तरह इस नूरिये को काम में लेना है ? इस नूरिये में ऐसी क्या ख़ासियत है, जिसे स्कूल के हित में काम लिया जा सके ! तभी मियां को याद आ जाते हैं, चुग्गा मियां ! अब झटपट, वे शमशाद बेग़म से कह देते हैं !]

आक़िल मियां – [शमशाद से, कहते हैं] – जाओ ख़ाला, चुग्गा खां को उनके घर से बुला लाओ और उनसे कहना कि उनको ज़रूरी काम से स्कूल में बुलाया है !
शमशाद बेग़म – [मुंह बनाकर, कहती है] – अभी-अभी चुग्गा खां रुख्सत हुए ही हैं, और अब तक घर पहुंच गए होंगे ! जब मियां यहाँ थे, तब आप उनसे कह देते कि, “क्या काम है ?”

आक़िल मियां – ख़ाला आपका फ़र्ज़ है, हुक्म तामिल करना ! यह आप ख़ुद जानती हैं कि, मैं आपको बिना वज़ह आपको ज़हमत नहीं देता ! अब जाइए, जल्द ! जल्दी बुलाकर ले आइये, चुग्ग खां को !

शमशाद बेग़म – [होठों में ही, कहती है] – हाय अल्लाह, अभी-अभी चाय से फारिग़ हुई हूँ...और इधर ज़र्दे को मुंह में भी नहीं डाला और न खोला टिफन को ! बस आक़िल मियां ने चला दी हुक्म की दुनाली ! ख़ुदा रहम, अब इन पांवों को तकलीफ़ देनी होगी !

[आख़िर, शमशाद बेग़म चुग्गा खां को बुलाने निकल पड़ती है ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है ! थोड़ी देर बाद, मंच वापस रोशन होता है ! स्कूल का बरामदा नज़र आता है ! दीवार पर लगी घड़ी टन-टन की आवाज़ करती हुई, जुहर के दो बजे का वक़्त बताती है ! आक़िल मियां घुसल जाने के लिए उठते हैं ! तभी बरामदे में, चुग्गा खां शमशाद बेग़म के साथ आते दिखायी देते हैं ! उनको आते देखकर, आक़िल मियां कमरे में आकर वापस कुर्सी पर बैठ जाते हैं ! स्वर्गीय फिल्म स्टार मीना कुमारी की तरह, चुग्गा मियां के हाथ की सबसे छोटी अंगुली नदारद है ! इस कारण वे, अपनी इस हथेली को रुमाल से ढांपते हुए कमरे में दाख़िल होते हैं ! आते ही, वे आक़िल मियां को सलाम करते हैं, फिर कहते हैं !]

चुग्गा खां – सलाम ! माफ़ करना, हुज़ूर ! सुबह स्कूल में आया था, मगर आपसे बात न हो सकी ! उस वक़्त अचानक बीबी का फोन आ गया, मुझे जाना पड़ा हुज़ूर !
आक़िल मियां – कुछ नहीं, अब भी आप गुफ़्तगू कर सकते हैं बरखुदार ! देर आये, दुरस्त आये ! [नाक-भौं की कमानी को ऊपर चढ़ाते हुए, कहते हैं] ऐसा करो, मियां ! अपनी रात की ड्यूटी में, इस नूरिये बन्ने को साथ ले लो !

चुग्गा खां – [चहकते हुए, कहते हैं] – किब्ला, उसको तो हम शागिर्दगी में कब का ले चुके हैं...बस, अब तो ज़नाब नाईट ड्यूटी का इन्तिज़ार है ! आपने हुक्म दिया हुज़ूर, मगर आज़ की बात है...

आक़िल मियां – [बात काटते हुए, कहते हैं] - जाने दीजिये, बेचारा नादान है ! मियां ऐसा करो टेबल पर रखा है ड्यूटी रजिस्टर, उसमें आप-दोनों की नाईट-ड्यूटी के हुक्म इज़रा है बस आप दोनों तामिल करने के दस्तख़त कर देना ! अब आप याद कीजिये, नाईट ड्यूटी न मिलने पर आप क्या फ़रमाते रहे हैं, कि “ए बाबा पीर दुल्हे शाह ! बाबा तू भली कर ! यह नाईट ड्यूटी, मुझे ही मिले ! किसी दूसरे को काहे लगाते हैं, नाईट ड्यूटी पर ?”

[अब शमशाद बेग़म धुले हुए चाय के बरतन पटवार साइज़ अलमारी में रख रही है, और उधर चुग्गा खां खुश हो गए और सोचने लगे कि “ज़नाब को एक आदमी मिल गया है, अब वे सीनियर होने के नाते ज़रूर उस पर ज़रूर रोब जमायेंगे ! अब आक़िल मियां से घरेलू समस्या की बात करनी है, अब झट इनको कह देते हैं !” चुग्गा खां अपना मुख खोले उसके पहले आक़िल मियां उठ जाते हैं, और चल देते हैं अपने कमरे के पिछवाड़े की तरफ़.. जहाँ मेल स्टाफ पेशाब करने जाता है ! चुग्गा खां कुछ बोल नहीं पाते, मंच पर अँधेरा छा जाता है !]

मंज़र ४, “आ गए निक्कमें कहीं के, धंधे के वक़्त...”

राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित

नए किरदार – वसीम मियां – मनु भाई के नेक दुख्तर, जिनकी उम्र है १७-१८ साल की ! जनाब की बुरी आदत है, अपनी हम-उम्र ख़ूबसूरत लड़कियों को देखते ही आशिकी पर उतर आना !

[मंच रोशन होता है, पोर्च में बैठे दाऊद मियां ख़्वाबों की दुनिया में खोये नज़र आ रहे हैं ! आली जनाब कुर्सी पर बैठे-बैठे झपकी ले रहे हैं ! खवाब में वे अपनी पिछली ज़िन्दगी की उन घटनाओं को देख रहे हैं, जो उनको ज़िंदगी जीने का तरीका सिखा गयी ! उन वाकयों के बारे में वे सोचते हुए अब बड़बड़ाने लगे हैं !]

दाऊद मियां – [बड़बड़ाते हुए, कह रहे हैं] – मेट की नौकरी के बाद में, एजुकेशन महकमें में छोटे दफ़्तरेनिग़ार [एल.डी.सी.] की नौकरी हासिल कर ली ! फिर, धीरे-धीरे वक़्त बितता गया..और हमारे होते गये परमोशन ! धीरे-धीरे हम छोटे दफ़्तरेनिग़ार से, दफ़्तरे निज़ाम बन गए..यानि, ऑफिस असिस्टेंट ! इस नौकरी में पैसा बचाने का हमने नायब तरिका निकाल डाला ! भविष्य को सुरुक्षित करने के लिए, एक ज़मीन का ऐसा प्लोट ख़रीदा जिसके भाव भविष्य बढ़ने वाले थे ! फिर हर दो साल बाद नफ़ा कमाकर, उस प्लाट को बेच देते और दुगनी संख्या में सस्ते प्लाट खरीदते रहे..जिनके भाव, भविष्य में बढ़ने वाले थे ! इस तरह प्लोटों की बिक्री होती रही, और हम नफ़ा कमाते रहे ! फिर क्या ? कमाई गयी राशि से, हम ज़रूरतमंद लोगों को ब्याज पर पैसे देने लगे ! इस तरह, हमने ब्याज पर रुपये उधार देने का धंधा खोल डाला ! बस, अब तो चारों तरफ़ से पैसों की बरसात होने लगी ! मगर ऐश-मौज़ के लिए, हमने कभी भी पैसे बरबाद नहीं किये ! मगर जब भी इस शमशु को मैं देखता हूँ, कलेज़े पर सांप लोटने लगते हैं ! कैसे कहूं ? पैसा तो उसने भी कमाया है, मगर सभी ऐश-मौज़ पूरी करके ! कमबख्त कहता है, “मियां, ट्यूशन पढ़ाने जाओ तो स्कूटर पर सवार होकर जाओ ! इस तरह वक़्त बचेगा और आप एक की जगह चार ट्यूशन ज़्यादा पढ़ा पायेंगे !” मगर करें, क्या ? पैसे को चोंच से पड़ने की आदत जो रही हमारी, बेफिजूल खर्च हमसे होता नहीं ! बस हम तो ट्यूशन के लिए साइकल का ही इस्तेमाल करते हैं और करते रहेंगे, जो हम पर हंसते हैं हम इन बकवादी लोगों को कह देंगे कि “साइकल की सवारी से बदन की कसरत हो जाती है, अमां यार स्कूटर, मोटर साइकल या कार की सवारी तुम करते रहोगे तो जल्दी बीमार पड़ जाओगे ! जवानी यूं ही ढल जायेगी, जल्दी बूढ़े नज़र आओगे !”

