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रविवार, १२ अप्रैल २००९

साधु और चूहा [बाल कविता] - सीमा सचदेव

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इक जंगल मे था इक साधु
जानता था वह पूरा जादु
करता रहता प्रभु की भक्ति
आ गई उसमे अदभुत शक्ति
इक दिन उसने लगाई समाधि
गिरा एक चूहा आ गोदि
साधु को आई बहुत दया
चूहे को उसने पाल लिया

स?ह?त?य श?ल?प?रचनाकार परिचय:-

2 अक्टूबर, 1974 को पंजाब के अबोहर मे जन्मी सीमा सचदेव पेशे से हिन्दी-अध्यापिका हैं। इनकी कई रचनाये जैसे- विभिन्न अंतर्जाल पत्रिकाओ मे प्रकाशित हैं। "मेरी आवाज़ भाग-१,२", "मानस की पीड़ा", "सन्जीवनी", "आओ सुनाऊं एक कहानी", "नन्ही कलियाँ", "आओ गाएं" नामक रचना-संकलन ई-पुस्तक के रूप में प्रकाशित हैं।

पर इक दिन इक बिल्ली आई
देख के चूहे को ललचाई
चूहा तो मन मे गया डर
साधु का हृदय गया भर
उसने अपना जादु चलाया
और चूहे को बिल्ली बनाया
ता कि बिल्ली न खा पाए
और चूहा आजाद हो जाए
कुछ समय तो सुख से बिताया
इक दिन वहाँ पे कुत्ता आया
बिल्ली के पीछे वह भागा
फिर साधु का जादु जागा
बिल्ली से कुत्ता बन जाओ
और कुत्तो से न घबराओ

खुश था चूहा कुत्ता बनकर
घूमे वह जंगल मे जाकर
फिर इक दिन इक चीता आया
कुत्ते को उसने खूब भगाया
भागा कुत्ता साधु के पास
बोला मेरा करो विश्वास
खा जाएगा मुझको चीता
फिर कैसे मै रहुँगा जीता
साधु को आ गया रहम
बोला! न पालो यह वहम
जाओ तुम चीता बन जाओ
सुख से अपना जीवन बिताओ

कुत्ते से चीता बन गया
नव-जीवन उसको मिल गया
भले ही वो बन गया था चीता
पर दिल तो चूहे का ही था
चूहे से बढ कर नही कुछ अच्छा
यह साधु नही बिल्कुल सच्चा
लोगो की बातो मे आया
चूहे को चीता क्यों बनाया
सोचे! मेरी खोई पहचान
माना न साधु का अहसान
गुस्से से गया वह भर
झपट पडा वह साधु पर

साधु को अब हुआ अहसास
नही करो किसी पर विश्वास
फिर से उसको चूहा बनाया
और फिर उसको यह समझाया
दुष्ट नही बदले स्वभाव
अच्छो को देगा वह घाव
बाते करना लोगों का काम
केवल बिगडे अपना दाम

बच्चो तुम भी रखना ध्यान
बड़ों का न करना अपमान
लोगों की बातों मे न आना
अपनी समझदारी अपनाना

8 comments:

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

दुष्ट नही बदले स्वभाव
अच्छो को देगा वह घाव
बाते करना लोगों का काम
केवल बिगडे अपना दाम

बच्चो तुम भी रखना ध्यान
बड़ों का न करना अपमान
लोगों की बातों मे न आना
अपनी समझदारी अपनाना

पुनर्मूषको भव ...... :-)

बढ़िया सीख सीमा जी - शुभाकामना

राजीव तनेजा २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

अच्छी बाल कविता

सीमा सचदेव २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

धन्यवाद साहित्य शिल्पी
साधु और चूहा एक हितोपदेश की कहानी है जिसको काव्य-कथा रूप देने का लघु प्रयास किया है |

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

सीमा जी,

साहित्य शिल्पी पर आपका स्वागत..
.. बहुत ही अच्छी और शिक्षाप्रद कहानी का अच्छी कविता रूपांतरण के लिए

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

सीमा जी,
यह कहानी बचपन में पढी थी आपने कविता के माध्यम से पुरानी यादें ताजा कर दी.

rachana २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

kya baat hai sima ji kitni sunder baat kahi .aur bahut hi majedar tarike se
saader
rachana

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ७:०४ PM  

सीमा जी छुट्टियों के कारण देर आमद रही लेकिन दुरुस्त रचना पढने को मिली।

अमिता २३ नवम्बर २००९ ७:१५ PM  

इतनी सुंदर व् शिक्षाप्रद कहानी को इतनी प्यारी कविता मैं बताया आपने. बहुत ही प्यारी रचना है. मैंने आपकी पहली बार कोई कविता पढ़ी है. धन्यवाद इस सुंदर रचना के लिए. अमिता

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