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बुधवार, ३१ दिसम्बर २००८

नव वर्ष तुम्हारा स्वागत है [आलेख] - कृष्ण कुमार यादव


भारतीय संस्कृति में उत्सवों और त्यौहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। हर संस्कार को एक उत्सव का रूप देकर उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को स्थापित करना भारतीय लोक संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। सामान्यत: त्यौहारों का सम्बन्ध किसी न किसी मिथक, धार्मिक मान्यताओं, परम्पराओं और ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा होता है। प्रसिद्ध दार्शनिक लाओत्से के अनुसार- ‘‘इसकी फिक्र मत करो कि रीति-रिवाज का क्या अर्थ है? रीति-रिवाज मजा देता है, बस काफी है। जिन्दगी को सरल और नैसर्गिक रहने दो, उस पर बड़ी व्याख्यायें मत थोपो।’’

दुनिया के भिन्न-भिन्न भागों में जनवरी माह का प्रथम दिवस नववर्ष के शुभारम्भ के रूप में मनाया जाता है। भारत में भी नववर्ष का शुभारम्भ वर्षा का संदेशा देते मेघ, सूर्य और चंद्र की चाल, पौराणिक गाथाओं और इन सबसे ऊपर खेतों में लहलहाती फसलों के पकने के आधार पर किया जाता है। इसे बदलते मौसमों का रंगमंच कहें या परम्पराओं का इन्द्रधनुष या फिर भाषाओं और परिधानों की रंग-बिरंगी माला, भारतीय संस्कृति ने दुनिया भर की विविधताओं को संजो रखा है। असम में नववर्ष बीहू के रूप में मनाया जाता है, केरल में पूरम विशु के रूप में, तमिलनाडु में पुत्थांडु के रूप में, आन्ध्र प्रदेश में उगादी के रूप में, महाराष्ट्र में गुड़ीपड़वा के रूप में तो बांग्ला नववर्ष का शुभारंभ वैशाख की प्रथम तिथि से होता है। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ लगभग सभी जगह नववर्ष मार्च या अप्रैल माह अर्थात चैत्र या बैसाख के महीनों में मनाये जाते हैं। वस्तुत: वर्षा ऋतु की समाप्ति पर जब मेघमालाओं की विदाई होती है और तालाब व नदियाँ जल से लबालब भर उठते हैं तब ग्रामीणों और किसानों में उम्मीद और उल्लास तरंगित हो उठता है। फिर सारा देश उत्सवों की फुलवारी पर नववर्ष की बाट देखता है।

मानव इतिहास की सबसे पुरानी पर्व परम्पराओं में से एक नववर्ष है। नववर्ष के आरम्भ का स्वागत करने की मानव प्रवृत्ति उस आनन्द की अनुभूति से जुड़ी हुई है जो बारिश की पहली फुहार के स्पर्श पर, प्रथम पल्लव के जन्म पर, नव प्रभात के स्वागतार्थ पक्षी के प्रथम गान पर या फिर हिम शैल से जन्मी नन्हीं जलधारा की संगीत तरंगों से प्रस्फुटित होती है। विभिन्न विश्व-संस्कृतियाँ इसे अपनी-अपनी कैलेण्डर प्रणाली के अनुसार मनाती हैं। वस्तुत: मानवीय सभ्यता के आरम्भ से ही मनुष्य ऐसे क्षणों की खोज करता रहा है, जहाँ वह सभी दुख, कष्ट व जीवन के तनाव को भूल सके। इसी के अनुरूप क्षितिज पर उत्सवों और त्यौहारों की बहुरंगी झाँकियाँ चलती रहती हैं।

इतिहास के गर्त में झाँकें तो प्राचीन बेबिलोनियन लोग अनुमानत: 4000 वर्ष पूर्व से ही नववर्ष मनाते रहे हैं। यह एक रोचक तथ्य है कि प्राचीन रोमन कैलेण्डर में मात्र 10 माह होते थे और वर्ष का शुभारम्भ 1 मार्च से होता था। बहुत समय बाद 713 ई0पू0 के करीब इसमें जनवरी तथा फरवरी माह जोड़े गये। सर्वप्रथम 153 ई0पू0 में 1 जनवरी को वर्ष का शुभारम्भ माना गया एवं 45 ई0पू0 में जब जूलियन कैलेण्डर का शुभारम्भ हुआ, तो यह सिलसिला बरकरार रहा। 1 जनवरी को नववर्ष मनाने का चलन 1582 ई0 के ग्रेगोरियन कैलेंडर के आरम्भ के बाद ही बहुतायत में हुआ।

नववर्ष आज पूरे विश्व में एक समृद्धशाली पर्व का रूप अख्तियार कर चुका है। इस पर्व पर पूजा-अर्चना के अलावा उल्लास और उमंग से भरकर परिजनों व मित्रों से मुलाकात कर उन्हें बधाई देने की परम्परा दुनिया भर में है। अब हर मौके पर ग्रीटिंग कार्ड भेजने का चलन एक स्वस्थ परंपरा बन गयी है पर पहला ग्रीटिंग कार्ड भेजा था 1843 में हेनरी कोल ने। हेनरी कोल द्वारा उस समय भेजे गये 10,000 कार्ड में से अब महज 20 ही बचे हैं। आज तमाम संस्थायें इस अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित करती हैं और लोग दुगुने जोश के साथ नववर्ष में प्रवेश करते हैं। पर इस उल्लास के बीच ही यही समय होता है जब हम जीवन में कुछ अच्छा करने का संकल्प लें, सामाजिक बुराइयों को दूर करने हेतु दृढ़ संकल्प लें और मानवता की राह में कुछ अच्छे कदम और बढ़ायें।