[इधर दाऊद मियां ख़्वाब देखते जा रहे हैं, और उधर बरामदे की जाली पर छा रही पांच पत्ती की बेल के पास चुग्गा खां हाथ में बाल्टी लिए खड़े हो जाते हैं ! अब वे डब्बे से पानी भरकर, उस बेल पर पानी का छिड़काव करते जा रहे हैं ! जैसे ही ठंडे पानी के छींटें दाऊद मियां पर गिरते हैं, और मियां झट चमककर उठते हैं ! इस तरह ख़्वाबों की दुनिया छोड़कर मियां लौट आते हैं, वर्तमान में ! मगर बदबख्त ठहरे, दाऊद मियां ! उनका बोला गया अंतिम जुमला, चुग्गा खां के कानों को सुनायी दे जाता है ! सुनते ही चुग्गा खां हो जाते हैं, बेनियाम ! फिर क्या ? आली जनाब एक की जगह चार बातें सुना देते हैं, दाऊद मियां को !]

चुग्गा खां – [बाल्टी को ज़मीन पर रखकर, कहते हैं] – बूढ़े होंगे, हमारे दुश्मन ! हुज़ूर, हम बूढ़े नहीं हैं ! पूरे बगीचे में पानी देकर आ रहे हैं, घंटों का काम मिनटों में निपटा दिया हुज़ूर !

दाऊद मियां – [आखें मसलते हुए, कहते हैं] – माफ़ करना, बिरादर ! ज़रा आँख लग गयी, क्या करें ? आज़कल हम बैठे-ठाले, पुरानी यादों में अक्सर खो जाया करते हैं !

[चाय से भरा प्याला लेकर आती है, शमशाद बेग़म ! पास आकर उनको चाय का प्याला थमा देती है, फिर उनसे कहती है !]

शमशाद बेग़म – [चाय का प्याला थामकर, कहती है] – हुज़ूर, साबिर मियां तशरीफ़ लाये थे ! आपके पास आकर, उन्होंने आदाब भी कहा ! मगर, क्या करें हुज़ूर ? आप उस वक़्त, सुनहरे सपनों की दुनिया में सैर कर रहे थे ! फिर क्या ? वे जमाल मियां से मिलकर, चले गए !

दाऊद मियां – ऐसे ही आये, या कोई काम रहा होगा जमाल मियां से ? ऐसा क्या काम रहा होगा, आप बता सकती है ख़ाला ?

शमशाद बेग़म – [लबों पर मुस्कान बिखेरती हुई, कहती है] – आज़ के ज़माने में, बिना काम कौन आता है ? हुज़ूर, थोड़ा-बहुत इन कानों ने सुना था ! शायद, कुछ कुछ रुपये उधार लेन-देन की तकल्लुम कर रहे थे !

दाऊद मियां – [थोड़ा घबराते हुए, कहते हैं] – यह क्या कह दिया ख़ाला, आपने ? रुपये उधार लेने का मामला था, तो मुझे जगाया क्यों नहीं ? कहीं इस जमाले ने, हमारी इस मुर्गी को तो न फांस ली ?

शमशाद बेग़म – फांस क्या ली हुज़ूर, अब-तक तो उसका कबाब बना डाला होगा ?

दाऊद मियां – [थोड़ा आवेश में] - ऐसा हो नहीं सकता, जमाले की क्या औकात जो हमारे बाकीदार [कर्ज़दार] का खून चूष ले ? फिर, हम किस लिए बैठे हैं यहाँ..हम किस काम के ?

शमशाद बेग़म – आपसे क़र्ज़ कब लिया, साबिर मियां ने ? हुज़ूर, फिर कैसे बन गए आपके बाकीदार ? उठिए जनाब, अभी वे दूर नहीं गए हैं ! अभी जाकर पकड़ लीजिएगा उनको, स्कूल के फाटक के पास ! फिर तसल्ली से उनका खून चूशते रहना ! अभी वे फाटक के पास भी नहीं पहुंचे होंगे, जल्दी कीजिये हुज़ूर !

दाऊद मियां – अरे ख़ाला, दो मिनट क्या हमने आंखें मूँद ली ? आपने तो समझ लिया, ‘हम इस दुनिया-ज़हान से, रुख्सत हो गए हैं ?’

शमशाद बेग़म – रुख्सत हो, आपके दुश्मन ! अरे हुज़ूर, यह तो आप सोचिये कि ‘मैं आपकी नींद में, कैसे ख़लल डाल पाती ? आख़िर, यह आपकी तंदरुस्ती का सवाल ठहरा ! नहीं जगाया, तो आप नाराज़ होते जा रहे हैं ?’ अब हुज़ूर जब भी आप ख़्वाब देखेंगे तब मैं कह दूंगी बड़ी बी से, कि “हेड साहब काम के वक़्त नींद ले रहे हैं !” फिर क्या ? वह आकर उठा देगी, आपको !

दाऊद मियां – [धीरे से, कहते हैं] – क्या कहती हो, ख़ाला ? थोड़ा संभालकर बोला करो ! तुम नहीं जानती, वह उठा देगी क्या ? वह तो हमें, इस ख़िलक़त से रुख्सत कर देगी !

[फ़टाफ़ट चाय पीकर, दाऊद मियां ख़ाली कप मेज़ पर रख देते हैं ! ख़ाली चाय का प्याला उठाकर, शमशाद बेग़म जाफ़री की जाली से बाहर देखती है ! उसे साबिर मियां नज़र आ जाते हैं, जो मेन गेट की तरफ़ अपने क़दम बढ़ा रहे हैं ! उनको देखते ही, शमशाद बेग़म तपाक से दाऊद मियां से कहती है !]

शमशाद बेग़म – [चाय का प्याला नल के नीचे रखती हुई, कहती है] – हुज़ूर, साबिर मियां तशरीफ़ ले जा रहे हैं ! जनाब जाइए, जाइए ! फ़टाफ़ट पकड़ लीजिये, उन्हें ! न तो आप..

[दाऊद मियां ने आव देखा न ताव, झट लपक पड़े साबिर मियां को पकड़ने ! फिर क्या ? तेज़ क़दम चलते हुए, तुरंत उनको पीछे से दबोच लेते हैं ! अचानक कन्धों पर दबाव पाकर साबिर मियां घबरा जाते हैं, और बहदवासी में तुनककर कह देते हैं !]

साबिर मियां – [घबराते हुए, तुनककर कह देते हैं] – अरे कौन है, कमबख्त ?

[इतना कहकर दाऊद मियां को देखे बिना, धक्का देकर अपना कन्धा छुड़ा लेते हैं ! मगर, यह क्या ? धक्का खाकर बेचारे दाऊद मियां पास के हेड पम्प से पानी ला रही एक मोहतरमा के ऊपर गिर पड़ते हैं ! क्या करें ? इन मोहल्ले की औरतों का स्कूल के इस हेड पम्प पर आना बंद होता नहीं, कारण यह है अभी गर्मी के मौसम में पानी की किल्लत चल रही है ! मना करने के बाद भी, न जाने कितनी मोहतरमाएँ घड़ा ऊंचाये पानी भरने यहाँ चली आती है ? और साथ में स्कूल का मेन फाटक खुला छोड़ जाती है, उनको क्या मालुम इनकी इस लापरवाही के कारण कोलोनी के न जाने कितने अवारा पशु स्कूल के बगीचे में घास चरने चले आते हैं ? बदक़िस्मती से अभी एक मोहतरमा पानी भरकर लौट रही थी, और तभी उसकी टक्कर दाऊद मियां से हो जाती है ! फिर क्या ? टक्कर लग जाने ने सर पर रखा पीतल का घड़ा धड़ाम से आकर गिरता है दाऊद मियां के ऊपर ! बेचारे गए चुग्गा चुगने, मगर ग़लत जगह अपना पाँव फंसाकर औंधे मुंह गिर पड़ते हैं ज़मीन पर ! वह मोहतरमा गलीज़ गालियां बकती हुई, ज़मीन पर गिरा घड़ा उठाती है और वापस अपने क़दम हेड पम्प की तरफ़ बढ़ा देती है ! अब बेचारे दाऊद मियां किसी तरह उठते हैं, और सामने साबिर मियां को ठहाका लगाकर हंसते पाते हैं ! अपने धंधे के कस्टमर साबिर मियां को, अपशब्द कहने की हिम्मत उनमें अब है कहाँ ? बेचारे दाऊद मियां खिसियानी हंसी हंसते हुए, साबिर मियां से कहते हैं !]

