रचनाकार परिचय:-


लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित
dineshchandrapurohit2@gmail.com

अँधेरी-गळी, आसोप री पोळ रै साम्ही, वीर-मोहल्ला, जोधपुर.[राजस्थान]
अंक तीन
“आज़कल..गधे को भी बाप बनाना पड़ता है !”
लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित
 



नए किरदार – [१] फन्ने खां – रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी, स्कूल की विकास समिति के मेंबर एवं साबू भाई के दोस्त ! श्याम वर्ण, चेहरे पर चेचक के दाग नाक के नीचे घनी सफ़ेद बाँकड़ली रौबदार मूंछें !


हाजी मुस्तफ़ा - स्कूल की विकास समिति के मेंबर एवं साबू भाई के दोस्त ! रंग गोरा, तीखे नाक-नक्श !

[मंच रोशन होता है, स्कूल के बाहर का मंज़र नज़र आता है ! मेन गेट के सामने मनु भाई की दुकान दिखायी दे रही है ! अभी वहां मनु भाई ग्राहकों को किराणे का सामान तोलकर दे रहे हैं ! पड़ोस वाली कमठे मेटिरियल की दुकान पर बैठे साबू भाई, फ़ोन का चोगा उठाये लम्बी गुफ़्तगू में मशगूल है ! तभी मोहल्ले के मौजीज़ मुसाहिब जनाब फन्ने खां अपने दोस्त हाजी मुस्तफ़ा के गले में हाथ डाले हुए वहां तशरीफ़ रखते हैं ! वहां आकर दोनों मुसाहिब पत्थर की बेंच पर बैठ जाते हैं ! अब फन्ने खां साहब मनु भाई को सलाम करते हुए कहते हैं !]

फन्ने खां – [सलाम करते हैं] – वालेकम सलाम, मनु भाई !

मनु आई – [बेरुख़ी से] – वालेकम सलाम ! [होंठों में ही, कहते हैं] आ गए निक्कमें, ग्राहकी के वक़्त ! ऐसे मर्द्सूद पैदा हो गए इस मोहल्ले में, कमबख्त व्यापारी को चार पैसे कमाने नहीं देते ! अभी कहेंगे आकर, “लाओ शतरंज, जमाते हैं मोहरे !”

फन्ने खां – [उतावलेपन में, कहते हैं] – क्या सोच रहे हो, मियां ? लाओ ना, शतरंज ! फिर आकर जम जाओ इस बेंच पर मोहरे बिछाकर !

मनु भाई – [शतरंज और उसके मोहरे थमाते हुए, कहते हैं] – अजी जनाब, आप ही बिछाएं शतरंज और उसके मोहरे ! हम तो जनाब, बैठें हैं दुकान पर ! बैठेंगे तो कमाएंगे, चार पैसे ! चार पैसे कमाएंगे, तो अपना और घर वालों का पेट भरेंगे !

[उधर अपनी दुकान पर बैठे साबू भाई के कानों में, मनु भाई की आवाज़ सुनायी देती है ! फ़ोन पर बात ख़त्म होते ही, वे फ़ोन को चोगे पर रखते हैं ! फिर ज़ोर से मनु भाई को आवाज़ देते हुए, कहते हैं !]

साबू भाई – [फ़ोन रखकर, फन्ने खां को देखते हुए कहते हैं] – ओ मनु भाई ! निक्कमे आज़म आ गए क्या ? ख़ुदा जाने, कहाँ से आ जाते हैं, ये निक्कमें ? आज़कल ये निक्कमें इंसान, किसी व्यापारी को चार पैसे कमाने से मरहूम कर देते हैं !

फन्ने खां – [झुंझलाते हुए, कहते हैं] – क्यों साबू साहब, हमने आपको कुछ नहीं कहा ? फिर आप, क्यों मुंह से आग उगल रहे हैं ? काहे की करते हैं आप, इतनी लग्व ? कहीं आपको अलील हो गया हमें देखकर, क्या कहूं अब आपको..? हमारे आते ही जनाब, आप हो जाते हैं बेकैफ़ ?

साबू मियां – क्या कहा, मियां ? हमारा ही धंधा ख़राब करते हो, और हम कुछ न बोलें ? क्या, आप क्या जानते हैं ? बड़ी मुश्किल से एक ग्राहक हाथ आया, उससे गुफ़्तगू कर रहा था फ़ोन पर ! और, आपने गुड़-गोबर कर डाला !

