इससे उसका बोध ही, अन्योक्ति का ठौर..[काव्य का रचना शास्त्र: १५] {अलंकारों पर श्रंखला} - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'


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10 comments:
रोचक है। यह अलंकार कविता को प्रभावी बनानें में सक्षम है।
कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना टाईप अलंकार है।
सुन्दर उदाहरणों से सजा आलेख है। आलेख छोटे होने के कारण समझने में आसानी होती है।
मानो, जानो, जैसे, जनु आदि तुलना करने वाले शब्दों के बिना सीधे ही किंसी उपमान के माध्यम से पूरी बात कहने पर अलंकार बनेगा। क्या मैं सही हूँ?
संजीव जी जिन उदाहरणों से लेख प्रस्तुत करते हैं वे SELF-EXPLANATORY होते हैं।
आपनें सही कहा। इस अलंकार को व्यंग्य में भरपूर इस्तेमाल किया जा सकता है। यानि कि गद्य में भी।
आलेख और प्रयास दोनो ही प्रशंसा योग्य हैं।
बहुत अच्छा आलेख है, बधाई।
संग्रहणीय आलेख है, हमेशा की तरह ज्ञानवर्धन हुआ।
संजीव जी!
मैं आपके आलेखों का हमेशा से हीं पाठक रहा हूँ, बस टिप्पणी करना भूल जाता हूँ। आप जो बढिया-बढिया उदाहरण लाते हैं,उसे पढकर दिल खुश हो जाता है और सीखने का भी मजा आता है। मेरी बस यही गुजारिश है कि जो भी छंद/दोहे हिंदी से अलग किसी भी भाषा के हों, मसलन अवधी,ब्रज, उसके अर्थ भी कृप्या बता दिया करें। आपने बस हिंदी वाले छंद का अर्थ बताया है :)
धन्यवाद-सहित,
विश्व दीपक
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