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बुधवार, २९ अक्तूबर २००८

जिन्न को क्रेडिट कार्ड [व्यंग्य] - आलोक पुराणिक

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गौरतलब है कि 2007 तक अलादीन किसी भी आम मध्यवर्गीय तरह विवाहित हो चुका था, और किसी भी आम मध्यवर्गीय की तरफ मर्सीडीज टाइप के ख्वाब देखने लगा था, पर किसी भी मध्यवर्गीय की तरह 800 सीसी की चिरकुट गाड़ी तक में पेट्रोल डलवाने के पैसे तक के लिए परेशान होने लगा था।

अलादीन को अचानक एक बोतल सी दिखायी दी।

अरे ये तो वो ही जिन्न वाली बोतल है-अलादीन ने यह कहकर बोतल पकड़ी।

बोतल के अंदर एक बेहद निरीह, कराहमान, थकी, मरी, लुटी, पिटी, कातर, भयभीत, आतंकित, मरगिल्ली, लगभग मरी हुई, लेटायमान अवस्था में जिन्न मिला।

जिन्न की आँख पर पानी की दो बूंदें डालीं अलादीन ने, जब जाकर वह होश में आया।
जिन्न आँख खोलते ही बड़बड़ाने लगा-प्लीज मुझे मत मारो। प्लीज…….. ।

अलादीन ने चकित होकर पूछा-हे जिन्न, पहले जब मुझे तुम मिले थे, तो तुम कितने लंबे, तगड़े, उत्साही होते थे, हर काम को करने के लिए तत्पर, सन्नद्ध, कटिबद्ध, प्रतिबद्ध टाइप। अब ये तुम्हे क्या हो गया है। तुम तो हर इच्छा पूरा करने में समर्थ होते थे। तुम तो बोतलमुक्त हो गये थे, फिर बोतल में काहे घुस गये हो। खैर, मेरी इच्छा पूरी करो, मैंने अपनी बीबी के कहने पर तमाम आइटमों की सेल से खऱीदार कर मारी है क्रेडिट कार्ड के जरिये। अब बताओ, तमाम बैंकों को भुगतान कैसे करुंगा। तुम करवाओ प्लीज।

सुनकर जिन्न फिर बेहोश हो गया और बोतल में घुस गया। और बोला कि बोतल से बाहर आने को ना कहो। बोतल से जिन्न ने जो सुनाया, वह इस प्रकार है-

हे अलादीन, तुम्हारी इच्छाएं पूरी करने के बाद मैं बहुत फेमस हो गया। और फिर तमाम सुंदरियां मेरे पास आने लगीं। फिर मैंने इस तरह के इश्तिहार देखे कि जो सुंदरी से करते प्यार, वो खरीदारी से कैसे करते इनकार। सुंदरियों ने मुझसे 7888888 रुपये डिजाइनर कुरते खरीदवाये, लोन पर। 80 लाख की मोटरसाइकिल खऱीदवायी,पचास बैंकों ने लोन दे दिया मुझे। कई तरह के क्रेडिट कार्ड दे दिये मुझे। पर बाद में मुझे पता चला कि अस्सी लाख के लोन पर 888888 करोड़ का ब्याज एक महीने में हो गया। बैंक वालों ने मेरे घर पर आकर मुझे ठोंकना शुरु कर दिया, मेरी हाईट बीस फुट की थी, ठोंक-पीटकर मुझे सिर्फ चार फुट का कर दिया। घर पे मुझे वो रोज ठोंकते थे। सो मारे डर के मैं बोतल में रहता हूं। प्लीज उन्हे ना बताना। अब कभी बोतल से बाहर नहीं आऊंगा।

लेटेस्ट खबर यह है कि जिन्न ने बोतल से बाहर आने से इनकार कर दिया, कभी भी।
पर बैंक वालों को ना बताइये।

14 comments:

Udan Tashtari २३ नवम्बर २००९ ६:४० PM  

कौन से बैंक वाले को न बताओगे..हमौ बैंक वाले हैं और जान गये हैं...अब अलादीन की खैर नहीं समझो.