फन्ने खां – क्या हो गया, मियां ? आसमानी फ़रमानी आ गयी, क्या ? आँख पर ठिकड़ी रखकर, बोल रहे हैं जनाब ? ऐसा हमने क्या कर डाला, जो आप इतने लाल-पीले होते जा रहे हैं ?

साबू भाई – जनाब, आपने ऊँची आवाज़ में बोलकर उसे भड़का दिया ! वह बेचारा कह रहा था कि, इन तेज़ आवाजों के आगे मुझे कुछ सुनायी नहीं दे रहा है ! बाद में, इतमिनान से बात करूंगा !

फन्ने खां – [हंसते हुए, कहते हैं] – काहे की फ़िक्र, करते हो यार ? नूरे खरादी के जाव की ज़मीन बेचनी है, कोई शीश महल बेचने नहीं बैठे थे आप ?

साबू भाई – शीश महल न सही, मगर आप उसे बेशकीमती तसवीर ही समझ लीजिये ! जिसे बेचकर, हम उसकी क़ीमत मार्केट में हज़ारों क्या लाखों रुपये वसूल कर सकते हैं ! जानते हैं आप, यह ज़मीन का टुकड़ा सरदार समंद हाई वे रोड पर आया हुआ है ?

फन्ने खां – तसल्ली रखो, मियां ! सबको अपनी चीज़ क़ीमती लगती है, मगर क़ीमत तुजुर्बेदार इंसानों की नज़रों में होनी चाहिए ! अभी सुबह ठीक नौ बजकर दस मिनट पर, आपको यहाँ दाऊद मियां के दीदार हो जायेंगे...वे ज़मीन बिकवा देंगे, आपकी सही दामों में ! आख़िर, जनाब दाऊद मियां ठहरे आपके एहबाब !

[फन्ने खां के दोस्त हाजी मुस्तफ़ा जो पहले से इस बेंच पर बैठे हैं, वे बिना पूछे बीच में बोल पड़ते हैं !]

हाजी मुस्तफ़ा – सौ टका सही बात कही आपने, दाऊद मियां सौदा पटा न पाए, तो स्कूल के लाइब्रेरियन साहब शेर खां ज़रूर आपकी ज़मीन बिकवा देंगे ! वे ठीक दोपहर के १२ बजे स्कूल में दाख़िल होंगे, वे उस्ताद हैं ज़मीन के प्लोटों की जानकारी के !

मनु भाई – उस्ताद क्यों नहीं, इन दोनों का काम फिर है क्या ? अजी जनाब, इनके सिवाय स्कूल में दो-दो दफ़्तरेनिग़ार बैठे हैं काम करने, फिर दाऊद मियाँ को काम करने की क्या ज़रूरत ? और इधर स्कूल की कोई लड़की आती नहीं किताब इशू कराने ? फिर, क्या काम करेंगे हमारे शेर खां साहेब ? बस, दोनों साहेबान के पास वक़्त ही वक़्त !

साबू भाई – फिर ये दोनों साहेबान, करते क्या हैं ?

मनु भाई - फिर दोनों उस्तादों का काम क्या ? ज़र्दा चखना, और हफ्वात हांकना ! या फिर नींद लेना, और क्या ?

साबू भाई – फिर क्या ? इन निक्कमों को करना क्या ? पूरी जिस्म की ताकत लगा देंगे, इन फ़िज़ूल के कामों में !

हाजी मुस्तफ़ा – अजी साहब, स्कूल की छुट्टी होने के बाद ये दोनों मुअज्ज़म घर जाने के लिए..स्कूल से पैदल ही निकलते हैं ! रास्ते में कई लोगों से मुलाक़ात करते हुए, आख़िर तक़रीबन शाम के साढ़े सात बजे अपने रिहायशी मकान पहुंचते हैं !

साबू भाई – अरे बिरादर, इन दोनों की बेग़में इन पर भरोसा कतई रखती नहीं ! क्या कहूं, आपको ? इनके निकलने के बाद घर से इनकी बीबियां तहक़ीकात में जुट जाती है ! अरे जनाब, बार-बार इनकी बीबियों के फ़ोन हमारी दुकान पर आते हैं !