दाऊद मियां – [खिसियानी हंसी हंसते हुए, कहते हैं] – ही..s..ही...ही ! [गीले कपड़ों को निहारते हुए] कुछ नहीं, गर्मी है अभी सूख जायेंगे ! [कपड़े झाड़ते हैं] अब मियां, अपनी सुनाओ ! क्या लोगे, चाय-वाय या कुछ ?

साबिर मियां – [अपने होंठों में ही, कहते हैं] – क्यों मियां, चच्चा करीम के मक्खीचूश भतीजे ! क्या पिलाओगे, चाय-वाय ? अभी मुफ़्त का ज़र्दा चखाकर, नाक की बारह बजा दोगे ? आप तो अभी यही कहोगे “स्कूल में जनाब ने चाय तो पी ली होगी, अब क्या बार-बार चाय पीना ? अरे यार, बार-बार चाय लेने से एसिडिटी की शिकायत बढ़ जाया करती है ! चलिए, मनु भाई की दुकान पर चलकर ज़र्दा चखते हैं !”

[मगर यह क्या ? इधर साबिर मियां ने अपने दिल में दाउद मियां के बारे में जो सोचा, वही बात सच्च हो गयी ! दाऊद मियां ने, वही जुमला कैसे बोल डाला ?]
दाऊद मियां – क्या मुंह बनाकर, यहाँ खड़े हो गए ? चलिए मनु भाई की दुकान पर, अभी ज़र्दा चखते हैं ! और बदन में आती है, स्फूर्ति !

[अब दोनों मेन गेट पार करके पहुँच जाते हैं, मनु भाई की दुकान पर ! वहां पत्थर की बेंच पर दाऊद मियां बैठ जाते हैं, मगर साबिर मियां खड़े ही रहते हैं ! तब दाऊद मियां, उनसे कहते हैं !]

दाऊद मियां – क्यों मुंह लटकाये खड़े हो, मियां ? रुपये-पैसों का इन्तिज़ाम जमाल मियां नहीं कर पाए, यही बात है ना ? कोई बात नहीं, हम कर देंगे बंदोबस्त ! अब अपने लबों पर मुस्कान लाओ, चलिए बिरादर, पहले ज़र्दा चख लेते हैं ! फिर क्या ? झट उठकर, चले आते हैं दुकान के काउंटर के पास, और जनाब कहते हैं मनु भाई से !]
दाऊद मियां – [मनु भाई की तरफ़ देखते हुए, कहते हैं] – आदाब, मनु भाई !

[इस वक़्त आदाब बजाने का क्या अर्थ ? मनु भाई अच्छी तरह से जानते हैं, बस झट उनकी मांग को समझते हुए उनको थमा देते हैं देशी ज़र्दे और गीले चूने के डब्बे ! अब दाऊद मियां इन डब्बों से ज़र्दा और चूना निकालकर अपनी हथेली पर रखते हैं ! फिर दूसरे हाथ के अंगूठे से ज़र्दा और चूने के मिश्रण को अच्छी तरह मसलते हैं, फिर मनु भाई से कहते हैं !]

दाऊद मियां – [मनु भाई से, कहते हैं] – जनाब, खैरियत है ? ज़रा आप भी चखिए यह सुर्ती !

[इतना कहकर, दूसरे हाथ से इस मिश्रण पर लगाते हैं दो-चार बार ज़ोर की थप्पी ! और कहते हैं, जोर से “अल्लाह हो अकबर !” फिर क्या ? खंक उड़ती है, जो उड़कर मनु भाई, साबिर मियां और दुकान पर सौदा ले रहे ग्राहकों के नासा छिद्रों में चली जाती है ! फिर क्या ? नासा छिद्र खुल जाते हैं, और छींकों की झड़ी लग जाती है ! बेचारे ये अनजान मोमीन, जो आये थे खुर्दाफरोश यानि घी, तेल, आटा वगैरा किराणा का सामान ख़रीदने, मगर इस आसमानी आफ़त ने उनका हाल बुरा बना डाला ! बेचारे छींकते-छींकते परेशान हो जाते हैं, अब दोनों डब्बे मनु भाई की दुकान के काउंटर पर रखकर, अपनी हथेली मनु भाई के सामने लाते हैं ! लिहाज़ के मारे मनु भाई थोड़ी सी सुर्ती उठाकर, अपने होंठों के नीचे दबा लेते हैं ! अब मनु भाई को सुर्ती थमाने के बाद, शेष बची हुई सुर्ती में थोड़ी साबिर मियां को उठाने देते हैं और बची-खुची सुर्ती अपने होंठों के नीचे दबाकर मियां आकर बैठ जाते हैं वापस बेंच पर ! निक्कमें इंसान की तरह दाऊद मियां का वापस बेंच पर बैठ जाना, मनु भाई को अख़रता है ! उधर बेचारे मोमिनों की बुरी हालत देखकर, मनु भाई दाऊद मियां के बारे में अपने होंठों में ही बड़बड़ाते हैं !]

मनु भाई – [होंठों में ही, बड़बड़ाते हैं] – मुफ़्त का चन्दन, लगा मेरे भैय्या ! हमसे ही ज़र्दा-चूना लेकर, हमें ही परेशान करने लगे मियां छींकों की झड़ी लगवाकर ? ऊपर से पूछने लगे कि ‘मियां, खैरियत है ?’ अब काहे की, खैरियत ? ख़ाली, हमारी मज़बूरी का फ़ायदा उठा रहे हैं !

[उधर गली में एक फेरी वाला आ गया है ठेला लेकर, जो बच्चों को बर्फ के गोले बनाकर बेच रहा है ! वह बच्चों को बुलाने के लिए, बार-बार घंटी बजाता जा रहा है ! उसकी घंटी की आवाज़ सुनकर, दसवी क्लास की लड़कियां स्कूल के बाहर चली आती है बर्फ का गोला खाने ! वहां खड़ी-खड़ी वे, मनु भाई के लख्ते ज़िगर वसीम मियां का इन्तिज़ार करने लगी ! इधर इन छोरियों को देखते ही वसीम मियां, एक बार अपने अब्बू का चेहरा देखते हैं ! उनको विचारों में तल्लीन पाकर, हाथ की सफ़ाई दिखलाने की कारश्तानी पर उतर आते हैं, वसीम मियां ! दबे पाँव जाकर, गल्ले से बीस रुपये पार कर लेते हैं ! थोड़ी देर बाद, वे उस फेरी वाले के पास खड़े नज़र आते हैं ! अब वे हंसी के ठहाके लगाते हुए, इन बच्चियों को शरबत में डूबे बर्फ के गोले खिलाते जा रहे हैं ! मगर यहाँ मनु भाई की तंद्रा कहाँ टूटी है ? वे अब भी, सोचते जा रहे हैं !]

मनु भाई – [होंठों में, बड़बड़ाते हैं] – हाय अल्लाह ! रसूखात तोड़ नहीं सकता इनसे, वक़्त-बेवक्त मुझे उधार देने वाला इनके सिवाय है कौन ? इस बस्ती में किराणे की दुकान, क्या खोली ? अब तो यह दुकान, जी का जंजाल बन गयी है ! बस, पूँजी डालते ही जाओ, डालते ही जाओ..मगर, एक पैसे का नफ़ा नहीं ! मोहल्ले वाले माल ले जाते हैं, उधार !

[बीस रुपये ख़त्म होने के बाद वसीम मियां लौट आते हैं, दुकान पर ! और चुपचाप अपने दबे पाँव जाते हैं, चाकलेट के मर्तबान के पास ! ढक्कन खोलकर १०-१५ चाकलेट बाहर निकालकर उन बच्चियों के पास चाकलेट बांटने चले आते हैं ! मगर, मनु भाई अभी भी विचारों में खोये सोचते जा रहे हैं !]

