आत्महत्या [आलेख] - शिवा तोमर

बीबी बच्चे मां बाप यार दोस्त इन सब के लिये कितना करता है फिर भी आत्महत्या.............................. इस विषय पर गहरा चिन्तन करना पड़ेगा....... श्री मदभगदगीता में एक श्लोक है......विषयों का चिन्तन करने वाले पुरूष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से कामना उत्पन होती है, कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध पैदा होता है। क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव हो जाता है। मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता, स्मृति में भ्रम होने से बुद्धि अर्थात ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है, बुद्धि का नाश हो जाने पर पुरूष अपनी स्थिति से गिर जाता है और गिर कर वह व्यक्ति हत्या, डकैती, बलात्कार या आत्म हत्या कुछ भी कर सकता है। मेरा मानना है कि आज यह श्लोक पूरे विश्व की वर्तमान हालत बयान कर रहा है। जिस तरह भारत ही नही सारे विश्व में अपराध, हिंसा, अशांति और आत्महत्या में वृद्धि हो रही है, उसका यही एक कारण है। बात चल रही है आत्महत्याओं की तो सबसे पहले उस संवेदनशील समय से पहले का विचार करना होगा । मैं आपके सामने कुछ केस की थोड़ी हकीकत बताउंगा। एक आदमी था निर्मल सिंह, खूब नशा करता था। एक दिन रात को मैं उठा तो देखा की 3.30 बजे स्मैक पी रहा है। मैंने कहा, “चाचा! अब तो सोने का समय है।“ उसने मुझे कहा कि “शिवा बाबा! जीवन में हर प्रकार की मौज लेने दो ना” और उसने 4.00 बजे फांसी लगा ली। राजेश, पिता का नाम ओमप्रकाश; तिहाड़ जेल में था। रोज वहाँ सबके साथ हंसी मजाक करता रहता था। अचानक फांसी लगा ली। वह भी चरस आदि का नशा करता था। एक आदमी पेसे से डाक्टर था। एक दिन उसकी बीबी से कुछ कहा सुनी हुई और लटक गया पंखे पर। एक ओर लड़का था जो एक लड़की से प्यार करता था और अकेले में बैठकर ऐसे बातें करता था कि जैसे वह सामने ही बैठी हो। उसके घरवालों ने उसे कहा कि तेरी शादी इसके साथ नही हो सकती, तो एक दिन रात को फांसी लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। अगले दिन उसके बिस्तर पर उस लड़की के कई पत्र मिले जिन्हे शायद वह सारी रात पढ़ता रहा होगा। जैसे मैंने अभी तक इतनी आत्महत्याओं का अध्ययन किया तो हर केस में कुछ एक बात समान मिलती है। जैसे कि जो भी इतना खतरनाक कदम उठाता है, उन संवेदनशील पलों से पहले बिलकुल अकेला रहकर, डूबा रहता है, वह खो जाना चाहता है। अपने को मिटा देता है इस समाज, सभी रिश्तों और हर बन्धन से। वह अपने को कहीं डुबा देना चाहता है, चाहे वह नशे में डूबे या फिर किसी की यादों में। उसमें डूबकर अनुभव करता है कि इस वस्तु या व्यक्ति के अलावा मेरा कोई नहीं है। एक बार मेरे सामने भी यह मनहूस घड़ी आयी थी। जहर की शीशी हाथ में थी। आधा घण्टा दरवाजा बंद करके रोता रहा फिर शीशी हाथ में ली, मन में यही विचार था कि वह नहीं तो मेरा कोई नहीं है, तो क्या करूँगा जीकर। इसी बीच एक ऐसा चमत्कार हुआ कि मुझे जीवन मिल गया। मैने अपनी घड़ी में 9 बजे का अलार्म भर रखा था। वह चित्कार उठी। बस सारा नक्शा ही बदल गया। वो ऐसे नाजुक पल होते हैं जिनमें व्यक्ति इतना बड़ा फैसला कर लेता है और वह क्षण बस कुछ ही सैकेंडों का होता है। उस पल अगर कोई बीच में आ जाये तो कुछ नहीं होगा। वह नाजुक पल जब आता है तो व्यक्ति आत्महत्या ही नहीं; हत्या, बलात्कार, कुछ भी कर सकता है। यह मन बड़ा चंचल है। एक क्षण में इधर उधर हो जाता है। यह चाहता है कि कोई इसे प्यार करे और आज व्यस्त युग में मनुष्य के पास हर चीज है, बस समय नहीं है। घर में बच्चे कब तक