[पहली पारी की मोहतरमा ग़ज़ल बी और जैलदार मेमूना, स्कूल का मेन गेट पार करके बाहर आते हैं ! ग़ज़ल बी अपने घर की तरफ़ क़दम बढ़ा देती है, मगर गुफ़्तगू के शौकीन रहे मेमूना भाई आकर बेंच पर बैठ जाते हैं ! उनके बैठ जाने से ये निक्कमें लोग, अपनी चल रही गुफ़्तगू बंद नहीं करते ! यहाँ तो मनु भाई भी, आगे कहते जा रहे हैं !]

मनु भाई – साबू भाई, ग़नीमत है...आपने शेर खान साहेब की बीबी की तल्ख़ आवाज़ नहीं सुनी, परसों की बात ठहरी..आपके यहाँ हाज़र न होने के कारण हमने फ़ोन का चोगा उठाया क्या जनाब ? ऐसा लगा...बस, कोई इंसान नहीं जंगजू शेरनी दहाड़ रही हो ?

हाजी मुस्तफ़ा – यह गरज़ती आवाज़ ज़रूर, शेर खान साहेब की बीबी की होगी ! फिर, मोहतरमा ने कुछ कहा होगा ?

मनु भाई – अजी साहेब क्या कहूं, आपसे ? उनकी बीबी गरज़कर ऐसे बोली “इतना वक़्त, कहाँ गुज़ार दिया ? यह कोई वक़्त है, घर रवाना होने का ? यह घर है, या सराय ? अजी क्या कहूं, आपसे ? आवाज़ सुनकर हम तो दहल गए ! हाय अल्लाह, हमें तो शक हो गया...कहीं यह फ़ोन हमारी खातून का तो नहीं ?

हाजी मुस्तफ़ा – फिर क्या हुआ, बिरादर ?

मनु भाई – हाजी साहेब, कौन उलझे ऐसी शेरनी से ? हमने डरकर चोगे को क्रेडिल पर रख दिया, तभी घंटी बजने लगी ! हाय ख़ुदा, यह तो क़िस्मत हमारी ख़राब रही ! हमने चोगा उठाया, अरे सुना क्या हुज़ूर ? सुनकर, हमारा जिस्म थर-थर कांपने लगा !

हाजी मुस्तफ़ा – फिर क्या हुआ, बिरादर ?

मनु भाई – मोहतरमा की कड़कती आवाज़ चोगे से निकली कि “कैसे बदतमीज़ हो मियां ? क्या आपको किसी मोहतरमा से बात करने की तहज़ीब नहीं, हम आकर वहा आपको तहज़ीब सिखाएं क्या ?

साबू भाई – आप तो जनाब साबिर ठहरे, कुछ बोले नहीं ?

मनु भाई – हमने तो यही समझा कि हम अपनी खातून से बात कर रहें हैं ! बस हमने, बस इतना ही कहा कि “मेरी महबूबा, नाराज़ मत हो...” बस, हमने प्यार से इतना ही कहा, हुज़ूर ! बस, आसमानी फ़रमानी आ गयी ! वह चीखकर बोली, कि “बदतमीज़ ! किसको कह रिया है, महबूबा ? जानता नहीं, हम शेर खान साहेब की खातून बीबी बेनजीर हैं !

हाजी मुस्तफ़ा – [हंसते हुए, कहते हैं] – फिर तो हुजूरे आला की पतलून, गीली हो गयी होगी ?

साबू भाई – जनाबे आली, वक़्त ख़राब है ! तसलीमात अर्ज़ करता हूँ, इन एहाबाबों की बीबियों से दूर रहना ही अच्छा है ! जनाब, ये...

मेमूना - मैं आपको राज़ की बात बताता हूँ, जनाब ! आपके ये दोनों एहबाब जब छुट्टी होने पर स्कूल से निकलते हैं तब ये दोनों सीधे अपने घर नहीं पहुंचते, स्कूल से घर तक के सफ़र में, इन लोगों की कई दफ़्तरों के दफ्तरेनिग़ारों से मुलाक़ात होती है ! अरे जनाब, ये सभी इनकी राह में आंखें बिछाए खड़े मिलते हैं ! इनको इन्तिज़ार रहता है कि, कब ये दोनों महानुभव उधर से गुज़रे और ये लोग उनसे मिलकर अपना काम सलटा लें !

