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पीली रोशनी का समंदर [कहानी]-विपिन पवार




पीली रोशनी का समंदर [कहानी]-विपिन पवार 

लाल, पीला, दोहरा पीला, हरा – सिगनलों के यही रंग तो उसे साथ देते हैं रात के घने अंधियारे में । जब नामदेव अकेला चमड़े की बड़ी-सी थैली में 10 पटाखों से भरा एक डिब्‍बा, एक हाथ सिगनल बत्‍ती, टार्च, माचिस रखकर, कमीज की ऊपरी जेब में सीटी तथा बीड़ी का बंडल सहेजकर, एक हाथ में बत्‍ती टांगने का डंडा तथा दूसरे हाथ में हाथ सिगनल बत्‍ती लेकर, अंधेरे में चमकने वाली नारंगी रंग की कमीज पहने हुए, अपने 6 किलो के साज़ो-सामान के साथ कड़कड़ाती बिजलियों, खून को जमा देने तथा हड्डियों को कंपा देने वाली ठंड, दृश्‍यता को बाधित करने वाली मूसलाधार बारिश तथा चिलचिलाती धूप में रेल की पटरी पर चलता चला जाता है, तब उसकी आदत में शुमार हो गया है, सिगनल के खंबे को छूकर माथे और फिर छाती से हाथ लगाना ।

‘अरे ! इस सिगनल देवता की पूजा न करूं, तो रात का यह भयानक सफर कैसे कटें ? यही लाल, पीली, दोहरी पीली और हरी रोशनी को देखकर ही तो मैं आगे बढ़ता हूं । कौन कहता है कि घने जंगल में गश्‍तीदार (नाइट पेट्रोलमैन) अकेला रेल की पटरी पर चलता हैं ? मेरे आगे तो यही रोशनियां होती है, जो गाड़ी को राह दिखाती है ।

नामदेव की बीट पुणे से 137.66 कि.मी. की दूरी पर स्थित जरंडेश्‍वर स्‍टेशन से प्रारंभ होती थी । वह सातारा स्‍टेशन के पास बने अपने रेलवे क्‍वार्टर से पैदल ही अपने काम पर जरंडेश्वर स्‍टेशन पहुंचता था । उस दिन जरंडेश्‍वर स्‍टेशन पहुंचते ही उसने स्‍टेशन मास्‍टर के कमरे में प्रवेश किया तो देखा कि जरंडेश्‍वर स्‍टेशन पर रात पाली में नईम मास्‍टर साहब हैं, तो वह सलाम करने के बाद वहीं रूक गया, मास्‍टर अपने काम में मशगूल थे, उनका ध्‍यान उसकी ओर नहीं गया था । नईम मास्‍टर अभी-अभी नौकरी पर लगे है, शादी भी नहीं हुई है, एकदम मस्‍त मौला, लेकिन हैं, देवता आदमी । हालचाल पूछेंगे, चाय पिलाकर ही रवाना करेंगे । उसने मास्‍टर को जोरदार सलाम किया, उन्‍होंने मुस्‍कुराकर जवाब दिया, 11023 डाउन सह्याद्री एक्‍सप्रेस को लाइन क्लियर दे रहे थे, रूट सेट किया, बटन कॉलर लगाए, ब्‍लॉक उपकरण का हत्‍था घुमाया और फोन पर प्राइवेट नंबर दिया। नामदेव को कहा,

‘ नामदेव, रूको, जरा 11023 निकाल दूं ।

’ गाड़ी निकालने के बाद प्राइवेट नंबर देकर फारिग हुए तो मेरे घर परिवार के पूरे हालचाल लेकर प्‍वाइंट्समैन लहानू को चाय बनाने के लिए कह दिया । चाय पीकर मैंने कप, प्‍लेट, बर्तन आदि धो दिए और अपनी किताब में मास्‍टर साहब के दस्‍तखत लेकर उनको सलाम कर उनकी लंबी उम्र की दुआएं करता हुआ आगे बढ़ गया ।