17 comments:

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

A VERY HAPPY NEW YEAR TO ALL

ALOK KATARIA

Rashmi Singh २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

यह एक रोचक तथ्य है कि प्राचीन रोमन कैलेण्डर में मात्र 10 माह होते थे और वर्ष का शुभारम्भ 1 मार्च से होता था। बहुत समय बाद 713 ई0पू0 के करीब इसमें जनवरी तथा फरवरी माह जोड़े गये। सर्वप्रथम 153 ई0पू0 में 1 जनवरी को वर्ष का शुभारम्भ माना गया एवं 45 ई0पू0 में जब जूलियन कैलेण्डर का शुभारम्भ हुआ, तो यह सिलसिला बरकरार रहा। 1 जनवरी को नववर्ष मनाने का चलन 1582 ई0 के ग्रेगोरियन कैलेंडर के आरम्भ के बाद ही बहुतायत में हुआ।....नव-वर्ष पर बहुत ही ज्ञानवर्धक और खूबसूरत भावाभिव्यक्तियाँ हैं...बधाई स्वीकारें.

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

बहुत अच्छा आलेख है। नव वर्ष की सभी को हार्दिक शुभकामनायें।

निधि २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

नया साल साहित्य शिल्पी के लिये नयी उँचाईया ले कर आये। के.के. यादव जी को अच्छे आलेख व नव वर्ष की शुभकामनायें

नंदन २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

नव-वर्ष कि पूर्वसंध्या पर आपका यह जानकारी पूर्ण तथा तथ्यपरक आलेख बहुत अच्छा लगा। नव-वर्ष की साहित्य शिल्पी के सभी संचालकों व पाठकों को शुभकामनायें।

Dr. Brajesh Swaroop २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

‘‘इसकी फिक्र मत करो कि रीति-रिवाज का क्या अर्थ है? रीति-रिवाज मजा देता है, बस काफी है। जिन्दगी को सरल और नैसर्गिक रहने दो, उस पर बड़ी व्याख्यायें मत थोपो।’'.....प्रसिद्ध दार्शनिक लाओत्से की ये उक्ति प्रस्तुत कर kk ji आपने वाकई मुझे नई राह दिखाई...शुक्रगुजार हूँ.

बाजीगर २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

.....और लो हम भी आ गए नए साल की सौगातें लेकर...खूब लिखो-खूब पढो मेरे मित्रों !!

डाकिया बाबू २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

HAPPY NEW YEAR-2009 to all.

आकांक्षा***Akanksha २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

नववर्ष के आरम्भ का स्वागत करने की मानव प्रवृत्ति उस आनन्द की अनुभूति से जुड़ी हुई है जो बारिश की पहली फुहार के स्पर्श पर, प्रथम पल्लव के जन्म पर, नव प्रभात के स्वागतार्थ पक्षी के प्रथम गान पर या फिर हिम शैल से जन्मी नन्हीं जलधारा की संगीत तरंगों से प्रस्फुटित होती है।
**********************************कितनी मासूमियत की भावाभिव्यक्ति हैं ये खूबसूरत पंक्तियाँ !!

डाकिया बाबू २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

चलिए KK साहब! नए साल पर इतना रोचक लेख पढ़कर मन गदगद हो गया.क्या लिखा है आपने, जादू है.

Ram Shiv Murti Yadav २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

नए साल के आगाज में सुन्दर लिखा है. ढेरों शुभकामनायें और आशीष.

विनय २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

नववर्ष की शुभकामनाएँ

आकांक्षा***Akanksha २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

नया साल...नया जोश...नई सोच...नई उमंग...नए सपने...आइये इसी सदभावना से नए साल का स्वागत करें !!! नव वर्ष-२००९ की ढेरों मुबारकवाद !!!

'Yuva' २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

आप सभी मित्रों और शुभचिंतकों को नए साल के आगमन पर बधाइयाँ.

Ratnesh २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

असम में नववर्ष बीहू के रूप में मनाया जाता है, केरल में पूरम विशु के रूप में, तमिलनाडु में पुत्थंाडु के रूप में, आन्ध्र प्रदेश में उगादी के रूप में, महाराष्ट्र में गुड़ीपड़वा के रूप में तो बांग्ला नववर्ष का शुभारंभ वैशाख की प्रथम तिथि से होता है।....शुभकामनाओं के साथ आपने अच्छी जानकारी भी दी. नव वर्ष-२००९ की आप सभी को सपरिवार शुभकामनायें !!

praveen pandit २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

एक बह्त सुंदर व जानकारी पूर्ण आलेख पढ़वा कर नव वर्ष के लिये मन-मस्तिषक तरो ताज़ा कर दिया।
बधाई आगत वर्ष की।
प्रवीण पंडित

Vijay Kumar Sappatti २३ नवम्बर २००९ ६:५० PM  

yadav ji ,

naye warch par aapki ye jaankari mujhe bahut acchi lagi .

bahut bahut badhai ..

aapka
vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

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