साबू मियां – इन लोगों से, ये दोनों क्यों मिलेंगे ? ये दोनों तो, बिना मतलब किसी से बात भी नहीं करते हैं !

मेमूना – साबू साहेब, महकमें के लोगों से महकमें की ताज़ी जानकारियाँ हासिल करेंगे तो इन मुसाहिबों से ज़मीन के प्लोटों की जानकारी ! कई मर्तबा इनको, क़र्ज़ लेने वाले ज़रूरतमंद जान-पहचान वाले मिल जायेंगे, जो अपनी अबसार बिछाए इनका इन्तिज़ार करते...

हाजी मुस्तफा – बस फिर, क्या ? इन दफ़्तरेनिग़ारों से ढेर सारी जानकारी हासिल करेंगे जैसे तबादलों की ! फिर क्या ? चर्चा का मसाला, इनकी जेब में ! किनका तबादला हो रहा है, व किनका तबादला क्यों रोका गया ?

फन्ने खां – फिर क्या ? यह सारा मसाला यहाँ इसी बेंच पर बैठकर, हम लोगों के बीच परोस दिया करते हैं ! और इसके बदले हम उनको जानकारी देते रहते हैं कि, इस मोहल्ले में कौन-कौन है सफ़ेदपोश ? किस-किस के बीच चल रहा है, याराना ? अजी हम तो यह भी बताते रहे है इनको कि, हमारे एम.एल.ए. साहेब का याराना मोहल्ले की किस-किस औरत के साथ चल रहा है ?

साबू भाई – अरे छोड़िये, इनके इस याराना को ! हमें तो खाली, अपना याराना दाऊद मियाँ के साथ बढ़ाना है ! जो अभी आकर इसी बेंच पर बैठकर, ज़मीन के प्लाट के ग्राहक लाकर हमारी हर्ज़-बुर्ज़ मिटाने वाले हैं ! लीजिये देखिये, उधर..[सड़क की ओर, उंगली का इशारा करते हैं] साइकल थामे, दाऊद मियाँ आ रहे हैं !

[सबकी निग़ाह, दाऊद मियाँ पर गिरती है ! दाऊद मियाँ को देखते ही, मेमूना भाई बेंच से झट ऐसे उठते हैं, जैसे उन्हें बिजली का करंट लग गया हो ? फिर, वे घबराते हुए कहते हैं !]

मेमूना – [घबाराते हुए, कहते हैं] – लो आ गए, साहब बहादुर ! [सभी से कहते हैं] सलाम, साहब बहादुरों ! अब तो हमें रुखसत हो जाना चाहिए, कहीं आली जनाब हमें कोई स्कूल का काम नहीं सौंप दे ? अब छुट्टी होने वाली है, खुदा कसम कहीं वक़्त ख़राब न कर दें हमारा ?

[फिर क्या ? तेज़ क़दम चलते हुए, वापस स्कूल में दाख़िल हो जाते हैं ! थोड़ी देर बाद, दाऊद मियाँ वहां पहुंचते हैं ! अपनी साइकल को बबूल के पेड़ के सहारे खड़ी करके, जनाब आकर बैठ जाते हैं बेंच पर ! फिर क्या ? साबू भाई झट अपना उल्लू सीधा करने के लिए, आकर बैठ जाते हैं उनके पहलू में !]

साबू भाई – [दाऊद मियाँ के नज़दीक बैठकर, कहते हैं] – सलाम, दाऊद मियाँ ! खैरियत है ? [मनु भाई से] ज़रा मनु भाई, ज़र्दे की पेसी थमाना ! चलिए, दाऊद मियाँ को सुर्ती चखाते हैं !

[मनु भाई दाऊद मियाँ को ज़र्दे की पेसी थमा देते हैं ! अब दाऊद मियाँ पेसी से ज़र्दा और गीला चूना निकालकर, उसे अपनी हथेली पर रखकर अंगूठे से मसलते हैं ! फिर, लबों पर मुस्कान लाकर साबू भाई से कहते हैं !]

दाऊद मियाँ – [लबों पर मुस्कान लाकर] – वालेकम सलाम, मियाँ ! आप जैसे एहबाबों की दुआ से, अब खैरियत है ! बस, आपकी मेहरबानी से जी रहे हैं हुज़ूर ! ना तो हम जैसे निक्कमों को कौन पूछता है ?