सिंगल लाइन सेक्‍शन पर आगे-पीछे दोनों तरफ देखना होता है, पता नहीं कब कौन-सी गा़ड़ी किस दिशा से आ रही हो । मैंने घने अंधेरे में रेल की पटरी पकड़ ली, टार्च की रोशनी में रेल की फिटिंग्‍स को देखते-देखते आगे बढ़ने लगा । दोनों ओर घना जंगल, सियारों की हुआं-हुआं सुनाई दे रही थी । एक दो कि.मी.चलने के बाद अचानक लगा कि कुछ दूरी पर पटरी पर तीन-चार लोग खड़े है । जैसे-जैसे निकट पहुंचा तो पाया कि तीन आदमी खड़े आपस में बाते कर रहे हैं । टार्च की रोशनी फेंकी तो दिखाई दिया कि सबके हाथ में हथियार हैं, एक के हाथ में पिस्‍तौल, दूसरे के हाथ में लाठी, तीसरे के सब्‍बल, जान कांप गई। अरे ! ये तो चोर-डाकुओं का गिरोह लगता है । चलो ! छोड़ो, अपने को क्‍या करना है ? अपना काम तो रेल लाइन की सुरक्षा करना है । उनकी अनदेखी करने का मन बनाकर कनखियों से उनको देखते हुए, जैसे ही उनके पास पहुंचा, तो एक आवाज आई,

‘ मिस्‍त्री ! बीड़ी है क्‍या ? ’

चलते कदमों को जैसे ब्रेक लग गए । तब तक तीनों पास में आ गए थे । तीनों ने मुंह पर कपडा बांध रखा था । जेब में हाथ डालकर बीड़ी का बंडल और माचिस निकाली और उन्‍हें दे दिया । कौन इनसे पंगा ले, सोचकर कदम बढ़ाए ही थे कि आवाज आई,

‘ मिस्री, ये लो,

’ तीन बीडि़यां निकालकर उन्‍होंने बंडल और माचिस वापिस कर दी थी । बोले,

‘ चलो, तुम अपना काम करो, हमें अपना काम करने दो । ’
मैंने आगे बढ़ने में ही अपनी भलाई समझी ।
सामने दूर सातारा का पीला डिस्‍टेंट सिगनल दिखाई दे रहा था, मेरा हौसला बढ़ा, मेरा डिस्‍टेंट मेरे साथ है । सावधानी से रेल पथ को देखते-देखते आगे बढ़ रहा था कि सातारा के पीले होम सिगनल को देखकर लगा कि मैं अपने घर पहुंच गया हूं । यहां से सातारा स्‍टेशन थोड़ी ही दूरी पर है । पीला होम सिगनल देखकर मैंने आदतन पीछे देखा, किसी गा़डी की हेड लाइट दिखाई नहीं दे रही थी । तो, मैं अतीत की गहराईयों में डूबता चला गया । उस दिन शेवंता के साथ बहुत झगड़ा हुआ था । सुबह-सुबह जब मैं घर पहुंचा, तो गौरी गाय ने रंभाना शुरू कर दिया । बहुत दूर से ही वह मेरी उपस्थिति को सूंघ लेती है । ईश्‍वर ने मनुष्‍य और पशु के बीच में यही विभेद किया है कि आत्‍मीय व्‍यक्ति भी जब तक बात न कर लें, पता नहीं चलता कि यह अपना आत्‍मीय है और गौरी जैसा मूक प्राणी मेरी गंध पाते ही रंभाने लगता है, इससे शेवंता को पता चल जाता है कि उसका पति घर आ रहा है । मेरी आदत है कि घर पहुंचते ही बा़ड़े में जाकर गौरी के गले में हाथ डालता हूं, उसके जबड़े को सहलाता हूं, उसके पूरे शरीर पर हाथ फेरता हूं, वह भी प्रत्‍युत्‍तर में लगातार पूंछ हिलाकर मेरे प्रेम की पावती देती रहती है । मुझे गौरी से इतना लगाव एवं अपनत्‍व क्‍यों है, इसका भी कारण है । रेलवे कवार्टर में मेरे पड़ोस में रहने वाला गैंगमैन रंगा एक तो दिन भर शराब के नशे में धुत रहता है, काम पर जाता भी है, तो तमाम गलतियां करने के कारण सस्‍पेंड हो जाता है, सस्‍पेंशन में उसने एक दिन चिढ़कर मुझसे बहुत गाली-गलौच की, लेकिन मैंने ध्‍यान नहीं दिया, पिए हुए आदमी से क्‍या बहस करना ? मैं गौरी को दूह रहा था, लेकिन जब रंगा की गालियां, ताने एवं उलाहने बढ़ते ही गए तो मैंने दूध दूहना छोड़कर उठना ही मुनासिब समझा । दूध का बर्तन वहीं छोड़ दिया । काफी समय के बाद जब शेवंता ने देखा कि मैं चुपचाप कमरे के एक कोने में बैठा हुआ हूं, तो पूछा कि-
‘ आज दूध नहीं दूहा, बर्तन कहां है ? ’ तो मैंने कहा कि,
‘ वो साला रंगा, उसको ज्‍यादा चढ़ गई है, मुझे बहुत गालियां दे रहा है, कहता है तू तो साला सरकार का चमचा है, ऐसी हालत में मैं तो दूध नहीं दूह सकता । वहीं पड़ा होगा, जा, तू लेकर आ ! ’
शेवंता गई और उलटे पैरों लौटकर आई, कहा कि-
‘ देखो, तुम्‍हारी गौरी के नखरे, जितना दूध तुमने दूहा था, लात मार कर गिरा दिया, अब मैं बच्‍चों को क्‍या दूं ? तुम्‍हें तो सुबह की चाय भी काली ही पीनी पड़ेगी जो तुम पियोगे नहीं । मांजी को दूध के साथ रात की दवाई देनी पड़ती है, दूध के बिना कैसे दूं ? तुम्‍हें तो अपने काम के अलावा कुछ सूझता ही नहीं है । सारे समय सिर्फ काम, काम और काम । कभी तो घर और अपने परिवार की चिंता किया करो । इतने सालों तक काम करने के बाद तुम्‍हे रेलवे ने दिया ही क्‍या है । ये पुराना-सा क्‍वार्टर और लोहा-लंगड़ की थैली और टार्च । ’