मनु भाई – [होंठों में ही, बड़बड़ाते हैं] – मगर अल्लाह के फ़ज़लो करम से हमें तो नकद देकर ही माल उठाना पड़ता है ! इधर हमारा नालायक बेटा वसीम, मर्दूद अक्सर तो दुकान पर बैठता ही नहीं ! अगर बैठता है तो, मोहल्ले की जवान छोरियों को कभी आईस-क्रीम तो कभी बर्फ के गोले खिलाकर कर देता है गल्ला कम ! अरे, करें क्या ? आडे वक़्त ये दाऊद मियां रुपये तो दे देते हैं उधार, मगर देते हैं बाज़ार रेट से ज्यादा ब्याज रेट लगाकर ! बस यही कारण है, मुफ़्त में इनको सुर्ती खिलाकर इनको खुश रखना पड़ता है !

दाऊद मियां – [मनु भाई को, विचारों में तल्लीन पाकर] – किस फ़िक्र में बैठ गए, मनु भाई ? एक बार और ज़र्दे की फाकी लगाकर आपके नासा छिद्रों को खोल दें क्या ?

साबिर मियां – [बीच में, बोलते हुए] – एक बार खुल गए, नासा छिद्र ! अब बार-बार क्यों खोल रहे हैं, उस्ताद ? अब आप हमारी दास्तान कब सुनेंगे, आख़िर हम क्यों आये थे जमाल मियां के पास ?

दाऊद मियां – कहिये, जनाब !

दाऊद मियां – कुछ महीने पहले गए थे हम कलेक्टर ऑफिस ! उस वक़्त ये जमाल मियां और पोलिटेकनिकल कोलेज़ के जूनियर अकाउंटेंट जनाब अयूब खां कण्ट्रोल रूम में डेपुटेशन पर लगे थे ! उनके कमरे के बाहर उनकी ख़िदमत में नवाब शरीफ़ एक स्टूल पर तशरीफ़ आवरी थे !

दाऊद मियां – क्या काम, नवाब शरीफ़ से ? हम तो पाकिस्तान के वज़ीर-ए-आज़म से भी कोई ताल्लुकात नहीं रखते !

साबिर मियां – सुनिए तो सही, वह बेचारा चपरासी नवाब शरीफ़ इन दोनों की ख़िदमत करता-करता परेशान हो गया ! ये दोनों ठहरे, चटोखरे ! कभी इस बेचारे को केन्टीन भेजकर मंगवाते लस्सी, तो कभी मंगवाते मिठाई-नमकीन ! बेचारा एक मांग पूरी नहीं कर पाता, तब-तक तो दूसरी मांग खड़ी हो जाती ! बेचारा इनकी मांग पूरी करता-करता अपने पांवों को दर्द का अलील दे बैठा !

दाऊद मियां – पांवों को क्यों तकलीफ़ दी, इस बेवकूफ नवाब शरीफ़ ने ? साला फोड़ देता सर, इस जमाले का ! कमबख्त मौज़ मनाने बैठ गया डेपुटेशन पर, और यहाँ मैं काम के बोझ से दब गया ! अब क्या कहूं, मियां ? उस दौरान मुझे, इसके हिस्से का सारा काम करना पड़ा !

साबिर मियां – आप तो अब उस नवाब की हालत देखिये, छोड़िये जमाल मियां को ! अल्लाह की ताज़ीर देखिये, हुज़ूर ! एक नवाब शरीफ़ तो है पाकिस्तान मुल्क का वज़ीर-ए-आज़म, और दूसरा यह नवाब शरीफ़ दफ़्तर में जूठे कप-प्लेट उठाता है ! वाह अल्लाह, तेरे दर पे ऐसी नाइंसाफ़ी ?

[गुफ़्तगू करते-करते साबिर मियां के पांवों में दर्द होने लगता है, इतनी देर उनमें खड़े रहने की ताक़त नहीं ! इस कारण वे भी आराम से, बेंच पर बैठ जाते हैं ! दाऊद मियां तो निक्कमों की तरह पहले से बैठे हैं इस बेंच पर, और अब एक और निक्कमें इंसान को बैठते देखकर मनु भाई ने सोचना बंद कर देते हैं ! अब वे इन निक्कमों को रुखी नज़रों से देखते हुए, बड़बड़ाते हैं !]

मनु भाई – [धीरे-धीरे, बड़बड़ाते हैं] – “आ गए निक्कमें कहीं के, धंधे के वक़्त आकर बैठ गए यहाँ, अब उठने का नाम नहीं !” ख़ुदा रहम, कहीं इन निक्कमों को देखकर निक्कमें-आज़म फन्ने खां यहाँ तशरीफ़ न ला बैठे !

दाऊद मियां – [मनु भाई की तरफ़ न देखकर, साबिर मियां से कहते हैं] – कहिये साबिर मियां, फिर क्या हुआ ?

साबिर मियां – होना क्या ? जो हमेशा होता आया है ! घंटी बजती है, और हमारे नवाब साहब हो जाते हैं तैयार हुक्म की तामिल करने ! मगर मनसूबा बना लेते हैं कि अगर इन लोगों ने मिठाई मंगवाई तो दस्तरख्वान पर मिठाई रखेंगे बाद में, पहले वे अपना हिस्सा ज़रूर अलग रख लेंगे ! ख़ुदा जाने, फिर मिठाई बचे या नहीं ?

[साबिर मियां अपनी दास्तान सुनाते जा रहे हैं, एक फिल्म की तरह सारा वाकया दाऊद मियां और मनु भाई की आँखों के आगे छाने लगता है ! धीरे-धीरे, मंच पर अँधेरा छा जाता है !]

मंज़र ५
तन्हाई है..तन्हाई है !
राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित

[मंच रोशन होता है, आक़िल मियां के कमरे का मंज़र सामने आता है ! आक़िल मियां वापस लौट आये हैं, शमशाद बेग़म पानी का लोटा लाकर उनके हाथ धुला चुकी है ! अब वे अपनी सीट पर बैठकर, अंगड़ाई लेते हैं ! शमशाद बेग़म कमरे के दरवाज़े के पास रखे स्टूल पर बैठ जाती है, फिर वह चुग्गा खां को कहने से नहीं चूकती !]
शमशाद बेग़म – [चुग्गा खां से, कहती है] – मियां ! ख़ुदा के मेहर से आपको आज़ मौक़ा मिला है ! बस, आप इसे इस्तेमाल कर लीजिएगा ! मेरी यह नाकिस राय है, यह आपका इमतिहान है ! हफ्ते-भर आप हाफ-इयरली एग्जामिनेशन के दौरान, इस नूरिये बन्ने को अपने साथ रखकर इसे माकूल तालीम दें दे !

चुग्गा खां – शुक्रिया ख़ालाजान, आपकी नाकिस राय के लिए ! [आक़िल मियां से, कहते हैं] हुज़ूर, कुछ आपसे अर्ज़ करना चाहता था कि....

[इतना कहकर, चुग्गा खां चुप हो जाते हैं ! फिर बरामदे की तरफ़ अपनी निग़ाहें डालते हैं ! शमशाद बेग़म को लगता है, शायद मियां अकेले में आक़िल मियां से बात करना चाहते होंगे ! यह सोचकर वह स्टूल से उठ जाती है, और वहां से चल देती है ! अब वहां और कोई उनकी बात सुनने वाला नहीं, यह जानकर चुग्गा मियां बस बोलना ही चाहते हैं तभी आक़िल मियां अपनी सीट से उठ जाते हैं ! और ज़नाब, चुग्गा खां से कह देते हैं !]

आक़िल मियां – चुग्गा मियां, वल्लाह आप बोलते-बोलते रुक जाया करते हैं ! मियां, कहीं आपको बेग़म का खौफ़ है या आपका रास्ता बिल्ली काट गयी ? हम दोनों के सिवाय और कोई यहाँ मौज़ूद नहीं है, आप तसल्ली से अपनी बात रख सकते हैं !

चुग्गा खां – [धीमी आवाज़ में, कहते हैं] – कल ही गाँव से ख़ालाजान आयी है, और कल उनको वापस गाँव के लिए रुख्सत करना है ज़नाब ! आप जानते ही हैं, महीने के आख़िरी दिन यानि कम्युनिष्ट दिन चल रहे हैं और हमारी जेबें ख़ाली है ! बस ख़ुदा के वास्ते [थोड़ा रुककर]...आप फ़िक्र न करें, एक तारीख़ को तनख्वाह से काट लेना !