[फिर साबू भाई और मनु भाई को सुनाते हुए, पास बैठे फन्ने खां साहब से कहते हैं !]

दाऊद मियां – [फन्ने खां साहब से, कहते हैं] – क्यों, फन्ने खां साहब ? आप भी इस बात की तसलीम करते हैं या नहीं ? कहीं हमने, क़ाबिले एतराज़ बात तो न कह दी ?

[फन्ने खां साहब अपनी घनी मूंछों पर ताव देते हैं, फिर लबों पर मुस्कान छोड़ देते हैं ! मगर, बोलते कुछ नहीं ! तब, साबू भाई पछताते हुए कहते हैं !]

साबू भाई – [पछताते हुए, कहते हैं] – हैं हैं हैं..! हमें अफ़सोसनाक ज़हालत में न डाले, हुज़ूर ! जबीं यह है...

फन्ने खां – हाँ बिरादर, आप ठहरे साबू भाई ! काम ऐसे करते हैं जैसे “नहर पर चल रही है पनचक्की, धुन की पूरी पक्की, काम की पक्की !” खैर, आ जाइए मक़सद पर..अब समझा दीजिये अपना मफ़हूम...आखिर, आप चाहते क्या हैं ?

हाजी मुस्तफा – ये अब क्या कहेंगे, अब आपसे ? सच्च यही है, इन निक्कमों से काम लेना आसान है ! इस कारण, एरा-गैरा आदमी इन निक्कमों को काम सौंप दिया करते है !

साबू भाई – [आब-आब होते हुए, कहते हैं] – गुस्ताख़ी के लिए, माफ़ी चाहता हूँ ! [फन्ने खां साहब की तरफ देखते हुए, कहते हैं] फन्ने खां साहब, आप जैसे दानिशों को हमने निक्कमा कहा ! क्या करें ? मगर, अब मज़बूरी है ! क्या कहूं, आपसे ? अब तो जनाब, ऐसा वक़्त आ गया है आज़कल..गधे को भी बाप बनाना पड़ता है !

दाऊद मियाँ – [मंद-मंद मुस्कराते हुए, कहते हैं] - जनाब, आगे यह भी कह दीजिएगा कि “काम बनाने के लिए गधे की लात भी खानी पड़ती है !” [उठते हैं]

साबू भाई – [चौंकते हुए, कहते हैं] – कहाँ चल दिए, बिरादर ? आपकी लातें, दुलती जो भी आप कहें, सहनी तो पड़ेगी ही ! अजी ये आपकी लाते और दुलती नहीं है, पैसों की बरसात है !

[हथेली पर ज़र्दे और चूने को अच्छी तरह से मसलकर, उन्होंने अच्छी-ख़ासी सुर्ती बना डाली है ! अब वे दूसरे हाथ से, उस सुर्ती फटकारा लगाते हैं ! जिससे खंक फैलती है, जो पास बैठे साबू भाई के नासा-छिद्रों में चली जाती है ! फिर क्या ? आली जनाब छींकों की झड़ी लगा देते हैं ! मगर अब तो वक़्त-वक़्त की बात है, जनाब साबू साहब अब बेनियाम नहीं होते है ! क्योंकि, अब तो मियाँ को गधे की लात और दुलती खानी अच्छी लगती है ! अपने होंठों के नीचे सुर्ती दबाकर, अब सभी बैठे मुअज्ज़मों को सुर्ती चखाते हैं ! फिर, मनु भाई को पेसी सौंपकर साबू भाई से कहते हैं !]

दाऊद मियाँ – हुक्म कीजिये, मेरे आका ! इस गधे के लिए क्या हुक्म है ?

साबू भाई – [होंठों के नीचे सुर्ती दबाते हुए, कहते हैं] – हुआ यूं बिरादर, आज़कल हमारा धंधा कुछ मंदा चल रहा है ! इधर सीमेंट के भाव बढ़ गए और उधर बाज़ार में मंदी ! पैसा लौटकर वापस नहीं आ रहा है, जनाब ! इस बात से आप पूरे वाकिफ़ हैं, हुज़ूर !