पत्‍नी की न रूकने वाली बक-बक से नामदेव त्रस्‍त हो गया, उठा और आंगन में आया, गौरी की ओर देखा, तमाम दूध जमीन पर बिखरा हुआ, गौरी को देखा, तो वह बिखरे हुए दूध के बीच शान से खड़ी हुई है, पास ही एक डंडा पड़ा हुआ था, उसने उठाया,
‘ हरामखोर, खा-खा कर मस्‍ती चढ़ गई है ।
’ और लगा उसे पीटने । पीटते-पीटते गौरी के शरीर पर निशान पड़ गए पर वह बेचारा मूक प्राणी प्रतिरोध तो छोड़ो, अपनी पीड़ा भी व्‍यक्‍त करने में संकोच कर रहा था । पीटते-पीटते नामदेव के हाथ थक गए, तो उसने डंडा एक और फेंक दिया और धम्‍म से जमीन पर बैठ गया । उतने में एक आवारा कुत्‍ता आया, जिसे कभी-कभी शेवंता रोटी का एकाध टुकड़ा दे दिया करती थी । आज तो उसे लगा कि शेवंता ने खीर परोस दी है । लेकिन उसने अपनी लपलपाती जीभ निकालकर जैसे ही जमीन पर बिखरा हुआ दूध पिया, एक दो सेकंड में ही जमीन पर लोट गया, शरीर अकड़ गया, मुंह से झाग निकलने लगा और वह एक-दो मिनट में ही शांत हो गया । नामदेव के तो होश ही फाख्‍़ता हो गए । बिजली की तेजी से उठा, देखा तो दूध के बर्तन के पास ही फसलों के कीटनाशक की खाली बोतल पड़ी हुई है। किसी ने, किसी ने क्‍या, रंगा ने दूध में जहर मिला दिया था । नामदेव ने गौरी को देखा, उसकी बड़ी-बड़ी पनीली आंखें उसे ही देख रहीं थी । वह भागकर उससे लिपट गया, उसके गले लगकर खूब रोया, पैरों पर गिर पड़ा, जब शेवंता ने उसे उठाया, तब उसे होश आया।
शिकायत का कोई फायदा नहीं, रंगा के खिलाफ पहले से ही इतनी शिकायतें दर्ज हैं कि उसके शिकायत करने से सिर्फ फाइल की मोटाई ही बढ़ेगी । वह दिन भर सोता रहा, शाम को उठा, गौरी की सेवा की, खाना खाया, अपने सामान का झोला उठाया और अपने काम पर जरंडेश्‍वर स्‍टेशन की ओर चल पड़ा । रास्‍ते में लहानू मिला, लहानू सातारा स्‍टेशन पर प्‍वाइंट्समैन है, ड्यूटी से वापस आ रहा था । बोला,
‘ क्‍या काका ! सिर पर लाल साफा लपेटकर ऐसे अकड़कर ड्यूटी पर जा रहे हो, जैसे पेशवाओं की लाल पुणेरी पगड़ी पहने सरदार लड़ाई पर जा रहा हो ? ’ नामदेव मुस्‍करा दिया और कहा कि-
‘ बेटा ! यह लाल पगड़ी रेलवे पेशवा की सनद ही तो है और मैं रात-भर संरक्षा और सुरक्षा की लड़ाई लड़ने ही तो जा रहा हूं । ’
आज नईम मास्‍टर के चेहरे पर उदासी की रेखाएं देखकर उसको अच्‍छा नहीं लगा । पता नही क्‍यों हम अपने मन-मस्तिष्‍क में व्‍यक्ति विशेष के चेहरे पर भावों को स्‍थायी रूप से चस्‍पां कर देते हैं, नईम मास्‍टर के चेहरे पर वहीं होंठों के कोनों से फिसलती मुस्‍कान होनी चाहिए, टीआई शर्मा के माथे पर तनाव भरी लकीरों के साथ छोटी-छोटी मिचमिचाती आंखे ही होनी चाहिए, पीडब्‍ल्‍यूडी हनुमंता का चेहरा हमेशा ऐसे ही खिलखिलाकर हंसता, खिला हुआ होना चाहिए, सेक्‍शन के पीडब्‍ल्‍युआई दातार के सफेद-सफेद एक जैसे दांत हमेशा दिखाई देने चाहिए । उसकी हिम्‍मत नहीं हुई कि मास्‍टर साहब से कुछ पूछे । चुपचाप किताब आगे बढ़ा दी । लहानू ने बताया कि मास्‍टर साहब की माताजी बहुत बीमार है तथा वह 12147 अप निजामुद्दीन एक्‍सप्रेस से कल अपने घर आगरा जा रहे हैं ।
नामदेव के कदम जहां थे, वहीं थम गए । वह तेजी से मास्‍टर साहब के पास गया और कहा कि-
‘ मास्‍टर साहब, आप चिंता न करें । मांजी जल्‍दी ठीक हो जाएंगी, हम आपके आने तक रोज गणेश जी की आरती कर मांजी के ठीक होने की प्रार्थना करेंगे । ’
नईम मास्‍टर के चेहरे से गायब हुए मुस्‍कुराहट के स्‍थायी भावों ने फिर नामदेव को वहां रूकने नही दिया ।
उस दिन वर्षा रानी अपने पूरे यौवन पर थी । सुबह से शुरू हुई बारिश और अब तक रूकने का नाम नहीं । वैसे भी सातारा क्षेत्र में बारिश कुछ ज्‍यादा ही होती है । एक तो यह छह किलो को बोझ ऊपर से बारिश...... बार-बार बत्‍ती बुझ जाती है, माचिस गीली हो जाती है, वह अलग । पिछले साल जब सातारा स्‍टेशन के पास ही आरओबी के नीचे एक लोको फेल हुआ था तो वह भी वहां खड़ा हो गया था, असिस्‍टेंट राकेश साहब ने अपना लाइटर मुझे दे दिया था, कहा था कि
