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भूख [लघुकथा] – मनोज शर्मा




भूख [लघुकथा] – मनोज शर्मा

दिन कितना हरा भरा था पर शाम होते होते सबकुछ धुंधला अस्पष्ट सा नज़र आने लगा। घर के बाहर बल्ब की मद्धिम रोशनी कुछ दूर जल रहे होलिजन लाइट में कहीं गुम हो रही थी। गली के एक कोने में दो तीन कुत्तों के भौंकने की आवाज़ हुई जिसको सुनकर और कुत्ते भी भौंकने लगे। घर के बाहर बैठा एक मरियल सा पिल्ला भी गुर्राने लगा। ये भी अंधभक्तों की तरह सुर से सुर मिलाने में माहिर होते हैं। कुत्तों को धन का मोह नहीं होता क्योंकि कितनी मर्तवा सामने वाले सेठ का गल्ला खुला पड़ा होने पर भी ये उस ओर नहीं फटकते, लेकिन नीयत इनकी बहुत खराब होती है; दूसरे कुत्ते से ईर्ष्या भी इतनी कि मजाल है बिना भौंके या गुर्राये दूसरा कुत्ता वहां से निकल जाए।

घर में कोई लज़ीज़ भोजन पक रहा है तभी दो एक कुत्ते लार टपकाए बाहर खड़े है मेरी नज़र पड़ते ही उनकी पूंछ खुशी से झूम गयी, आंखे विह्वल होने लगी, चेहरों पर प्रेम छलक आया, मानो कोई बिछड़ा हुआ सखा गले मिलने को आतुर हो। रात घनी होने लगी है। बस्ती अब सूनी हो जाएगी। लोग थक हारकर के सो जाएंगे, पर ये मरियल पिल्ला अभी भी रात्रि भोज की तलाश में भटक रहा है। देर शाम जब कुत्तों के दो परिवारों के मध्य द्वंद्व व शोरशराबा हो रहा था, तब चपाती का एक आध ग्रास किसी दूसरे कुत्ते के मुख में चला गया था। मरियल पिल्ला अपनी पूरी ताकत से भूंक कर लौट चुका था पर भूख के कारण दुबककर रह गया था पर अब लंबी रात खाने की तलाश में ही बीत जाएगी।

बल्ब की पीली रोशनी में पिल्ले का आकार अधिक बड़ा व डरावना दिखता है चूंकि जब भी वो पैरों के पंजों से स्वयं को खुजलाता है तो हवा में लहराती कोई आकृति तेज यंत्र की भांति नज़र आती है। मैंने छत पर से बिस्केट उस पिल्ले की ओर डुलका दिये वो तेजी से दौड़कर एक एक कर सब चट कर गया और ऊपर मेरी ओर देखकर जैसे झूमने लगा उसकी पूंछ फिर से खुशी से नाच रही थी। सभी दरवाजे बंद सूनी गली के दूसरे छोर पर दो एक कुत्ते फिर से भूंकने लगे पर ये मरियल पिल्ला घर की दहलीज पर सिर पेट में समेटे सो गया था •••।

मनोज शर्मा
9868310402

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1 टिप्पणियाँ

  1. साहित्य शिल्पी लेखकों के लिए बहुत अच्छा प्लेटफार्म है।जो नये लेखकों को पहचान देता है

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