दाऊद मियाँ – इस गधे के बिरादर, अब आप वापस याद दिला दीजिये ! वैसे भी मोहल्ला-ए-आज़म साबू भाई, अभी आप निक्कमें ही हैं...हम निक्कमों की तरह ! अब तो आप और हम एक ही बिरादरी के निकले, यानि आपको निक्कमा कह दें या गधे के बिरादर ! फिर, काहे की औपचारिकता ?

साबू भाई – आपका पड़ोसी जग्गू मियाँ है, ना ? उसका मकान हमारे पास गिरवी पड़ा है, अब पैसे देकर छुड़ाना तो दूर, यह मरदूद ब्याज भी नहीं दे रहा है !

दाऊद मियाँ – इसमें पूछने की क्या बात है ? ले लीजिये ब्याज, किसने मना किया है आपको ? हम आपकी खिलाफ़त कभी नहीं करेंगे ! जब चाहे आप डंडे मारकर, उससे ब्याज वसूल कर सकते हैं ! जनाब, आपको कोई नहीं रोकेगा !

साबू भाई – यही मुसीबत की जड़ है, हुज़ूर ! उसका मकान बिकवाने के लिए जिस-किसी ग्राहक को मकान देखने भेजता हूँ, उसके सामने यह नामाकूल ग़रीबी का रोना रोकर उसे भगा देता है ! हाय अल्लाह, अब पैसे कहां से लाऊं ?

दाऊद मियाँ – [बेंच पर वापस बैठते हुए, कहते हैं] अब बताइये, मेरे मुअज्ज़म अब आपकी क्या ख़िदमत करूँ ?

साबू भाई – देखिये जनाब, नूरे खरादी के जाव में हमने सौ बाई सौ का एक प्लाट खरीद रखा है ! क्या बताऊँ जनाब, आपको ? अब वहां बस्ती बसने लगी है ! बस हुज़ूर, ख़ाली पक्की सड़क नहीं बनी हैं !

दाऊद मियाँ – अरे जनाब, क्या आपने मुझको मुनिस्पलटी का वार्ड मेंबर समझ रखा है ? अब जाइए, जाइए अपनी पड़ोसन मुन्नी तेलन के पास..जो आपके मोहल्ले की वार्ड मेंबर है ! वह ज़रूर सड़क बनवा देगी ! न बनवाये तो कहिये आप अपने एहबाब एम.एल.ए. साहेब को, वे ज़रूर अपने बज़ट के कोटे में सड़क बनवा देंगे !

साबू भाई – जनाब, आप ग़लत समझ रहे हैं ! मुझे सड़क नहीं बनवानी है, बस ख़ाली अपना प्लाट बिकवाना है ! कुछ पैसे हाथ आ गए तो, मैं भी आपके कुछ काम आ सकूंगा !

दाऊद मियाँ – [लबों पर मुस्कान लाकर, कहते हैं] – देखो साबू भाई, गए महीने हमने मज़ीद मियाँ कबाड़ी के जाव से कुछ प्लाट ख़रीदे हैं ! अरे साहेब, क्या बताऊँ अब आपको ? सारी रक़म प्लाट ख़रीदने में काम आ गयी ! अब हमारे पास रोकड़ रक़म बिलकुल बची नहीं ! आप हमारे अज़ीज़ ठहरे, अगर आप...

साबू भाई – सकोंच मत कीजिये, कह दीजिये ! आपकी हर शर्त मंज़ूर है, जनाब ! बोलिए मेरे एहबाब, आप क्या कहना चाहते थे ?

दाऊद मियां – बात ऐसी है, हुज़ूर ! आपका प्लोट बिकवाने के लिए, हमें ग्राहक ढूँढ़कर लाना होगा ! ग्राहक ढूँढ़ने के लिए बहुत मेहनत करनी होगी, यह भी हो सकता है हमें स्कूल से छुट्टी लेनी पड़े ! बस, आप...

साबू मियाँ – आप तो जनाब, अपना काम बोलिए..आपके लिए क्या किया जाय ?

फन्ने खां – [साबू भाई से] – मैं राज़ की बात बता देता हूँ, आपको ! बस, आप दो परसेंट कमीशन दे दीजिएगा दाऊद मियां को ! फिर, सौदा पक्का ! आखिर घोड़ा बिना घास खाए कैसे दौड़ेगा, बिरादर ? [दाऊद मियाँ की तरफ देखते हुए] अब तो, खुश ?