‘ दादा ! रखो, बारिश में तुम्‍हारे काम आएगा । ’
राकेश बाबू से सातारा रनिंग रूम के सामने मुलाकात हुई थी, जब वे नए-नए नौकरी में आए थे और मैंने उन्‍हें भींगता देखकर उनके सिर पर अपना छाता तान दिया था । आज की इस नई पीढ़ी को पता नहीं इतनी गालियां क्‍यों दी जाती हैं, मैं आए दिन सुनता हूं न बाबू लोगों की बातें । पता नहीं क्‍या–क्‍या जनरेशन गैप जैसी बातें करते हैं, जो अपनी समझ में तो नहीं आती । खैर, उसके बाद जब भी राकेश बाबू मिलते हैं, तो दुआ-सलाम कर देता हूं । बस ! इतना ही रिश्‍ता है मेरा और उनका । हालांकि लाइटर मेरे काम नहीं आया, एक तो चालू नहीं होता, चालू हो जाए तो बंद नहीं होता, शायद मुझे चलाना नहीं आता है, यह सोचकर मैंने उसको बक्‍से में रख दिया है ।
139/4-5 कि.मी. पर स्थित कर्मचारी रहित (अनमेन्‍ड) समपार फाटक पर पहुंचकर थोड़ी देर रूक गया । सोचा एक बीडी जला लूं । अब नहीं हो पाता इतना काम । थक जाता हूं । उस दिन पीआई फटाणकर बाबू बता रहे थे कि- ‘ सत्‍तावन साल से ऊपर वालों के बच्‍चों को रेलवे नौकरी पर रख लेगी, लेकिन बच्‍चे की उमर 18 साल होनी चाहिए । ’
वह सोचने लगा कि मेरी तो 15 से ऊपर की दो लड़कियां है, जग्‍गू तो अभी सिर्फ तेरह का है, और मेरा काम मेरी बेटियां तो कर नहीं सकती । बीड़ी का आखिरी कश लगाकर नामदेव आगे बढ़ गया । कुछ दूर आगे जाने पर उसे लगा कि लाइन पर कुछ अवरोध है, हांलाकि यहां से अंधेरे में कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था । उसने अपनी चाल तेज कर दी । उसे मालूम है कि 104/9-2 कि.मी. पर अनमेन्‍ड गेट है और सातारा के निकट होने के कारण इस गेट पर वाहनों की आवाजाही रात में भी होती रहती है । अब उसने दौड़ना शुरू कर दिया । हांफते-हांफते गेट पर पहुंचा तो देखा कि एक ट्रैक्‍टर, जिसके पीछे ट्राली लगी हुई है, गेट पर खड़ा है । आसपास किसी का पता नहीं, वह जोर से चिल्‍लाया
‘’अरे ! किसका है ये ट्रैक्‍टर, हटाओ यहां से ।‘’
अंधेरे से कोई आवाज नहीं आई । वैसे भी अंधेरा जवाब नहीं देता । अंधेरा तो मौन होता है, रोशनी की कोई किरण ही उसका जवाब बनती है । उसे मालूम है कि अप दिशा से गोवा एवं सह्याद्री एक्‍सप्रेस आ सकती है, डाउन से सह्याद्री या फिर फिर कोई मालगाड़ी ही आ सकती है । उसके तो होश फाख्‍़ता हो गए । पैरो तले की जमीन खिसकती नज़र आई । अब क्‍या होगा ? कोई गाड़ी आ जाए तो ? लेकिन यह समय हिम्‍मत हारने का नहीं था । उसके दिमाग ने तेजी से हरकत करना प्रारंभ कर दिया । उसने डाउन में देखा, सारे सिगनल लाल रंग की कतार में थे । अप का कोई सिगनल उसे पीला दिखाई नहीं दिया । उसने एक लंबी सांस ली और देखा कि ट्रैक्‍टर से जुड़ी हुई ट्रॉली पूरी तरह मिट्टी से भरी हुई है । उसके ऊपर तसले एवं फावड़े भी रखे हुए हैं, शायद इस ट्रैक्‍टर पर पांच-छह लोग सवार होंगे और ट्रैक्‍टर फाटक पर बंद पड़ते ही सब भाग खड़े हुए हैं, उसने देखा कि ट्रैक्‍टर या ट्राली पर कहीं पर कहीं कोई रजिस्‍ट्रेशन नंबर नहीं है । उसने फाटक से पांच मीटर की दूरी पर डाउन दिशा में सातारा की ओर अपने डंडे पर लाल बत्‍ती लगाई और 600 मीटर की दूरी लगभग भागते हुए पार की और एक पटाखा डिब्‍बे से निकालकर लाइन पर लगा दिया । उसकी सांस फूल गई थी, पर अब उसे केवल सैंकड़ों जानों की चिंता थी, फिर भागकर 600 मीटर की दूरी पर 10-10 मीटर की दूरी पर रखा बीच का पटाखा उठाते हुए वह फाटक पर पहुंचा । ट्रैक्‍टर ट्रॉली उसकी जी-तोड़ मेहनत का मजाक उड़ाते हुए वहीं पर अंगद के पांव की तरह जमी हुई थी । उसने इस सब की परवाह न करते हुए अप दिशा में भी सुरक्षा की वैसी ही व्‍यवस्‍थाएं कर दी, जैसी कि डाउन दिशा में कर दी थी । फिर वह फाटक की ओर वापिस चल दिया ।