आक़िल मियां – [होंठों में ही, कहते हैं] - अब समझा ! ज़नाब एक ही बुलावे से, कैसे झटपट आ गए स्कूल में ? ये ज़नाबे आली तो ऐसे हैं, जो घर बैठे कहला देते हैं कि डाक देने गए हैं या गाँव गए हैं..न मालुम ज़नाब क्या-क्या बहाने गढ़ लेते हैं ?

[आक़िल मियां को चुप पाकर, चुग्गा खां के चेहरे पर फ़िक्र की रेखाएं उभर जाती है ! मगर, आक़िल मियां को उनकी फ़िक्र से क्या मतलब ? वे तो अभी भी, होंठों में ही बड़बड़ाते जा रहे हैं !]

आक़िल मियां – [होंठों में ही, बड़बड़ाते जा रहे हैं] – क्या करूं ? कभी-कभी इनकी बीबी घूंगट निकाले बाहर आती है, फिर टीच-टीच करती हुई कहती है कि “फ़कीरे की अब्बा, घर पर नहीं हैं !” इतना कहकर वह घर का दरवाज़ा बंद करके चली जाती है ! वाह रे, वाह ! इनकी अक्ल तारीफ़े क़ाबिल है ! मगर आज़ यह ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया है ! अब इनकी सारी होशियारी, धरी रह जायेगी !

[अब आक़िल मियां की अक्ल काम आने लगी, उन्होंने सोच ली सारी प्लानिंग..कि, पहाड़ के नीचे आये ऊंट को काम में कैसे लगाया जाय ? फिर थोड़ा ग़मगीन होकर, चुग्गा खां से कहते हैं !]

आक़िल मियां – [थोड़ा फिक्रमंद बनाकर, कहते हैं] – मियां आपका काम कर दें, तो ख़ुदा ज़रूर मेहर बरसायेगा हम पर ! मगर, करें क्या ...?

चुग्गा खां – क्या हो गया, ज़नाब ? हमारा काम तो हो जाएगा ना..?

आक़िल मियां – आपका काम क्यों नहीं करते, मिया ? मगर ज़माना ज़ालिम है, आज़ तड़के आते ही दाऊद मियां ने उधार मांग लिए और ले गए जमा राशि..अब कुछ नहीं बचा, आपको देने के लिए ! मियां, अब क्या करें ?

चुग्गा खां – क्या हो गया, ज़नाब ? [हताश होकर, कहते हैं] क्या भैंस पानी में बैठ गयी, हाय अल्लाह अब पैसों का काम कैसे सलटेगा ?

आक़िल मियां – काम नहीं हो सकता, यह मैंने कब कहा ? हो सकता है, अल्लाहताआला ने चाहा तो रुपयों का बंदोबस्त हो सकता है ! [खिड़की के बाहर झांकते हुए] यह क्या ? यहाँ तो इतना कचरा पड़ा है, हाय अल्लाह यह बदबू यहाँ से आ रही थी ?

चुग्गा खां – क्या कह रहे हैं, आप ? क्या, वास्तव में रुपयों का इंतज़ाम हो जाएगा ?

आक़िल मियां - [मुंह अन्दर लाकर, कहते हैं] – देख नहीं रहे हो, मियां ? कितना कचरा पड़ा है, बाहर ? आप लोग कूड़ादान को, कहीं इसी स्थान पर ख़ाली तो नहीं कर देते...आज़कल ? अब लाओ फावड़ा, और बाहर जाकर यह सारा कूड़ा उठाकर बाहर फेंक आवो ! कुछ कीजिये ना, इन बच्चियों की दुआ लगेगी ! जानते हैं यहीं पास में, बगीचे में लगे पेड़ों के तले ये बच्चियां बैठकर खाना खाती है ! ख़ुदा रहम, ये बेचारी कैसे इस बदबू को बर्दाश्त कर पाती है ?

चुग्गा खां – आप फ़िक्र न करें, ज़नाब ! शाम को नाईट ड्यूटी पर आऊंगा तब हुज़ूर, ज़रूर मैं इस कूड़े को बीनकर बाहर फेंक आऊँगा ! अभी तो आप, पैसों का इंतज़ाम कीजिएगा ना !

आक़िल मियां – किसने देखी है शाम, जब यहाँ एक पल का भरोसा नहीं...और आप शाम की बात करते हैं ? देख नहीं रहे हो, मियां ? शकील मियां को कोटन मिल गए केवल एक ही घंटा ही नहीं बीता, और ख़बर आ गयी कि दुर्घटना से बेचारे शकील मियां मारे गए ! अब आप शाम की बात करना छोड़िये..

चुग्गा खां – [भौंचके होकर, कहते हैं] – क्यों हुज़ूर ?

आक़िल मियां - न तो कहीं से यह ख़बर आ जायेगी कि बच्चियां छुट्टियां लेकर चले गयी, और फ़ीस के रुपये जमा नहीं हुए ! बाद में तो मियां, कल उन बच्चियों के आने के बाद ही रुपयों का बंदोबस्त होगा !

[फिर क्या ? मियां फावड़ा उठाते हैं और आ जाते हैं वहां, जहां आक़िल मियां के कमरे के पीछे ये जैलदार रोज़ कचरा डाला करते हैं ! थोड़ी देर तक बराबर काम करने के बाद कचरा हट जाता है, चुग्गा खां अपने दोनों हाथ ऊपर ले जाते हुए अंगड़ाई लेते हैं ! तभी, आक़िल मियां वहां तशरीफ़ लाते हैं ! और उनसे कहते हैं !]
आक़िल मियां – वाह मियां, वाह ! क्या सफ़ाई की है, ज़नाब ने ! सदका उतार लूं, कहीं बुरी नज़र न लग जाए आपको ! बस, एक कसर बाकी रह गयी है !
[चुग्ग खां घबरा जाते हैं, न मालुम अब और कौनसा काम उनके ऊपर आ पड़ा ? बेचारे घबराये हुए, कहते हैं!]

चुग्गा खां – [घबाराकर, कहते हैं] – ऐसी क्या कमी रह गयी, हुज़ूर ? रुपये तो मिलेंगे, ना ?

आक़िल मियां – अब ऐसा करो, मियां ! इस साफ़ किये गए स्थान पर, केली के पौधों का रोपण कर दीजियेगा ! फिर इन पौधों पर, कोई माई का लाल कचरा डालने की हिम्मत न करेगा ! इस तरह इस स्थान की ख़ूबसूरटी देखकर स्कूल की बच्चियां कहेगी “वाह, चुग्गा मियां की केलियाँ क्या ख़ूबसूरत बहारे बिखेर रही है ?”

[जिस स्थान को साफ़ किया गया, वह पहले यहाँ बगीचे में बदबू फैला रहा था और स्कूल की बच्चियां इसके नज़दीक बैठकर लंच में खाना नहीं खाती थी ! अब यह स्थान यहाँ खड़ा रहने के लायक बन गया है ! यहाँ से कुछ दूर खड़े मेमूना भाई, पाइप से पानी दे रहे हैं ! वे आक़िल मियां की कही बात, सुन लेते हैं ! ज़नाब से बिना बोले रहा नहीं जाता, और वे बरबस बोल उठते हैं !]

मेमूना भाई – अरे ज़नाब, वह क्या मंज़र होगा ? जब इन कलियों के पीले-लाल फूल ख़िल उठेंगे और इन पर तितलियाँ और भंवरे मंडराते रहेंगे ! कोयले कूहू कूहू करती, कुहुक रही होगी ! ऐसा मंज़र तो हुज़ूर, जन्नत में भी दिखायी न देता होगा ! इस मंज़र को देखकर बच्चियां कहेगी कि फूल कह देने से अफ़्सुर्दा कोई होता है,
सब अदाएँ तिरी अच्छी हैं नज़ाकत के सिवा

आक़िल मियां – [दाद देते हुए, कहते हैं] – वाह, मेमूना भाई वाह ! क्या पेश किया है ? ‘सब अदाएं तिरी अच्छी है नज़ाकत के सिवा” अब तो मेमूना भाई एक नज़्म हो जाय, इनके साहसी काम पर ! जो इस बगीचे में इन फूलों पर मंडराते हुई तितलियाँ, कोयले और ये भ्रमर गाकर हमें सुनायेंगे, कि ‘हमारे बहादुर चुग्गा खां ने, क्या किया ?’

