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कोरोना काल में सोसाईटी गेट [लघुकथा] - नीरज त्यागी

दो साल पहले की ही बात है, शर्मा जी के पड़ोस में चोरी हो गई थी। चोरी कोई बड़ी नहीं थी, गुप्ता जी की पुरानी कार चोर ले गया था। शर्मा जी ने फिर भी पड़ोसियों को समझाया कि मोहल्ले के दोनों ओर लोहे के गेट लगवा लेते हैं। चोरी की संभावना समाप्त हो जाएगी। एक गार्ड को ड्यूटी पर रख लेंगे। सब मिलकर उसकी महीने भर की तनख्वाह दे दिया करेंगे। शर्मा जी की बात केवल गुप्ता जी को समझ में आई, जिनके घर में चोरी हुई थी। सभी का एकमत था कि ऐसी घटना हो ही जाती हैं। इसके लिए पुलिस में रिपोर्ट करनी चाहिए। कुछ समाजवादी किस्म के विचार थे कि मोहल्ले में जिन जिन के पास कार है उन्हें ही सुरक्षा की आवश्यकता है, वे ही गेट लगवायें और गार्ड रखें।

कोरोना ने अब दस्तक दी है तो सबको समस्या हो गयी। कौन कैसे मुहल्ले के अंदर चला आ रहा है इसका लेखा-जोखा कौन रखेगा। अब जब सोसाईटी में बैठक हुई तो कार-बेकार समका मत एक हो गया। तय हुआ कि गेट भी लगेगा, गार्ड भी रखा जायेगा। शर्मा जी इस बात पर मन ही मन मुस्कुराए। कोरोनाकाल के वह किया हाल कि जो सालों से न हुआ वह सप्ताह भर में निर्विवाद हो गया। क्या हर काम का समय होता है या कि काम समय पर ही होता है?

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