फाटक पर पहुंचते ही उसे दूर से पीली रोशनी का प्रकाश पुंज रेंग कर उसके करीब आता हुआ दिखाई दिया । अरे ! कोई गाड़ी आ रही है । वह मुंह में सीटी दबाएं, लाल बत्‍ती लेकर तेजी से डाउन दिशा में उस गाड़ी की दिशा में दौड़ने लगा। पता नहीं उसमें इतनी चुस्‍ती-फुर्ती तथा ऊर्जा कहां से आ गई थी कि पचपन साल की उम्र में उसने फाटक से 600 मीटर की दूरी कब पार कर ली, उसे पता ही नहीं चला । उस दिन गोवा एक्‍सप्रेस कुछ देरी से चल रही थी । गोवा एक्‍सप्रेस के पाइलट को जैसे ही दूर से लाल बत्‍ती दिखाई दी, उसने लोको की गति धीमी करनी शुरू कर दी । नामदेव को तो सिर्फ गोवा एक्‍सप्रेस के इंजन की धीरे-धीरे नजदीक आती और क्रमश: बड़ी होती जा रही रोशनी ही दिखाई दे रही थी, जैसे-जैसे रोशनी का वृत्‍त वृहताकार होता जा रहा था, नामदेव की आंखे मूंदी जा रही थी । इंजन बिलकुल पास आ गया और नामदेव की चेतना लुप्‍त हो गई ।