मेमूना भाई – [गाते हुए] – खिड़की के पास किस चमान ने कूड़ा करकट डाल दिया, हाय अल्लाह क्या देखूं मैं ? उज़ले धवल कपड़े पहने बाबूजी ने, सारा कूड़ा करकट हटा दिया ! अब क्या देखूं, हाय अल्लाह..

चुग्गा खां – [गुस्से से, कहते हैं] – अरे मरियल, क्या बोल रहा है ? अभी ठहर..

[फिर क्या ? चुग्गा खां आंखें तरेरते हुए मेमूना भाई को इस तरह देखते हैं, मानों बकरीद के दिन बकरे की ठौर इस मेमूना भाई को ही क़ुरबानी का बकरा उनको बनाना हो ? बेचारे चुग्गा खां वैसे ही खफ़ा हैं, कई लोगों से रुपये उधार मांगकर देख चुके हैं, मगर ऐसा कोई माई का लाल मिल नहीं जो उनको बिना ब्याज रुपये उधार दे सके ? यहाँ तो चुग्गा मियां अपने आपको इतना होशियार समझते आये हैं, कि स्कूल का कोई बन्दा क्या जानता होगा...कि, ज़नाब ने कई रुपये-पैसे बचत करके बैंक में जमा कर रखे हैं ! अल्लाह मियां के फ़ज़लो-करम से चुग्गा मियां ने कभी बैंक से अपने बचत किये रुपये-पैसे बाहर निकालना सीखा ही नहीं ! यह नहीं कि उनको विड्रोल करना आता नहीं हो ? वे तो बड़ी मेडम के हुक्म से, अक्सर स्कूल के बॉयज फण्ड के रुपये बैंक से निकलाकर लाया करते हैं ! इसलिए बात यह है कि, जहां आक़िल मियां जैसे रहम-दिल जैसे इंसानों से बिना ब्याज उधार रुपये मिल सकते हैं, तब कौन ऐसा उल्लू का पट्ठा होगा जो बैंक से मिलते ब्याज को छोड़ना चाहेगा ? जबकि इस्लाम में ब्याज लेना और देना, ग़ैरमज़हबी है ! जहां स्वार्थ सामने आ जाता है, वहां ऐसा कौनसा इंसान है जो मज़हबी हुक्म को लोहे की लकीर की तरह मानता रहेगा ? सभी अपने-अपने मतलब में होशियार, यही ख़िलक़त का कायदा रहा है ! इसलिए उन्होंने सोच रखा है कि, “बैंक से रुपये बाहर आते ही, जुड़ रहा ब्याज कम हो जाता है !” यही कारण है, मियां इधर-उधर कहीं से रुपये बिना ब्याज पर लेकर अपना काम चला लिया करते हैं ! मगर, अब यहाँ उनकी क़िस्मत उनका साथ दे नहीं रही है ? और इधर यह ख़ालाजान ठहरी जिद्दी फ़ितरत की, कई दफ़े समझा दिया चुग्गा खां ने कि “प्लीज़ ख़ाला, दो-तीन दिन और रुक जाओ, एक तारीख के बाद चली जाना ! ऐसा बार-बार मौक़ा मिलता कहाँ है साथ रहने का ?” मगर एक बात उसने मानी नहीं, और ऊपर से इनकी खातूनेखान यानि इनकी बीबी ने यह बात कहकर गुड़-गोबर कर डाला ! बीबी कहने लगी कि, “हाय अल्लाह, कैसी बात कह रहे हो मियां ? जानते नहीं, ख़ानदानी औरतें ज़्यादा दिन ससुराल से बाहर नहीं रहती है !” फिर तो मियां के पास, एक ही चारा रहा...कहीं से, रुपये-पैसों का इंतज़ाम करना ! यहाँ तो पहले से ही आक़िल मियां के साथ ऐसा रसूखात चल रहा है, कि ‘महीने के लास्ट दिनों में आक़िल मियां से रुपये उधार लेना, और अगले माह तनख्वाह के रोज़ उधार लिए रुपयों को चूका देना !’ अब इस वक़्त यही मियां की मज़बूरी है, किसी तरह आक़िल मियां से उधार के रुपये लेना ! इस कारण अब वे झट जुट जाते हैं, काम पर ! सरकारी दफ़्तरो का काम, ख़ुदा के भरोसे चलता है ! कौन ऐसा शख्स होगा, जो बिना स्वार्थ मन लगाकर काम करता हो ? फिर क्या ? वे बगीचे के उस हिस्से की तरफ़ क़दम बढ़ा देते हैं, जिधर केली के पौधों के झुरमुट लगे हैं ! वहां पहुँचकर उस झुरमुट से, केली के रोप निकाल लाते हैं ! फिर उसी ख़ाली स्थान पर, कतार में केली के पौधों का रोपण कर देते हैं ! फिर पानी से भरी बाल्टी लाकर, उन उन नए रोप को पानी दे डालते हैं ! पूरा काम निपट जाने के बाद वे तनकर सीधे खड़े होते हैं, फिर चारों-तरफ़ अपनी निग़ाहें डालते हैं ! उनको कहीं भी आक़िल मियां और मेमूना भाई के दीदार होते नहीं ! वे बेचारे इस काम में इतना डूब गए कि, उन्होंने ध्यान भी नहीं रखा आक़िल मियां और मेमूना भाई कब छू-मंतर हो गए ? अभी थोड़ी देर पहले मेमूना भाई उनकी शान में तारीफ़ के कसीदे निकाल रहे थे, और आक़िल मियां सुन रहे थे ! हाय ख़ुदा..आसमान की हवा उड़ाकर ले गयी, या धरती के फटने से ज़मीन के अन्दर चले गए आकिल मियां ? फिर क्या ? मियां झट बगीचे के बिलकुल बीच में आ जाते हैं ! अब वहां खड़े रहकर, वे बगीचे का नज़ारा देखते हैं ! अब उनको साफ़-साफ़ दिखायी देता है, मेमूना भाई तो बगीचे के किनारे पर लगी केली के पौधों को पाइप से पाने दे रहे हैं ! और आक़िल मियां, अपने कमरे की तरफ़ अपने क़दम बढ़ा चुके हैं ! काम करते-करते चुगा खां के बदन से पसीना बाहर निकलने लगा ! इस वक्त ग्रीष्म ऋतु चलने के कारण चुग्गा खां की कमर पर घमोरियां हो गयी है, अब इस पसीने से उनके बदन की घमोरियां जलने लगी ! इसके साथ-साथ, कमर पर खुजली भी बढ़ने लगी ! इस पसीने से उनका पूरा कमीज़ भींग चुका है, उसे सूखाने के लिए मियां उस कमीज़ को बदन से उतार लेते हैं ! और पास में लगे नीम के पेड़ की डाल पर, उसे सूखाने के लिए उसे टांक देते हैं ! पानी देता हुआ मेमूना भाई उस नीम के पेड़ के पास चले आते हैं ! इधर आता है, ठंडी हवा का झोंका ! यह झोंका उनके खुले बदन को छूता है ! और, उनकी कमर पर छायी घमोरियों की खुजली को बढ़ा देता है ! बेचारे चुग्गा खां घमोरियों को खुजाते-खुजाते जलन को और बढ़ा देते हैं ! अब यह खुजली, नाक़ाबिले बर्दाश्त हो जाती है ! बस, फिर क्या ? वे तेज़ी से खुजाने लगते हैं ! तभी ख़ुदा जाने कहाँ से, एक खुजली वाला कुत्ता बगीचे में दाख़िल हो जाता है ! और आते ही, वह ठंडी-ठंडी घास के ऊपर लोटने लगता है ! बगीचे में पानी दे रहे मेमूना भाई उस कुत्ते को घृणा से देखते हैं, जो बगीचे की घास से अपनी ख़ाल रगड़कर खुजली मिटा रहा है ! अब मेमूना भाई कभी कमर को खुजाते चुग्गा खां को देखते हैं, तो कभी देखते हैं उस खुजली वाले कुत्ते को ! बस, फिर क्या ? वे इस मंज़र को देखकर, न मालुम उनको ऐसा क्यों लगता है कि ‘कहीं यह खुजली की सिहरन, उनके बदन पर शुरू तो नहीं हो रही है ?’ अब इन दोनों का लगातार बदन खुजाने का यह मंज़र, उनके लिए देखना बर्दाश्त के बाहर है ! अब वे, गुस्से से बेनियाम हो जाते हैं ! फिर क्या ? मुग्गल्लज़ गालियां बकते हुए, कुत्ते पर सारा गुस्सा उतार बैठते हैं ! ज़मीन से पत्थर उठाकर उस खुज़ली वाली कुत्ते पर फेंक-फेंककर, आख़िर उसे बगीचे से बेदख़ल करके ही इतमिनान की साँस लेते हैं !]