[दाऊद मियां अपने लबों पर मुस्कान छोड़ते हैं ! फिर, दोनों आराम से बैठकर प्लाट के मुद्दे पर गुफ़्तगू करने लगते हैं ! स्कूल की छुट्टी होने का वक़्त हो गया है, हमेशा की तरह सितारा मेडम के शौहर वहां आ गए हैं ! अपनी मोटर साइकल को स्टैंड पर खड़ी करके, अब वहां खड़े-खड़े अपनी बीबी का इन्तिज़ार करते हैं ! तभी स्कूल में, छुट्टी की घंटी लग जाती है ! पहली पारी की सभी बच्चियाँ बैग लटकाए स्कूल गेट से बाहर निकलती है, और जल्द ही उनके क़दम घर की तरफ बढ़ जाते हैं ! अब इन दोनों की गुफ़्तगू पूरी हो गयी है, दाऊद मियां उठते हैं
और साबू भाई से कहते हैं !]

दाऊद मियां – [उठकर, कहते हैं] – अब रुखसत होना चाहता हूँ, हुज़ूर ! अब आप, फ़िक्र न करें ! प्लाट बिकवाने का भार, अब मेरे कन्धों पर आ गया है ! बस, आप प्लाट के कागजात की फ़ोटो कोपी और जाव के काटे गए प्लोटों के नक़्शे की कोपी मेरे पास भेज देना !

साबू भाई – शुक्रिया, बिरादर ! आपको ज़रा तकलीफ़ दी !

दाऊद मियाँ – [हंसते हुए, कहते हैं] – अब यह निक्कमा गधा, अपने बिरादर साबू भाई के मुंह से ढेंचू ढेंचू की मधुर आवाज़ सुनना चाहेगा ! क्या जनाब, क़ाबिले एतराफ़ है ?

[साबू भाई को छोड़कर, सभी बैठे मुअज्ज़म, ठहाके लगाकर जोर से हंस पड़ते हैं ! अब दाऊद मियां, साइकल थामे स्कूल में दाख़िल होते दिखाई देते हैं ! उनके जाते ही फन्ने खां साहेब मनु भाई को अपने पास बैठाकर, शतरंज खेलना शुरू करते हैं ! साबू भाई और हाजी मुस्तफ़ा साहब, उनके खेल को तन्मय होकर देख रहे हैं ! धीरे-धीरे, मंच की रोशनी लुप्त हो जाती है !]




लेखक का परिचय
लेखक का नाम दिनेश चन्द्र पुरोहित
जन्म की तारीख ११ अक्टूम्बर १९५४
जन्म स्थान पाली मारवाड़ +
Educational qualification of writer -: B.Sc, L.L.B, Diploma course in Criminology, & P.G. Diploma course in Journalism.
राजस्थांनी भाषा में लिखी किताबें – [१] कठै जावै रै, कडी खायोड़ा [२] गाडी रा मुसाफ़िर [ये दोनों किताबें, रेल गाडी से “जोधपुर-मारवाड़ जंक्शन” के बीच रोज़ आना-जाना करने वाले एम्.एस.टी. होल्डर्स की हास्य-गतिविधियों पर लिखी गयी है!] [३] याद तुम्हारी हो.. [मानवीय सम्वेदना पर लिखी गयी कहानियां].
हिंदी भाषा में लिखी किताब – डोलर हिंडौ [व्यंगात्मक नयी शैली “संसमरण स्टाइल” लिखे गए वाकये! राजस्थान में प्रारंभिक शिक्षा विभाग का उदय, और उत्पन्न हुई हास्य-व्यंग की हलचलों का वर्णन]
उर्दु भाषा में लिखी किताबें – [१] हास्य-नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” – मज़दूर बस्ती में आयी हुई लड़कियों की सैकेंडरी स्कूल में, संस्था प्रधान के परिवर्तनों से उत्पन्न हुई हास्य-गतिविधियां इस पुस्तक में दर्शायी गयी है! [२] कहानियां “बिल्ली के गले में घंटी.
शौक – व्यंग-चित्र बनाना!
निवास – अंधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर [राजस्थान].
ई मेल - dineshchandrapurohit2@gmail.com


 










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