अतिशयोक्ति सीमा हनें [काव्य का रचना शास्त्र: १६] {अलंकारों पर श्रंखला} - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
जब सीमा को तोड़कर, होते सीमाहीन
अतिशयोक्ति तब जनमती, सुनिए दीन-अदीन..
बढा-चढ़ाकर जब कहें, बातें सीमा तोड़.
अतिशयोक्ति तब जानिए, सारी शंका छोड़..
जहाँ लोक-सीमा का अतिक्रमण करते हुए किसी बात को अत्यधिक बढा-चढाकर कहा गया हो, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है.
रचनाकार परिचय:-जहाँ पर प्रस्तुत या उपमेय को बढा-चढाकर शब्दांकित किया जाये वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है.
१. परवल पाक, फाट हिय गोहूँ.
यहाँ प्रसिद्ध कवि मालिक मोहम्मद जायसी ने नायिका नागमती के विरह का वर्णन करते हुए कहा है कि उसके विरह के ताप के कारण परवल पाक गए तथा गेहूं का ह्रदय फट गया.
२. मैं तो राम विरह की मारी
मोरी मुंदरी हो गयी कँगना.
इन पंक्तियों में श्री राम के विरह में दुर्बल सीताजी की अँगूठी कंगन हो जाने का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन है.
३. ऐसे बेहाल बेबाइन सों, पग कंटक-जल लगे पुनि जोये.
हाय! महादुख पायो सखा, तुम आये न इतै कितै दिन खोये.
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करि के करुनानिधि रोये.
पानी परात को हाथ छुओ नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये..
४. बूँद-बूँद मँह जानहू.
५. कहुकी-कहुकी जस कोइलि रोई.
६. रकत आँसु घुंघुची बन बोई.
७. कुंजा गुन्जि करहिं पिऊ पीऊ.
८. तेहि दुःख भये परास निपाते.
९. हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग.
लंका सारी जल गयी, गए निसाचर भाग. -तुलसी
१०. देख लो साकेत नगरी है यही.
स्वर्ग से मिलने गगन को जा रही. -मैथिलीशरण गुप्त
११. प्रिय-प्रवास की बात चलत ही,
सूखी गया तिय कोमल गात.
१२. दसन जोति बरनी नहिं जाई.
चौंधे दिष्टि देखि चमकाई.
१३. आगे नदिया पडी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार.
राणा ने सोचा इस पार, तब तक था चेतक उस पार.
१४. भूषण भनत नाद विहद नगारन के.
नदी नाद मद गैबरन के रलत है..
१५. ये दुनिया भर के झगडे,
घर के किस्से, काम की बातें,
बला हर एक ताल जाए
अगर तुम मिलने आ जाओ.. -जावेद अख्तर.
१६. मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार.
दुःख ने दुःख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार.. -निदा फाज़ली
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18 comments:
आभार जानकारी का!!
अलंकार सिखाने का शुक्रिया
अतिशयोक्ति की परिभाषा सोदाहरण बहुत ही सुन्दर प्रस्तुत की है, इसमे कोई अतिशयोक्ति नही
सलिल जी पुनीत कार्य का धन्यवाद।
बढा-चढ़ाकर जब कहें, बातें सीमा तोड़.
अतिशयोक्ति तब जानिए, सारी शंका छोड़..
परिभाषाओं का काव्यानुवाद, सबसे महत्व का तो यही है।
atishyokti se rochak koi alankar nahin.
Alok Kataria
नये पुराने उदाहरणों का सुन्दर गुलदस्ता सजाया है आपनें। बहुत अच्छा लगा।
क्या अतिश्योक्ति के भी भेद होते हैं?
सुन्दर उदाहरणों के साथ अति-उत्तम आलेख......
आभार आपका......
मेरे ब्लॉग पर आकर आपने अनुग्रहित किया.....
आभार......आपका दिया हुआ लिंक ओपन नहीं हो रहा है........
संग्रहणीय आलेख है। अतिश्योक्ति अलंकार के बहुत अच्छे उदाहरण हैं।
जानकारी प्रद लेख के लिये सलिल जी का आभार.
अलंकार पर बहुत अच्छा आलेख, बधाई।
संजीव जी का यह आलेख उनके इस श्रंखला के अन्य आलेखों की तरह ही उत्कृष्ट है।
सरस सार्थक सुन्दर उपयोगी ज्ञानवर्धक आलेख हेतु बहुत बहुत आभार आपका....
आपकी जितनी प्रसंशा की जाय कम है यह बात अतिश्योक्ति नहीं है।
आचार्य संजीव जी मुझे आपका लेख छोटा लगा। इतने रोचक अलंकार को आपसे और व्याख्या की अपेक्षा रही होगी।
आपके लेखन नें हमेशा ही प्रभावित किया है।
आदरणीय संजीव वर्मा सलिल जी इन दिनों नेपाल में हैं लेकिन उनकी अपने स्तंभ के प्रति प्रतिबद्धता इसी से आँकी जा सकती है कि अपनी तमाम व्यस्ताओं के बावजूद अग्रिम आलेख प्रेषित कर साहित्य शिल्पी के पाठकों को उन्होंने निराश नहीं किया। अलंकार पर जो सामग्री एकत्रित होती जा रही है वह समेशा ही सर्च आदि माध्यमों से विद्यार्थियों/ शोधकर्ताओं आदि के लिये उपलब्ध रहेगी। इन मायनों में सलिल जी का कार्य महत्वपूर्ण भी है।
उदहारण १५ में 'ताल' के स्थान पर 'टल' पढिये.
सभी को धन्यवाद.
प्राम्भिक लेख लम्बे होने पर कुछ पाठकों ने लेख छोटे रखने की बात की थी. अतः, लेख संक्षिप्त रखे गये हैं. एक-दो उदाहरणों की व्याख्या कर शेष को आपके लिए छोड़ दिए जाते हैं ताकि आप स्व्क्यम प्रयास करें तथा कठिनाई होने पर पूछें.
अतिशयोक्ति के भेद कहीं नहीं मिले किन्तु विविध आधारों पर भेद किये जा सकते हैं. यह चर्चा फिर कभी.
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