मेमूना भाई – अरे, हरामी के पिल्ले ! कमज़ात तुझको यही बगीचा मिला, खुजाने के लिए ? अब तू जाता है, बाहर ? या मारूं, तेरे पिछवाड़े पर चार लात ! कमबख्त मेरे बगीचे में पड़िया-पड़िया खुजा रिया है ?

[इतना कहकर, ज़मीन से पत्थर उठाकर, उस पर बार-बार फेंकते हैं ! आख़िर उसे बगीचे से बेदख़ल करके ही, दम लेते हैं ! इधर चुग्गा खां के बदन की खुज़ली, बर्दाश्त के बाहर ? बेचारे चुग्गा मियां, अब हाय तौबा मचाने लगे ! और उधर कुत्ते की फज़हत में बोले गए मेमूना भाई के बोल वे अपने ऊपर ले लेते हैं ! फिर क्या ? झल्लाते हुए, वे कहते हैं !]

चुग्गा खां – [झल्लाते हुए, ज़ोर से कहते हैं] – हाय..हाय ! पूरा बदन इन जानलेवा घमोरियों से जल रहा है, ख़ुदा रहम ! और यह दोज़ख़ का कीड़ा मुझे गालियां बकता हुआ मेरे घाव पर नमक छिड़क रहा है, हाय अल्लाह..इसे ज़रूर जहन्नुम नसीब करें ! [सोचते हुए] अब, इस बदन को कैसे ठंडा करूं ? अब तो आक़िल मियां के पास जाता हूँ, फिर उनसे कोल्ड ड्रिंक मंगवाकर उधार के रुपये ले लेता हूँ !

[फिर क्या ? चुग्गा खां फावड़े को औजारों के बॉक्स में रखकर, वापस बगीचे में आ जाते हैं ! फिर आक़िल मियां के पास जाने के लिए, पांवों में चप्पल डालते हैं ! इसके बाद कमीज़ पहनने के लिए, नीम के डाल की तरफ़ अपना हाथ बढ़ाते हैं...ताकि, वे अपना सफ़ेद कमीज़ पहन सके ! मगर यह सफ़ेद कमीज़ जो दिखने में ऐसा लगता है, मानों मियां ने उसे टीनाफोल से धोया हो ? मगर मियां के नसीब में लिखा नहीं, कि वे उस उज़ले, सफ़ेद और चमकदार कमीज़ पहनकर इतराए ! ख़ुदा जाने क्यों नीम की डाल पर बैठा क़लाग़ [कौआ] उड़ता है, और कमबख्त उड़ते-उड़ते गर्म-गर्म बींट छोड़ देता है ! कुछ बींट गिरती है, कमीज़ पर ! तो कुछ गर्म-गर्म बींट गिरती है, उनकी सुराहीदार कमर के ऊपर ! गर्म-गर्म बींट उनकी कमर पर गिरते ही, उनकी कमर इस जलन बर्दाश्त नहीं कर पाती है ! जलन के मारे, चुग्गा खां चिल्ला उठते हैं ! फिर क्या ? फिर ज़नाब, बिना देखें बोल देते हैं!]

चुग्गा खां – [गुस्से से उबलते हुए, कहते हैं ज़ोर से] – हाय अल्लाह, तू रहम कर ! [उड़ते क़लाग़ के ऊपर निशाना साधकर पत्थर फेंकते हैं] क़लाग़ तेरी ऐसी की तैशी, कमबख्त यह मेरी कमर है, तेरा पाख़ाना नहीं ! जब मर्ज़ी आये तब इस पर बींट छोड़कर उड़ जाता है ?

[गुस्से से उबलते हुए, उस उड़ते क़लाग़ [कौए] का निशाना बनाते हुए एक पत्थर फेंकते हैं..मगर निशाना चूक जाता है ! फिर क्या ? वह पत्थर उसे न लगकर चोट लगा देता है मेमूना भाई के सर पर ! फिर दर्द के मारे मेमूना भाई के हाथ से पाइप छूट जाता है, जो गोल-गोल घूमता हुआ चुग्गा खां के मुंह पर आकर गिरता है ! इस पाइप से निकला जा रहा पानी, मुंह के साथ-साथ उनके कमीज़ के ऊपर भी गिर पड़ता है ! अपने गीले कमीज़ को देखकर, चुग्गा खां का गुस्सा बढ़ जाता है और लाल-पीले होकर वे ज़ोर-ज़ोर से बोलने लगते हैं !]

चुग्गा खां – [चिल्लाते हुए, कहते हैं] – मार डाला रे, अभी कमर अंगारे की तरह धधकती है तो कभी हमारे कमीज़ का हो जाता है सत्यानाश !

[उनकी चीख-पुकार सुनकर मेमूना भाई पाइप को बरामदे में रखकर वापस झट बगीचे में लौट आते हैं, और आकर चुग्गा खां से कहते हैं !]

मेमूना भाई – अमां यार, क्या हाय तौबा मचा रखी है ? यदा-कदा कभी आपकी बिरादरी वाले आपकी सुराहीदार कमर को पाख़ाना समझकर बींट कर भी दे, तो क्या बिगड़ता है तुम्हारा ? मियां आपको खुश हो जाना चाहिए, आख़िर ये क़लाग़ ठहरे आपकी बिरादरी के !

चुग्गा खां – [नाराज़गी के साथ, कहते हैं] – होंगे तुम्हारी बिरादरी के, आ गए कमबख्त यहाँ.. इस नामाकूल क़लाग़ की हिमायत करने ?

[तभी छुट्टी का वक़्त हो जाता है, शमशाद बेग़म झट जाकर छुट्टी की घंटी लगा देती है ! फिर क्या ? उधर मेमूना भाई को भी घर जाने की उतावली मचने लगी है ] वे झट, चुग्गा खां से कह देते हैं !]

मेमूना भाई – आप तो ज़नाब, बड़े बाबूजी ठहरे ! हम तो ठहरे, छोटे जैलदार ! इसलिए सुबह ही हमने दी थी आपको, नत्थी करने के लिए हमारी जोइनिंग की दरख्वास्त ! [मंद-मंद मुस्कराते हैं] हुज़ूर, अब आप रुके रहना ! दफ़्तर का काम बहुत पेंडिंग पड़ा है, उसे पूरा करते आना ! रवाना होते समय, स्कूल के ताले-वाले भी देख लेना हुज़ूर ! जिम्मेदारी का काम ठहरा आपका, कहीं चूक न हो जाय ? अच्छा, अब हम चलते हैं !

[यहाँ की बकवास को अधूरी छोड़कर, मेमूना भाई हंसी के ठहाके लगाते हुए अपने क़दम बरामदे की तरफ़ बढ़ा देते हैं !]

चुग्गा खां – [दुखी होकर, कहते हैं] – आख़िर, यह भांडा किसने फोड़ा ? किसने बताया, इस कमबख्त को..कि, हम दफ़्तरेनिग़ार नहीं हैं ? अक्सर, रात को चौकीदारी करने वाले, चौकीदार ठहरे !

[छुट्टी की घंटी लगने से, बगीचे में बैठी बच्चियां यकायक बस्ते उठाकर चिल्लाती हुई भागती है गेट की तरफ़ !]

बच्चियां – [चिल्लाती हुई, ज़ोर से कहती हुई भगती है] – छुट्टी हो गयी, भागो..भागो !

[रास्ते के बीच में खड़े चुग्गा खां को धक्का देती हुई ये बच्चियां, बस्ता उठाये गेट की तरफ़ बढ़ जाती है ! बेचारे चुग्गा खां का कोमल बदन, उनके धक्के को क्या झेल पाता ? बेचारे धक्के से, चारों खाने चित्त हो जाते हैं ! जब वे उठते हैं, तब-तक बगीचे से बाहर निकालने का रास्ता पूरा पैक हो जाता है ! अब इनका आक़िल मियां के पास जाना, हो जाता है मुश्किल ! उनसे रुपये उधार लेने, अब कैसे जाया जाय ? अब तो मियां के नसीब में, ख़ाली इन्तिज़ार करना ही लिखा है ! अपनी बुरी दशा देखकर, मियां बरबस मुख से बड़बड़ाने लगते हैं !]