अकेले रहें। उन्हें तो प्यार चाहिए, अपनापन चाहिए। कोई उनसे बात करे, उनके दिल की पूछे। लेकिन मम्मी पापा के पास समय नही होता, 5-10 मिनट के लिये खाने के समय बात करते हैं तो बस यही पूछते हैं कि कैसी पढ़ाई चल रही है, क्या चाहिए, बेटा तुम्हें अपने भविष्य के बारे में सोचना है, पढ़ाई का ध्यान करना और जाकर सो जाते हैं। बच्चा सुन सुन कर दुखी हो जाता है; परेशान हो जाता है; झल्ला जाता है। जब घर में उसे प्यार नहीं मिलता, कोई उनके दिल की आवाज नही सुनता तो वह कहीं और दूसरी जगह प्यार खोजता है। उस व्यक्ति को खोजता है जो उसको प्यार दे सके, उसकी दिल की आवाज सुन सके। तो वह अपने दोस्तों से सम्पर्क बढ़ाता है और किसी ना किसी में वह तस्वीर देखता है कि यह मेरी दिल की आवाज सुनेगा। और यह मन बड़ा चालू है, विपरीत लिंग की ओर ही प्रभावित होता है। लेकिन यह कार्यक्रम ज्यादा नही चलता। हर व्यक्ति रोज एक सा पाकर भी बोर हो जाता है और जिसे मन अपना समझता है, वह कहीं और भी अपना ठिकाना बना लेता है। जब वह मासूम मन उसे देखता है तो सहन नहीं कर पाता क्योंकि पहले तो अपने मां बाप से नहीं मिला प्यार; बाहर भी खोजा लेकिन जितना वह मासूम मन चाहता है उतना नही मिल पाता। बस टूट जाता है, टूट गयी सारी उम्मीदें। वह अब दुख ओर कष्ट के कुऐं में पड़ा रहता है। अब वह हर तरफ से निराश और मायूस होकर कोई ऐसा रास्ता खोजता है जो सहज और सरल हो। जैसा हम सब जानते है कि दुख ओर कष्ट से निकलने का सबसे आसान तरीका मानते हैं नशा................................. अब वह मन मां-बाप, यार-दोस्त सबसे निराश हो चुका और सिर्फ नशे में ही अपने जीवन का आनन्द सुख समझने तथा अनुभव करने लगता है। यहाँ कई लोग अपने को उस अकेलेपन ओर मायूसी से बचाने के लिये लड़ाई झगड़ा, हिंसा और अपराध में लिप्त कर लेते है। नशे में डूबा हुआ आदमी अपनी वास्तविक स्थिति से गिर जाता है, नशे के सागर या फिर किसी में अपनी तस्वीर देखता हुआ बाकी सारे जहाँ से अलग होकर आत्महत्या में ही आत्मीक सुख और जीवन का आनन्द समझता है और इस संसार में जो भी उसके अपने मां, बाप, भाई, बहन, यार-दोस्त, घर, पैसा, सोहरत सबको अपना नहीं मानता। वह बस अकेला है। यह जग दुश्मन है। यहां इस स्थिति पर आकर वह दुखी मन हत्या भी कर सकता है, बलात्कार औरर आत्महत्या भी। यह भेड़चाल नही है और कोई किसी के बहकावे में आकर भी आत्महत्या नहीं करता। अर्जुन भी यही कह रहा था कि हे कृष्ण! अगर ये सब ही मर गये तो मैं किसके लिये राज्य करूंगा। मेरा मरना भी कल्याण का होगा। जब मेरा परिवार नहीं रहेगा तो मैं जीकर क्या करूंगा। भगवान जानते थे कि ऐसी परिस्थति होगी भविष्य में तो पहले ही इससे बचने के लिये वह रास्ता इस दुनिया को दिया जो हमें इन सभी बीमारियों से मुक्ति दे सकती है वह है श्री मदभगवदगीता!




7 comments:
bahut hi sachi aur savvedan shil tippanhi hai
very true to life ....abd really sentimental hai
बेहतरीन
bahut badhiya post hai
सटीक लिखा है
मेरे हिसाब से जिन्दगी के सारे अहम फ़ैसले एक क्षण में ही होते हैं और वही क्षण जिन्दगी को बदल कर रख देता है... आत्महत्या भी शायद इसी श्रेणी में आती है.
बहुत सही लिखा ,बस एक वो पल निकल जाने दिया जाए , किसी भी तरह , बस फिर शायद कोई आशा का दिया टिमटिमा ही उठे | आत्महत्या करने वाला जिन्दगी का सिर्फ अँधेरा पक्ष ही देखता है और उसी में डूब जाता है , अगर अन्दर एक नेह की बेल पाल ले तो बड़े से बड़े तूफानों का सामना कर सकती है वो बेल , नहीं मिलता तो क्या हुआ , love is one way traffic .
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