एक दिन में दो दो बार आलोक पुराणिक के व्यंग्य..कहीं दिवाली पर बदहजमी न हो जाये.

दिव्यांशु शर्मा २३ नवम्बर २००९ ६:४० PM  

बहुत खूबसूरत व्यंग्य ....हास्य का पुट भी एक दम संतुलित है | सामयिक भी है | इसे पढ़ कर ख्याल आता है की ये दुनिया , ये ख्वाब एक तलिस्म है और हम सब मकान रुपी बोतलों में बंद जिन्न..... डर रहे हैं की कोई बोतल न घिस दे और हमें बाहर न निकलना पड़ जाए .. जानते सब हैं कि बैंक वालो को एक दिन पता पड़ ही जाना है और बोतल से निकलना पड़ेगा.. :-)

अविनाश वाचस्पति २३ नवम्बर २००९ ६:४० PM  

हमें मिलाए रहे होते

पहले इस जिन्‍न से
तो हम भी दो ठो
खरीदारी कर लिए
होते, जब यह बच
जाए और आए बाहर
तो जरूर बतलाना।

ऐसी चमत्‍कारिक जानकारियां
छिपाई नहीं जातीं
और जो छिपाई जाती हैं
वे आपने बतला दी हैं


अब उस जिन्‍न से मिलवा दो

जो आपके व्‍यंग्‍य छापता है

होते तो हमारे भी बेसिर पैर के हैं

पर पड़े रहते ढेर हैं

छपते नहीं क्‍यों

पता नहीं अखबारों से बैर है।


जिन्‍न की तो अब खैर नहीं
समझो, बैंक ऑफ उड़नतश्‍तरी
जिन्‍न की बोतल के पास
पहुंचती होगी बिना पेट्रोल।

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:४० PM  

हा हा...
जिन्न के साथ साथ आजकल बेंक वाले भी वोतल में घुस गये हैं... नये क्रेडिट कार्ड बनाना बन्द कर दिये हैं..

नारदमुनि २३ नवम्बर २००९ ६:४० PM  

aapki rachana, taja hawa ka jhonka. narayan narayan

नंदन २३ नवम्बर २००९ ६:४० PM  

जबरदस्त..इसे कहते हैं व्यंग्य।

राजीव रंजन प्रसाद २३ नवम्बर २००९ ६:४० PM  

"लेटेस्ट खबर यह है कि जिन्न ने बोतल से बाहर आने से इनकार कर दिया, कभी भी।
पर बैंक वालों को ना बताइये।"

आलोक जी के व्यंग्य की धार का कोई भी कायल हो सकता है। आज से समय के साहूकार और महाजन तो बैंक ही हैं और उनका पूरा जाल लील रहा है आम आदमी को...व्यंग्य की चाशनी में लपेट कर एक सच प्रस्तुत है।

***राजीव रंजन प्रसाद

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ६:४० PM  

मैं स्वयं जिन्न बन चुका हूँ और कर ली है इस बैंक वालों से तौबा।

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:४० PM  

एक दम सही व्यंग्य है। बधाई।

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ६:४० PM  

बेचारा जिन्न :)

राजीव तनेजा २३ नवम्बर २००९ ६:४० PM  

मंदी में खरीदारी?....

इसने ने तो एक से एक...बड़े से बड़े तुर्रम खानों के पेच ढीले कर दिए हैँ। आपके इस अलादीनी जिन्न की तो बिसात ही क्या है?...

अच्छा व्यंग्य

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ६:४० PM  

बैंक वाले तो पाताल से जिन्न ढूंढ निकालेंगे। च च च च..बेचारा।

praveen pandit २३ नवम्बर २००९ ६:४० PM  

क्या कहने हैं भैय्या, ज़बरदस्त बात।

प्रवीण पंडित

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:४१ PM  

that was fantastic sir
meenakhi

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