चुग्गा खां – [बड़बड़ाते हैं] – हाय रे, मेरे नसीब ! ख़ुदा रहम ! अब कैसे पहुंचा जाय, आक़िल मियां के पास ? ए मेरे परवरदीगार, यह बच्चियों की दीवार अब कब ख़त्म होगी ? मेरे ख़ुदा, कब मिलेंगे आक़िल मियां से रुपये ?

[गेट पार करके, बच्चियां जा चुकी है, मगर यह दूरी की दीवार अभी-तक ख़त्म नहीं हुई है ! बहुत दूर से आक़िल मियां अपना बैग लिए, स्कूटर की तरफ़ क़दम बढाते नज़र आ रहे हैं ! मगर, उनके पास शीघ्र पहुँच जाना आसान नहीं है ! क्योंकि, उनके आगे-आगे ये स्कूल की मेडमें स्कूटर पर बैठी बाहर निकल रही है ! इधर इन मेडमों का झुण्ड गेट से बाहर निकलता है, और उधर सड़क पर एक चरवाहा भेड़ों का झुण्ड लिए गुज़रता नज़र आता है ! मेडमों के झुण्ड के कारण भेड़ें इधर-उधर बिखर जाती है ! जिससे वह नाराज़ होकर, चिल्लाता हुआ कह बैठता है !]

चरवाहा – [मारवाड़ी भाषा में, चिल्लाकर कहता है] – औ बैनजियां रौ रेवड़ सांतरों है, अरे मालक इनौ चरवाहों कठै मरियौ है म्हारा बाप ?

[बाहर मनु भाई की दुकान के सामने वाली बेंच पर बैठे साबू भाई उस चरवाहे की बात सुन लेते हैं, वे उसे सुनाते हुए ज़ोर से बोलकर ज़वाब देते हैं !]

साबू भाई – [ज़ोर से बोलते हुए, ज़वाब देते हैं] – ग़नीमत है रे, इनका चरवाहा नहीं होना ही अच्छा ! अभी-तक इस रेवड़ के चरवाहे ने तुझको देखा नहीं है, देख लिया होता तो छुट्टी के वक़्त तेरा यहाँ से निकलना बंद हो जाता ?

[मेडमों के गुज़र जाने के बाद, नूरिया बन्ना दिखायी देते हैं ! जो डिस्को डांसर का फ़िल्मी गीत गाते हुए अपनी साइकल उठाते हैं ! उनको बाहर रुख्सत होते देखकर, चुग्गा खां उन्हें ज़ोर से आवाज़ देकर पुकारते हैं !]

चुग्गा खां – [ज़ोर से आवाज़ देते हुए, उसे पुकारते हैं] – अरे ओ, नूरिया बन्ना ! ज़रा ठहरना भाई, स्कूल के ताले जड़ने हैं, आकर मदद...!

[नूरिया ठहरा, उस्ताद ! वह तो आकाश की तरफ़ ऊंचा देखता हुआ, आराम से साइकल बाहर ले आता है ! फिर साइकल पर सवार होकर नौ दो ग्यारह हो जाता है ! अब चुग्गा खां स्कूल के चारों तरफ़ निग़ाहें दौड़ाते हैं, मालुम होता है कि सिवाय चुग्गा खां के सभी रुख्सत हो चुके हैं ! स्कूल में सन्नाटा छाया हुआ है ! अब वे आगे बढ़कर सामने की दुकान पर नज़र डालते हैं, जहां अक्सर आक़िल मियां घर जाते वक़्त थोड़ी देर के लिए वहां रुक जाया करते हैं, साबू भाई से दुआ-सलाम करने ! इसीलिए वे वहां आक़िल मियां का स्कूटर देखना चाहते हैं, शायद वहां पड़ा हो तो वे उनसे मिलकर रुपये उधार ले लें ! मगर, यह क्या ? वहां कहाँ है, स्कूटर ? पता नहीं, आक़िल मियां ने कब अपने कमरे का ताला लगा डाला, और रुख्सत हो गए ? बदक़िस्मत उनकी यही रही कि, दिन-भर बगीचे में काम करते रहे और उनसे रुपये उधार माँगने जा नहीं पाए ! हताश होकर चुग्गा खां बरामदे की ओर अपने क़दम बढ़ाते हैं, वहां पहुँचकर वे सभी कमरों के ताले जड़ देते हैं ! इस काम से फारिग़ होकर, वे मेन गेट के बाहर आकर खड़े हो जाते हैं ! अक्समात उनकी निग़ाह मनु भाई की दुकान पर आकर टिकती है ! वहां उनको नूरिया बन्ना खड़े नज़र आते हैं ! जो खड़े-खड़े गुटका अरोग रहे हैं ! और साथ में वे मनु भाई को शेर सुनाते जा रहे हैं !]

नूरिया – “वो गुनगुनाते रास्ते, ख़्वाबों के क्या हुआ ! वीरान क्यूँ है बस्तियां, बासिन्दे क्या हुए ! हम इतने पागल नहीं हैं, जितना ज़माना समझे ! हम क्या शागिर्द बनते, जो ख़ुद शागिर्द रखते हैं !

[अब बेचारे चुग्गा खां अपने आपको तन्हाई में पाकर, दुखी हो जाते हैं ! ऐसा लगता है, इस स्टाफ का कोई बन्दा उनका नहीं है, सभी उनको छोड़कर चले गए हैं ! बेचारे अब होंठों में ही शाइर सीन काफ़ निज़ाम का शेर गुनगुनाते रह जाते हैं !]

चुग्गा खां – [होंठों में ही, गुनगुनाते हैं] – “माजी की हर चोट उभर आयी है ! ये दर्द मिरी जाँ का तमन्नाई है...आ जाओ किसी तरह कि ताहेद्द-नज़र तन्हाई है, तन्हाई, तन्हाई है !”

[चुग्गा खां हताश होकर, साइकल उठाते हैं अपनी ! संध्या होने जा रही है ! चुग्गा खां अपने घर की ओर चल देते हैं ! उनके ऊपर उड़ता रहा कबूतरों का झुण्ड भी, अपने घर कुए की तरफ़ उड़ता जा रहा है ! दोनों का मक़सद अब एक ही है..बस, कुए की ओर जाना !]




लेखक का परिचय
लेखक का नाम दिनेश चन्द्र पुरोहित
जन्म की तारीख ११ अक्टूम्बर १९५४
जन्म स्थान पाली मारवाड़ +
Educational qualification of writer -: B.Sc, L.L.B, Diploma course in Criminology, & P.G. Diploma course in Journalism.
राजस्थांनी भाषा में लिखी किताबें – [१] कठै जावै रै, कडी खायोड़ा [२] गाडी रा मुसाफ़िर [ये दोनों किताबें, रेल गाडी से “जोधपुर-मारवाड़ जंक्शन” के बीच रोज़ आना-जाना करने वाले एम्.एस.टी. होल्डर्स की हास्य-गतिविधियों पर लिखी गयी है!] [३] याद तुम्हारी हो.. [मानवीय सम्वेदना पर लिखी गयी कहानियां].
हिंदी भाषा में लिखी किताब – डोलर हिंडौ [व्यंगात्मक नयी शैली “संसमरण स्टाइल” लिखे गए वाकये! राजस्थान में प्रारंभिक शिक्षा विभाग का उदय, और उत्पन्न हुई हास्य-व्यंग की हलचलों का वर्णन]
उर्दु भाषा में लिखी किताबें – [१] हास्य-नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” – मज़दूर बस्ती में आयी हुई लड़कियों की सैकेंडरी स्कूल में, संस्था प्रधान के परिवर्तनों से उत्पन्न हुई हास्य-गतिविधियां इस पुस्तक में दर्शायी गयी है! [२] कहानियां “बिल्ली के गले में घंटी.
शौक – व्यंग-चित्र बनाना!
निवास – अंधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर [राजस्थान].
ई मेल - dineshchandrapurohit2@gmail.com


 










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