‘’श्री नामदेव धोंडीबा हुलगे, नाईट पेट्रोलमैन, सातारा, पुणे मंडल, मध्‍य रेल ने 137.66 कि.मी. से 142.66 कि.मी. तक अपनी बीट पर रात्रि ड्यूटी करते समय पुणे-सातारा सेक्‍शन पर अपनी सतर्कता, कर्तव्‍य निष्‍ठा, सूझबूझ तथा ईमानदारी का परिचय देते हुए, सुरक्षा के संपूर्ण यथासंभव उपाए किए तथा आपके इन अथक प्रयासों से एक बड़ी दुर्घटना टल गई । आपके इस अनुकरणीय तथा सराहनीय कार्य को देखते हुए आपको रेल मंत्री का स्‍वर्ण पदक प्रदान किया जाता है .....................................’’

उद्घोषिका की मधुर ध्‍वनि कुछ समय तक तो नामदेव को सुनाई दी, लेकिन बाद में नई दिल्‍ली के मांवलकर हॉल में जब वह माननीय रेल मंत्री के कर-कमलों से गर्दन झुकाकर स्‍वर्ण पदक पहन रहा था तो उसे लगा कि उसकी चेतना के द्वार बंद हो रहे हैं और उसके सामने गोवा एक्‍सप्रेस के इंजन की पीली रोशनी का एक समंदर है, जिसमें वह तेजी से डूबता जा रहा है ।

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विपिन पवार

6 सितंबर 1963 को जन्म। प्रथम श्रेणी में हिंदी में एम.ए.। मराठी, हिंदी एवं अंग्रेजी पर अधिकार।
13 वर्ष की आयु में एक लंबी कविता से साहित्यिक यात्रा का प्रारंभ। बाल्यावस्था से ही वक्तृत्व में रुचि।
प्रकाशन- 1. शब्‍दों के परे ( निबंध संग्रह)
2. अक्षरों की मेरी दुनिया ( निबंध संग्रह) - शीघ्र प्रकाश्‍य
3. पीली रोशनी का समंदर ( कहानी संग्रह) - शीघ्र प्रकाश्‍य
4. साहित्यिक पत्रिका ‘सृजन’ एवं आत्मकथा ‘अतीत की पगडंडियां’ एवं
भारतीय रेल की पत्रिकाओं रेल दर्पण, ज्ञानदीप, इंद्रायणी, कोयना, रेल सुरभि, उड़ान आदि का संपादन।
देश की अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में दर्जनों लेख, कविताएं, कहानियां , रिपोर्ताज, यात्रा वृत्तांत एवं साक्षात्कारों का प्रकाशन। आकाशवाणी भोपाल, इंदौर एवं नागपुर से रचनाओं का प्रसारण।
महाविद्यालय शिक्षा के साथ-साथ पत्रकारिता से जीवन वृति प्रारंभ। कुछ समय तक प्रतिष्ठित विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में हिंदी का अध्यापन। भोपाल, नागपुर एवं पुणे में भारतीय रेल के राजभाषा विभाग में विभिन्न पदों पर कार्य करने के उपरांत संघ लोक सेवा आयोग से प्रथम श्रेणी के वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी पद पर चयनित।
संप्रति : उप महाप्रबंधक (राजभाषा), मध्य रेल मुख्यालय, मुंबई छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस
संपर्क : 1, बेरिल हाउस, वुड हाउस रोड, कुलाबा, मुंबई-1
vipkum3@gmail.com
8828110026

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1 टिप्पणियां

  1. बिपीन पवार महोदय से मैं जब भी मिला, मुझे एक अनोखी ऊर्जा की प्राप्ती हुई। उनका मृदुभाषी तथा सादगी पूर्ण व्यक्तित्व माहौल को खूषनुमा बना देता है।

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